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यात्रा वृत्तान्त नेपाल: जिस अंदाज से कोई पुरुष आकर व्हिस्की खरीदता उसी अंदाज और मस्ती में लड़कियां भी

नेपाल
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नेपाल की राजधानी काठमांडू तो और भी विचित्र। पहले तो भैरहवा दाखिल होते ही हमें चाय की दूकानों पर चाय कम बियर और व्हिस्की ज्यादा बिकती मिलीं और बेचने वाला कोई पुरुष नहीं बल्कि महिलाएं ही होतीं। जिस अंदाज से कोई पुरुष आकर व्हिस्की खरीदता उसी अंदाज और मस्ती में लड़कियां भी। लेकिन क्या मजाल कि कोई छेडख़ानी हो जाए। यह कोई कम आश्चर्य की बात नहीं कि इस छोटे से देश नेपाल के लोग इतने संयमी व अनुशासन के पाबंद हैं कि हमारे फेसबुक मित्र और काठमांडू वासी श्री राजीव मिश्र ने बताया कि पिछले पंद्रह वर्ष से वे काठमांडू में रह रहे हैं पर आज तक किसी रेप या छेड़छाड़ की घटना न उन्होंने सुनी न पढ़ी। 

पूरे तेरह दिन बाद दिल्ली लौटा हूं। इन तेरह दिनों में छह दिन तो नेपाल में गुजारे और पांच दिन वाराणसी में तथा बाकी के दो दिन दिल्ली से बनारस की यात्रा में। अब काठमांडू की विशेषता बताऊँ अथवा बनारस की इस विषय पर दिग्भ्रमित हूं। दोनों ही शहर बेमिसाल हैं। एक विश्वनाथ का तो दूसरा पशुपति नाथ का। एक शिव के त्रिशूल पर टिका है तो दूसरा त्रिशली के उदगम के समीप। पर दोनों की अपनी मस्ती है। बनारस में गोदोलिया में भांग डालकर लस्सी पी सकते हैं, मात्र पचास रुपये में दो लोग भरपेट पूरी-सब्जी खा सकते हैं और फिर बनारसी पान का बीड़ा दबाकर शाम सात बजे से रात दस बजे तक कुल दो हजार में नाव कर राजघाट से असीघाट तक मस्ती कर सकते हैं। यह शिव की नगरी है। यहां भारी संख्या में मुस्लिम हैं तो इतनी ही आबादी हिंदुओं की भी होगी। देश के हर हिस्से के लोग यहां मिलेंगे पर सब भोजपुरी अपने-अपने अंदाज में बोलते हुए। यहां मराठे हैं, मारवाड़ी-गुजराती-पंजाबी और बंगाली हैं। आंध्र के हैं तो तमिलनाडु और केरल-कर्नाटक के भी। सब हैं बनारस में पर रहते हैं रसिया बनकर ही। बीएचयू के कलाभवन में एक विद्यार्थी हमारा स्वयंभू गाइड बन गया। वह जेआरएफ था और किन्हीं खान साहब के अंडर में पीएचड़ी कर रहा था। वह जितनी श्रद्घा से खान साहब के गुण गा रहा था उतनी ही श्रद्घा से मुझे विश्वनाथ मंदिर में जाकर दर्शन करने और गंगा आरती देखने को प्रेरित भी कर रहा था। बहराइच के उस बालक का नाम मैने नहीं पूछा। ताकि यह न पता चले कि वह हिंदू था या मुसलमान और अगर हिंदू था तो ब्राह्मण था या ठाकुर अथवा कायस्थ या बनिया-यादव-कुर्मी या जाटव। ऐसी काशी नगरी पर कौन न मर मिटे।
नेपाल की राजधानी काठमांडू तो और भी विचित्र। पहले तो भैरहवा दाखिल होते ही हमें चाय की दूकानों पर चाय कम बियर और व्हिस्की ज्यादा बिकती मिलीं और बेचने वाला कोई पुरुष नहीं बल्कि महिलाएं ही होतीं। जिस अंदाज से कोई पुरुष आकर व्हिस्की खरीदता उसी अंदाज और मस्ती में लड़कियां भी। लेकिन क्या मजाल कि कोई छेडख़ानी हो जाए। यह कोई कम आश्चर्य की बात नहीं कि इस छोटे से देश नेपाल के लोग इतने संयमी व अनुशासन के पाबंद हैं कि हमारे फेसबुक मित्र और काठमांडू वासी श्री राजीव मिश्र ने बताया कि पिछले पंद्रह वर्ष से वे काठमांडू में रह रहे हैं पर आज तक किसी रेप या छेड़छाड़ की घटना न उन्होंने सुनी न पढ़ी। काठमांडू हो या पोखरा हर दूकान का नामपट नागरी लिपि में और सन की बजाय हर जगह विक्रमी संवत का ही प्रयोग। हिंदुओं की भक्ति देखनी हो तो नेपाल आकर देखिए मगर न तो जातिभेद न सांप्रदायिक भेद। आप मुसलमान हैं तो बने रहिए। ईसाई हों या यहूदी नेपाल में सब बसे हैं पर किसी के अंदर किसी को लेकर डर नहीं है। दशहरा यहां का मुख्य त्योहार है फिर शिवरात्रि। अन्य त्योहार अपने-अपने समुदाय मनाएं। फिर वह चाहे ईद हो या बकरीद या क्रिसमस अथवा रामनवमी या कृष्ण जन्माष्टमी।

नेपाल में सर्वाधिक आबादी हिंदुओं की है पर वे भारत के हिंदुओं की तरह न तो मुसलमानों से डरते हैं न ईसाइयों द्वारा धर्मान्तरण किए जाने से। वहां धर्म बदलने पर कोई बवाल नहीं मचता और कोई धर्म बदलता भी नहीं। वहां गोमाता तब तक ही माता है जब तक दूध देती है बाकी उसे काटो उन्हें फर्क नहीं पड़ता। एक वनप्रांतर में मुझे भूख लगी थी। वहां पर ढाबे की मालकिन दाल-चावल के साथ कुछ सब्जी जैसा पका रही थी। मैने पूछा- यह क्या है तो उसने बताया यह बाफा है। मुझे समझ नहंी आया तो मैने कहा चावल में थोड़ा सा बाफा मिला कर दे दो। वहां पर एक ट्रक ड्राइवर खड़ा था जो अपनी दाढ़ी और पहरावे से मुसलमान प्रतीत हो रहा था उसने आगे बढ़कर कहा कि अरे यह क्या कर रहे हो भाईजान? बाफा यानी भैंस का मीट। तब मैं बिदका। वह ट्रक ड्राइवर गोरखपुर का था। वहां बताया गया कि यहां बीफ भी खाते हैं पर चूंकि वह बहुत मंहगा है इसलिए उसे सिर्फ विदेशी यानी कि अंग्रेज ही खा पाते हैं। हर मंदिर में वहां भैंसे, कुत्ता, मुर्गा या बकरे की बलि देने की परंपरा है। पशुपति नाथ के मंदिर में जिस राग के साथ आरती होती है उसी विराग के साथ मृतक संस्कार भी। जीवन का यह भेद अनजान ही रहा मेरे लिए।
नेपाल छोटा मुल्क है पर गजब का अनुशासन। आप सड़क पर पेशाब नहीं कर सकते। हर जगह पब्लिक टायलेट्स बनी हैं। वहां जाइए। पांच रुपये पेशाब जाने के और दस रुपये शौच के। यहां तक कि हर छोटी जगह भी पब्लिक टायलेट्स हैं। छोटी-छोटी चाय की दूकानों पर भी। वहां शादियां कोई धूमधाम से नहीं होतीं। बस मंदिर जाएं और 501 रुपये नेपाली की फीस चुकाएं और वर-वधू बन कर लौटें। पिता और मां तथा बच्चे साथ में ही शराब पी लेते हैं। वहां हर चीज खूब मंहगी है और इस बहाने यह भी बताया जाता है कि “जन्म लिया है खेल नहीं है”, इसलिए राधा की तरह नाचो यानी कमाना सीखो। साठ हजार की पल्सर बाइक वहां पर दो लाख की है और ढाई लाख की मारुति साढ़े बारह लाख की। सस्ती से सस्ती नेपाली थाली भी दो सौ से कम की नहीं है। पर ठगी नहीं है, लूट नहीं है और बेईमानी नहीं है। वहां शासकीय कर्मचारी रिश्वत नहीं लेते। पर भारतीयों पर भरोसा नहीं करते और अक्सर नियम-कानून तोडऩे पर भारतीय दंडित होते रहते हैं। वहां ‘गंगा कसम’ या ‘खुदा कसम’ जैसी रवायतें नहीं हैं। सब कुछ साफ और पारदर्शी। शराब की नदियां भले बहती हों पर शराब पीकर गाड़ी चलाई नहीं कि लाइसेंस गया जीवन भर के लिए। वहां पर भारत के राजदूत श्री मनवीर सिंह पुरी ने इन सब बातों से हमें सतर्क कर दिया था और सलाह दी थी कि ऐसी हरकतें नहीं करें। मगर इसके बावजूद आम नेपाली जनमानस भारत की मौजूदा सरकार से खुश नहीं है। उसे लगता है कि भारत सरकार उसके साथ छोटू जैसा व्यवहार करती है। जैसे अभी भूकम्प के वक्त जो मदद की उसे इतना प्रचारित किया कि नेपाली जनता की सहानुभूति प्राप्त करने के भारत की सरकार को वहां घृणा से देखा जाता है। जबकि चीन, जापान और यहां तक कि पाकिस्तान के साथ उनका अपनापन अधिक है। बावजूद इसके कि नेपाल की नब्बे फीसदी जनता हिंदू है। हमें भारत स्थित नेपाली राजदूत श्री दीपकुमार उपाध्याय ने हालांकि कहा था कि ऐसा नहीं है पर वहां जाकर लगा कि ऐसा ही है।

(काठमांडू से लौटकर शंभूनाथ शुक्ल)

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