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छात्रों को झूठे सपने न दिखाएं मीडिया कॉलेजः ओगरा

मीडिया मिरर की साक्षात्कार श्रंखला बात-मुलाकात में इस बार अतिथि हैं एपीजे इंस्टीट्यूट ऑफ मॉस कम्युनिकेशन दिल्ली के डॉयरेक्टर अशोक ओगरा जी। ओगरा जी 40 वर्षों से मीडिया क्षेत्र में सक्रिय हैं अलग अलग भूमिकाओं में। दूरदर्शन के डॉयरेक्टर और कन्ट्रोलर रहे। डिस्कवरी चैनल के साउथ एशिया के वाइस प्रेसिडेंट रहे। पेश है उनसे मीडिया मिरर के सम्पादक प्रशांत राजावत की विशेष बातचीत।

ओगरा जी की बातचीत के प्रमुख अंश
-आईआईएमसी के डीजी अच्छे इंसान हैं। छात्र का अहित नहीं कर सकते
-पैसा कमाना है तो पत्रकारिता में नहीं आएं
-मीडिया में सैलरी अच्छी नहीं होगी तो टैलेंट अट्रैक्ट नहीं होगा।
-भारतीय मीडिया को अभी काफी कुछ करना है
-हिंदी मीडिया को अंग्रेजी मीडिया से कम नहीं आंका जा सकता
-हिंदी मीडिया में संसाधनों की कमी
-हिंदी भाषा की कम समझ का मुझे दुख है

पेश है साक्षात्कारः-

सवालः-आप एपीजे इंस्टीट्यूट ऑफ मॉस कम्युनिकेशन के निदेशक हैं। इस संस्थान को ऑउटलुक पत्रिका ने एक सर्वे में 2014 में देश के शीर्ष 10 मीडिया ट्रेनिंग कॉलेज में शामिल किया था। सर्वे के अब 3 वर्ष हो चुके हैं। इन तीन वर्षों में आप संस्थान को शीर्ष 5 में मानते हैं या शीर्ष 10 से बाहर।
जवाबः देखिए हम टॉप 10 में तो हैं ही। आउटलुक में और तमाम पत्रिकाओं के सर्वे में ये निष्कर्ष निकला है। इससे हमे पता चलता है कि हम आगे बढ़ रहे हैं। चूंकि प्लेसमेंट के आधार पर तय होता है विशेषरूप से कि कॉलेज बेहतर है। तो प्लेसमेंट के लिहाज में मैं कह सकता हूं कि हमारा संस्थान देश के टॉप 5 मीडिया कॉलेज में शामिल है। कभी कभी जो कॉलेज के टॉप रैंक का आधार होता है वो थोड़ा मुशिकल है। क्योंकि सभी संस्थानों का उद्देश्य अलग अलग है। जैसे जामिया में फोकस डॉक्युमेन्ट्री का है, आईआईएमसी में पत्रकारिता संबंधी है, फिल्म इस्टीट्यूट में फिल्म पर जोर है।

सवालः 2014 में जब आपके कॉलेज को देश के टॉप 10 मीडिया कॉलेज में शामिल किया गया। उसके बाद आपका फोकस किस पर रहा कि कॉलेज में हम इस पक्ष को ज्यादा मजबूत करेंगे।

जवाबः हमने तीन चीजों पर काम किया। अपना इन्फ्रास्ट्रक्चर अपग्रेड किया। जिस स्टूडियों में आप बैठे हैं हाईडेफिनेशन है। इक्युपमेंन्ट्स को बढ़ाया। एडवरटाइजिंग लैब थी उतनी बेहतर नहीं थी उसको बेहतर किया। बच्चों को ट्रेनिंग देने के लिए हमने प्रेस कॉन्फ्रेंस रूम बनाया। वहां बच्चे प्रेक्टिस करते हैं। फैकल्टी को भी बढ़ाया।

सवालः पत्रकारिता जब एक मिशन से दूर अब उद्योग का रूप ले चुकी है। बड़ी संख्या में छात्र इसमे बेहतर करियर के सपने देखते हैं। देखने में आया है महानगरों को छोड़ दें तो क्षेत्रीय स्तर पर भी बड़ी संख्या में मीडिया कॉलेज खुल रहे हैं। ये कॉलेज भारी शुल्क तो वसूलते ही हैं और सीधे रवीश कुमार, बरखा दत्त, अर्नव गोस्वामी बनाने का सपना छात्रों को दिखाते हैं। जबकि स्थित ठीक उलट है। इन कॉलेजों के पास न तो संसाधन होते और न ही योग्य शिक्षक।

जवाबः बहुत अच्छा सवाल किया है आपने। हमारे कॉलेज में ऐसा नहीं है। पूरी पारदर्शिता है। जब कोई अभिभावक आता है या छात्र आते हैं तो हम उनको स्पष्ठ करते हैं कि हमारा काम है आपको स्किल्स देना बांकी आप मेहनत करेंगे। आपकी मेहनत पर निर्भर है। हम झूठे सपने नहीं बेचते। आप हमारे कॉलेज का प्रॉस्पैक्टस देख सकते है। हमारी वैबसाइट देख सकते हैं, विज्ञापन देख सकते हैं। कहीं पर झूठे सपने नहीं दिखाए जाते मिलेंगे। हां ये आपने सही कहा छोटी छोटी जगहों में कॉलेज खुल रहे हैं। छात्र आ रहे हैं उनकी क्या गलती पर उनको फीस देने के बाद भी कुछ मिलता नहीं है। हां हमने इस दिशा में एक कदम उठाया है। हम जो विभिन्न् मीडिया कॉलेजों में फैकल्टी हैं उन्हें कार्यशाला के जरिए प्रशिक्षण देते हैं। इसे फैकल्टी अपग्रेडेशन प्रोग्राम कहते हैं। हमने अभी हाल ही में किया था। जो भी संस्थान झूठे सपने बेच रहे हैं ये तो गलत है। लेकिन मैं यहां एक और बात कहना चाहूंगा ये छलावा कॉलेज प्रबंधन का चलेगा नहीं। एक बैच को धोखा दे दिया, 2 को दे दिया। फिर आपकी हकीकत सामने आ ही जाएगी।

सवालः 1977 में आपने ट्रिब्यून से करियर शुरू किया। लगातार 40 वर्षों तक मीडिया में लम्बी पारी खेली। दूरदर्शन में निदेशक और नियंत्रक रहे। डिस्कवरी के दक्षिण एशिया के उप प्रमुख रहे। रेडियो, प्रिंट और टीवी के लम्बे अनुभव। कैसे लेते हैं इस पूरी यात्रा को।

जवाबः 1977 में मैनें आईआईएमसी से पढ़ाई पूरी की। पहला जॉब ट्रिब्यून में मिला। फिर में दूरदर्शन में चयनित हुआ बतौर प्रोड्यूसर न्यूज और करंट अफेयर्स। फिर मैने यूपीएससी के साथ चयनित हुआ और काफी छोटी उम्र में 1988 में दूरदर्शन का निदेशक बना।

सवालः आप समान रूप से प्रिंट, टीवी और रेडियो में पकड़ रखते हैं। आज के दौर में मीडिया का कौन सा स्वरूप ज्यादा प्रभावी लगता है आपको प्रिंट, डिजिटल,टीवी या रेडियो।

जवाबः ये बड़ा अच्छा सवाल किया आपने। इसको समझना होगा। हालांकि ये कहना मुश्किल है कि आज के दौर में मीडिया का प्रभावी स्वरूप कौन सा है। पर आप पुराने दौर में देखें तो अखबार ही थे, या रेडियो और बाद में टीवी पर एकमात्र चैनल दूरदर्शन। तब कोई या तो रेडियो को ही समाचार माध्यम के रूप में अपनाता था, या दूरदर्शन को। तब विकल्प नहीं थे। अब टीवी भी है, कई सारे न्यूज चैनल, अखबार भी हैं, सोशल मीडिया भी है। डिजिटल मीडिया भी है। अब कोई व्यक्ति हो सकता है एक ही समय में एक से ज्यादा समाचार माध्यमों का उपयोग कर रहा हो। वो टीवी पर न्यूज देख रहा हो, सामने टेबल पर अखबार भी देखता जाता हो और मोबाइल से भी अपडेट ले रहा हो। तो फिलवक्त ये कह पाना मुश्किल है कि ये दौर किस मीडिया का है। अखबार भी बढ़ ही रहे हैं, टीवी चैनल भी और सोशल मीडिया के कहने ही क्या। सब एक दूसरे पर हावी नजर आते हैं।

सवालः आप आईआईएमसी से पढ़े हैं और आपके बेटे भी। सवाल ये है कि आपके बेटे पर आपका दबाव था आईआईएमसी से पढ़ने के लिए या प्रभाव।

जवाबः नहीं कोई दबाव नहीं। मेरे हिसाब से खुद ही उन्होंने किया। हां ये जरूर कह सकता हूं कि घर पर पांच छः अखबार आते हैं, सप्ताह में 4 या 5 पत्रिकाएं आती हैं और ढेर सारी किताबें हैं। तो कहीं न कहीं एक माहौल जरूर बन जाता है उस हिसाब का।

सवालः हमे जानकारी मिली है कि ओगरा साहब का शरीर दिल्ली में रहता है पर आत्मा और मन कश्मीर में। कितना सच है ये।

जवाबः हंसते हुए, जी सही है वो।

सवालः हमने देखा कि आपका कश्मीर की शिक्षा नीतियों पर फोकस रहता है।

जवाबः हां बिल्कुल सही बात है। फोकस रहता है। देखिये क्योंकि मैने बचपन तो वहीं गुजारा। पढ़ाई भी वहां की। मैं 1974 में दिल्ली शिफ्ट हुआ। मेरा परिवार पहले ही यहां आ गया था। लेकिन फिर भी मेरा अटैचमेंट कश्मीर के साथ बहुत ज्यादा है। मैं वहां कुछ संस्थाओं के साथ जुड़ा हूं। लोगों से जुड़ा हूं। क्योंकि मैं चाहूंगा कि कश्मीर वही बने जो हमने देखा है। सूफी माहौल था। पहले हिदू और मुसलमान में भाईचारा था। अब जैसी गुटबाजी नहीं थी।

सवालः चूंकि आप कश्मीर से हैं। ऐसा कहा जाता है कि कश्मीर के जो मुद्दे हैं जो खबरें हैं वो मेन स्ट्रीम मीडिया में आते नहीं हैं और आते भी हैं तो आधे अधूरे। इसलिए कश्मीर की सच्चाई गर्त में ही रहती है। कितना सहमत हैं आप।

जवाबः हां ये तो है ही। देखिए ये तो जाहिर बात है कि लोकल मीडिया और नेशनल मीडिया का कवरेज अलग अलग तरीके का होता है। हां ये सच हैं जो कॉन्फ्लिक्ट जोन होते हैं वहां से रिपोर्टिंग करना बहुत मुश्किल होता है। यहां कॉनफ्लिक्ट जोन से मतलब आतंकवाद से नहीं है। कुछ भी गंभीर मुद्दे राजनीति ही। उस पर बहुत बारीकी से रिपोर्टिंग की जरूरत है। हालांकि हर समाचार माध्यम के खबर प्रस्तुत करने का एक तरीका है पर कोशिश होनी चाहिए वो संतुलित हो।

सवालः आप पत्रकार रहे, अब मीडिया शिक्षक की भूमिका में हैं। कहते हैं आपने थियेटर भी किए हैं। लोग कहते हैं कि आपकी भाव भंगिमाएं आज भी कभी कभार थियेटर के कलाकार की भांति नजर आती हैं।

जवाबः हंसते हुए। हां हां बहुत ज्यादा नहीं। पर बचपन में थियेटर किया। मैं शुक्रगुजार हूं जो मुझमें आज भी एक थियेटर आर्टिस्ट को पाते हैं। पर बचपन में ज्यादा समय डिबेट में गया। मुझे याद आती है अपने शिक्षकों की। मेरे प्रिंसिपल थे सैफुद्दीन साहब। उनसे बहुत कुछ सीखा। हां थियेटर देखता था। अब मेरा शौक पेंटिंग की ओर ज्यादा हो रहा है।

सवालः आईआईएमसी दिल्ली में पिछले दिनों एक विवादास्पद मामला सामने आया। वहां के महानिदेशक ने एक छात्र को निष्कासित कर दिया। छात्र पर आरोप ये थे कि उसने आईआईएमसी के खिलाफ कुछ लिखा था। जब इस मामले ने तूल पकड़ा तो महानिदेशक सर ने सोशल मीडिया पर एक टिप्पणी की अगर एचटी या एनडीटीवी या किसी भी मीडिया समूह का पत्रकार अपने संस्थान के खिलाफ लिखेगा तो उसका संस्थान के मालिक क्या करेंगे। उनकी इस टिप्पणी का भी विरोध हुआ जो उन्होंने सफाई स्वरूप दी थी। चूंकि आईआईएमसी देश का प्रमुख केंद्र है पत्रकारिता शिक्षा का। आप इस पूरे घटनाक्रम को कैसे लेते हैं।

जवाबः देखिए आईआईएमसी दिल्ली के महानिदेशक केजी सुरेश बहुत काबिल पत्रकार और शिक्षक हैं। और अच्छे इंसान हैं। मैं उनको जानता हूं। मेरे मित्र हैं। हालांकि ये घटनाक्रम मुझे विस्तृत पता नहीं है। इसलिए कोई स्पष्ट राय नहीं दे सकता। पर हां इतना जरूर कहूंगा अगर छात्र को निष्काशित किया गया है तो गंभीर मसला रहा होगा। वरना कोई भी शिक्षक किसी छात्र के भविष्य के साथ इस तरह पेश नहीं आएगा।

सवालः आप कई नेशनल अवार्ड के जूरी मेम्बर रहे हैं। क्या कभी कोई दबाव आता है राजनेताओं का या किसी अन्य रूप में कि फलां को अवार्ड देना है आदि या निर्णय की पूरी स्वतंत्रता रहती है।

जवाबः नहीं ऐसा कभी नहीं रहा। नेशनल फिल्म अवार्ड की ज्यूरी में रहा, सेंटर फार मीडिया स्टडीज का जो वातावरण फेस्ट था उसकी पहली ज्यूरी में मैं रहा हूं। उसमें भी कोई दबाव या हस्तक्षेप नहीं रहा। हां किसी प्रतिभागी को लेकर पशोपेश की स्थिति जरूर बनती रही है। पर उसमें हम ज्यूरी मेम्बर बैठकर किसी प्रतिभागी के हर पहलू पर विचार कर लेते थे। कभी कभार होता है कि किसी कैंडिंडेट के किसी बेहतर पक्ष को हम नहीं देख पाए दूसरा मेंबर उसको समझ रहा है तो हम उस पर भी विचार करते थे और खुद के निर्णय में बदलाव या संशोधन करते थे। पर दबाव कभी नहीं रहा।

सवालः आपका पसंदीदा टीवी पत्रकार कौन है और क्यों है।
जवाबः मुझे दो तीन अच्छे लगते हैं। बीबीसी की क्रिशिएन अमानपोर मेरी पसंदीदा हैं। मुझे रवीश कुमार काफी अच्छे लगते हैं। उनकी जो खबरों को लेकर समझ है। बेहतर है। उनका जो विश्लेषण रहता है बहुत शानदार होता है। राजदीप सरदेसाइ बहुत बढ़िया पत्रकार हैं। एनडीटीवी में जो डिफेंस कवर करते हैं सोम वो भी काफी अच्छी रिपोर्टिंग करते हैं।

सवालः चूंकि आप दूरदर्शन में रहे हैं। दूरदर्शन के पुराने दौर में चलें। एक दौर था जब सलमा सुल्तान, मंजरी जोशी, सुनित टंडन, विनोद दुआ, शम्मी नारंग, वेद प्रकाश आदि जिनका दर्शकों में जबरदस्त क्रेज था। कहते हैं कि सलमा सुल्तान के बालों में जो फूल सजता था या उनके साड़ी पहनने का अंदाज था देश की महिलाएं नकल करती थीं। कुल मिलाकर एक स्टार जैसा क्रेज था, अब के टीवी पत्रकारों के प्रति वो क्रेज जनता में देखने में नहीं मिलता।

जवाबः इसमें कई बाते हैं। देखिए 60,70 और यहां तक 80 के दशक को भी आप टीवी का स्वर्णिम काल कह सकते हैं। जब भी कोई नई चीज आती है। तो लोगों का झुकाव हद दर्जे तक होता है। वही था। ज्यदातर लोगों के यहां टीवी 80 के दशक में आया। फिर कलर आया। आपने नई नई टीवी लिया तो आपको क्या दिखा मंजरी जोशी दिखीं, सलमा सुलतान दिखीं, नीति रविन्द्रन दिखीं, टीनू जोशी दिखी, शम्मी नारंग दिखे और आपने उन्ही को देखना है। औऱ कोई चैनल थे नहीं। रेडियो पर देवकीनंदन का समाचार सुनते थे। तो निश्चित है कि उनके प्रति दीवानगी तो थी। हां लेकिन अब कई चैनल हैं, कई पत्रकार हैं, कई माध्यम हैं। तो निश्चित ही वो क्रेज तो नहीं रहा।

सवालः आप किताबें पढ़ते हैं। कोई अपनी पसंदीदा किताब।

जवाबः आजकल संजीव सन्याल की किताब जो इंडियन ओसन पर है, पढ़ रहा हूं। एरिक स्मिथ की एक किताब पढ़ रहा हूं।

सवालः हिंदी की कोई किताब जो पसंद हो।

जवाबः हिंदी में मेरी उतनी पकड़ नहीं है। पर मेरे मित्र हैं गौरीशंकर रैना उन्होंने एक किताब भेजी है जिसमें उन्होंने कश्मीरी लेखकों के आलेखों का हिंदी में अनुवाद किया है।

सवालः हिंदी साहित्य बड़ी तेजी से आगे बढ़ रहा है। हाल ही के वर्षों में कई अच्छी किताबें हिंदी में आईं। कोठागोई, आजादी मेरा ब्रांड, लतासुर गाथा, डार्क हार्स, आकाल में उत्सव, दर्दजा आदि।

जवाबः हां ये मेरी कमी है कि मैं न तो कश्मीरी उतना पढ़ सकता हूं और न हिंदी उतना पढ़ सकता हूं। हर व्यक्ति में कुछ कमी होती है मेरी ये कमी है मैं मानता हूं। मुझे इस बात का दुख है।

सवालः अभी एक पत्रकारिता विश्वविद्यालय ने एक रिपोर्ट तैयार की और रिपोर्ट से ये निष्कर्श निकला की हिंदी का स्तर गिरने में हिंदी अखबार भी जिम्मेदार हैं। रिपोर्ट में कहा गया कि हिंदी अखबार बेवजह अंग्रेजी शब्दों का उपयोग करते हैं। पूरी एक सूची जारी की गई कि फलां शब्द ज्यादा उपयोग किए जा रहे हैं। जैसे उनमे से कुछ स्टूडैंट, वूमेन, टीचर, इवेंट और बहुत सारे। जबकि इन्हें हिंदी में लिखा जा सकता है। आप किस तरह लेते हैं इस रिपोर्ट को। और ये भी कहा गया कि हिंदी अखबार अंग्रेजी के शब्दों का इस्तेमाल न करें या बचें।

जवाबः देखो जब भाषाएं आगे बढ़ती हैं। संवाद होते हैं। तो आपने देखा होगा हिंदी भाषा में कई अंग्रेजी शब्द आए हैं। लाठी है, नक्सलाइट है। अंग्रेजी शब्द हैं। महात्मा अंग्रेजी शब्द है। वैसा ही यहां भी होता है। और यहां एक बात समझनी होगी समाचार पत्र माध्यम हैं सूचना का। और सूचना जिस भी रूप में सहजता से पहुंचे वो ज्यादा जरूरी है। चूंकि चलन में अंग्रेजी शब्द हैं तो आप निश्चित ही अंग्रेजी शब्दों का इस्तेमाल करेंगे। अखबार साहित्यिक माध्यम नहीं है। जाहिर बात है जब आप कोई किताब लिखते हैं तो उसमें ये नहीं होना चाहिए पर अखबार में संदर्भ में ये गलत नहीं। ये मेरी राय है।

सवालः आप रेडियो में भी अक्सर व्याख्यान देते हैं। जानना चाहूंगा कि एफएम चैनल जो हमेशा से मांग कर रहे हैं कि उन्हें भी समाचार प्रसारण के अधिकार मिलें। आप इसके पक्ष में हैं।

जवाबः बिल्कुल एफएम चैनलों को अधिकार मिलने चाहिए इसमे कोई हर्ज नहीं है।

सवालः पत्रकारिता में भी और खासतौर पर हिंदी पत्रकारिता में सैलरी बहुत नहीं है। इस कारण रुझान कम हो रहा है छात्रों का।

जवाबः देखिए पहली बात कि अगर आपको पैसा चाहिए तो आपको पत्रकारिता में आना ही नहीं चाहिए। यहां तो जुनून और एक सम्मान की नौकरी है। जहां आपकी खुदकी एक पहचान देश और समाज के बीच बनती है। पैसा कमाना है तो कार्पोरेट सैक्टर में जाओ। मैने देखा है करोड़ों लाखों की सैलरी पाने वाले भी पत्रकारों से एक जलन रखते हैं कि काश मैं भी पत्रकार होता। पत्रकार एक हार्डवर्क है जहां ग्लैमर और पैसे के लिए मत आईए। इस पेशे में एक गर्व है। सब बातें एक साथ तो नहीं हो सकतीं। खैर अब तो समय बदल रहा है।

सवालः आप डिस्कवरी में रहे हैं। डिस्कवरी जैसा चैनल भारत में क्यों नहीं खुल पाया अबतक।

जवाबः देखिए ऐसा नहीं है, होगा। पर डिस्कवरी की तो बात छोड़िए अभी तो हमारे पास अंतर्राष्ट्रीय चैनल भी नहीं है। अभी हमारे चैनल कोई अलजजीरा और बीबीसी की तरह भी नहीं है। अभी काफी कुछ होना है पर होगा।

सवालः डिस्कवरी के पत्रकार या कहें पूरी टीम बड़ी समर्पित होती है। काबिल तो हैं ही। तभी इतने शानदार प्रोग्राम बन पाते हैं। भारतीय पत्रकारो में काम को लेकर इतना परिश्रम और समर्पण नहीं दिखता। अभी पिछले दिनों डिस्कवरी के लिए प्रधानमंत्री का साक्षात्कार करने अमेरिका से डेविड लेटरमैन आए थे इतना होमवर्क था उनका की गजब का साक्षात्कार किया।

जवाबः हां वो तो है। पर कुछ बातें संसाधनों और सुविधाओं पर भी निर्भर करती हैं। डिस्कवरी अपने कर्मचारियों को मोटी सैलरी देता है। अच्छे क्वालिटी के कैमरे और विश्वस्तरीय स्टूडियो हैं। और भारत में अभी संसाधनों की कमी है। और ऐसा भी नहीं है कि काबिल मेहनती लोग नहीं है। बहुत अच्छे फिल्मकार हैं भारत में भी।

सवालः भारत में हिंदी और अंग्रेजी मीडिया में बेहतर कौन है आपकी नजर में।

जवाबः मेरे लिए ये कहना बड़ा मुश्किल होगा। लेकिन मैं ये कहूंगा कि कुछ चीजे हिंदी मीडिया में ज्यादा अच्छी होती हैं। जैसे ग्रामीण परिवेश से जुड़े मुद्दों पर। हां लेकिन अंतर्राष्ट्रीय मसलों की बात आती है तो अंग्रेजी मीडिया के पैनलिस्ट आगे हैं। इसको ऐसे भी समझ सकते हैं कि हिंदी मीडिया का दायरा सीमित है। अगर सीरिया में कुछ हो रहा है तो निश्चित है उसकी कवरेज अंग्रेजी मीडिया में बेहतर होगी क्योंकि वहां उसका प्रतिनिधि मौजूद है। यहां पहुंच की और संसाधनों की बात है। आप सीधे तौर पर किसी को कमतर नहीं कह सकते।

सवालः हिंदी मीडिया को लें तो खासतौर पर दक्षिण एशिया के कुल 8 देशों जिनसे हम सीधे तौर पर सामरिक और भौगोलिक और आर्थिक दृष्टि से आत्मनिर्भर हैं। इन देशों में संभवतः किसी भी देश मं हिंदी अखबार का प्रतिनिधि नहीं हैं।

जवाबः हां ये सच है कि भारत के बाहर हिंदी अखबारों के प्रतिनिधि कम हैं। लेकिन मैं ये भी कहना चाहूंगा कि अंग्रेजी मीडिया के प्रतिनिध भी अब विदेशों में घटे हैं। पहले जमाने में ये संख्या ज्यादा होती थी। लेकिन अब अंग्रेजी मीडिया ने भी कम किए हैं। अब वो ये कोशिश करते हैं कि फलां देश में कोई स्वतंत्र पत्रकार है उसको कह देते हैं कि आप हमारे लिए पेड रिपोर्ट लिख दो, अब ये हो रहा है।

सवालः ऐसा सुनने में आता है कि सरकारी मीडिया चाहे दूरदर्शन हो, प्रसार भारती, आकाशवाणी, लोकसभा और राज्यसभा टीवी। यहां प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से राजनेताओं का या सरकार के लोगों का दखल रहता है। क्या आपके समय में ऐसा था जब आप दूरदर्शन के डायरेक्टर थे।

जवाबः देखिए आप जब सरकारी सेवा में होते हैं तो एक माइंडसेट बन जाता है। एक मेकप एक फ्रेम बन जाता है कि आप सरकार की नौकरी कर रहे हैं। तो सीधे तौर पर तो दबाव नहीं कह सकता या दखल। मेरे समय में तो फोन नहीं आते थे। पर हां मेकप ऐसा जरूर होता कि हां कुछ भी संभव हो सकता है।

सवालः अखबारी पत्रकारों को बेहद कम सैलरी दी जाती है। इसको देखते हुए मजीठिया वेज बोर्ड का गठन हुआ। सुप्रीम कोर्ट ने आदेश किए की सभी अखबारों के मालिक मजीठिया वेज बोर्ड के अनुसार एक निर्धारित सैलरी दें। पर सुप्रीम कोर्ट के आदेश को किसी भी अखबार प्रबंधन ने नहीं माना और आज भी 10 हजार से लेकर 20 हजार तक सैलरी में अखबारों में वरिष्ठ उप सम्पादक स्तर के लोग भी काम कर रहे हैं। आप क्या कहेंगे इस मामले पर।

जवाबः देखिए मैं तो कहूंगा वेज बोर्ड के अनुसार सैलरी देना चाहिए। मीडिया में सैलरी अच्छी नहीं होगी तो टैलेंट अट्रैक्ट नहीं होगा। चूंकि पत्रकारिता देश सेवा है समाज सेवा है। तो निश्चित है इस मामले पर मीडिया संस्थानों के मालिकों को सोचना होगा कि अच्छा पैसा दें ताकि अच्छे लोग आएं और अच्छा काम हो। यहां एक बात मैं प्रमुखता से कहूंगा कि जो पत्रकार संगठन हैं उन्हें एक फंड बनाना चाहिए। ये फंड किसी हादसे में मारे गए पत्रकार या बीमार पत्रकार को मदद कर सकता है। इतना तो संगठनों को करना चाहिए अपनी तरफ से।

सवालः आपके पास 40 वर्ष लम्बा पत्रकारिता अनुभव है। अब मीडिया कॉलेज में डॉयरेक्टर हैं। मैं ये जानना चाहता हूं कि क्या सरकार की ओर से कोई प्रस्ताव आया किसी शासकीय उपक्रम में सेवा के लिए तो आप जाएंगे।

जवाबः देखिए ऑफर तो आते रहते हैं। लेकिन मैं यहां समर्पित हूं और खुश हूं। ये मेरा लास्ट जॉब है।

सवालः पत्रकारिता की पढ़ाई की चाहत रखने वालों के लिए कोई संदेश।

जवाबः कोई एक मानसिकता गढ़कर न आएं कि मुझे एंकर बनना है या फोटोग्राफर या रिपोर्टर। आएं कोर्स ज्वाइन करें। और फिर चीजों को समझने के बाद अपनी रुचि और काम कर सकने की क्षमता के बाद निर्णय लें।

तस्वीरों में अशोक ओगरा जी और मीडिया मिरर के सम्पादक प्रशांत राजावत। स्टूडियो है एपीजे जन संचार संस्थान का।

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