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टीवी मीडिया में ‘लुक’ का जो प्रभुत्व है उसको राज्यसभा टीवी ने गम्भीरता से तोड़ा: सप्पल

राज्यसभा टीवी के मुख्य कार्यकारी अधिकारी व प्रधान सम्पादक गुरदीप सिंह सप्पल
राज्यसभा टीवी के मुख्य कार्यकारी अधिकारी व प्रधान सम्पादक गुरदीप सिंह सप्पल। छायाः प्रशांत राजावत

मीडिया मिरर की साक्षात्कार श्रृंखला बात-मुलाकात में आप सबका स्वागत है। जैसा की आप जानते हैं हम बात-मुलाकात के माध्यम से आपको साहित्य और पत्रकारिता जगत की शख्सियतों से मिलवाते आ रहे हैं। तो इस बार भी बेहद ख़ास मेहमान हमारे साथ हैं श्री गुरदीप सिंह सप्पल। सप्पल जी राज्यसभा टीवी के मुख्य कार्यकारी अधिकारी व प्रधान सम्पादक हैं और उपराष्ट्रपति के संयुक्त सचिव भी हैं। मीडिया मिरर सम्पादक प्रशांत राजावत ने लम्बी बातचीत की सप्पल जी से।

राज्यसभा टीवी के मुख्य कार्यकारी अधिकारी व प्रधान सम्पादक गुरदीप सिंह सप्पल
राज्यसभा टीवी के मुख्य कार्यकारी अधिकारी व प्रधान सम्पादक गुरदीप सिंह सप्पल

गुरदीप सिंह सप्पल के बारे में:-
बहुत कम लोग जानते हैं कि देश में सूचना का अधिकार कानून पारित करवाने के लिए जद्दोजहद करने वाले प्रारंभिक लोगों में से एक हैं गुरदीप सिंह सप्पल। गुरदीप जी बेबाक़ी से आज भी ये कहते हैं की भारत एकमात्र ऐसा मुल्क़ है जहाँ आज भी गॉड फ़ादर के बग़ैर लोग सफ़ल होते हैं, हो सकते हैं। गुरदीप वो नाम है जिसे 2004 तक कोई विशेष पहचान नहीं मिली थी पर अपने बूते शाइनिंग इंडिया का तोड़ लेकर कांग्रेस के नीति नियंताओं से मिले और फ़िर पीछे मुड़कर नहीं देखा। कांग्रेस नेता और पूर्व केंद्रीय मंत्री सुरेश पचौरी के राजनीतिक सलाहकार के तौर पर अपनी नई पारी शुरू करने वाले सप्पल क्रमशः बुलंदियों की ओर बढ़ते रहे। राष्ट्रपति, उपराष्ट्रपति के चुनाव की ज़िम्मेदारी हो, या उपराष्ट्रपति के ओएसडी के रूप में उनकी नियुक्ति या राज्यसभा टीवी में बतौर प्रधान सम्पादक उनका सफ़र। हर जगह वो उन पदचिन्हों को छोड़ते गए जिनका अनुसरण न सही अध्ययन और विश्लेषण ज़रूर भविष्य में किया जाएगा। खुद को पॉलिसी मेकर कहलाना पसन्द करने वाले सप्पल ने जिला स्तर पर प्राथमिक शिक्षा के लिए कार्य किया और ग्रामीण विकास, ग्रामीण तकनीक मामलों के विशेषज्ञ हैं। कांग्रेसी पृष्ठभूमि के सप्पल की ये निष्पक्ष छवि का नायाब उदाहरण ही है की जब वो राज्यसभा टीवी के प्रधान सम्पादक बने तब यूपीए सरकार के कांग्रेस सांसदों ने ही उनपर आरोप मढ़े की वो कांग्रेस के ख़िलाफ़ कार्यक्रम दिखा रहे हैं। सप्पल का मानना है की कामकाज़ में विचारधारा आड़े नहीं आना चाहिए। एक सम्पादक के तौर पर सप्पल की रॉय है की अगर हम पत्रकार को छूट नहीं देंगे तो हम सरकारी कर्मचारी पैदा कर रहे होंगे। बतौर सम्पादक सप्पल जी ने 24 घण्टे प्रसारित होने वाले न्यूज़ चैनलों की कड़ी प्रतिस्पर्धा के बीच राज्यसभा टीवी को जिस मुक़ाम तक पहुँचाया है वो आज किसी से छिपा नहीं। राज्यसभा टीवी आज देश में बेहतर कार्यक्रमों के लिए प्रसिद्ध है।

 

