Home > यादें > धरम जी को छूने की जिद में कहीं मैं अपनी आत्मा जख़्मी न कर लूँ

धरम जी को छूने की जिद में कहीं मैं अपनी आत्मा जख़्मी न कर लूँ

हालिया मुलाकात के दौरान धर्मेन्द्र के साथ उनके घर में रामकुमार सिंह
हालिया मुलाकात के दौरान धर्मेन्द्र के साथ उनके घर में रामकुमार सिंह

पूर्व पत्रकार और अब फ़िल्म संवाद लेखक रामकुमार सिंह का संस्मरण। जब वो अपने पत्रकारिता जीवन में अभिनेता धर्मेन्द्र का साक्षात्कार करने एक आत्मिक भय के चलते नहीं गए। पढ़िए संस्मरण। रामकुमार मुम्बई रहते हैं, राजस्थान से हैं। सरकार-2 फ़िल्म के संवाद इन्ही ने लिखे हैं।

 

कल मैं पहली बार धरम जी से उनके घर पर मिला। मेरी उम्मीद से कहीं ज़्यादा उन्होंने स्नेह दिया, कुछ सलाह दी, कुछ शायरी सुनाई। वे स्वस्थ प्रसन्न ज़िंदादिल दिखे। उनके पहली कार ख़रीदने से लेकर दिलीप साब की आत्मीयता के क़िस्से हमने सुने। मन मेरा भरा नहीं, मैं फिर उनसे मिलने जाना चाहता हूँ, और ऐसे जाना चाहता हूँ कि अगली बार मेरे हाथ में उनके लिए कोई स्क्रिप्ट हो।

धरम जी ही बॉलीवुड में वो हैं, जिनका मैं फ़ैन रहा हूँ। मैंने होश सम्भालने के बाद पहली फ़िल्म ‘शोले’ देखी थी वीसीआर प्लेअर पर। गाँव में दुर्गा माता मंदिर (जो आजकल बहुत बड़ा हो गया है) के सामने। हम बच्चे सबसे आगे बैठे थे, और अगला दृश्य आने से पहले ही पीछे से कोई ना कोई फ़िल्म का संवाद बोल देता था। हमारे गाँव के भाइयों ने फ़िल्म के संवाद रट लिए थे। वीरू हम बच्चों के दिलोदिमाग़ पर छा गया था। मैं इस पहली फ़िल्म से ही धरम जी का फ़ैन हो गया था। बाद में उनकी फ़िल्में ढूँढ कर देखीं। पत्रकारिता के दिनों में बहुत सोचा कि मुझे धरम जी पर किताब लिखनी है, लेकिन आलस्य के चलते वो भी नहीं हो पाया। पत्रकारिता में (और अब सिनेमा में) होने की वजह से ज़्यादातर सितारों को रूबरू देखने का मौक़ा मिला, बहुतों से बातचीत करने का भी, लेकिन धरम जी को परदे से बाहर मैंने ना ही देखा था, और ना ही मिला था। जब वो बीकानेर से चुनाव लड़ रहे थे, तब एक दिन ऐसा संयोग था कि वे जयपुर के पार्क प्राइम होटल में रुके थे। मेरे मित्र सुरेन्द्र डांगी और ताराचंद जी ने उनसे बात कर मेरे अकेले मिलने का समय तय कर दिया था लेकिन बाद में घबरा कर मैंने मना कर दिया। मुझे लगा यदि धरम जी मेरे साथ ठीक से बात नहीं करेंगे तो मैं हमेशा के लिए दुखी हो जाऊँगा। वे सितारे हैं, उन्हें दूर से देखकर ख़ुश हो लेना ठीक है। उन्हें छूने की ज़िद में कहीं अपनी आत्मा को ज़ख़्मी ना कर लूँ। लेकिन पिछले दिनों रिक्कू जी (राकेश नाथ, जो माधुरी दीक्षित का काम देखा करते थे) ने धरम जी की ख़ूबियों के इतने किस्से सुनाए कि मैंने कहा, सर, अब मिलवा दीजिए। कल मैं पहली बार धरम जी से उनके घर पर मिला। मेरी उम्मीद से कहीं ज़्यादा उन्होंने स्नेह दिया, कुछ सलाह दी, कुछ शायरी सुनाई। वे स्वस्थ प्रसन्न ज़िंदादिल दिखे। उनके पहली कार ख़रीदने से लेकर दिलीप साब की आत्मीयता के क़िस्से हमने सुने। मन मेरा भरा नहीं, मैं फिर उनसे मिलने जाना चाहता हूँ, और ऐसे जाना चाहता हूँ कि अगली बार मेरे हाथ में उनके लिए कोई स्क्रिप्ट हो।

Share this: