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अनुवाद कर्म आज भी दोयम दर्जे का माना जाता है: रचना भोला यामिनी

अनुवादक व लेखक रचना यामिनी
अनुवादक व लेखक रचना यामिनी

बात- मुलाकात में रचना यामिनी:

  • मीडिया मिरर की साक्षात्कार श्रृंखला बात- मुलाकात में आज अतिथि हैं अनुवादक व लेखक रचना यामिनी।150 से अधिक लोकप्रिय अंग्रेजी किताबों का हिंदी में अनुवाद किया है। कई किताबें भी लिखी हैं। पत्रकारिता पर भी किताबें लिखी हैं। फरीदाबाद रहती हैं।

मीडिया मिरर सम्पादक प्रशांत राजावत के सवाल
रचना यामिनी के जवाब

सवाल, सबसे पहले अपने बारे में कुछ बताइये संक्षेप में। स्कूलिंग कहाँ से हुई, और उच्च शिक्षा कहाँ से पाई।

जवाब- मैंने अपनी स्कूली शिक्षा फरीदाबाद से ही पूरी की। वाणिज्य में स्नातक की डिग्री लेने के बाद हिंदी में स्नातकोत्तर की डिग्री ली और फिर दिल्ली के भारतीय विद्या भवन संस्थान से पत्रकारिता (हिंदी) में डिप्लोमा लिया। पत्र-पत्रिकाओं में नियमित लेखन जारी था और इसके साथ ही प्रकाशन जगत से भी जुड़ गई।

सवाल, लेखन में दिलचस्पी कैसे जागी। क्या घर में कोई और भी साहित्य पृष्ठभूमि से है।

जवाब -घर में लेखन के क्षेत्र से तो कोई नहीं था परंतु माँ और नानी माँ साहित्यिक अभिरुचि रखती थीं। मेरा बचपन उनके पुस्तकालयों की पुस्तकों से समृद्ध रहा। उनका यही शौक़ मुझे विरासत में मिला और मेरे लिए इस अद्वितीय संसार के द्वार खुले। आज जब खुद को किताबों से सजी रंगी-बिरंगी क्यारियों के बीच पाती हूँ तो समझ सकती हूँ कि उन दौरान माँ मेरे लिए साहित्य प्रेम के बीज बो रही थी और मैं नन्ही अंजुलियों से भर-भर पानी उलीच रही थी।

सवाल, 150 से ज्यादा किताबों का अनुवाद और कई किताबें लिखीं। साहित्य जगत में लोकप्रिय भी हैं। पर क्या लगता है कभी इस क्षेत्र में न आती तो किसी और क्षेत्र में बेहतर कर रही होती।

जवाब-अगर मेरे लिए इस जीवन में कोई क्षेत्र हो सकता था तो वह यही है। इसके अतिरिक्त मैं स्वयं को किसी और काम से जोड़ कर देख ही नहीं पाती। यह मेरे जीवन को निरंतर ऊर्जान्वित करने का माध्यम रहा है और हमेशा रहेगा।

सवाल, क्या आप फुल टाइम लेखक और अनुवादक हैं या कुछ और भी करती हैं आजीविका के लिए।

जवाब- जी, मैं पूर्णकालिक रूप से लेखन व अनुवाद के कार्य से जुड़ी हूँ। मेरा सौभाग्य यह रहा कि मेरे पैशन ने ही प्रोफेशन की कमी को पूरा कर दिया और मुझे आजीविका कमाने के लिए कभी कोई दूसरा कार्य नहीं करना पड़ा।

सवाल, अनुवादक और लेखक हैं। पलड़ा किसका भारी है। लेखक या अनुवादक का। और खुद को किस विधा में सहज पाती हैं।

जवाब-दोनों ही विधाओं में बहुत मन रमता है पर जाने क्यों अनुवाद परियोजनाएँ अक्सर निजी लेखन पर भारी पड़ जाती हैं। हालांकि मित्रों और शुभचिंतकों को मेरा लेखन भी प्रिय है और उनका निरंतर आग्रह रहता है कि मुझे इसके लिए अधिक समय देना चाहिए। फिलहाल यह निर्णय उस नियंता के हाथ है। मैं लहरों के हवाले हूँ, जहाँ लिए जा रही हैं, उनके साथ मौज में बह रही हूँ।

सवाल, अनुवादक हैं आप, अंग्रेजी से हिंदी अनुवाद करती हैं। अनुवाद के बाद भाषागत व्यवधान तोड़ते हुए जो किताबें बड़ी आनंद देतीं हैं पाठकों को, उन्हें अनुवाद करना इतना आसान भी नहीं होता, अनुवाद के दौरान पाठकों के हिसाब से शब्द संयोजन में लय बनी रहे ये एक बड़ी चुनोती होती है अनुवादक के लिए, किस तरह की समस्या से जूझना पड़ता है अनुवाद के समय कुछ बताइये।

जवाब-अनुवाद करने से पहले उस विषय की पृष्ठभूमि की सारी जानकारी होनी चाहिए। यदि ऐसा न हो तो अनुवाद तो हो जाता है पर उसकी आत्मा कहीं पीछे छूट जाता है। लेखक के शब्दों को हिंदी के मुहावरे और बोली में ढालते हुए, उसी संवेदनशीलता के साथ प्रस्तुत करना अपने-आप में एक कड़ी कवायद है। कई बार अपने लिखे को ही काट कर फिर से लिखना पड़ता है ताकि भाषा का प्रवाह बना रहे।
लगभग हर विषय अपने-आप में किसी चुनौती से कम नहीं होता। जिन दिनों इंटरनेट आदि की सुविधा भी उपलब्ध नहीं थी। तब यह काम और भी कठिन हुआ करता था। नलिनी जमीला की पुस्तक ‘स्टोरी आफ़ ए सेक्स वर्कर’करते समय ऐसी ही समस्या आई थी। मूल लेखन दक्षिण भारतीय भाषा में था और अंग्रेजी में कुछ अपशब्दों को यूँ ही लिखा गया था। मुझे उनके अर्थ हिंदी में जानने के लिए एक दक्षिण भारतीय महिला से संपर्क करना पड़ा।
एक फ्रीलांस अनुवादिका होने के नाते मैं इस बात का पूरा ध्यान रखती हूँ कि किसी भी पुस्तक की प्रकाशक द्वारा औपचारिक घोषणा होने से पूर्व उसके बारे में किसी को न बताया जाए। इसी वजह से मैं उन्हें यह नहीं बता सकती थी कि मैं किस विषय पर काम कर रही थी। जब मैंने उनसे उन शब्दों के अर्थ पूछने आरंभ किए तो वे सकते में आ गईं, ‘रचना! आप क्या काम कर रहीं हैं। हमारे यहाँ तो ये निम्नस्तरीय लोग ऐसे अपशब्दों का प्रयोग करते हैं।’मेरे पास मुस्कुराने के सिवा कोई उपाय नहीं था क्योंकि मैं उन्हें अपनी परियोजना की और अधिक जानकारी नहीं दे सकती थी।
इसी कड़ी में मुझे ‘फिफ्टी शेडस आफ ग्रे शृंखला’याद आ रही है। जिसका अनुवाद मैंने अपने पति संजय भोला ‘धीर’ के साथ किया था। वे भी लेखन के क्षेत्र से जुड़े हैं। उन उपन्यासों में आई यौन संबंधी पारिभाषिक शब्दावली के अनुवाद के लिए नेट पर बहुत जानकारी एकत्र करनी पड़ी।
जैसे हाल ही में विक्टर ई. फ्रेंकल की एक पुस्तक ‘मैन इन सर्च आफ़ मीनिंग’ का अनुवाद किया। उस समय मुझे होलोकास्ट के विषय में काफी जानकारी लेनी पड़ी क्योंकि लेखक उन कष्टों के भुक्तभोगी थे और उनके शब्दों का अनुवाद तब तक संभव नहीं था जब तक मैं उस विषय को आत्मसात् न करती।

सवाल, अच्छा कोई एक किताब जिसे अनुदित करते समय आपको परेशानी हुई हो, आपको लगा हो ये किताब अनुदित करना चुनौती है।

जवाब- बौद्ध धर्म पर आधारित एक तिब्बती क्लासिक शीर्षक इन दिनों प्रकाशनाधीन है। इस पुस्तक का अनुवाद करते हुए कुछ विशेष शब्दों के उच्चारण और वर्तनी को सुनिश्चित करने के लिए मठ के बौद्ध भिक्षुओं की सहायता लेनी पड़ी ताकि अपनी ओर से काम में कोई कमी न रह जाए। यह पुस्तक मेरे लिए किसी चुनौती से कम नहीं रही। मैं अपने अनुवाद के ड्राफ्ट्स का एक-एक अक्षर अपने हाथों से फाइनल करती हूँ और जब तक पूरी तरह से संतुष्ट नहीं होती, उन्हें प्रकाशक के पास नहीं भेजती।

सवाल, अनुवाद का काम प्रकाशक के माध्यम से आमतौर पर मिलता है, क्या व्यक्तिगत लेखक के जरिये भी आपको काम मिलता है।

जवाब -अनुवाद का काम अधिकतर प्रकाशकों की ओर से ही आता है परंतु मैं कई वर्षों से इस क्षेत्र में हूँ और अब लोग जानने लगे हैं इसलिए अक्सर निजी लेखकों की ओर से भी प्रस्ताव आते हैं। मैंने कुछ लोगों के लिए काम भी किया है, जो प्रकाशक के पास सीधा न जा कर, हिंदी अनुवाद करवाने के बाद ही अपनी पुस्तक प्रकाशित करवाना चाहते हैं।

