Home > बात-मुलाकात > रेडियो जॉकी भी संजीदा और गंभीर स्वभाव के होते हैं: आरजे आलोक

रेडियो जॉकी भी संजीदा और गंभीर स्वभाव के होते हैं: आरजे आलोक

aamir khan and alok
aamir khan and alok
  • बात- मुलाकात में अतिथि हैं आरजे आलोक

 

big b and aalok
big b and alok
rj aalok with jaiky shrof
rj alok with jaiky shrof

{ मीडिया मिरर की साक्षात्कार श्रंखला बात मुलाकात में इस बार अतिथि हैं दैनिक भास्कर (डिजिटल) मुम्बई के लोकप्रिय फ़िल्म पत्रकार आरजे आलोक। आलोक रेडियो जॉकी भी हैं। ओए एफएम, रेड एफएम से जुड़े रहे हैं। मीडिया मिरर के सम्पादक प्रशांत राजावत ने आलोक से लम्बी बातचीत की। बात- मुलाकात श्रृंखला में मीडिया मिरर हर बार आपको देश दुनिया के प्रसिद्ध पत्रकार और लेखकों से रूबरू करवाता है।} 

 

 

 

 

          पेश है आलोक से हुई विशेष बातचीत।।

जिस तरीके से अभिनेता आपको रंगमंच पर या फिल्मी पर्दे पर या TV के ऊपर एक्टिंग करते हुए नजर आता है, ठीक उसी तरीके से एक रेडियो जॉकी भी अपने कार्यक्रम के दौरान हर एक बात को आप तक पहुंचाने के लिए स्टूडियो के भीतर से अपनी स्टाइल में चीजों को रखता है. रेडियो जॉकी भी संजीदा और गंभीर स्वभाव के होते हैं और जैसा मैंने ऊपर कहा कि उनकी पर्सनल जिंदगी का प्रभाव कभी भी उनके रेडियो शो पर नहीं पड़ता है और शायद यही कारण है कि अगर एक रेडियो जॉकी के घर कोई शोक की बात भी हो तो भी वह रेडियो शो के दौरान कभी भी अपना दुख अपने श्रोताओं  से शेयर नहीं करता क्योंकि सुनने वाला सिर्फ और सिर्फ रेडियो जॉकी की आवाज के साथ मनोरंजन की आशा रखता है.

 

सवाल: ओबरा से गाजियाबाद और फिर सीधे मुम्बई। मेकेनिकल इंजीनियरिंग करने वाला लड़का लोकप्रिय रेडियो जॉकी होगा सोचा था आपने कभी। मेकेनिकल इंजीनियरिंग से आरजे तक के सफर को थोड़ा बताइये ये यात्रा। कैसे रेडियो की दुनिया में प्रवेश हुआ।

जवाब: सबसे पहले मैं बता दूं कि मैं उत्तर प्रदेश के सोनभद्र जिले के एक ‘ओबरा’ नामक कस्बे का रहने वाला हूं और वही मेरी पढ़ाई लिखाई हुई है .बचपन में जब हम स्कूल की पढ़ाई करते थे तो हमारे घर में मनोरंजन का सिर्फ एक ही माध्यम होता था और वह रेडियो ही था. चाहे वह सुबह का 7:00 बजे का समाचार हो दोपहर के लोकगीत हो शाम की युवा वाणी हो या शाम 720 का समाचार. बचपन में जब भी फरमाइशी गीतों के कार्यक्रम आते थे तो मेरी मां उसे बड़े ध्यान से सुनते थे और स्कूल के जमाने से ही मुझे रेडियो के कार्यक्रमों में हिस्सा लेना काफी पसंद था मैं खुद रेडियो स्टेशन जाकर के बच्चों के कार्यक्रम में हिस्सा लेता था. यहां तक कि फरमाइशी गीतों के कार्यक्रम में अपना नाम सुनने के लिए की जाने वाली रिकॉर्डिंग जो कि 2 दिन पहले ही हो जाया करती थी, उस रिकॉर्डिंग के लिए घर से दूर वाले पीसीओ पर समय से घंटों पहले पहुंचकर अपनी कॉल लगाने की प्रक्रिया शुरु कर देता था जिससे कि उस कार्यक्रम में मेरी आवाज जाए और जिसे मेरी मम्मी और पूरा सोनभद्र आगामी रविवार को सुन पाएं.
मैंने साइंस के साथ 12वीं की परीक्षा पूरी की और जैसा की छोटे शहरों में होता है कि अगर आप साइंस की पढ़ाई कर रहे हैं तो इंजीनियरिंग करें और अगर बायोलॉजी की पढ़ाई करते हैं तो डॉक्टर बनने की कोशिश करें. बस इसी लिहाज से साल 2001 में मैं ओबरा से निकला और एक साल इंजीनियरिंग की तैयारी इलाहाबाद में की और उसके बाद गाजियाबाद जाकर 2002 से 2006 तक इंजीनियरिंग की पढ़ाई की और सर्टिफिकेट लिया. लेकिन उन्हीं दिनों प्राइवेट FM गाजियाबाद से सटे दिल्ली में बड़े जोर शोर से आ चुके थे और वहां के रेडियो जॉकी को सुनना , उनके कार्यक्रमों में हिस्सा लेना, इनाम जीतना इत्यादि सब कुछ शुरु हो चुका था. मेरे पसंदीदा आरजे आज भी मंत्रा ही है जिन्हें सुनकर और बहुत कुछ सीख कर ही मैंने ऑडिशन देने की प्रक्रिया शुरु की. जिस तरीके से टीवी की दुनिया में संवाददाता होते हैं वैसे ही रेडियो की दुनिया में भी ओबी जॉकी की जगह भी होती है जो शहर के अलग-अलग जगहों पर खड़े होकर के स्टूडियो में बैठे रेडियो जॉकी से बातचीत करते हैं और उस जगह की हाल चाल बताते हैं और यही कार्य महीने इंजीनियरिंग के दौरान साल 2004 में शुरू कर दिया. इंजीनियरिंग के बाद मुझे लगा कि सुबह 9 से शाम 5:00 बजे की एक ही तरह के कपड़े पहन कर के की जाने वाली इंजीनियरिंग की जॉब शायद मैं ना कर पाऊं और इसी कारण मैंने रेडियो के ऑडिशन देने शुरू किए. इन नोएडा में रेडियो धमाल में रेडियो जॉकी की जॉब मिली उसके बाद हरियाणा के हिसार में कुछ समय तक रेडियो जॉकी रहा फिर मध्य प्रदेश के जबलपुर में 2 साल तक रेडियो जॉकी रहा और अंततः मुंबई आया कुछ समय की स्ट्रगल की और उसके बाद यहां पर भी रेडियो जॉकी बन गया और लगभग 12 साल का समय रेडियो के साथ बिताने के बाद मैं अभी पूरी तरह से बॉलीवुड रिपोर्टर के तौर पर कार्यरत हूं .कभी सोचा नहीं था कि रेडियो जॉकी ही बनूंगा लेकिन परिस्थितियों के साथ-साथ चलता गया और बचपन का शौक पेशे में बदल गया
सवाल: आप कॉलेज में भी मंच पर गाने गाते थे, तब लोगों का क्या रिस्पॉन्स होता था। 
जवाब: जब मैं कॉलेज में मंच पर गाया करता था तो लोगों का एक ही रिस्पॉन्स था कि आप बहुत अच्छा गाते हैं और आपको गायन के क्षेत्र में भी ट्राई करना चाहिए.
सवाल: घर वालों की मर्जी से इंजीनियरिंग में दाखिला लिया था आपने? अब जब आरजे हैं क्या माता पिता संतुष्ठ हैं आपके करियर से। 
जवाब: जी घर वालों की मर्जी से ही इंजन इन के लिए दाखिला लिया था और मैं बड़ा भाग्यशाली हूं कि मेरे माता-पिता मेरे हर एक कदम से बेहद खुश है और जब वह खुश होते हैं तो मैं सबसे ज्यादा खुश होता हूं.
सवाल: अगर आरजे नहीं होते तो क्या होते। क्या होना चाहते। 
जवाब: अगर आर जे नहीं होता तो मनोरंजन के क्षेत्र में ही कोई न कोई कार्य कर रहा होता. जब बहुत छोटा था और किसी भी चीज का ज्यादा संज्ञान नहीं था तो लगता था कि वैज्ञानिक बनूंगा.
सवाल: आप मुम्बई के लोकप्रिय रेडियो जॉकी हैं। मुम्बई में आपका पसंदीदा आरजे कौन है। 
जवाब: जी मुझे 2004 में भी और आज 2017 में भी और आने वाले 2027 या 2040 में भी एक ही RJ पसंद था है और रहेगा, वह है RJ मंत्रा. एक रेडियो जॉकी बनने से पहले मैं एक श्रोता भी हूं और मुझे लगता है कि मंत्रा जैसा RJ शायद अब कोई ना हो.
सवाल: आरजे लोगों से बातें खूब करते हैं, लोग आरजे को आवाज से खूब पहचानते हैं, प्रशंसक भी बहुत हैं आप सबके, पर आप फेस से नहीं पहचाने जाते। क्या कभी ये कमी खलती है। हालाँकि फेसबुक ट्विटर ये कमी पूरी कर रहा है पर आपका हर श्रोता फेसबुक या ट्विटर पर हो ज़रूरी नहीं। 
जवाब: जी इस मामले में मैं काफी लकी रहा हूं क्योंकि हमेशा से ही मेरा चेहरा लोगों के सामने रहा है. चाहे वह याहू मेसेंजर, ऑरकुट या rediffmail वाला जमाना हो या फिर आज का फेसबुक ट्विटर इंस्टाग्राम वाला, आरजे आलोक का चेहरा हमेशा से ही उन लोगों तक जरूर पहुंचा है जो तकनीकी रूप से पूर्ण है. हां जिन्हें यह सोशल नेटवर्किंग साइट्स का संज्ञान नहीं है वह अक्सर रेडियो स्टेशन आ करके मुलाकात करते थे और जब भी वह हम से मुखातिब होते थे तो हमें लगता था कि हमारा रेडियो जॉकी बनना सफल हुआ सफल हुआ. रेडियो पर दिखाई ना देना और भी ज्यादा अच्छी बात है क्योंकि लोगों के भीतर उत्सुकता बनी रहती है कि आखिरकार जिस इंसान की आवाज वह सुना करते हैं वह देखने में कैसा होगा और यही बात उन्हें रेडियो स्टेशन तक खींचकर लाया करती थी. और सबसे मजे की बात यह है की रेडियो स्टेशन के भीतर आप एक माइक के सामने बैठे बैठे लाखों लोगों के साथ एक ही वक्त पर बात कर सकते हैं. लोगों को अपनी बातों के जरिए तरह तरह की तस्वीरें दिखाने की कोशिश करते हैं और शायद यही कारण है कि रेडियो की दुनिया विजुअल दुनिया से बहुत अलग है क्योंकि यहां खाली Canvas पर आपको कई तस्वीरें बनानी पड़ती है जिसे लोग अपने कानों से देखते हैं.
सवाल: एक बेहतर आरजे में क्या ख़ूबी होना चाहिए, कुछ बताइये, उनलोगों के लिए जो इस क्षेत्र में आना चाहते हैं।
जवाब: एक RJ में सबसे पहले उसकी आवाज कर्णप्रिय हो, दूसरी बात उसे अधिकतर चीजों का ज्ञान हो क्योंकि जो भी रेडियो सुनता है उसे लगता है कि जो शख्स रेडियो पर बोल रहा है उसे उस सुनने वाले से ज्यादा ज्ञान है और वह उसकी बातों पर अमल भी करता है. रेडियो जॉकी के निजी जिंदगी में क्या चल रहा है उसका कभी भी प्रभाव उसके रेडियो की जिंदगी पर नहीं पढ़ना चाहिए. एक रेडियो जॉकी को हमेशा अपडेट रहना चाहिए. और जो इस क्षेत्र में आना चाहते हैं उन्हें रेडियो जॉकी बनने से पहले रेडियो का अच्छा श्रोता बनना बहुत जरुरी है. इसी के साथ एक रेडियो जॉकी का हमेशा समय पर रहना बहुत जरूरी है क्योंकि 7:00 बजे के शो में अगर आप 5 मिनट भी लेट होते हो तो आप फेल हो.
सवाल: जैसा हम सब सभी आरजे साथियों को सुनते समझते हैं, ऐसा लगता है हर समय चिल्लाना, चीखना, शोर, मस्ती, धमाल, मटरगस्ती ही ये करते हैं। और हम ऐसी ही छवि गढ़ लेते हैं आरजे साथियों की। मैं ये समझना चाहता हूँ क्या वाक़ई मस्ती और मटरगस्ती मूड वाले लोग ही आरजे हो सकते हैं या होते हैं या फिर ये बनावटी दुनिया बस स्टूडियो तक है और स्टूडियो से बाहर आरजे भी संजीदा और गंभीर स्वभाव के होते हैं। 
जवाब: जिस तरीके से अभिनेता आपको रंगमंच पर या फिल्मी पर्दे पर या TV के ऊपर एक्टिंग करते हुए नजर आता है, ठीक उसी तरीके से एक रेडियो जॉकी भी अपने कार्यक्रम के दौरान हर एक बात को आप तक पहुंचाने के लिए स्टूडियो के भीतर से अपनी स्टाइल में चीजों को रखता है. रेडियो जॉकी भी संजीदा और गंभीर स्वभाव के होते हैं और जैसा मैंने ऊपर कहा कि उनकी पर्सनल जिंदगी का प्रभाव कभी भी उनके रेडियो शो पर नहीं पड़ता है और शायद यही कारण है कि अगर एक रेडियो जॉकी के घर कोई शोक की बात भी हो तो भी वह रेडियो शो के दौरान कभी भी अपना दुख अपने श्रोताओं  से शेयर नहीं करता क्योंकि सुनने वाला सिर्फ और सिर्फ रेडियो जॉकी की आवाज के साथ मनोरंजन की आशा रखता है.
सवाल: आरजे के लिए गंभीर स्वभाव का और मज़ाक और मस्ती से दूर रहने वाला व्यक्ति योग्य नहीं। क्या मानते हैं आप
जवाब: ऐसा बिल्कुल नहीं है, जैसा मैंने ऊपर के सवालों में कहा कि रेडियो जॉकी एक अच्छा परफॉर्मर होता है जिसे किसी भी परिस्थिति में श्रोताओं के मनोरंजन के लिए परफॉर्म करना होता है चाहे उसका स्वभाव कोई भी हो.
सवाल: अच्छा एक बात बताइये हर आरजे खूब मस्ती करते हैं स्टूडियो पर उनका प्रोफेशन है। कभी ऐसा हुआ हो आपका मूड़ सही न हो कभी टेंशन हो, मस्ती मजाक का मन न हो पर स्टूडियो में प्रोफेशन के मुताबिक आपको ये करना पड़ा हो।
जवाब: जी ऐसा कई बार होता है, रेडियो जॉकी भी एक इंसान होता है और उसकी जिंदगी में कई उथल-पुथल होती हैं, उसे भी लोकल ट्रेन में घूमना होता है, उसे भी बस स्टैंड पर खड़े होकर के बस का इंतजार करना होता है, उसका भी मूड स्विंग करता है और उसे भी टेंशन होती है लेकिन इन सभी बातों को दरकिनार कर के जिस पर एक रेडियो जॉकी स्टूडियो में घुसता है उस पल उसे यह सब चीजें भूल नहीं पड़ती है और मकसद एक ही होता है श्रोताओं का मनोरंजन. मेरे साथ क्या ऐसा हर एक रेडियो जॉकी के साथ होता है चाहे वह विश्व के किसी भी कोने में हो.
सवाल: अच्छा आप पहले दाढ़ी नहीं रखते थे, फिर दाढ़ी बढ़ी, और वो भी एक नए अंदाज में और कपड़ों का चयन भी थोड़ा बदला। सच बताइयेगा इस नए लुक को लेकर माता पिता की कोई टिप्पणी आई।
जवाब: जिस जिस शहर से मेरा वास्ता रखता हूं उस शहर में आज भी बड़े बाल ,बड़ी दाढ़ी इत्यादि रखना खराब माना जाता है, पिताजी ने तो कभी टिप्पणी नहीं की लेकिन मम्मी को हमेशा लगता था कि इतनी ज्यादा दाढ़ी बढ़ाकर नहीं रखनी चाहिए, लेकिन एक वक्त के बाद माता-पिता दोनों लोग इस बात से खुश रहते हैं कि उनका बेटा कुछ न कुछ कर ही रहा है. और मैंने भी उन्हें कपड़ों के चयन, दाढ़ी और शारीरिक रखरखाव के बारे में बता दिया है क्योंकि मेरा मानना है की व्यक्तित्व के साथ-साथ आपका पहनावा और हाव-भाव भी दुरुस्त होने चाहिए और मैं वही पहनता हूं या उसी तरीके से खुद का रखरखाव करता हूं जिसमें मैं सबसे ज्यादा कंफर्टेबल फील करता हूं.
सवाल: आप हर रात एक फ़िल्मी गाना फेसबुक पर गाते हैं, उस सीरीज का नाम है नाईट सांग, कुछ खास कहानी इसकी शुरुआत के पीछे। कब से शुरू हुई ये सीरीज और क्यों।।
जवाब: जी जैसा की बचपन से ही मुझे गाने का शौक हुआ करता था उसके बाद स्कूल और कॉलेज में भी मैंने कई बार गाने गाकर के बड़े-बड़े कंपटीशन में पहली जगह सुनिश्चित की. और हां जब से Facebook आया तो मुझे लगा कि हर रात अपना यह ख्याल छोड़ देना चाहिए जो कि मैं गानों के माध्यम से लिख दिया करता था और एक वक्त के बाद लगा कि सिर्फ लिखना ही सही नहीं है कुछ गुनगुना देना भी चाहिए, तब मैंने छोटे-छोटे गानों का वीडियो सॉन्ग बनाना शुरु किया और हर रात एक गाना गुनगुना दिया करता था और अभी भी वह परंपरा जारी है और जब से लाइव वीडियो शुरू हुए हैं तब से मैं ने इसी विधा में एक और विधा छोड़ दी है वह है संडे की रात लाइफ सोंग्स जोकि उस पल जगे हुए मेरे Facebook के दोस्तों की फरमाइश होती है. कभी-कभी मेरे Facebook के नाइट सॉन्ग में हिंदी फिल्म इंडस्ट्री के सितारे जुड़ते हैं तो कभी मेरे मीडिया फील्ड के दोस्त मेरे साथ या गीत गाते हैं. यदाकदा मैं हिंदी के अलावा भी बाकी भाषाओं के गीतों को गाने की कोशिश करता हूं. अधिकतर अकेला ही नाइट सॉन्ग आता हूं और इसकी शुरुआत हुए लगभग ढाई साल से ज्यादा हो चुके.
सवाल: बॉलीवुड के तमाम छोटे बड़े स्टार आपको जानते पहचानते हैं। आप किसके फेन हैं और कोई एक स्टार जो आपका फेन हो। और उसने आपके शो या आपकी आवाज की तारीफ़ की हो। 
जवाब: जी हिंदी फिल्म इंडस्ट्री अपने आप में ही एक मैजिकल इंडस्ट्री है जहां सितारे को पत्रकार की और एक पत्रकार को सितारे की जरूरत है. वैसे तो मैं किसी भी सितारे का फैन नहीं हूं और ना ही वह मेरे, यह बस जज्बातों का आदान प्रदान होता है, एक अच्छा वक्त गुजर जाने के बाद लोग आपको जानने लगते हैं जो कि बड़े ही गर्व की बात है और मुझसे ज्यादा मेरे माता पिता को इस बात का गर्व है कि तमाम हिंदी फिल्म इंडस्ट्री के सितारे उनके बेटे को जानते हैं. और यह सितारे जब भी मिलते हैं तो शो की और आवाज की तारीफ यदाकदा जरूर करते हैं. किसी एक सितारे का नाम लेना गलत होगा.
सवाल: बिल्कुल सटीक याद नहीं पर शायद एक बार आप कवरेज के दौरान गिर गए थे तो जॉन अब्राहम ने आपको उठाया था, क्या घटना थी वो, जॉन काफी जिंदादिल व्यक्ति हैं।
जवाब: जी मुंबई में बारिश अलग ही रुप में हुआ करती है लेकिन जैसा कि आपको पता है कि यह पत्रकार हर एक मोसम में कार्यरत होता है और ऐसा ही कुछ हुआ था जब जॉन अब्राहम की फिल्म ढिशूम का एक इवेंट था जिस की तस्वीरें खींचने के लिए मैं जब कोशिश कर रहा था तो उस पल जमीन पर बारिश का पानी भरा हुआ था और पीछे आते हुए ध्यान ना देने की वजह से मैं गिर पड़ा, मुझे गिरता देख अभिनेता जॉन अब्राहिम खुद आगे बढ़ कर आए ,मुझे उठाया और उन्होंने मुझसे पूछा कि चोट तो नहीं लगी और तसल्ली होने के बाद ही वह इवेंट के लिए आगे बढ़े. यह जॉन इब्राहिम का बड़प्पन है कि वह अभिनेता होने के साथ-साथ एक उम्दा इंसान भी हैं
सवाल: मुम्बई की पत्रकारिता पर सवाल-
बहुत दिनों से मैं सुन और पढ़ रहा हूँ और वो भी बड़े पत्रकारों से और बड़े अखबारों के जरिये की मुम्बई में फ़िल्म पत्रकारों से फ़िल्म वालों का व्यवहार अब अच्छा नहीं। स्टार कभी प्रेस कॉन्फ्रेन्स में भड़क जाते है, कभी बोलने से पत्रकार को रोक देते हैं, कभी घण्टों साक्षात्कार के लिए इंतजार करातेे हैं, कभी खुद पीसी में लेट आते हैं स्टार। कभी पीसी में अपनी पसन्द का सवाल पूछने की इजाजत देते हैं। क्या सच्चाई है इस मामले में। क्या सच में फिल्मी लोग पत्रकारों से ये व्यवहार करते हैं। 
जवाब: जी इस सवाल के बारे में बड़े पत्रकारों और बड़े अखबारों का क्या कहना है उस पर मैं तो टिप्पणी नहीं कर सकता, लेकिन हर दिवस फिल्मों के लिए कई प्रेस कॉन्फ्रेंस होती हैं जिनका हिस्सा मैं खुद होता है और 8 साल से भी ज्यादा का वक्त गुजारने के बाद मैं यह बात कह सकता हूं कि व्यवहार में बदलाव वैसे ही होते हैं जैसे की हर छठवें महीने में तकनीकी में बदलाव होते हैं. फिल्मी पत्रकारों को फिल्मी सितारों के मिजाज और समय का संज्ञान होता है. और जिस दिन पत्रकार को उसकी संस्था से जो भी सवाल देकर भेजा जाता है वह पत्रकार उस सवाल को पूछने की भरपूर कोशिश करता है और जैसा की सवाल पूछना हमारा हक है वैसे ही जवाब देना या ना देना सामने बैठे सितारे का हक होता है. अब वह किस अंदाज में सवाल का जवाब देता है या नहीं देता है, इसी बात पर टीका टिप्पणी की जाती है. मैंने जब भी जिस सवाल का जवाब लेना चाहा है वह मुझे जरूर मिला है और प्रेस कॉन्फ्रेंस से या सितारों से आज तक मुझे कोई भी गिला शिकवा नहीं है. एक प्रोफेशनल पत्रकार होने के नाते इवेंट पर जाना, प्रश्न पूछना, स्टोरी बनाना और फिर अगले इवेंट की तरफ रुख कर देना, बस हर दिन का यही काम है जो मैं करता आया हूं और निकट भविष्य में करता रहूंगा.
सवाल: सलमान मीडिया से अक्सर भिड़ जाते हैं, कोई ऐसा स्टार जो मीडिया से सबसे ज्यादा खार खाता हो, बचता हो।।
जवाब: आप की पहली लाइन से मैं सहमत नहीं हूं कि सलमान मीडिया से अक्सर भिड़ जाते हैं, हर एक सितारे का अपना मिजाज होता है और उस मिजाज को कोई भी नाम दिया जा सकता है. मेरे जानने में कोई ऐसा सितारा नहीं है जो मीडिया से खार खाता हो या बचता हो क्योंकि मीडिया और सितारे का मिलन  ज्यादातर उनकी आने वाली फिल्म की रिलीज के आस-पास ही होता है.
सवाल: क्या स्टार और पत्रकार वॉर में क्या दोषी स्टार ही बस हैं  या मीडिया वाले भी। जैसे कुछ भी आपत्तिजनक या बेहद निजी पूछना, या सलीके से पेश न आना। या निजी जिंदगी में ज्यादा दखल देना। मैंने ये सवाल इसलिए किया क्योंकि पिछले दिनों सोहेल, सारा अली खान और स्टार जिम में थे, निकलते वक्त पपराजी यानि कुछ स्वतंत्र फोटो पत्रकारों ने उनका पीछा करना शुरू कर दिया अनावश्यक रूप से, स्थिति इतनी बिगड़ी की पत्रकारों से बचने स्टार्स को पुलिस बुलानी पड़ी। ये इंडियन एक्सप्रेस की खबर में भी है। क्या ये पत्रकारों की ज्यादती नहीं। 
जवाब: जी जैसा की मैंने ऊपर के प्रश्न में जवाब दिया है कि अक्सर फील्ड पर पत्रकार चाहे वो रिपोर्टर हो या फोटोग्राफर्स या फिर वीडियो जर्नलिस्ट, वह अक्सर सितारों का पीछा करते हुए नजर आते हैं क्योंकि उनकी संस्था के द्वारा दिए गए निर्देशों को वह पूरा करते हैं. उनकी निजी जिंदगी में झांकना ,कौन किसके साथ कहां देखा गया, और सबसे बड़ी बात आज के समय में सभी को एक्सक्लूसिव खबरों की तलाश होती है जिसकी वजह से दिए गए निर्देशों का पालन एक पत्रकार करता है. मुझे लगता है कि हर एक पत्रकार को उसकी संस्था के द्वारा पत्रकारिता की हद जरूर बताइ और पढ़ाई जानी चाहिए जिससे कि पत्रकारिता के दौरान उन्हें इस बात का इल्म हो कि उन्हें क्या कब और कैसे करना है जिससे कि वह पत्रकारिता के मानकों पर खरे उतरें.
सवाल: आप को साढ़े 5 हजार लगभग लोग फॉलो करते हैं, कई आरजे हैं जिन्हें लाखों लोग फॉलो करते हैं। ये फॉलोवर इतने कम क्यों और आपकी नजर में भारत का सबसे बेस्ट आरजे कौन है। 
जवाब:  जी शायद आपने सिर्फ Facebook के प्रोफइल को देखकर यह आकड़ा निकाला है जहां सिर्फ 5000 दोस्तों को जोड़ा जा सकता है और बाकी लोग आपको फॉलो कर सकते हैं. यदि आप थोड़ा रुख ट्विटर और इंस्टाग्राम की तरफ भी करें तो आपको लगभग साढ़े तीन लाख फालोवर ट्विटर पर और लगभग 25 हजार इंस्टाग्राम पर मिलेंगे. मैं खुशनसीब हूं कि मेरा ट्विटर और Facebook का अकाउंट वेरिफाइड है और ट्विटर पर हिंदी फिल्म इंडस्ट्री के कई नामी सितारे मेरी अपडेट्स को फॉलो करते हैं. जैसा की मैंने ऊपर बताया कि मेरे लिए कल भी आज भी और कल भी एक ही बेस्ट RJ था, है और होगा वह है RJ मंत्रा
सवाल: साहित्य में दिलचस्पी है आपकी? किस लेखक को पढ़ना पसन्द करते हैं। नए लेखकों को में कौन पसन्द है।
जवाब: जी साहित्य में बचपन में काफी रुचि थी, कबीर रहीम प्रेमचंद की कृतियों को काफी पड़ा लेकिन बड़े होने पर और खासतौर से फिल्मी पत्रकार होने के बाद आजकल मेरा रुझान ज्यादातर फिल्मी बायोग्राफी पढ़ने में है. मैंने ऋषि कपूर करन जोहर आशा पारेख की बायोग्राफी हाल ही में खत्म की है और जल्द ही नहीं किताबों का इंतजार है.
सवाल: कोई एक पसंदीदा फ़िल्म पत्रकार, कोई एक टीवी पत्रकार अपनी पसन्द का। न्यूज़ चैनल कौन सा देखते हैं और अख़बार कौन सा पढ़ते हैं।
जवाब: जी मुझे फिल्मी पत्रकारों में हर एक पत्रकार पसंद है क्योंकि उसकी अलग स्टाइल है कोई एक नाम ले पाना गलत होगा, TV के पत्रकारों में मुझे आजतक के सिद्धार्थ हुसैन काफी पसंद है. मैं मुख्य रुप से आज तक न्यूज़ देखता हूं. मेरे घर सुबह सुबह टाइम्स ऑफ इंडिया ,हिंदुस्तान टाइम्स ,मिड डे ,मुंबई मिरर ,नवभारत टाइम्स, डीएनए इत्यादि अखबार आते हैं. जिन्हें मैं नियमित रुप से सरसरी निगाह से हर दिवस पढ़ कर के ही काम पर निकलने की कोशिश करता हूं.
सवाल: आप उत्तरप्रदेश के हैं, ये नहीं लगता की अपने प्रदेश में जाकर काम करें ताकि आपके गांव आपके क्षेत्र तक आपकी आवाज सुनी जाये।
जवाब: जी अपने प्रदेश जाने से पहले और वहां ज्यादा से ज्यादा काम करने से पहले मेरी पहली कोशिश है कि एक ऐसा मकाम हासिल करूं जिसके बाद यह सब कुछ करना मेरे लिए काफी आसान हो. अभी मुंबई में स्ट्रगल की जिंदगी चल रही है
सवाल: एक सवाल या कहें जिज्ञासा, मुम्बई से इतर रहने वाले पत्रकारों की ओर से। वो ये की अगर कोई पत्रकार महानायक अमिताभ बच्चन का साक्षात्कार करना चाहे तो क्या वो समय देंगे, क्या प्रक्रिया है अमिताभ का साक्षात्कार का समय मिलने की और इसमें कितना समय लग सकता है। चूँकि आप मिलते ही रहते हैं आपसे बेहतर ये बात कोई नहीं बता सकता।
जवाब: अगर महानायक अमिताभ बच्चन से मिलना हो या और भी किसी सितारे से मिलना हो तो उनके मैनेजर उनके समय के हिसाब से साक्षात्कार का समय देते हैं और अमिताभ बच्चन तो यूं ही हर रविवार शाम अपने घर जलसा के बाहर अपने चाहने वालों से मिलते ही मिलते हैं बशर्ते कि वह मुंबई शहर में हो. अगर कोई पत्रकार अमिताभ बच्चन से मिलना चाहता है तो या तो वह उन के मैनेजर के जरिए या फिर ट्विटर या उनके ब्लॉग पर अपनी अर्जी छोड़ सकता है.
सवाल: अंतिम सवाल, आप फ़िल्म समीक्षा लिखते हैं। क्या समीक्षा पूरी तरह से सही होती हैं, या संसथान के व्यावसायिक हित के चलते समीक्षा प्रचार में बदल जाती हैं। क्योंकि आपका संस्थान जिस फ़िल्म के मीडिया पार्टनर हैं या उसके प्रमोशन का जिम्मा ले रखा है तो आप उस फ़िल्म की पारदर्शी समीक्षा कैसे लिख सकते हैं?
जवाब: जी मैं फिल्म समीक्षा लिखता हूं और मैं भाग्यशाली हूं कि इतने सालों में कभी भी ऐसा नहीं हुआ कि मेरा संस्थान मुझसे कहे कि मैं समीक्षा फिल्म के प्रमोशन या मीडिया पार्टनर के तौर पर लिखूं. मुझे बिल्कुल स्वतंत्र रखा गया है की फिल्म जिस तरह की है उसी हिसाब से उसकी समीक्षा की जाए जिससे कि पढ़ने वाले पाठक उस समीक्षा को पढ़े और फिल्म देखने या ना देखने की राय उसे ही पढ़ कर बनाए.
Share this: