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मीडिया नेशनल कॉन्क्लेव 2017 ओरछा

ओरछा के अमर महल होटल में तीन दिनी मीडिया नेशनल कॉन्क्लेव 2017 में शामिल सभी प्रतिभागियों की समूह फोटो
ओरछा के अमर महल होटल में तीन दिनी मीडिया नेशनल कॉन्क्लेव 2017 में शामिल सभी प्रतिभागियों की समूह फोटो

ओरछा के अमर महल होटल में तीन दिनी मीडिया नेशनल कॉन्क्लेव 2017 में शामिल होकर मीडिया में जमीनी मुद्दों की समझ को विस्तारित फलक पर देखना बहुत सुखद और उपलब्धिपूर्ण रहा। यहाँ मीडिया में बच्चे और असहिष्णुता विषय पर मीडिया जगत के जाने-माने कलमवीरों के विचारों से रूबरू हुए तो ओरछा की संपन्न ऐतिहासिक विरासत को नए अर्थों में देखा–समझा। इसमें देश के चुनिंदा पत्रकार शामिल हुए।

यूनिसेफ, क्राई तथा टीडीएच के सहयोग से हुए विकास संवाद के इस आयोजन में हिन्दुस्तान टाइम्स के राजनीतिक संपादक विनोद शर्मा, वरिष्ठ पत्रकार अरुण त्रिपाठी, द हिन्दू के पूर्व संपादक और द वायर के संस्थापक संपादक सिद्धार्थ वरदराजन, पत्रकार अरविन्द मोहन, आईआईएमसी दिल्ली के वरिष्ठ प्राध्यापक आनंद प्रधान, इलेक्ट्रानिक मीडिया से सुमित अवस्थी, गिरीश उपाध्याय, प्रकाश पुरोहित, प्रकाश हिन्दुस्तानी, सामाजिक कार्यकर्ता चिन्मय मिश्र, राकेश दीवान तथा सचिन कुमार जैन सहित बड़ी संख्या में वरिष्ठ पत्रकारों ने बच्चों के स्वास्थ्य, शिक्षा, पोषण, पुनर्वास सहित विभिन्न मुद्दों पर मीडिया की भूमिका को लेकर अपनी बात रखी।

सिद्धार्थ वरदराजन ने मीडिया में बच्चों के मुद्दों की पड़ताल, असहिष्णु होते जा रहे समाज में बच्चों के हालातों और उनकी कमतर मौजूदगी पर सवाल खड़े किए और कहा कि हमारा देश अपनी विविधताओं के लिए जाना जाता रहा है, इसकी विविधता को उसी तरह सहेजने की बड़ी ज़रूरत है। विनोद शर्मा ने कहा कि मीडिया मुनाफे की दौड़ में है तथा अपनी सामजिक जिम्मेदारी को भूलता जा रहा है। उन्होंने अपने लंबे पत्रकारिता जीवन के प्रसंगों के उदाहरण देते हुए मीडिया की चुनौतियों पर विस्तार से अपनी बात रखी। अरुण त्रिपाठी ने भी बच्चों के मुद्दों और असहिष्णुता पर अपने विचार रखे। उन्होंने कहा कि मीडिया की क्रूरता और बदहाल स्थितियों के कारण एथिक्स की पत्रकारिता प्रभावित हुई है। गांधी के देश में ऐसी स्थितियां और मीडिया का बर्ताव ठीक नहीं है।

राकेश दीवान ने कहा कि हमारे समाज और मीडिया से बच्चे गायब होते जा रहे हैं। इंडिया टुडे के पत्रकार पीयूष बवेले ने हालिया समाज में बच्चों की स्थिति तथा उनके मुद्दों से भटकाव को मार्मिक ढंग से सामने रखा। चिन्मय मिश्र ने कहा कि हम बच्चों के लिए अभिमन्यु की तरह उन्हें बेवजह तनाव और होड़ के युद्ध में भेज रहे हैं। शिक्षा उन्हें एक तरह के चक्रव्यूह में धकेल रही है। मीडिया की भूमिका बच्चों के हित में नहीं है। कबीर, तुलसी और मीरा ने अपने समय के सच को तमाम खतरे उठाते हुए भी लिखा लेकिन मीडिया अपने समय के ज़रूरी मुद्दों को भूल गया है।

अरविन्द मोहन ने कहा कि इन दिनों संचार की ताकत बढ़ी है। वह हवा बनाने और बिगाड़ने वाला बन गया है पर प्रामाणिकता खोता जा रहा है, जो कभी उसकी ताकत हुआ करती थी। सुमित अवस्थी ने कहा कि अब संपादक संस्था का ल्हास तेजी से हुआ है। यह समय मीडिया के मिशन से प्रोफेशन में बदल जाने का समय है। इन दिनों सरोकारों की पत्रकारिता को निभाना मुश्किल होता जा रहा है। सरकारें भी मीडिया पर दबाव बनाती हैं फिर उन्हें बिकाऊ होने का आरोप लगाती है।

आनंद प्रधान ने अकादमिक रूप से पत्रकारिता के बदलते स्वरूप पर विस्तार से अपनी बात रखी। उन्होंने कहा कि पोस्टट्रुथ जैसी बात महज एक भ्रामक प्रचार भर है। इसे संगठित रूप से अपना हित साधने के लिए फैलाया जा रहा है। प्रकाश पुरोहित ने पत्रकारिता पर बढ़ते दबावों की चर्चा करते हुए कहा कि तानाशाह खबरों पर जिंदा होते हैं और विचारों पर वे खत्म हो जाते हैं। सुबह सवेरे के सम्पादक गिरीश उपाध्याय ने कहा कि पोस्टट्रुथ से ज़्यादा युवा पोस्टपेड़ और प्रीपेड़ जानते हैं। हालातों से लड़ने का माद्दा हो तो अब भी कई दिशाओं में संभावनाएं और विकल्प मौजूद हैं।

प्रकाश हिन्दुस्तानी ने वाट्सएप तथा अन्य सोशल साइट्स पर फेक न्यूज़ के बढ़ते चलन और उसके झूठ को सच बनाकर परोसने की प्रवृत्ति पर शोधपरक जानकारी दी। शुभ्रांशु ने आदिवासी इलाकों में रेडियो को सशक्त बनाने पर बात की। सचिन कुमार जैन ने कहा कि हमें पक्षधरता करनी ही होगी, बिना इसके हम मीडिया तक दबे–कुचले, दलित और आदिवासियों तथा वंचित वर्ग की आवाज़ को हक से नहीं उठा सकेंगे।

पत्रकारिता में विकल्प की दिशा में चर्चा करते हुए कश्मीर उप्पल, संदीप नाईक, समर पांडे, मनीष वैद्य, आरती, संतोषकुमार द्विवेदी, शिवनारायण गौर, यशवंत सिंह, अखिलेश्वर पांडे, निवेदिता खांडेकर, अख़लाक़ भाई, अशोक गंगराडे आदि ने अपनी बात रखी।

  • मनीष वैद्य की रिपोर्ट
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