सवाल, अनुवादक साहित्य क्षेत्र में एक बहुत बड़ी भूमिका में होता है। वो भाषागत अवरोध को खत्म करके साहित्य का दायरा विस्तृत करता है। बावजूद अनुवादकों को वाज़िब श्रेय और पारिश्रमिक नहीं मिलता क्या कहेंगी इस पर आप।

जवाब- अनुवादकों के पारिश्रमिक की बात करें तो यह मसला आज भी उतना ही पेचीदा है जितना आज से बीस साल पहले था। पारिश्रमिक की दरें इतनी विविध हैं कि कुछ कहते नहीं बनता। अगर किसी एक प्रकाशक को दूसरे प्रकाशक द्वारा दिए जा रही दर का हवाला भी दिया जाए तो वे स्पष्ट शब्दों में जता देते हैं कि वे उससे अधिक भुगतान नहीं कर सकते। वे अनुवादक अंगुलियों पर गिने जा सकते हैं जो अपने काम के लिए मुँहमाँगा पारिश्रमिक पाते हैं। अधिकतर अंग्रेज़ी से हिंदी अनुवादकों को प्रकाशन संस्थान द्वारा तय की गई दरों पर ही काम करना होता है। भाषागत अवरोध को मिटा कर साहित्य प्रेमियों को विविध साहित्य उपलब्ध कराने वाला अनुवाद कर्म अब भी दोयम दर्जे का ही माना जाता है। अनुवादकों के पास कोई और विकल्प नहीं क्योंकि उनके एक इंकार पर, उस परियोजना पर काम करने के लिए कई लोग आ जुटेंगे। नतीजन अनुवाद की गुणवत्ता में कमी साफ दिखाई देती है। कुछ प्रकाशन गृहों की ओर से धीरे-धीरे बेहतर नतीजे मिलने लगे हैं और आशा की जा सकती है कि आने वाला समय अनुवादकों के लिए अच्छा होगा।

सवाल, पाठक जब किसी अनुदित किताब को भी पढ़ता है तो उसके जेहन में लेखक का नाम ही रहता है, ये आम धारणा है। कैसा लगता है जब अनुदित किताब के लोकप्रिय होने पर भी अनुवादक का जिक्र नहीं होता।

जवाब- अंग्रेज़ी से हिंदी अनुवाद को पढ़ते समय अधिकतर लेखक का ही नाम जे़हन में होता है पर अब मुझे लगता है कि पाठकों की सोच में बदलाव आया है। अब वे अनुवादक का नाम भी देखते हैं। मैं यह बात इसलिए कह सकती हूँ क्योंकि अक्सर अपने अनुवादों के लिए पाठकों की प्रतिक्रियाएँ मिलने लगी हैं। आज से कुछ वर्ष पहले तक कई बार ऐसी स्थिति बनती थी कि अनूदित पुस्तक का अनुवाद करने पर भी श्रेय नहीं मिलता था या कहीं नाम तक नहीं लिया जाता था। कुछ अच्छे प्रकाशकों की ओर से पुस्तक के टाइटल पर लेखक के साथ ही अनुवादक का नाम भी दिया जाने लगा है जैसे मेरी ‘असुर’, ‘अजेय’, ‘सीता’ आदि पुस्तकों पर आप देख सकते हैं। मुझे सबसे पहले मंजुल पब्लिशिंग हाउस से यह उपहार मिला। वे किताब पर अनुवादक का नाम देने के अलावा, पुस्तक के भीतर एक पृष्ठ पर अनुवादक परिचय भी छापते हैं।

सवाल, अच्छा कभी किसी लेखक ने जिसकी किताब आपने अनुदित की हो उसने बोला हो की अनुवाद सही नहीं किया या वो संतुष्ट नहीं। कभी हुआ ऐसा।

जवाब- अनुवाद की परियोजनाएँ विविध होती हैं और अक्सर हमारी कोशिश यही रहती है कि अनुवाद के दौरान ही लेखक की फीडबैक ली जाए या अगर कुछ बिंदुओं पर चर्चा करनी हो तो उन्हें पूछ लिया जाए। एकाध बार ऐसा हुआ, जब लेखक ने पहले कोई रुचि नहीं ली और बाद में अपनी ओर से बहुत से बदलाव करने को कहा। उस समय लेखक की संतुष्टि ही अपनी पहली कोशिश रहती है।

सवाल, कभी किसी बड़े लेखक ने ये बोला की आपने शानदार अनुवाद किया उसकी किताब का, कुछ बताइये। कौन थे वो लेखक।

जवाब- ऐसे अवसर तो कई बार आए जब लेखक की ओर से मंच पर शाबाशी मिली। अभी हाल ही में, बाहुबली श्रृंखला की पहली पुस्तक ‘राइज़ आफ़ शिवगामी’ का लोकार्पण हुआ। जिसके लेखक आनंद नीलकंठन जी हैं। मैंने उनके लिए असुर, अजेय उपन्यास श्रृंखला का अनुवाद किया है। उन्होंने उस दिन भारी व्यस्तता के बावजूद मुझे मीडिया से मिलवाते हुए कहा, ‘ये मेरी पुस्तकों की अनुवादिका हैं। इन्होंने मेरी पुस्तकों का बहुत सुन्दर अनुवाद किया है।’ इसी तरह कुछ वर्ष पूर्व मैंने प्रसिद्ध लेखिका नमिता गोखले जी के उपन्यास ‘पारो’ का अनुवाद किया था। पुस्तक के लोकार्पण कार्यक्रम में मैं दर्शक दीर्घा में उपस्थित थी। मंच पर सम्मानीय अतिथिगण के बीच, मेरी मानस गुरु गौरा पंत ‘शिवानी’ जी की सुपुत्री इरा पांडे भी उपस्थित थीं। उन्होंने अचानक कहा, ‘अरे! रचना को भी बुलाओ, वे तो इस पुस्तक की फॉस्टर मदर हैं।’मंच पर सभी अतिथियों ने खड़े हो कर मेरा अभिनंदन किया। कभी-कभी ऐसे सुखद क्षण भी आ जाते हैं जो मन को विभोर कर देते हैं।

सवाल, जब अनुवाद किसी किताब का पूरा होता है तो प्रकाशक और लेखक दोनों देखते हैं? और क्या ऐसा होता है या हुआ की लेखक और प्रकाशक अनुवाद से संतुष्ट न हों तो पुनः सुधार के लिए भेजते हों।

जवाब- प्रायः ऐसी स्थिति नहीं बनती। अनुवाद करते समय ही मैं अपने संपादक और लेखक के संपर्क में रहती हूँ ताकि अनुवाद के दौरान आने वाली किसी भी जिज्ञासा का तुरंत समाधान हो सके। यदि ऐसा संभव न हो तो प्वाईंट्स नोट कर लिए जाते हैं और अनुवाद के अंत में, उनका समाधान कर लिया जाता है। यह एक निरंतर चलने वाली प्रक्रिया है जिसमें संपादक और लेखक की सक्रिय भागीदारी से बहुत निखार आता है। मैं सौभाग्यशाली हूँ कि मेरे सभी संपादक मुझे मेरे काम में पूरा सहयोग देते हैं।

सवाल, आपने अलग अलग विधाओं और विषयों की किताबों के अनुवाद किये। खासतौर पर मजा कैसी किताबों के अनुवाद में आया। जैसे धार्मिक, जीवनशैली पर, उपन्यास।

जवाब- मैंने कई विधाओं और विषयों के अनुवाद किए हैं परंतु निजी तौर पर मुझे धार्मिक, पौराणिक, आध्यात्मिक और आत्म-विकास से जुड़ी अनुवाद परियोजनाओं पर काम करने में आनंद आता है।

सवाल, कोई एक किताब, जिसके अनुवाद में बेहद आनंद आया हो।

जवाब- अपने किसी एक अनुवाद का नाम लेना, जिसे करने में बेहद आनंद आया हो। इस प्रश्न का उत्तर देना बहुत कठिन है। आप एक माँ से पूछ रहे हैं कि उसे अपनी कौन सी संतान सबसे ज्यादा प्रिय है। मैं जिस क्षण किसी परियोजना के लिए हामी भरती हूँ, उसी क्षण से उसके साथ एक आत्मिक संबंध स्थापित कर लेती हूँ और उसका भरपूर आनंद उठाती हूँ। मेरा यह मानना है कि जब तक अनुवादक को अपने काम में आनंद नहीं आएगा। पाठक भी उस अनुवाद से तारतम्य नहीं बना सकेगा। मैं अपनी तुलना पालिता माँ के रूप में ही करती हूँ जिसे पराई संतान को पाल-पोस कर विदा करना होता है। भले ही फिर कोई उसका नाम नहीं लेता पर इतना तो तय है कि परियोजना के साथ बीते वक्त में उसके साथ जुड़े मानसिक संबंध को कोई नहीं तोड़ सकता। रूजबेह एन. भरुचा की पुस्तक ‘फ़क़ीर’ का अनुवाद मुझे बहुत अच्छा लगता है। यह आध्यात्मिक कृति अपने-आप में एक अनूठी गाथा है।

सवाल, भारत में किताबों के अनुवादकों की क्या स्थिति है। कमी है या ठीक संख्या है।

जवाब- भारत में किताबों के अनुवादकों की संख्या अभी संतोषजनक नहीं मानी जा सकती क्योंकि अनुवादकों की संख्या तो बढ़ी है परंतु वे इसे टाइमपास के लिए, चार पैसे कमाने के साधन से अधिक नहीं मानते। इस तरह स्थायी तौर पर काम करने वाले अनुवादक बहुत कम रह जाते हैं। इस विषय में और लोगों के शामिल होने की बहुत संभावनाएँ हैं, बशर्ते वे गंभीरता के साथ काम करना चाहें।

सवाल, एक अनुवादक के तौर पर आपको क्या लगता है की किस क्षेत्र की किताबें या साहित्य अभी अनुदित होने की खास आवश्यकता है।

जवाब- मुझे लगता है कि अंग्रेजी साहित्य की बहुत सी क्लासिक पुस्तकों का अनुवाद होना चाहिए। जो पाठक अपने-अपने कारणों से अंग्रेजी नहीं पढ़ पाते। उन्हें उन पुस्तकों के हिंदी अनुवाद पढ़ने का अवसर मिलना चाहिए।

सवाल, अनुवाद करते समय किस तरह की दिक्कत आती हैं, और एक अच्छे अनुवादक में क्या खूबियां होनी चाहिए। कोई अनुवादक बनना चाहे तो क्या करे।

जवाब-एक अच्छा अनुवादक बनने के लिए बहुत जरुरी है कि आपके पास अनुवाद किए जाने वाले विषय की पूरी जानकारी हो, आपके पास अच्छे व स्तरीय शब्दकोष व समानांतर कोश हों ताकि उसी समय शब्द विशेष की जानकारी मिल सके। मेरे पास अक्सर कई युवाओं के संदेश आते हैं कि अगर कोई अनुवाद का काम हो तो मैं उनके साथ बाँट लूँ। यदि उनसे दो पृष्ठों का भी अनुवाद करने को कहा जाए तो वे उसे भी सही तरह से नहीं कर पाते। एक अच्छा अनुवादक बनने के लिए आपको हिंदी की मानक वर्तनी और व्याकरण का ज्ञान होना चाहिए। देशी और विदेशी साहित्य का ज्ञान हो। काम को सही समय पर पूरा करने में समर्थ हों । परियोजना पर गंभीरता से काम करें और अनुवाद करते हुए सामग्री को कम या अधिक न करें। सबसे अहम बात यह है कि अनुवाद एक कला है जो अभ्यास से साधी जाती है। जब भी काम करते हुए कहीं कुछ समझ न आए तो अपने अहं को एक ओर रखते हुए, उसके बारे में पूछने में संकोच नहीं होना चाहिए। अपने काम से पूरी ईमानदारी ही इस क्षेत्र में आगे बढ़ने का मूलमंत्र है।

सवाल, हाल ही में आपने देवदत्त पटनायक की किताब सीता का अनुवाद किया। कहते हैं पटनायक ने नरेंद्र कोहली के लेखन प्रभाव को कम किया है अपनी अलग तरह की धार्मिक किताबों की श्रृंखला और लेखन शैली से। क्या कहेंगी आप।

जवाब -देवदत्त पटनायक जिस खूबसूरती से पौराणिक पात्रों को हमारी नई पीढ़ी के लिए प्रस्तुत कर रहे हैं, वह वास्तव में सराहनीय है। अगर आप ‘सीता’ की बात करें तो इसमें ‘सीता की कथा के अलावा जो तथ्य प्रस्तुत किए गए हैं वे वास्तव में रोमांचित कर देते हैं। देवदत्त पटनायक अपने विषय को प्रामाणिक तथ्यों के साथ सचित्र प्रस्तुत करने की कला में माहिर हैं। हाल ही में, मैंने उनके लिए ‘देवलोक 2, देवदत्त पटनायक के संग’ नामक विषय पर काम किया है। यह एपिक चैनल पर उनके लोकप्रिय कार्यक्रम का पुस्तकीय रूपांतरण है। यह पुस्तक प्रकाशनाधीन है जो जून के मध्य तक प्रकाशित होगी।

सवाल, देवदत्त पटनायक कैसे लेखक हैं आपकी नजर में, धार्मिक चरित्रों को एक अलग नजरिया देते हैं। कुछ बताइये।

जवाब-देवदत्त पटनायक के लेखन की विशेषता यही है कि वे पाठकों पर अपना नजरिया नहीं थोपते। एक अच्छा लेखक वही है जिसे पढ़ने के बाद पाठक अपने विवेक से तय कर सके कि उसे किसी बात को अपना समर्थन देना है या नहीं। वे प्रचलित आस्थाओं या मान्यताओं पर प्रहार नहीं करते और यही मुझे उनका सबसे बड़ा गुण लगता है।

सवाल, अपना पसंदीदा लेखक और कोई एक पत्रकार बताइये। क्यों पसन्द है ये भी बताइये।

जवाब- मेरे प्रिय लेखकों की सूची देना संभव नहीं यदि कुछेक नाम ही लेने हों तो मैं गौरा पंत ‘शिवानी, अमृता प्रीतम, आशापूर्णा देवी, ताराशंकर बंद्योपाध्याय का नाम लेना चाहूँगी। आध्यात्मिक पुस्तकों में मैं ओशो को पढ़ती हूँ। सभी पत्रकार अपने-अपने तरीके से अपने कर्तव्यों को बखूबी निभा रहे हैं। इस तरह कोई एक मनपसंद पत्रकार का नाम जानना चाहें तो नाम नहीं ले सकूँगी।

सवाल, फरीदाबाद रहती हैं, किस अख़बार को पसन्द करती हैं और पढ़ती हैं। और क्यों

जवाब- अपनी व्यस्त दिनचर्या के चलते, बहुत वर्षों से नियमित रूप से समाचार-पत्र पढ़ने का अभ्यास नहीं रहा। प्रायः सभी शीर्षस्थ दैनिक पत्रों के साहित्यिक पृष्ठ नेट पर ही देखती हूँ। यह देख कर प्रसन्नता होती है कि समाचार-पत्रों में विविध विषयों पर आने वाली पृष्ठ सामग्री और अधिक स्तरीय होती जा रही है।

सवाल, अनुवाद के लिए किताबों का चयन कैसे करती हैं। या जो भी ऑफर आया उसको ले लेती हैं। या फिर किसी खास विषय से जुडी किताबों में दिलचस्पी लेती हैं।

जवाब- अनुवाद के लिए किताबों का प्रस्ताव प्रकाशकों की ओर से आता है। वे भी मेरी पसंद के अनुसार ही मुझे विषय देते हैं। मैं लेखक और किताब का नाम जानने के बाद गूगल पर उसके बारे में सारी जानकारी एकत्र करती हूँ। उसके बाद ही यह तय होता है कि मैं उस पर काम करना चाहती हूँ या नहीं। परियोजना की हामी भरने के बाद उसके लिए डेडलाइन तय की जाती है।

सवाल, क्या कभी ऐसा हुआ की अनुवाद के लिए कोई ऑफर आया, और आपको किताब या लेखक पसन्द न आया हो और आपने मना कर दिया हो।

जवाब- जी, ऐसा कई बार होता है। मैं अनुवाद के लिए वही विषय चुनती हूँ जो मुझे पसंद हों। तकनीकी अनुवाद करना पसंद नहीं करती। मुझे यह कहने में कभी संकोच नहीं होता कि उक्त विषय पर मेरी जानकारी बहुत अधिक नहीं या वह मेरी रुचि के दायरे में नहीं आता। किसी शायर ने कहा है,
‘कभी-कभी यूँ भी हमने अपने दिल को बहलाया है
जिन बातों को खुद नहीं समझे, औरों को समझाया है’
कम से कम मैं अपनी अनुवाद परियोजनाओं के साथ ऐसा नहीं करना चाहती। वही काम हाथ में लेती हूँ, जिसे खुद समझ सकती हूँ।

सवाल, बड़े लेखक की किताबों को अनुवादक तवज्जो देते हैं, आप क्या मानती हैं।

जवाब- मैं केवल अपने बारे में बता सकती हूँ कि मेरे लिए मेरा हर लेखक बड़ा लेखक होता है। भले ही उसकी पहली पुस्तक का अनुवाद क्यों न हो रहा हो। लेखन से जुड़ा हर व्यक्तित्व मेरे लिए आदरणीय और प्रशंसनीय है। शब्द की साधना करने वालों को मैं छोटे या बड़े की श्रेणी में वर्गीकृत करना पसंद नहीं करती।

सवाल, आप अंग्रेजी से हिंदी अनुवाद करती हैं, इससे विदेशी साहित्य और देश के अंग्रेजी लेखकों को हिंदी भाषी पढ़ पाते हैं। पर क्या आपको लगता है की बड़े संख्या में ऐसे अनुवादकों की जरूरत है जो हिंदी लेखकों और हिंदी साहित्य को तमाम विदेशी भाषाओँ में अनुदित कर उसका अंतरराष्ट्रीय दायरा करें। और ऐसा कम हो पा रहा है।

जवाब- जिस तरह हम अंग्रेजी़ लेखकों को हिंदी भाषा में पढ़ रहे हैं अगर उसी तरह तमाम अच्छी हिंदी किताबें अंग्रेजी के पाठकों तक अनूदित हो कर पहुँचें तो इससे बेहतर कुछ नहीं हो सकता। वैसे कुछ नए प्रकाशक इन दिनों इस दिशा में कार्यरत हों और हम इस दिशा में एक अच्छे भविष्य की आशा कर सकते हैं ।

सवाल, अनुदित किताब में सामग्री जरूर लेखक की ही होती है पर सार अनुवादक का। ये बहुत मैटर करता है की एक अच्छी किताब का अच्छा अनुवाद हो। अच्छा अनुवाद न होने से पाठक को वो आनंद नहीं मिलता। क्या सहमत हैं।

जवाब-आपने बिल्कुल सही कहा। किसी भी क़िताब का अच्छा अनुवाद होना चाहिए। कई बार अनुवादक की कमी से लेखक की सामग्री भी फ़ीक़ी पड़ जाती है। आजकल अनुवाद के नाम पर कचरा परोसने वाली किताबों की भी कमी नहीं है। उचित पारिश्रमिक न देने वाले प्रकाशक अक्सर अनुभवहीन अनुवादकों को किताब सौंप देते हैं जो उसके सार को समझे बिना गलत अनुवाद करते हैं। इसका सारा ख़मियाज़ा पाठक को भुगतना पड़ता है जिसे दाम देने के बाद भी कुछ अच्छा व स्तरीय पढ़ने को नहीं मिलता।

सवाल, आपका पसंदीदा अनुवादक और उसकी अनुदित की कोई किताब।

जवाब- किसी एक अनुवादक का नाम लेना नाइंसाफ़ी होगी क्योंकि बहुत सारे अनुवादक इस समय बहुत अच्छा काम कर रहे हैं। सबके नाम लेना भी संभव नहीं है पर मुझे नवेद अकबर, विश्वजीत ‘सपन, आशुतोष गर्ग व नीलाभ के अनुवाद प्रिय हैं। उर्मिला जी ने इक्ष्वाकु के वंशज का अच्छा अनुवाद किया है। इन दिनों लेखक व अनुवादक प्रभात रंजन जी भी बढ़िया अनुवाद कर रहे हैं।
सवाल, आप फ़ेसबुक पर बहुत लम्बा लम्बा लिखती हैं, अनुवाद करती हैं, किताब लिखती हैं, पढ़ती भी होंगी, तभी इतना प्रभावी लिखती हैं, घर परिवार के बीच कैसे इतना समय निकाल पाती हैं।

जवाब- देखिए, जब हमारा काम ही हमारे लिए सब कुछ हो तो समय की सीमा कोई मायने नहीं रखती। मेरे लिए फ्रीलांसिंग काम करने का अर्थ था कि अपनी शर्तों और अपनी इच्छा के अनुसार काम कर सकूँ, अपने घर-परिवार को पूरा समय दे सकूँ। यहाँ मैं अपने इस लक्ष्य में पूरी तरह से सफल रही। आरंभिक वर्षों में अनेक प्रकाशन संस्थानों से और पत्रिकाओं से संपादन कार्य के लिए प्रस्ताव भी आए पर मैंने नौकरी न करने का निर्णय ले लिया था इसलिए अपने फैसले पर अडिग रही। मैं आज भी जी भर कर पढ़ती हूँ। मेरे निजी पुस्तकालय में हजारों की संख्या में क़िताबें हैं, अपने काम के सिलसिले में पढ़ी जाने वाली क़िताबों के अलावा अपने रचनात्मक लेखन को भी समय देती हूँ और साथ ही अपने परिवार के सभी कर्तव्यों को भी अच्छी तरह निभा लेती हूँ। इसमें कोई संदेह नहीं कि परिवार का पूरा साथ मिलता है। पति स्वयं एक कलाकार व लेखक हैं इसलिए वे इस क्षेत्र से जुड़ी माँगों को अच्छी तरह समझते हैं और अपना पूरा सहयोग देते हैं। मैंने समय प्रबंधन की कई तकनीकों को अपनाते हुए अपने दिन के चौबीस घंटों को तीस घंटों में बदल लिया है। मैं टी.वी. बिल्कुल नहीं देखती और यह कहने में कोई संकोच नहीं है कि बहुत गैर-सामाजिक क़िस्म के लोगों में से हूँ। अपने घर में स्टडी में काम करती हूँ। कोई बहुत आवश्यक मीटिंग या निमंत्रण न हो तो अक्सर घर में ही रहना पसंद करती हूँ। मेरा बेटा कुशल इन दिनों विदेश में अपनी डिग्री के दूसरे वर्ष में है इसलिए भी मेरे पास पारिवारिक कार्यों से बहुत सा समय बच जाता है

सवाल, लेखक भी हैं, 2016 की कोई पसंदीदा किताब बताइये। फ़ेसबुकिया लेखन पर एक सक्षिप्त टिप्पणी ज़रूर। हालाँकि सवाल बहुत हो गए। पर आप जैसे व्यक्तित्व के सामने सवाल पैदा होना जायज है।

जवाब- 2016 में कुछ सुंदर अनुवाद सामने आए जिनमें ‘मेरी गीता’ व ‘मैं गुमशुदा लेखक’ का नाम ले सकते हैं। ‘स्वप्नपाश’ और ‘जिंदगी लाइव पठनीय उपन्यास हैं।
फेसबुक के साथ मेरा बहुत ही सकारात्मक संबंध रहा है। इसने मुझे बहुत से लोगों से जोड़ा और पाठकों की उल्लेखनीय प्रतिक्रियाएँ भी जानने को मिलीं। फेसबुक परस्पर रचनात्मकता के आदान-प्रदान का बहुत अच्छा साधन है परंतु यदि आप इसे धर्म, राजनीति और ज्वलंत मसलों पर खोखले विमर्श का अड्डा बना दें तो यह उत्पादक समय को नष्ट करने के उपाय से अधिक कुछ नहीं रह जाता।

सवाल, साहित्य में आजकल गैंग प्रथा है। उस गैंग में कुछ लेखक हैं, कुछ प्रकाशक हैं और कुछ पत्रकार। ये आपस में ही एक दूसरे को प्रमोट करते हैं, पुरस्कार भी दे देते हैं और प्रशंसा भी कर लेते हैं। क्या ऐसी गैंग से आपका पाला पड़ा। कैसे लेती हैं इन सब चीजों को।

जवाब- आप जिसे गैंग प्रथा का नाम दे रहे हैं। उसे बहुत ही खूबसूरत तरीके से सभा-समितियों और संस्थानों की ओर से दिए जाने वाले पुरस्कारों के साथ निभाया जाता है। आप इसे मेरा सौभाग्य कह सकते हैं कि इस क्षेत्र में लगभग बाईस-तेईस वर्षों से काम करने के बावजूद मैं इन सबसे दूर रही। कैरियर के आरंभ में ही तय कर लिया था कि आपस में रेवड़ियाँ बाँटने वाले दलों से दूर, केवल अपने काम पर ध्यान देना है। यही वजह है कि मुझे मेरे अपने ही शहर में भी लोग नहीं जानते। पहले-पहल सभाओं का हिस्सा बनने के लिए फ़ोन आते थे पर मैं विनम्रता से ठुकराती रही और फिर मुझे मेरे हाल पर छोड़ दिया गया। अब मैं और मेरी परियोजनाएँ बहुत आनंद से रहते हैं।

सवाल, साहित्य जगत में आजकल ठेकेदार हैं, जो नए पुराने लेखकों के प्रचार प्रसार की भूमिका अदा करते हैं अपने मीडिया संबंधों के दम पर। जो इनकी छाँव में है। वरना आप होनहार लेखक भी हैं ये आपको स्पेस नहीं देंगे। क्या कुछ कहेंगी। क्या कुछ अनुभव आपके।

जवाब-मैं इस विषय पर कोई टिप्पणी नहीं देना चाहती और न ही मुझे कभी ऐसा कोई अनुभव हुआ।

सवाल, वर्तमान लेखक किताब सामग्री पर कम उससे ज्यादा कवर पृष्ठ पर और उससे ज्यादा प्रचार पर ध्यान देता है। कैसे देखती हैं इस मुद्दे को।

जवाब – यह सच है कि यह प्रचार का युग है। जो दिखता है, वही बिकता है परंतु इस तथ्य को कभी झुठलाया नहीं जा सकता कि पाठक भी प्रबुद्ध है। आप उसे केवल बाहरी आवरण दिखा कर आकर्षित तो कर सकते हैं परंतु अपने लेखन का मुरीद नहीं बना सकते।
अंत में मैं अपने लेखन और अनुवाद कर्म के लिए केवल यही कहना चाहूँगी:
एक-एक शीर्षक अपने साथ ढेर सारी संभावनाओं के साथ उपस्थित होता रहा और मेरे जीवन में आध्यात्मिक विकास के अभूतपूर्व अवसर पैदा करता रहा। यह लेखन मेरी ओर से, जीवन के प्रति सहज स्वीकार्य भाव था, सादा शब्दों में कहूँ तो, यह जीवन की ओर से मेरे लिए खुलने वाले हर द्वार के लिए एक ‘हाँ’ थी, मैं परम विश्वास और सहज भाव के साथ हर द्वार से भीतर प्रवेश करती गई। जानती थी कि जीवन इतना छोटा है कि किसी भी द्वार को एक बार ‘न’ कह देने के बाद, उसके दोबारा खुलने की प्रतीक्षा करने का समय नहीं मिलेगा। एक-एक शीर्षक मुझे अपने साथ चेतना के विभिन्न आयामों की ओर ले जाता रहा। नहीं जानती कि मेरी इस यात्रा से मैं समाज को कितना लौटा पाई किंतु मेरे लिए यह एक विलक्षण अनुभव रहा। मेरा मानना है कि जब हमारा काम ही हमारे लिए ध्यान-मनन बन जाए तो जीवन अपनी पूरी खिलावट के साथ सामने आता है। इस खिलावट की भीनी खुशबू से अपने और दूसरों के अस्तित्व को महकाने का क्षणिक सा भी मौका हाथ आए, तो गँवाना नहीं चाहिए…सृष्टि की प्रज्ञा हमसे यही तो चाहती है, हम इसके प्रति मुक्त मन से ग्रहणशील हों….जीवन को पूरी संभावनाओं के साथ घटने दें और इसके चरम आयामों को छू लें..
मीडिया मिरर को धन्यवाद और असीम शुभकामनाएं। आपने बहुत सार्थक प्रश्न पूछे.

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