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राष्ट्रपति के विशेष विमान में 25 से ज्यादा पत्रकारों की एंट्री नहीः अर्चना दत्ता

तत्कालीन राष्ट्रपति प्रतिभा देवी सिंह पाटिल के साथ अर्चना दत्ता
तत्कालीन राष्ट्रपति प्रतिभा देवी सिंह पाटिल के साथ अर्चना दत्ता
अर्चना
विदेश यात्रा के दौरान तत्कालीन राष्ट्रपति प्रतिभा पाटिल के विशेष विमान में आयोजित प्रेस कांफ्रेंस की तस्वीर। जिसमें अर्चना दत्ता और पत्रकार साथी दिख रहे हैं।

मीडिया मिरर की साक्षात्कार श्रृंखला बात-मुलाकात में अतिथि हैं अर्चना दत्ता। श्रीमती दत्ता तत्कालीन राष्ट्रपति प्रतिभा पाटिल की प्रेस सचिव व दूरदर्शन व आल इंडिया रेडियो की महानिदेशक रही हैं। फिलहाल खाली समय में कविताएं लिखती हैं, फोटोग्राफी करती हैं। हाल ही में उनका एक कविता संग्रह भी प्रकाशित हुआ है। मीडिया कॉलेजों में अतिथि शिक्षक के तौर पर जाती रहती हैं। मीडिया मिरर के सम्पादक प्रशांत राजावत से उन्होंने दिल्ली स्थित अपने निवास पर लम्बी बातचीत की। बातचीत के दौरान खासतौर पर राष्ट्रपति और प्रेस के बीच परस्पर संबंधों की पड़ताल इस साक्षात्कार में की गई। आमतौर पर पत्रकारों की जिज्ञासा होती है कि राष्ट्रपति की प्रेस कांफ्रेंस कैसी होती होगी, उनके साथ विदेश यात्रा में जाने का क्या प्रोसीजर है। ऐसे तमाम सवालों के जवाब बड़ी सहजता से अर्चना जी ने दिए।

पढ़िए पूरी बातचीतः-

 

वर्तमान मीडिया स्थिति के बारे में क्या राय है। खासकर इलेक्ट्रॉनिक मीडिया के कामकाज पर क्या कहेंगी।

इलेक्ट्रॉनिक मीडिया सबसे पावरफुल मीडिया है। जो लोग देखते हैं उसपर सबसे ज्यादा भरोसा करते हैं। इलेक्ट्रॉनिक मीडिया पब्लिक ओपिनियन बनाने में भी बड़ा रोल निभाता है। हां मीडिया में आजकल न्यूज के साथ जो व्यूज का चलन है वो गलत है। हां डिस्कशन प्रोग्राम पर चर्चा हो पर एंकर खुद ही एजेंडा तय ना करें।

 

आप कौन सा न्यूज चैनल पसंद करती हैं।

बहुत ईमानदारी से कहूं कि तो मैं बहुत ज्यादा न्यूज चैनल नहीं देखती। मैं टीवी ही ज्यादा नहीं देखती। मैं रेडियो सुनना पसंद करती हूं।

 

पसंदीदा टीवी पत्रकार कौन है आपका

किसी एक का नाम नहीं लेना चाहती मैं

 

अखबार कौन सा पढ़ती हैं

टॉइम्स ऑफ इंडिया, हिंदू और इंडियन एक्सप्रेस। मैं खबर के लिए सबसे पहले रेडियो, फिर अखबार और फिर वेबसाइट देखती हूं। टीवी न्यूज से अब ज्यादा जुड़ाव नहीं है। जबकि एक दौर था कि कमरे में तीन चार चैनल लगातार चलते थे। औऱ मैं लगातार देखती भी थी। पर आजकल उसकी जरूरत नहीं पड़ती।

 

पहले आप राष्ट्रपति की प्रेस सचिव थीं। फिर दूरदर्शन और ऑल इंडिया रेडियो की महानिदेशक रहीं। पत्रकारों से घिरी रहती थीं। अब कितने पत्रकार संपर्क में हैं।

देखिए पत्रकार वहां जाता है जहां खबर मिलती है। अब मैं खबर नहीं दे सकती तो मेरे पास पत्रकार भी नहीं आते। हां कुछ लोग हैं पुराने उनसे बात होती रहती है।

अर्चना दत्ता।
अमेरिकी राष्ट्रपति बराक ओबामा और उनकी पत्नी मिशेल से मुलाकात करतीं अर्चना दत्ता।

 

आप कविताएं भी लिखती हैं

हां कविताएं लिखती हूं। इसी वर्ष मेरा कविता संग्रह अंग्रेजी में प्रकाशित हुआ है। अंग्रेजी में लिखती हूं।

 

कविताओं की शुरूआत कैसे की

दरअसल मैं नेचर लवर हूं। मैं अपनी रोजमर्रा की जिंदगी में कुछ देखती हूं वहीं से कविताएं जन्म ले लेती हैं। सर्विस के दौरान तो नहीं लिख पाती थी, जब रेडियो में डीजी थी तब से कविताओं की थोड़ी थोड़ी शुरूआत हुई।

 

आप तत्कालीन राष्ट्रपति प्रतिभा पाटिल की प्रेस सचिव रही हैं। कभी वो कहती थीं कि फला पत्रकार को बुलाइए उससे मिलना है

देखिए कोई एक नाम नहीं, कई नाम हैं। लेकिन सजेस्ट मैं ही करती थी कि किससे मिलना है। मराठी अखबार से भी प्रतिनिधियों को मिलने बुलाती थीं। पर्सनली बात करें तो कल्याणी शंकर बहुत आती थीं। एक हिंदू की कोई जर्नलिस्ट आती थीं। ये वो जर्नलिस्ट थीं जिनसे प्रेसीडेंट कम्फर्टबल थीं। आलोक मेहता जी बहुत आते थे। देखिए आलोक मेहता, कल्याणी शंकर, सुभाष चंद्रा इनको पहले से जानती थीं तो इनको ज्यादा बुलाती थीं।

 

अच्छा प्रेसीडेंट पाटिल कभी ये कहती थीं की फला अखबार या चैनल अच्छा है या अच्छा कर रहा है। किस भाषा के अखबार पढ़ती थीं।

देखिए न्यूज चैनल देखने का तो समय उन्हें कम ही मिलता था। हां अखबार हिंदी, अंग्रेजी औऱ मराठी भाषा के पढ़ती थीं। लोकमत, साकाल पढ़ती थीं। दरअसल न्यूज का काम मेरा था मैं उन्हें सभी अखबार दिखाती थी।

राष्ट्रपति
राष्ट्रपति प्रणव मुखर्जी को अपनी किताब भेंट करतीं अर्चना दत्ता।
अर्चना दत्ता।
उप राष्ट्रपति हामिद अंसारी को अपना कविता संग्रह भेंट करतीं अर्चना दत्ता।

प्रेसीडेंट पाटिल के साथ जो समय आपने बिताया उसको कभी किताब की शक्ल में पेश करेंगी

हां सोच तो रही हूं। बहुत लोगों ने कहा भी है। कुछ करूंगी।

 

 

 

राष्ट्रपति के साथ पत्रकार विदेश यात्रा पर जाते हैं। आपके समय में भी जाते होंगे। ये जिम्मा प्रेस सचिव का ही होता है। क्या प्रोसीजर होता है।

बहुत ही इंपोर्टेंट सवाल पूछा है। बहुत ही पारदर्शिता रहती है इस मामले को लेकर। सबसे पहले तो हम देखते हैं कौन सी कंट्री जा रहे हैं। उसमे किसका स्पेशलाइजेशन है। अखबार से फॉरेन करसपोन्डेंट को ज्यादा तवज्जे देते थे। जैसे मुझे याद आ रहा है कि हम गल्फ गए थे तो मलयाली ग्रुप को ज्यादा ले गए थे। हमारी उस दौर में एक प्राथमिकता ये भी थी कि रीजनल अखबार से जरूर पत्रकारों को ले जाना है। सो हम रीजनल पेपर से काफी पत्रकारों को ले जाते थे।

 

अच्छा आप सीधे पत्रकारों को कॉल करती थीं विदेश ले जाने के लिए

सीधे पत्रकारों को नहीं करना होता है। हम सम्पादक को अप्रोच करते थे। और उन्हें जिसे भी भेजना है उसे भेंजे ये उनके ऊपर होता है।

जैसे एजेंसी, दूरदर्शन, एआईआर को ले ही जाना होता है। हम टॉप न्यूजपेपर को बारी बारी से अवसर देते थे। हिंदू को बहुत रिफरेंस दिया। टॉइम्स ऑफ इंडिया तो कभी एग्री ही नहीं किया जाने के लिए। और कभी कभी ये भी होता है कि जब आप किसी मीडिया संस्थान को अप्रोच करते हैं तो उसका प्रतिनिधि संबंधित देश में पहले से ही नियुक्त होता है। ऐसी स्थिति में कोई क्यों अपना एक्स्ट्रा रिपोर्टर भेजेगा। हां ऐसा जरूर होता था जैसे जब हम चाइना जा रहे थे तो टीओआई के चाइना रिपोर्टर सैबाल दास ने कहा था कि हमें प्रेसीडेंट के कार्यक्रम की एंट्री फेसिलिटी दे देना। ऐसे ही फेसिलिटी कई मीडिया संस्थान विदेश में मांगते थे अपने विदेशी प्रतिनिधियों के लिए।  कुछ लोग जाना भी नहीं चाहते। दरअसल होता ये है कि किसी भी विदेश यात्रा में प्रेसीडेंट के साथ जाने वाले पत्रकारों को होटल का खर्चा खुद देना होता है, औऱ जब कोई प्रतिनिधि पहले ही उस देश में है किसी अखबार का तो वो अपना प्रतिनिधि क्यों भेजेगा। हिंदू ने हमें बढ़िया कवरेज दी थी। हमने भी हिंदू के हर सेंटर से पत्रकार को विदेश यात्रा का मौका दिया था।

 

मतलब आप टॉप मीडिया ब्रांड से पत्रकार ले जाती थीं प्रेसीडेंट के साथ विदेश यात्रा में

हां ये भी है। लेकिन हम चैनल, प्रिंट, रीजनल पेपर से भी रिपोर्टर ले गए। हिंदी और अंग्रेजी व अन्य भाषाओं के अखबारों से भी लोगों को ले गए। इसलिए सिर्फ टॉप ब्रांड ही ले गए ऐसा नहीं है। सबको मौका दिया।

 

अच्छा विदेश यात्रा के दौरान कुछ बाउंडेशन भी होती होंगी पत्रकारों की संख्या को लेकर

हां बिल्कुल होती है। हम 30 से ज्यादा लोगों को नहीं ले जा सकते। देखिए 5 तो हमारा सरकारी स्टॉफ होता है जिसे ले ही जाना है। उसके अलावा 25 सीट प्रेसीडेंट के स्पेशल प्लेन में प्रेस के लिए और होती हैं। सीटों का भी एक दायरा है।

 

ऐसा भी कभी होता था कि मीडिया संस्थानों की ओर से ऐसे निवेदन आते हों कि प्रेसीडेंट के साथ हमारे प्रतिनिधि को ले जाइए विदेश दौरे में

हां हां। कई बार। और हम ले भी गए हैं। जैसे नार्थ ईस्ट से बहुत आवेदन आते थे। हम ऐसा भी करते थे कई बार कि जब आवेदन मिला इस तरह का और सीट फुल हो गई तो हम उन्हें अगली बार ले जाने का आश्वासन देते थे। नार्थ ईस्ट को बहुत मौका दिया।

 

राष्ट्रपति के प्रेस कांफ्रेस की क्या व्यवस्था होती है

आमतौर पर राष्ट्रपति पीसी नहीं करते। सिर्फ विशेष विमान में करते हैं। और वहां आप विजिट को लेकर ही बात कर सकते हैं। पर है क्या कि पत्रकार मुद्दे से हटकर ही सवाल पूछते हैं। तब मुझे रोकना पड़ता था कि आप केवल विजिट के बारे में पूछिए।

 

अच्छा किसी पत्रकार से कभी कोई नोक-झोक, क्योंकि आप प्रेस सचिव थीं और मीडिया को मैनेज करना आपका काम था

नहीं मेरे सभी से अच्छे संबंध थे। देखिए फिर प्रेसीडेंट के साथ अगर आप यात्रा पर हैं तो सभी पत्रकार बहुत विनम्रता से ही पेश आते हैं और आना भी चाहिए।

 

आपके कार्यकाल में तत्कालीन राष्ट्रपति प्रतिभा पाटिल किसी पत्रकार या मीडिया संस्थान से परेशान हुई हों।

ऐसा कभी नहीं हुआ। हां एक बार जरूर कोई उनके बेटे से जुड़ा मामला था तो उसमें प्रेसीडेंट का नाम कोई चैनल ले रहा था। तब प्रेसीडेंट ने मुझसे कहा देखो उससे बात करो कौन पत्रकार है, मेरा नाम क्यों ले रहा है। तब मैंने संबंधित पत्रकार से बात की थी। और ऐसे ही एक और केस था जब किसी चैनल की पत्रकार ने प्रेसीडेंट के बयान को तोड़ मरोड़ के पेश किया था। तब वो थोड़ा नाराज हुई थी।

 

आप मूलरूप से कलकत्ता की हैं। कभी जाना होता है।

हां हम जाते रहते हैं। हमारी बहुत बड़ी हवेली है वहां, हम जागीरदार परिवार से हैं। पर बच्चों की पढ़ाई के लिए दिल्ली में हूं।

 

दिल्ली रहती हैं आप, दिल्ली में महिला अपराध बहुत बढ़ गया है। आपके साथ भी एक वारदात हो गई थी एक बार कोई आपकी चेन झपटकर चला गया था। कितना सेफ महसूस करती हैं खुद को यहां।

हां वो हादसा हो गया था। मैं बाजार गई थी और मुझे पता भी नहीं चला और किसी ने मेरी चेन छीन ली। रही बात महिला अपराध की तो उस पर पुलिस को और सख्त होना होगा।

 

आगे की क्या योजना है

पढ़ाना पसंद है। चाहती हूं किसी विश्वविद्यालय या कालेज में पढ़ाऊं। अभी हाल ही में माखनलाल चतुर्वेदी विश्वविद्यालय में लेक्चर देने गई थी।

 

साहित्यिक आयोजनों में भी आप कभी कभार दिख जाती हैं

हां जाती हूं पर कम ही। दरअसल मैं अंग्रेजी की लेखिका हूं तो दिल्ली में अंग्रेजी के साहित्यिक प्रोग्राम कम ही होते हैं। हिंदी के ज्यादा। इसलिए कम ही जाना होता है।

 

आप फोटोग्राफी भी करती हैं

हां कर लेती हूं मोबाइल से ही। आते जाते-उठते बैठते। कोई सुंदर दृश्य दिखा उसको कैद कर लेती हूं। कुछ तस्वीर आपको भी भेजी थीं। देखिएगा।

 

बहुत बहुत धन्यवाद मीडिया मिरर से बात करने के लिए

धन्यवाद

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

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