Home > जानिए अपने पत्रकार व लेखक को > दुनिया निश्चित तौर पर रहने लायक अच्छी जगह नहीं है: रस्किन बॉन्ड

दुनिया निश्चित तौर पर रहने लायक अच्छी जगह नहीं है: रस्किन बॉन्ड

रस्किन बांड अपने मसूरी स्थित घर में
रस्किन बांड अपने मसूरी स्थित घर में

रस्किन मोबाइल नहीं रखते, लैपटॉप नहीं चलाते। किसी साहित्यिक गोष्ठी पर नियमित नहीं जाते, अमूमन जाते ही नहीं। मीडिया से दूर, लेखकों से भी दूर ही रहते हैं अपने पहाड़ी मकान में। अविवाहित हैं। टीवी नहीं देखते कहते हैं सब हिंसा दिखाने में मशगूल हैं और रस्किन मनोरंजन ढूढ़ते हैं। 


रस्किन लोगों से मिलने में दिलचस्पी नहीं लेते। एक बार एक आदमी रस्किन के मसूरी स्थित घर पहुंचा मिलने, हालाँकि उसने रस्किन को कभी देखा नहीं था, वो घर पर पहुंचा, घण्टी बजाई, रस्किन बाहर आये मुंह से धूआँ निकालते, जाड़े के दिन थे और ऊपर से पहाड़ सर्दी ज्यादा होना लाज़िमी है न। रस्किन बोले बताइये क्या मदद कर सकता हूँ आदमी बोला रस्किन बॉन्ड से मिलना है। रस्किन ने इधर उधर देखा बोले रस्किन बांड अभी तो नहीं हैं, एकमहिने बाद आएंगे। आदमी बोला ठीक है, आदमी जब जाने लगा तो पलटते हुए बोला वैसे आप कौन हैं तो रस्किन दोनों हांथों को रगड़ते हुए बोले मैं रस्किन बांड का नौकर। आप चाहें तो मेरे हाथ की चाय पी सकते हैं। बग़ैर दूध की।
आदमी बोला, नहीं शुक्रिया।।

दरअसल रस्किन अपनी दुनिया में ही जीना चाहते हैं। वो भीड़, शोर, मीडिया से दूर हैं। किसी ने कहा है रस्किन के चेहरे पर स्थायी हंसी है पर आस्था चैनल के बाबाओं वाली नहीं 10-11 साल के बच्चों वाली।।

शब्द: प्रशांत राजावत
(मेरे प्रिय लेखक)


रस्किन अपने पहाड़ी घर नीचे उतरते, शायद अंडे लेने जा रहे हों
रस्किन अपने पहाड़ी घर नीचे उतरते, शायद अंडे लेने जा रहे हों

कोई क्यों न रस्किन (बॉन्ड) से प्यार कर ले!

मैं लेखकों को साहित्यिक हिंसा में व्यस्त पाता हूँ, संगोष्ठियों के नाम पर, तब रस्किन अपने पहाड़ी घर की दालान में बैठकर कोहरे भरी पहाड़ी में खुद को गुमा रहे होते हैं।

मैं लेखकों को मीडिया (छपास-दिखास) रोगी बनते वर्षों से देखता आ रहा हूँ तब रस्किन अपने घर पर आये पत्रकार को ये कहकर लौटा चुके होते हैं किताब पढ़िए वहीँ से मेरे बारे में लिखिए। और अपनी छत पर उन्मुक्त वातावरण को जी रहे होते हैं।

जब लेखक सोशल मीडिया में एक दूसरे के क़सीदे या कमतर दिखाने के प्रयास में डूबे होते हैं तब रस्किन अपना पुराना फटा छाता उठाते हैं और घनी बारिश के बीच आमलेट बनाने के लिए अण्डे लेने, पास वाली पहाड़ी के नीचे वाली दुकान पर, हौले हौले कदमों से निकल जाते हैं। अपने बूढ़े थुल थुल शरीर के साथ। जब लौटते हैं तो घर के पास सिर पर से छतरी हटा देते हैं और खुद को थोड़ा भीगने देते हैं।।
घर में घुसते हैं बाल से पानी झड़ाते हैं और अंडे फोड़ने लगते हैं, टक टक, टक टक….

(रस्किन किसी भी सोशल मीडिया मंच में नहीं हैं, मोबाइल नहीं रखते, टीवी नहीं देखते)

: दिल्ली के अभिजात्य लेखकों में एक आवरण चढ़ा होता है, उनकी प्रसिद्धि का, उनके अभिमान का, उनकी क़ाबिलियत का।। संगोष्ठी में जब ये बोलते हैं नाटकीय लगता है। दिल्ली की संगोष्ठियों के बदले मैं रस्किन के लाल पीले घर के पास बैठकर उनकी कोई किताब पढ़ना पसन्द करूँगा।।

ये नफ़रत रस्किन से प्यार का संकेत ही तो है

शब्द: प्रशांत राजावत
(प्रिय लेखक-2)


रस्किन पारदर्शी हैं, उन्हें पता नहीं कौन सी बात छिपाने वाली है

थुलथुले और गोल मटोल रस्किन बांड उम्र के चलते अब ज्यादा देर तक टहल नहीं पाते इसलिए और भारी हो रहे हैं। रस्किन बताते हैं पहले वो काफी दूरी तक टहलने जाते थे, पर बढ़ती उम्र के कारण अब पहाड़ी सड़कों को नापना संभव नहीं। रस्किन जब मुस्कुराते हैं आहिस्ता आहिस्ता, तो उनका बाहर निकला पेट उछलता है। 
हमेशा करीने से कटे बाल, स्वेटर और ढीली पैंट कमीज पहने रस्किन पूरी तरह से पारदर्शी जीवन जीते हैं। आम चालबाज इंसानों की तरह उन्हें नहीं पता होता कि सामने वाले से बातचीत करते समय कौन सी बात छिपाने लायक है और कौन सी बताने लायक। टूटी फूटी हिंदी और अंग्रेजी के समिश्रण से वो सबकुछ बता डालते हैं और उनकी गोद ली हुई बहू हंसती रह जाती हैं अपने ससुर की निश्छलता पर।

रस्किन अपने गोद लिए बेटे बहू और नातियों के साथ
रस्किन अपने गोद लिए बेटे बहू और नातियों के साथ

दिल्ली से एक पत्रकार रस्किन का साक्षात्कार लेने मसूरी उनके घर पहुंचते हैं। पत्रकार रस्किन के गोद लिए हुए बेटे और उसकी पत्नी से बातचीत कर रहे होते हैं और रस्किन भी बैठे हैं। पत्रकार पूछता है रस्किन के बेटे से कि आपकी शादी की सहमति आपके पिता (रस्किन बांड) ने दी थी तो बेटे ने कहा हां। पत्रकार ने बहू से सवाल किया कि आपका प्रेम विवाह था, तो उसने बोला हां, आगे बहू बताती है कि दादा (रस्किन बांड) को मैं पसंद थी, वो मुझे पहले से जानते थे, तो दादा ने इनसे बोला कि शादी कर लो। फिर पत्रकार ने रस्किन की बहू से पूछा कि शादी के लिए आपके मां बाप ने विरोध नहीं किया तो बहू ने कहा नहीं विरोध नहीं किया, और वो ऐसे मुस्कुरा रही थी जैसे कुछ छिपाना चाह रही हो मुस्कुराहट में। पर पास बैठे रस्किन ने कहा बताओ न विरोध किया। फिर खुद बोले हूं विरोध किया।

दरअसल उनकी बहू विरोध की बात छिपाना चाहती थी पर रस्किन ये बात अपनी बहू के चेहरे के भाव पढ़कर भी नहीं समझ पाए। और फिर उन्होंने पूरा भंडाफोड़ कर दिया कि हां विरोध कर रहे थे फिर इन लोगों ने भागकर मंदिर में शादी कर ली। कुछ दिन इधर उधर रहे और बाद में सब ठीक हो गया।
जब रस्किन पोलपट्टी खोलने में व्यस्त थे तो उनका चेहरा देखना लायक था, एकदम बच्चों सरीखा। जैसे बच्चे का पिता घर के बाहर खड़े मेहमान के लिए बच्चे से कहलवाता है कि कह दो मैं घर पर नहीं हूं और बच्चा अपनी मासूमियत से कहदेता है कि पापा कह रहे हैं कि वो घर पर नहीं है।

रस्किन ठीक इसी लहजे में सबकुछ बयां कर रहे हैं, मुस्कुराते जा रहे हैं और उनकी छोटी छोटी गोल मटोल आंखों में गजब की चंचलता और नटखटपन इस समय दिख रहा है। पर ठीक दूसरी ओर उनकी बहू मानो थोड़ा शर्मसार सी जान पड़ती हैं। वो नहीं चाहती थीं कि कोई उनके शादी का ये पक्ष जाने।
रस्किन पूरी तरह पारदर्शी व्यक्ति हैं, आवरण विहीन। उनसे अभिनय करते नहीं आता। उन्हें संवाद में कुटिलता भरना नहीं आता।
उनसे जब यही पत्रकार थोड़ा इजाजत मांगते हुए उनकी प्रेमिकाओं के बारे में पूछता है तो रस्किन पूरी लय में शुरू हो जाते हैं। जबकि पत्रकार को लगा था शायद वो कुछ न बोलें या बेहद कम बोलें। पर रस्किन खुद को बांधना नहीं जानते। उन्हें नहीं पता मीडिया क्या से क्या पेश कर सकता है, ऐसा इसलिए भी क्योंकि उन्हें मीडिया की पेशगी से कोई फर्क नहीं पड़ता। रस्किन अपनी प्रेमिकाओं पर बात करते करते थोड़ा शरारती हो जाते हैं। अपने पहाड़ी घर की छत पर सर्दीली हवाएं और सूरज की मद्धम धूप के बीच वो कहते हैं कि 20 वर्ष की उम्र के आगे पीछे उन्होंने कई रोमांटिक कहानियां लिखीं और उसी दौर में उन्होंने अलग अलग लड़कियों को प्यार किया।

फिर कहते हैं कि मुझसे पलटकर किसी ने प्यार नहीं किया। और खूब हंसते हैं। इसलिए मैं सिंगल हूं। फिर कहते हैं वैसे अभी भी डबल हुआ जा सकता है। और हंसते हैं। रस्किन खुली किताब हैं। वो कहते हैं कि मुझे चाहने वालों (पाठकों) से प्रेम है बशर्ते वो अल सुबह 5 बजे आकर डिस्टर्ब न करें।
रस्किन अपने दत्तक नाती के साथ गढ़वाली गाने पर थिरकते भी हैं और खूब मस्ती करते हैं। वो घर आए किसी व्यक्ति को अपने पद्मश्री और पदमभूषण पुरस्कार नहीं दिखाते और न उनकी चर्चा करते। हां अगर वो व्यक्ति ज्यादा देर रुका तो ये फौरन कह देते हैं देखिए श्रीमान मुझे कुछ अंडे लेने जाना है उस पास वाली पहाड़ी में और मोची से जूते सिलवाने हैं। क्या हम फिर मिल सकते हैं। 
सामने वाला जब तक जवाब दे रस्किन अपना छाता लेकर सीढियों की ओर बढ़ जाते हैं……

(प्रिय लेखक भाग-3) 
शब्दःप्रशांत राजावत

– रस्किन बांड ब्रिटिश मूल के भारतीय लेखक हैं, मसूरी रहते हैं। बाल साहित्य में उनके योगदान के लिए उन्हें पदम पुरस्कारों और साहित्य अकादमी पुरस्कार से सम्मानित किया जा चुका है।

 

—————————————————————–

मैं जब मुस्कुराता हूं लाल बंदर दिखता हूं पता है मुझे

बचपन के रस्किन
बचपन के रस्किन
रस्किन का लिखा पहला उपन्यास
रस्किन का लिखा पहला उपन्यास

