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भारत की दिक्कत यही है कि यहां गरीबों की आवाज गरीब ही उठाते हैः अरुंधति रॉय

अरुंधति रॉय के युवावस्था के दिन
अरुंधति रॉय के युवावस्था के दिन

 

अरुंधति रॉय के युवावस्था के दिन
अरुंधति रॉय

1961 में जन्मी सुजन्ना अरुंधति रॉय  में कुछ भी ऐसा नहीं जो आम लड़की से अलग हो। उन्हें अपने कॉलेज में दिनों में पहली नजर में ही एक लड़के से प्यार हो जाता है और फिर वो उसको अपना जीवनसाथी बना लेती हैं। हालांकि ये शादी 4 साल तक ही चल पाती है। अरुंधति 1997 यानी द गॉड ऑफ स्माल थिंग्स किताब आने के पहले तक बिल्कुल साधारण सी, पतली, सांवली सी खूबसूरत आम लड़की थीं। जिसे कोई नहीं जानता था।

 

जो कभी एरोबिक्स क्लास लेती है तो कभी रोजगार के लिए कई अलग अलग जगहों पर नौकरी करती है। बाद में फिर उनके जीवन में फिल्मकार प्रदीप कृष्णन आए और उनसे उन्होंने शादी कर ली। हालांकि फिलवक्त अरुंधति सिंगल हैं। प्रदीप कृष्णन ने अरुंधति का भरपूर लाभ लिया एक पत्नी के रूप में। अपने सीरियल और फिल्म की स्क्रिप्ट लिखवाई और फिल्म मैसी साहब में तो एक भूमिका भी करवाई। पर समय ने करवट बदली। काफी गुमनामियों में जीवन गुजार रहीं अरुंधति दरअसल एक किताब में व्यस्त थीं, जिसने न सिर्फ विश्व प्रसिद्ध बुकर पुरस्कार जीता बल्कि उनकी माली हालत को भी सुधार दिया। अरुंधति मानती हैं कि द गॉड ऑफ स्माल थिंग्स की रॉयल्टी की बदौलत आज भी उन्हें कुछ करने की जरूरत नहीं उनके पास भरपूर पैसा है।

अरुंधति मानव अधिकारों के लिए भी जानी जाती हैं सड़क पर आंदोलन की आदत उन्हें अपनी मां से मिली जो केरल की प्रसिद्ध महिला अधिकार कार्यकत्ता थीं।

अरुंधति कहती हैं कि वो किताब लिखने की तैयारी नहीं करतीं और न उन्हें पता होता कि वो कोई किताब लिखेंगी। वो कहती हैं हो सकता है मैं अगले 10 सालों में कोई किताब न लिखूं।

अरुंधति के बारे में कहा जाता है कि वो खुद को एकांतवास में रखती हैं सालो साल और फिर देश उनकी कोई बड़ी किताब से रूबरू होता है। मूलरूप से मेघालय की अरुंधति एनडीटीवी के मालिक प्रणय राय की चचेरी बहन हैं। दिल्ली में एक आलीशन घर है जहां वो रहती हैं। एक पत्रकार जब उन्हें कहता है कि मैडम आप दिल्ली के इतने महंगे इलाके में इतने आलीशान घर में रहती हैं और बात गरीबों की और उनके हक की करती हैं। ये कैसा तालमेल। आप तो रईसों वाला जीवन जीती हैं, तब अरुंधति मुस्कुराते हुए कहती हैं कि हमारे देश में समस्या तो यही है कि यहां गरीबों की आवाज गरीब ही उठाते हैं। अगर गरीबों की आवाज अमीर उठाने लगे तो सत्ता झुकेगी। गरीबों को तो सत्ता दबा देती है तो मेरे जैसे रईस उन्हें चुनौती देते हैं।

अरुंधति को अपने विलासतापूर्ण जीवन से कोई शिकायत नहीं, वो कहती हैं कि मैं मेहनत करती हूं लिखती हूं, मुझे अपनी किताबों से इतनी रॉयल्टी मिली कि मैं खूबसूरत घर ले पाई इसमें दिक्कत क्या है।

अरुंधति दिल्ली रहती हैं पर मीडिया या आमलोग उनसे सरलता से नहीं मिल सकते। वो कभी कभार जंतर मंतर में हो रहे आंदोलनों में दिखती हैं तो कभी ठेठ विलायती आयोजनो में। पर बहुत ज्यादा सुर्खियों में नहीं रहती। दिल्ली के साहित्यिक आयोजनों में आप उन्हें नहीं पाएंगे, इतना ही नहीं दिल्ली के हिंदी पट्टी के वरिष्ठ लेखक भी उनसे लगभग अपरिचित ही हैं। वो ज्यादातर विदेश में रहती हैं। अरुंधति को आप बहुत सरल महिला के रूप में जान सकते हैं। अजीब किस्म के बाल, कोई भी परिधान में वो दिखेंगी। अपने फिगर को लेकर अरुंधति बेहद सजग हैं। एकदम चुस्त दुरुस्त रहती हैं।

अरुंधति रॉय के युवावस्था के दिन
अब एैसी दिखती हैं अरुंधति रॉय

ऐसा नहीं है अरुंधति किसी से मिलती नहीं हैं पर बहुत कम संख्या है जो अरुंधति से सीधे सम्पर्क में है। अरुंधति के बारे में कहा जाता है बेहद खास दोस्तों के घर वो बिना बताए पहुंच जाती हैं और दरवाजे पर जाकर पता लगता है मेजबान को कि सामने अरुंधति खड़ी हैं। एकाकी जीवन जी रही अरुंधति के विदेशी मित्रों की कमी नहीं है। जिसमें बड़ी संख्या पुरुष मित्रों की है।

अपने लेखन से विश्वपटल पर प्रसिद्ध अरुंधति दरअसल दुर्घटनावश लेखक हैं, बहुत खूबसूरत नैन नक्श वाली अरुंधति अगर फिल्मों में रमतीं तो देश को एक मजी हुई अभनेत्री मिलती पर विश्व एक अलौकिक लेखक खो देता।

अरुंधति बेतरतीब रहती हैं, फक्कड़ों की तरह। वरना वो नंदिता दास के बाद शायद दूसरी सबसे खूबसूरत सांवली अभिनेत्री होतीं।

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