धीरे धीरे टीवी चैनलों के 15-20 साल के सफर में एंकर और ग्लैमर एक दूसरे का पर्यायवाची बन गए थे। और हम ये मान रहे थे कि एंकर तो सिर्फ माध्यम है, जो मूल है वो कंटेंट है। तो हमने उन्हीं पत्रकारों को चुना जिनका कंटेंट अच्छा था। हम उनके लुक्स पर भी नहीं गए। और ये एक प्रयोग था कि बिना लुक्स पे ध्यान दिए हुए भी क्या आप अच्छा टीवी कर सकते हैं। और ये शायद हमने प्रूव भी किया। लुक का जो प्रभुत्व है टीवी मीडिया में हमने उसको तोड़ना चाहा और गंभीरता से तोड़ा भी। तो गिरीश निकम हों, उर्मिलेश हों, सिद्धार्थ वरदराजन हों या जितने भी हमारे एंकर रहे हैं उनका लुक टीवी चैनल का लुक नहीं था। लेकिन हमने इनको एंकरिंग इसलिए दी क्योंकि ये पत्रकार थे, विषय विशेषज्ञ थे। 

 

 

प्रशांत राजावत के सवाल- गुरदीप सिंह सप्पल के जवाब

सवालः अगस्त 2011 में शुरू हुए राज्यसभा टीवी के सफर को कैसे देखते हैं। वो भी ऐसे समय में जब आरएसटीवी से अगले माह विदा ले रहे हैं।

जवाबः संतोष के साथ देखता हूं, 6 साल में राज्यसभाटीवी ने एक बात साबित की है कि इस देश में एक मजबूत पब्लिक ब्रॉडकास्टर की जगह है और वो जगह लोग चाहते भी हैं और उसकी जरूरत भी है। पब्लिक ब्राडकॉस्टर पब्लिक मीडिया की तरह चल भी सकता है और सर्वाइव भी कर सकता है। कुल मिलाकर ये हमारी कहानी है।

सवालः राज्यसभा टीवी ने देश को एक से एक बेहतर प्रोग्राम दिए। हर वर्ग इन कार्यक्रमों का प्रशंसक रहा है। पर राज्यसभा टीवी में आपका पसंदीदा प्रोग्राम कौन सा है। 

जवाबः ये सबसे बेहतर चुनने की परम्परा जो इस देश में चली है, उसी ने बड़ा नुकसान किया है। इस सवाल के जवाब से मैं बच नहीं रहा हूं। बल्कि मेरा मानना है अच्छा, लोकप्रिय, लोगों को पसंद आने वाली चीजें अलग अलग बातें हैं। अलग  लोगों की  अलग अलग पसंद होती, बेहतर का अलग अलग पैमाना होताहै । इसका सरलीकरण उचित नहीं है।

सवालः आपका बायोडाटा मैने देखा आपने ग्रामीण विकास, ग्रामीण तकनीक, प्राथमिक शिक्षा पर काम किया है। जैसे आपके यहां ग्रामीण मामलों पर अरविंद कुमार सिह रिपोर्ट करते हैं, तो जब इस विषय से संबंधित प्रोग्राम होते होंगे आपके चैनल में तब आपकी खास दिलचस्पी रहती होगी। उस प्रोग्राम में सलाह मशविरा अन्य प्रोग्राम की अपेक्षा ज्यादा करते होंगे। 

जवाबः अरविंद सिंह प्रिंट के पत्रकार रहे हैं। उन्हें जगह ही इसलिए मिली की हमे ग्रामीण मामलों पर काम करना था। और जब आप सीनियर व्यक्ति को लाते हैं तो आइडिया लेवल पर डिस्कशन करते हैं।लेकिन उसके बाद उस पत्रकार को छूट देनी होती है।

अगर हम पत्रकार को छूट नहीं देंगे तो हम सरकारी कर्मचारी पैदा कर रहे होंगे। हां लेकिन आइडिया लेवल पर रोल रहता है। एडिटोरियल का भी हमारे रोल रहता है। और हर स्टोरी जो न्यूज में जाती है वो न्यूज टीम का काम होता है। लेकिन कोई स्पेशल रिपोर्ट है तो उसपर जरूर हम लोग डिस्कशन करते हैं कि इसको कैसे करना है। फाइनली तो वो पत्रकार की जिम्मेदारी होती है नहीं तो वो पत्रकार किस बात का।

दूसरी बात अगर एडीटर इन चीफ ही हर स्टोरी को अपनी तरह से बनाएगा तो फिर तो चैनल में सबकुछ एक जैसा होगा, वैरायटी रहेगी ही नहीं। और एक व्यक्ति का ज्ञान सब पर भारी नहीं हो सकता न।

संसद परिसर में उपराष्ट्रपति हामिद अंसारी के साथ गुरदीप सिंह सप्पल
संसद परिसर में उपराष्ट्रपति हामिद अंसारी के साथ गुरदीप सिंह सप्पल

सवालः उपराष्ट्रपति महोदय इस चैनल के मुखिया हैं, निश्चित है राज्यसभा टीवी के कार्यक्रमों पर उनकी नजर रहती होगी। क्या कभी उन्होंने बताया कि चैनल में उनका पसंदीदा प्रोग्राम कौन सा है।

जवाबः हां उनकी कार्यक्रमों पर नजर रहती है। हर कार्यक्रम वो देखते हैं। उनकी भी बड़ी वाइड रेंज है। और बहुत कम लोगों को पता है कि उपराष्ट्रपति हैं जो हमारे वो शायरी के बहुत बड़े शौकीन है। वो बातचीत करते समय हर बात में ऐसे ऐसे शेर ढूढ़कर लाते हैं कि हैरानी होती है और उर्दू में बात करते हैं। उनकी रुचि विदेश मामलों में भी है, करंट अफेयर्स पर भी, शास्त्रीय संगीत में भी। वो तो ये सारे प्रोग्राम देखते आए हैं। कभी मैनें पूछा नहीं आपका बेस्ट प्रोग्राम कौन सा है। कभी उन्होंने बताया नहीं मेरा बेस्ट कौन सा है। इंडीविजुअल प्रोग्राम को लेकर उन्होंने कभी चर्चा नहीं की। हां जब चैनल शुरू ही हुआ था तब जरूर एक बार बुलाकर कहा था कि चैनल तुम्हारा चल गया। बस ये उनका कमेंट है इसके अलावा उन्होंने कोई कमेंट्री नहीं की।

क्योंकि वो भी इंटेलेक्चुअल हैं, उन्होंने स्पेस पूरी दी और चूंकि मैं उनका ओएसडी भी रहा, 10 साल से उनके साथ हूं तो कई बार हम लोगों की बातचीत बिना बोले ही हो जाती है।

सवालः आपने राष्ट्रपति-उपराष्ट्रपति के चुनाव की जिम्मेदारी संभाली, फिर उप राष्ट्रपति के ओएसडी बने,फिर राज्यसभा टीवी के एडीटर। हामिद अंसारी जी ने विश्वास और स्नेह दोनों जताया आप पर और जिम्मेदारियां दीं। क्या कहेंगे।

जवाबः इस सवाल का जवाब उपराष्ट्रपति जी से ही पूछिए, अपने बारे में कहना ठीक नहीं।

सवालः आप कविताए लिखते रहते हैं अक्सर

जवाबः वो आजकल हमलोग फेसबुक कवि हो गए हैं।

सवालः तो क्या कभी संकलन करेंगे कविताओं का किताब के रूप में

जवाबः नहीं। संकलन नहीं करूंगा। देखिए कवि बनने के लिए, संकलन करने के लिए खास मूड में जीना पड़ता है, और आप उस खास मूड में जीना चाहेंगे तो आप चैनल नहीं चला सकते, क्योंकि आपको रोजमर्रा की दुनिया से कटकर अपनी ही एक दुनिया में रहना होता है। आप अपनी दुनिया नहीं बनाएंगे तो अच्छी कविता नहीं कर सकते।

सवालः आप अगले माह राज्यसभा टीवी के प्रधान सम्पादक पद से मुक्त हो जाएंगे, क्या आप चाहेंगे कि आगे भी उस पद पर बने रहें।

जवाबः कार्यकाल तो मेरा काफी लम्बा है आगे राज्यसभा टीवी में। लेकिन मैं स्वेच्छा से पद छोड़ रहा हूं। उसकी वजह ये है कि मैं वर्तमान उप-राष्ट्रपति जी का सलाहकार हूं, ओएसडी हूं। मैं चुनाव लड़कर या एक्जाम पास करके तो आया नहीं था, मुझे उन्होंने चुना था। ऐसे में जो नए उपराष्ट्रपति आएंगे ये उनका अधिकार है वो जिसको चाहें उसको चुनें। मेरा अपना पर्सनली मानना है कि मुझे लेकर अगले उपराष्ट्रपति के अधिकार क्षेत्र दिक्कत नहीं आनी चाहिए। इसलिए मुझे जगह खाली करनी है। इसलिए ये सवाल ही नहीं आता चाहने या न चाहने का।

सवालः मान लीजिए नए उपराष्ट्रपति आपको पुनः पद पर बने रहने का अवसर दें तो आप राज्यसभा टीवी से जुड़े रहना चाहेंगे।

जवाबः मैं बिल्कुल क्लीयर हूं। अब इस पारी को आगे नहीं बढ़ाऊंगा। अगर मैं वर्तमान उपराष्ट्रपति जी के साथ नहीं होता तो अलग बात होती। पर आपने उपराष्ट्रपति के साथ 10 साल काम किया तो नए के साथ नहीं करना चाहिए। ये उचित नहीं। ये नैतिक रूप से उचित नहीं इसलिए नहीं करूंगा।

सवालः आप राज्यसभा टीवी के मुख्य कार्यकारी अधिकारी भी हैं और सम्पादक भी। दोनों भूमिकाओं में सामंजस्य कैसे बिठा पाते हैं।

जवाबः इससे फायदा ही हुआ है क्योंकि दोनो की ही डिमांड मुझे पता है। जब दोनों तरफ की डिमांड पता है तो समाधान निकालने में आसानी होती है। जब डिमांड पता है तो आपको खुद से ही लड़ना होता है किसी और से नहीं। और अब तो आपने देखा है मीडिया में चलन शुरू हो गया है सीईओ और एडीटर दोनों एक ही व्यक्ति। हमारे बाद लोकसभा टीवी में भी ऐसा ही हुआ है। निजी चैनलों में भी ऐसा ही हो रहा है।

सवालः जैसा आपने कहा कि उपराष्ट्रपति जी ने आपको काम की स्वायत्ता दी और आपने अपने कर्मचारियों को।

जवाबः हर मीडिया संगठन का एक फ्रेमवर्क है। उसमें तो पत्रकार को फिट होना पड़ेगा। पर अगर उसके बाद आप पत्रकार को स्वायत्ता नहीं देंगे तो मीडिया संगठन नहीं चल सकता। ये फौजी संगठन नहीं है कि ऊपर से एक आर्डर आया और सबको मानना है।

सवालः आप बहुत प्रयोगधर्मी सम्पादक के रूप में जाने जाते हैं। एक वाकया है आपके चैनल के शुरूआती दौर का जब पत्रकार उर्मिलेश राज्यसभा टीवी मे आए एंकरिंग के लिए, तो आपने कहा कि उनका गेटप वरिष्ठ पत्रकार राहुल देव से मिलता है और फिर गेटअप में कुछ परिवर्तन हुए। क्या था वो मामला। क्या इस स्तर पर भी सोच विचार करते थे आपलोग।

जवाबः ऐसा तो हर चैनल में होता है। क्योंकि उर्मिलेश ने एंकरिंग कभी की नहीं थी।

सवालः वैसे आप ऐसे ही लोगों को लेकर क्यों आए जो टीवी दुनिया से नहीं थे। गिरीश निकम भी एक उदाहरण कहे जा सकते हैं। 

जवाबः उसमें बिल्कुल क्लीयरिटी थी दिमाग में। क्या हो गया था कि धीरे धीरे टीवी चैनलों के 15-20 साल के सफर में एंकर और ग्लैमर एक दूसरे का पर्यायवाची बन गए थे। और हम ये मान रहे थे कि एंकर तो सिर्फ माध्यम है, जो मूल है वो कंटेंट है। तो हमने उन्हीं पत्रकारों को चुना जिनका कंटेंट अच्छा था।हम उनके लुक्स पर भी नहीं गए। और ये एक प्रयोग था कि बिना लुक्स पे ध्यान दिए हुए भी क्या आप अच्छा टीवी कर सकते हैं। और ये शायद हमने प्रूव भी किया।

लुक का जो प्रभुत्व है टीवी मीडिया में हमने उसको तोड़ना चाहा और गंभीरता से तोड़ा भी। तो गिरीश निकम हों, उर्मिलेश हों, सिद्धार्थ वरदराजन हों या जितने भी हमारे एंकर रहे हैं उनका लुक टीवी चैनल का लुक नहीं था। लेकिन हमने इनको एंकरिंग इसलिए दी क्योंकि ये पत्रकार थे, विषय विशेषज्ञ थे।

साथ ही हमारी एक समझ और रही है । अच्छे लुक की परिभाषा उत्तरी भारत में अलग है, दक्षिण में अलग और पूर्वोत्तर में अलग है। केवल उत्तर भारत की परिभाषा सब पर थोपना ठीक नहीं है। इसीलिए हम विशेष तौर पर पूर्वोत्तर और दक्षिण के चेहरे बतौर ऐंकर ले कर आए।

सवालः अच्छा जब चैनल शुरू कर रहे थे तो ये बात मन में होगी कि ऐसा चैनल लाएंगे जो अन्य चैनलों पर भारी हो, एक उदाहरण बने।

जवाबः नहीं ये नहीं था कि सब पर भारी हो। हमारे को डायरेक्शन क्लीयर थी। जब राज्यसभा टीवी शुरू हुआ तो उस वक़्त चैनलों में एक परंपरा रही कि दर्शक जो चैनल देखे तो उसे लगे कि चैनल मेरी ही बात कह रहा है। दर्शक को लगे जो मैं सोचता हूं चैनल वही कह रहा ह, मेरी ही समझ को पुष्ट कर रहा । हमने इससे अलग लाइन ली। हमारे अनुसार दर्शक को लगना चाहिए कि चैनल जो कह रहा है वो हमे मालूम नहीं था। आज नई बात मालूम चली। ये बेसिक फर्क है राज्यसभा टीवी और अन्य चैनलों में।हमने अपने चैनल को नॉलेज चैनल रखा।

सवालः राज्यसभा टीवी के कंपटीटर के रूप में किस चैनल को देखते हैं। 

जवाबः हमने कंपटीटर चैनल नहीं लिया। हमने प्रिंट में अपने को जरूर जोड़ा। हमारी सोच ये थी जो व्यक्ति इंडियन एक्सप्रेस पढ़ता होगा वो राज्यसभा टीवी जरूर देखे। वो जो पाठक वर्ग है वो अलग पाठकवर्ग है देश में। उसके लिए कोई टीवी चैनल नहीं था। तो हमने उसको एड्रेस किया।

सवालः मतलब आपने हिंदी दर्शकों के हिसाब से राज्यसभा टीवी को तैयार नहीं किया था। क्योंकि इंडियन एक्सप्रेस तो अंग्रेजी का अखबार है।

जवाबःपाठक मतलब पाठक। हिंदी अंग्रेजी नहीं। मेरा मतलब उस तरह की सोच वाला पाठक जो इंडियन एक्सप्रेस पढ़ता है। जो सीरियस चीज पढ़ना व देखना चाहते हैं।

सवालः तो जिस वर्ग को आप टारगेट करके चैनल लाए वो वर्ग तो बहुत सिमटा हुआ है।

जवाबः नहीं सिमटे हुए नहीं हैं। इंडियन एक्सप्रेस को लें । सर्कुलेशन बेशक कम है, प्रभाव ज्यादा है। हमने भी उसी बात को लक्ष्य बनाया। हमारी दर्शक संख्या बेशक कम हो पर प्रभाव ज्यादा हो। हमे डेडीकेटेड व्यूअर मिले और हमे चाहिए भी थे।उस दर्शक को जो राज्यसभा टीवी में मिला वो और कहीं नहीं मिल सकता। हमने अपना टारगेट ग्रुप तय कर रखा था।और हम उसी को अप्रोच करते रहे। हमने हर वर्ग के लिए प्रोग्राम बनाने की कभी नहीं सोची। क्योंकि हर चैनल को अपनी दिशा तय करनी पड़ती है। अब 4 -5 साल में एक चैनल सबके लिए सबकुछ नहीं कर सकता। हमारी दिशा एकदम तय थी, जो लोग ज्ञान चाहते थे, कुछ नया जानना चाहते थे वो राज्यसभा टीवी देखें।

सवालः सरकारी स्तर पर कभी कोई दखल होता था कि ऐसा प्रोग्राम नहीं चलाना है या किसी अन्य तरीके से। जैसे आपने कोई प्रोग्राम बनाया और वो सरकार के पक्ष में न हो ऐसी स्थिति में कोई सरकार की ओर से बाधा।

जवाबः हम डे वन से बहुत क्लीयर थे कि राज्यसभा टीवी संसद का चैनल है। और जब ये मैसेज सबको क्लीयर था तो सीधे तौर पर कभी कोई दखल नहीं हुआ । न पुरानी सरकार का, न इस सरकार का।अब मीडिया है तो कुछ तो लोगों को पसंद-नापसंद रहता है। पर ये कभी नहीं हुआ कि ये मत करो।

सवालः आपका कार्यकाल बेदाग रहा, बस प्रशांत भूषण की पीआईएल को छोड़ दें तो। जिसमें आपकी नियुक्ति को चुनौती दी गई थी। 

जवाबः (थोड़ा गंभीर मुद्रा में..) प्रशांत भूषण ने हमपे पीआईएल की। उस पीआईएल का आधार कुछ लोगों ने उनको दिया, जो सीएजी ओबजेक्शन थे। जिस दिन प्रशांत भूषण ने पीआईएल की उस दिन शाम को भी  हमारे प्रोग्राम में थे। उसदिन से आजतक डेढ़ साल हो गए। वो हमारे प्रोग्राम में आते हैं। आजतक मैने उनसे बात नहीं की कि आपने पीआईएल क्यों लगाई। उसकी वजह है हमको पता था कि पीआईएल का जो आधार है वो दरअसल आधार ही नहीं है। आज डेढ़ साल बाद सीएजी ने भी सारे ओबजेक्शन में हमारे जवाब मान लिए। हमने एफेडेविट दे दिया। और मेरा मानना है कि कोर्ट की लड़ाई कोर्ट में लड़ें। मेरा मानना है कि जब कोई संस्थान बनता है तो लोगों में अविश्वास आता ही है, तो उसका जवाब दिया जाना चाहिए।सवाल करने वाले पर सवाल उठाना ये मेरी समझ में ठीक नहीं होता।

सवालः फिर भी ऐसे मामलों (पीआईएल मामला) को किस तरह देखते हैं। 

जवाबः (बहुत सहजता से जवाब) नहीं, ऐसा होता है। उसका कारण है कि बहुत लोग अलग अलग तरीके से चीजों को देखते हैं। इस मामले को मैं व्यक्तिगत तौर पर नहीं देखता हूं। इसलिए मैंने कभी नहीं कहा कि प्रशांत जी हमारे चैनल में न आएं। वो सीनियर आदमी हैं मेरा तो मानना है कि उन्होंने जो किया अच्छी नियत से ही किया होगा। इसलिए मैं अपना पर्सनल वर्जन नहीं दूंगा, हां कोर्ट में दिया। मुझे लगता है अब वो भी सहमत हैं। मुझे नहीं लगता अगर अब आप उनसे बात करें तो वो वही बात दोहराएंगे जो उन्होंने एफेडेविट में बोली थी। क्योंकि उस समय उनको भी लगा होगा कि कहीं बहुत कुछ गड़बड़ है। वो प्रक्रिया का हिस्सा होता है। और आज हम अकेले ऑर्गनाइजेशन हैं जिसके ऊपर कैग का एक भी ऑब्जेक्शन नही रहा।

देखिए राज्यसभा टीवी एक एक्सपेरीमेंट है। जिसमें बहुत इनोवेशन हुए। और इनोवेशन न सिर्फ प्रोग्राम के लेवल पर बल्कि सरकारी नियम कानून के लेवल पर भी हुए। इसलिए जो लोग समझ नहीं पाए, उन्होंने सवाल किए और जब हमने जवाब दिए तो वो कन्विंस हो गए। किसी भी नए या इनोवेटिव प्रोसेस को इस प्रक्रिया से गुजरना होता है। इससे परेशान नहीं होना चाहिए। ये जवाबदेही तय करने की ही प्रक्रिया है।

सवालः आपने जितनी सहजता से पीआईएल मामले पर बात रखी वो ठीक है पर लोग तो इसको कंट्रोवर्सी के रूप में देखते हैं। जवाबः हां लोगों ने कंट्रोवर्सी की बात की तो उसका हमने जवाब नहीं दिया। क्योंकि हमे पता था कि लोग जिस बेस पर कंट्रोवर्सी कर रहे हैं वो बेस ही खत्म हो जाना है।

पत्रकार हो या सिविल सोसायटी, उनको क्रिटिकल होना ही चाहिए। ठीक है हमारे खिलाफ कोई आरोप साबित नहीं हुआ, पर सभी संगठन तो ऐसे नहीं हैं न। इसलिए ये प्रक्रिया है बस। अगर किसी भी संस्था पर सवाल उठाए जाते हैं, तो उठाए जाने चाहिए, उससे संस्थाएं मजबूत होती है।

सवालः बहुत सारे लोग ये मानते हैं कि गुरदीप सिंह सप्पल कांग्रेसी हैं। कांग्रेस पृष्ठभूमि के हैं।

जवाबः (थोड़ा गंभीर) इसमें तो मैंने कभी कुछ छिपाया ही नहीं | मैं कभी कांग्रेस पार्टी का मेम्बर नहीं रहा। हां मैं नेहरूवादी विचारधारा को ज़रूर मानता रहा हूँ ।मैंने कांग्रेस के लिए इलेक्शन हैंडल किए हैं। (हंसते हुए जवाब) मैं उप राष्ट्रपति जी का चुनाव प्रबंधक था, वो भी कांग्रेस पार्टी ने ही बनाया था।

तो इसमे कोई छिपाने वाली बात ही नहीं। लेकिन कोई ये नहीं कह सकता, खासतौर पर आप संसद भी जाएं,जहाँ मैं राज्यसभा का काम देखता हूं, आज की सरकार वाले लोग भी ये नहीं कहते कि मैं बायस्ड हूं।

दरअसल संविधान हमको ये अधिकार देता है कि हम अपनी विचारधारा को माने । विचारधारा अलग चीज है और आपका काम अलग चीज। काम आपकी ड्यूटी है,फ़र्ज़ है देश के प्रति, विचारधारा आपका विश्वास है ।दोनों साथ साथ चल सकते हैं, चलने चाहिए।

लोगों ने ये जरूर कहा होगा कि मैं कांग्रेसी हूं पर लोगों ने ये नहीं कहा होगा कि मैं पक्षपात करता आया। ये आरोप मुझपर नहीं लगा। सच तो ये है कांग्रेस लीडरशिप के पास भी कई कई सांसद गए हैं मेरी शिकायत करने कि राज्यसभा टीवी उनके खिलाफ काम करता है। पर कर्तव्य में विचारधारा आडे नहीं आती मेरे और न आनी चाहिए। हाँ, अगर आप निष्पक्ष काम करोगे तो आपकी शिकायतें होती रहेंगी। इससे विचलित होने जैसी कोई बात नहीं है।

फ़िल्म रागदेश का पोस्टर, फ़िल्म के निर्माता गुरदीप सिंह सप्पल हैं।
फ़िल्म रागदेश का पोस्टर, फ़िल्म के निर्माता गुरदीप सिंह सप्पल हैं।

सवालः फिल्मों की तरफ चलते हैं आपने संविधान सीरियल बनाया था 10 एपीसोड अब रागदेश फिल्म। जो 28 जुलाई को आने वाली है। आपने इस फिल्म में कोई बड़ा स्टार क्यों नहीं लिया जिसके बलबूते फिल्म चले। 

जवाबः (थोड़ा सोचते हुए) मैं आपको पहले पुराने वाले सवाल (कि गुरदीप सिंह सप्पल कांग्रेसी हैं) का एक और जवाब देना चाहता हूं। फिर फिल्मों पर जवाब दूंगा। जो सवाल आपने किया कि लोग कहते हैं कि मैं कांग्रेसी हूं। वो सवाल अब की सरकार के कई लीडर मुझसे पूछते हैं। तो मैं उनको एक कथा सुनाता हूं विक्रमादित्य का सिंहासन वाली। जिसमें कुछ बच्चे खेलते हैं आपस में और जब कुछ निर्णय करना हो तो एक बच्चा पास में एक टीले पर चढ़ जाता है और वो सच में सही निर्णय लेता है। तो एकदिन गांव वालों ने सोचा कि इस टीले में ऐसा क्या है तो उस टीले की खुदाई की तो वहीं राजा विक्रमादित्य का सिंहासन निकला। मेरा मतलब इस कथा से इतना है जब आप सिंहासन यानि कुर्सी पर होते हैं तो पक्ष कोई भी हो आपको निष्पक्ष रहना होता है। यही मैं लीडर्स को जवाब देता हूं और आपको दे रहा हूं।

हमारे देश में प्रेमचंद की ‘पंच परमेश्वर’ वाली परम्परा रही है। मैं उसी को मानता हूँ, उसी पर चलने की कोशिश करता हूँ।

(अब फिल्मों पर……

बड़े स्टार फिल्म रागदेश से नहीं जोड़े इसके 2 रीजन रहे।

पहला आज का जो युवा है वो कुनाल कपूर औऱ अमित साध को ज्यादा पहचानता है। इन एक्टर्स की वैल्यू मेरे उम्र के लोगों में हो न हो, यंगस्टर में है।दूसरी प्रमुख बात कि हमारे पास इतना बजट नहीं था कि हम बड़े स्टार को ले सकें।

सवालः आपकी फिल्म रागदेश में कुछ एपीसोड भी हैं फिल्म के अलावा। क्या पैकेज में कोई कमी रह गई कि फिल्म को पूरा करने के लिए एपीसोड बनाने पड़े।

जवाबः ऐसा नहीं है। ये पहले से ही तय था कि 2 घंटे की फिल्म औऱ 6 घंटे का एपीसोड। हम नया प्रयोग कर रहे हैं कि फिल्म के माध्यम से पापुलर मॉसेस को जोड़ें और सीरियल के माध्यस से सब्जेक्ट की गहराई में जाएं।

सवालः क्या आपकी फिल्म चलेगी। 

जवाबः हमारी होड़ सलमान या शाहरुख की फिल्मों से नहीं है। हम इतिहास बता रहे हैं। हमारा पैरलल है म्यूजियम। ये फिल्म कोर्स मटेरियल हो जाएगी। हम म्यूजियम का काम फिल्म के माध्यम से कर रहे हैं। ये फिल्म इतिहास को जिंदा रखेगी। हमारा पैरामीटर फिल्म की सफलता या असफलता नहीं, हिस्ट्री को पब्लिक तक पहुंचाने का पापुलर माध्यम गढ़ने का है। ये बतौर पब्लिक ब्रॉडकास्टर हमारा पॉयलट प्रोजेक्ट है।

सवालः फिल्म रागदेश जिसके आप निर्माता हैं उसका ट्रेलर संसद में रिलीज हुआ, अब सुना है कि प्रीमियर भी भव्य तरीके से आयोजित होगा।

जवाबः (मुस्कुराते हुए) हां राष्ट्रपति महोदय सबसे पहले ये फिल्म देखें ये तमन्ना है।

सवालः रागदेश के साथ मधुर भंडारकर की फिल्म इंदू सरकार भी आ रही है। कोई खतरा आपकी फिल्म को।

जवाबः हिस्टोरिकल फिल्में कभी मेनस्ट्रीम सिनेमा का हिस्सा नहीं रहीं तो हमने सोचा पब्लिसिटी की लड़ाई हम अकेले क्यों लड़ें। इससे बेहतर 2 फिल्में एक साथ लड़ें। और दोनों को फायदा होगा इससे। हम मधुर की फिल्म को कंपटीटर के तौर पर नहीं सहयोगी के रूप में देख रहे हैं।

सवालों के अंतिम दौर में….

सवालः राज्यसभा टीवी में अपने कार्य़काल के दौरान अपनी उपलब्धि के रूप में किन चीजों को देखते हैं।

जवाबः ( थोड़ा देर तक सोचते हैं, फिर बोले) हमारे 3 अचीवमेंट्स रहे।

1- हमने यह साबित किया कि डी ग्लैमराइज्ड टीवी भी संभव है। हमने सोच समझकर डी ग्लैमराइज्ड किया और वो चल गया। इससे एक रास्ता खुलता है कि अब बांकी चैनल भी ये प्रयोग कर सकते हैं कि कंटेंट पर जाएं।

2- दूसरी उपलब्धि जो हमने प्रयोग किया था सोशल मीडिया का। हमारा हर प्रोग्राम यू ट्यूब पर है। दुनिया की किसी भी संसद में वो नहीं हुआ जो हम कर रहे हैं। हर एमपी की स्पीच 10 मिनट के अंदर यू ट्यूब पर होती है। ट्वीट पर होती है।

3- तीसरी उपलब्धि निश्चित ही संविधान सीरियल और रागदेश फिल्म।

सवालः अब सवालों का टेस्ट थोड़ा बदलते हैं। अच्छा ये बताइए आप उपराष्ट्रपति के साथ विदेश दौरों में पत्रकारों के प्रतिनिधि मंडल को ले जाते रहे हैं। क्या नियम कायदे होते हैं पत्रकारों के चयन के जिनको ले जाते हैं आप। कहते हैं अच्छे पत्रकार पीछे छूट जाते हैं, कभी मीडिया संस्थानों के मालिक विदेशी यात्राओं में आगे रहते हैं तो कभी जुगाड़बाजी।

जवाबः  इस मामले में हमारे नियम कायदे एकदम तय हैं। एक तो इतने सालों में हमे पता है कि विदेश मामले कौन कवर करता है। तो उन मीडिया संस्थाओं को वरीयता दी जाए जो विदेश मामलों को कवर करती हैं। क्योंकि हर अखबार और चैनल इस मामले में रुचि नहीं लेते। दूसरा हम कभी पत्रकार नॉमिनेट नहीं करते। उपराष्ट्रपति के यहां ये सिस्टम रहा, हमें औरों का नहीं मालूम।

मेरा मानना है कि एडीटर की संस्था को वीक नहीं करना चाहिए। तो हम चिट्ठी एडीटर को लिखते हैं मालिक को नहीं। और एडीटर जिसको भेजना चाहें उसको भेजें। हम कभी आपत्ति नहीं करते कि आपने फलां पत्रकार को क्यों भेजा। हां कई बार ऐसे पत्रकार को भी संपादक भेजते हैं जिसको विदेश मामले का ज्ञान नहीं रहता। पर कभी उसने कुछ सम्पादक की नजर में अच्छा काम किया होता है उसका ईनाम सम्पादक उसे इस रूप में दे देता है।

सवालः हिंदी किताबें पढ़ते हैं आप, अपनी पसंदीदा कोई एक हिंदी की किताब

जवाबः जहां तक पढ़ने की बात है मैने मुंशी प्रेमचंद का पूरा साहित्य 8वीं क्लास तक पढ़ लिया था। मैं हिंदी का स्टूडेंट रहा हूं। मेरे बच्चे भी 9-11 साल के हैं और उन्हें भी प्रेमचंद, फणीश्वरनाथ रेणु, देवकीनंदनखत्री के बारे में काफ़ी कुछ पता है। मैं बताता हूं। क्योंकि ये ऐसा दुर्भाग्यशाली समय है जब बच्चे हिंदी की बजाय अंग्रेजी पढ़ने में ज्यादा सहूलियत महसूस करते हैं। बच्चों को हिंदी पढ़ने में दिक्कत आ रही है और इस पर माँ-बाप भी ध्यान नहीं दे रहे। ये तो कहना मुश्किल होगा कि कौन सी एक किताब चुनी जाए, हां लेखक की बात करें तो फणीश्वरनाथ रेणु,सोबती, यशपाल, प्रेमचंद मेरे पसंदीदा हैं।

सवालः नए हिंदी लेखकों में किसी को पढ़ते हैं।

जवाबः ओमप्रकाश वाल्मीकि, पुष्पा मैत्रयी थोड़ा हटकर लगते हैं। हां अभी आज ही एक किताब पढ़कर पूरी की है मुर्दहियाः लेखक डॉ तुलसीराम। गजब का संस्मरण है, दलित समाज की झाँकी है, एक दृष्टि देती है दलित विषयों को देखने की।

सवालः कोई एक पसंदीदा टीवी पत्रकार।

जवाबः (थोड़ा रुके फिर बोले) कोई जवाब नहीं दूंगा

सवालः वर्तमान में मीडिया का सबसे सशक्त माध्यम किसे मानते हैं। 

जवाबः टीवी मीडिया

सवालः राज्यसभा टीवी को छोड़कर कोई एक पसंदीदा टीवी न्यूज चैनल।

जवाबः मैं आजकल टीवी न्यूज चैनल नहीं देख रहा हूं। उसका कारण है कि सबमें लगभग एक ही बात आ रही है। इसके बजाय मैं वेबसाइट में जाकर खबरें पढ़ लेता हूं क्योंकि मैं इटरनेट फ्रेंडली हूं।

राष्ट्रपति प्रणव मुखर्जी के साथ गुरदीप सिंह सप्पल
राष्ट्रपति प्रणव मुखर्जी के साथ गुरदीप सिंह सप्पल

सवालः राज्यसभा टीवी से विदाई के बाद अगला पड़ाव

जवाबः मेरी पर्सनल फिलॉसपी है, जिस दिन तक मैं यहां हूं उसदिन तक यहां की बात। जिस दिन छोड़ूंगा उस दिन यहां की बात नहीं करेंगे। ( हाहाहा…।)

अंतिम सवालः आप उत्तराखंड (देहरादून) से हैं।उत्तराखंड के विकास को किस तरह देखते हैं।

जवाबः उत्तराखंड के विकास को लेकर मेरी स्पष्ट राय है। वहां विकास नहीं हो रहा है और उसकी जिम्मेदारी वहां की सरकार की भी है और लोगों की भी। उत्तराखंड के लोग अपने प्रदेश से बाहर आकर सफल बहुत हुए लेकिन उन सफल लोगों ने अपने राज्य में आर्थिक, मानसिक या सामाजिक तौर पर कोई मदद या योगदान नहीं दिया। उत्तराखंड को economic, moral और social investment की ज़रूरत है ।

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