ये रस्किन का बाल्यकाल है। छोटी छोटी आंखों और गोरी चमड़ी वाला रस्किन जब मुस्कुराता तो लाल बंदर दिखता। ये रस्किन अब भी मानते हैं। कसौली में जन्म और फिर देहरादून, दिल्ली, शिमला में पढ़े बढ़े पले रस्किन का बचपना शानदार बीता।
रस्किन बचपन में बहुत शरारती थे। उनकी बचपन की साथी महेंद्र कुमारी बताती हैं रस्किन बहुत शैतान था और मुझे हाथी बुलाता था। मजे की बात ये है कि रस्किन को आज भी महेंद्र कुमारी का मूल नाम नहीं पता वो हाथी नाम से उन्हें याद करते हैं। रस्किन के पिता एयरफोर्स में थे। रस्किन कुछ दिनों में अपने पिता के कहने पर लंदन रहने चले गए। पर उनका दिल भारत में ही रह गया। उन्हें वहां कुछ भी अच्छा नहीं लगता।
फिर क्या रस्किन ने लंदन में ही महज 17 वर्ष की उम्र में अपना उपन्यास लिखा द रूम ऑन द रूफ। 1956 की बात है ये। रस्किन को 50 पौंड एडवांस मिला और रस्किन उस एडवांस की रकम लेकर भारत आ गए।
कम उम्र में ही उनके सिर से माता पिता का साया उठ गया। रस्किन किसी तरह जीवन यापन करते रहे। रस्किन कहते हैं भारत में परंपरा है कि बेटे के रिश्ते की बात माता पिता करते हैं, मेरा तो कोई था ही नहीं जो मेरे लिए बात करता इसलिए सिंगल रह गया।
हालांकि वो कहते हैं मुझे इसका कोई दुख नहीं। मेरे पास बगैर शादी के ही परिवार है गोद लिया हुआ। रस्किन बांड जब अविवाहित रह जाने का कारण बताते हैं तो उनकी शारीरिक भाषा गंभीर जरूर हो जाती है। और वो छिपा नहीं पाते कि हां इस बात का उन्हें किसी न किसी रूप में मलाल जरूर है।
रस्किन अपने बचपन को याद करते भावुक हो उठते हैं और बीच बीच में उनके जबान से शब्द भरभराने लगते हैं। रस्किन बताते हैं कि बाल साहित्य पर लिखने के पीछे एक कारण उनका अकेलापन ही था। मां बाप नहीं थे इसलिए वो ऐसा मनोरंजक लिखते जो उन्हें आनंद देता। जो बाद में उनकी पहचान बन गई। रस्किन बचपन की बातें करते करते बचपन के दिनों में खो जाते हैं, ऐसे समय उनकी आंखों में आप अतीत स्पष्ट रूप से देख सकते हैं। जिस पर उन्हें क्षोभ भी है।
रस्किन मस्तमौला इंसान हैं, पर अगर आप उनसे उनके बचपन , अकेलेपन पर बात करेंगे तो उनके चेहरे में स्थिरता पाएंगे, आंखों में अतीत की परछाईं और जबान में थोड़ी थोड़ी चुप्पी। उनका ऐसा दिखना या प्रतीत होना इस बात की गवाही है कि रस्किन ठीक वैसे दिखते हैं जैसे वो हैं। रस्किन का व्यक्तित्व इतना प्रभावी है कि आप उनपर हावी नहीं हो सकते एक प्रश्नकर्ता के रूप में। आप कितने भी बड़े पत्रकार हों आप आग्रह और निवेदन की मुद्रा में ही उनसे कुछ निजी सवाल कर सकते हैं। पर ये रस्किन ही हैं कि आपको धाराप्रवाह बिना किसी लाग लपेट के जवाब देते जाते हैं।
रस्किन की जिंदगी अब बुढ़ापे के ढर्रे पर है। वो आमदिनों में लोगों से कम मिलते हैं। या कहें लोगों से मिलने के लिए उन्होंने समय और दिन निश्चित कर रखे हैं। रस्किन को इस बात का कोई अफसोस नहीं कि आप उनको खूसड़ बुड्ढा समझें, तब जब आप उनके घर के गेट पर खड़े हों और वो मिलने में दिलचस्पी न लें। रस्किन अपनी दिनचर्या में कोई दखल नहीं चाहते। वो माल रोड पर सड़कछाप चाय पीते हैं भीड़ का हिस्सा बनकर। रस्किन खुद को सेलिब्रिटी की तरह नहीं रखना चाहते, रस्किन ये जानते हैं कि अगर वो खास बनकर रहेंगे तो उन्हें एक छद्मरूप से जीना पड़ेगा। तब वो सड़क के किनारे रेड़े वाली चाय नहीं पी पाएंगे।
रस्किन बांड अपने जीवन की बातें आपसे परत दर परत शिद्दत से बताएंगे, पर आपकी बातों में अगर कहीं झूठ है या फरेब दिखा तो तुरंत टोक देंगे और आप झेंप जाएंगे उनके इस व्यवहार से।
आप उनका थोड़ा सा भी समय उनकी इच्छा के बगैर नहीं ले सकते। मसूरी की माल रोड पर टहलते या घर से पैदल बागते वक्त कोई जब उनसे बात करे उनके लेखन पर तो वो तुरंत टोक देंगे कि साब मैं वाक पर हूं।

प्रिय लेखक भाग-3
शब्दः प्रशांत राजावत

 

Share this: