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कुछ नया जानने की ललक ऐसी की युवाओं को भी शर्मिंदा होना पड़े

मुम्बई नवभारत टाइम्स दफ़्त
मुम्बई नवभारत टाइम्स दफ़्तर से रिटायर हुए सतीश मिश्रा की विदाई का उत्सव
  • नवभारत टाइम्स मुम्बई के रिपोर्टर विजय पाण्डेय बता रहे हाल ही में मुम्बई दफ़्तर से रिटायर हुए सतीश मिश्रा के बारे में
  • नवभारत टाइम्स में आए करीब 5 साल हो गए लेकिन किसी की विदाई का उत्सव पहली बार देखा। सतीश सर की कल विदाई का जश्न भी मनाया जा रहा था और दुख भी। पिछले दो दिनों से एनबीटी मुंबई में मानो कोई उत्सव चल रहा हो, कुछ इस तरह का माहौल था। हर कोई अपनी ओर से कुछ अलग करने की सोच में लगा हुआ था। दामू भाई ने इस पूरे कार्यक्रम की रूपरेखा तय कर इसे बेहतरीन बना दिया। फिर कल जब सतीश सर को कुछ क्रिकेटिया अंदाज में हमने विदाई दी तो…..
    आखिर क्या था कि यह विदाई समारोह खास हो गया। हां, जरूर कुछ तो खास था सतीश सर के व्यक्तित्व में की हर उम्र का सहयोगी उनका अपना बनकर हो गया।
    पिछले कुछ सालों में जितना मैंने उनको देखा, सुना और समझा है, उसमें कई खास गुण को जानने का अवसर मिला।
    भाषा पर अद्भुत कमान: हिंदी, अंग्रेजी, मराठी और यहां तक की गुजराती न केवल इन भाषाओं का ज्ञान बल्कि इन पर पूरी पकड़।
    गजब का आत्मविश्वास: कोई भी काम करने से पहले उनका आत्मविश्वास गजब का होता था। पूरी बारीकी से प्लानिंग उनके जीवन का अभिन्न हिस्सा है।
    नया सीखने की ललक: कुछ नया जानने की ललक ऐसी की युवाओं को भी शर्मिंदा होना पड़े। कई बार मैंने उनको बारीकी से जानते और सामने वाले को सही मानते हुए देखा है।
    खुद पर नियंत्रण: सालों साल रिपोर्टिंग करने के बावजूद पिछले कुछ सालों में उन्हें किसी बीट पर हस्तक्षेप करते नहीं देखा। जबकि अक्सर थोड़ी जानकारी रखने वाले भी इस तरह से खुद पर नियंत्रण नहीं कर पाते हैं।
    संबंध बनाने में महारथ: संबंध किसी तरह से बनाए और निभाए जाते हैं, यह कोई उनसे सीखे।
    धार्मिक और घुमक्कड़ी: तमाम प्रमुख मंदिरों के दर्शन और जानकारी तो उन्होंने इकट्ठा की ही साथ ही वहां संबंध भी बनाएं। घुमक्कड़ी स्वभाव के चलते कई देशों की जानकारी भी एक ही झटके में मिल जाया करती थी।
    अपना बना लेने की कला: सतीश सर की सबसे अहम कला थी, अपना बना लेना। वह हर किसी को अपना बना सकते थे। इस तरह से कि सामने वाला कुछ बोल भी न सके। वह छोटी से छोटी बात का भी इतना ध्यान रखते थे कि सामने वाला उनका होकर रह जाता था। कई मौकों पर वह खुद ही कहते थे कि मैं हूं, चिंता मत करना।
    टास्क मास्टर: किसी से कोई भी काम कितनी बार भी कराने की कला। चाहे जूनियर हो या सीनियर।

लिखने के लिए बहुत कुछ है लेकिन नहीं लिख रहा हूं। कारण, ज्यादा लिखने पर शायद ज्यादा परेशानी होगी।

सर बधाई आपको नई पारी के लिए….. लेकिन आप हमसे दूर ही कहां जा रहे हैं यह तो केवल बहाना है, कुछ नया करने का।

तस्वीर विदाई बेला की

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