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इस उत्तराखंडी को मैंने एक पूर्ण समर्पित पत्रकार के रूप में पाया

रमेश भट्ट
रमेश भट्ट पूर्व टीवी पत्रकार और अब उत्तराखंड मुख्यमंत्री के मीडिया सचिव।
पद्मपति शर्मा, खेल विशेषज्ञ
पद्मपति शर्मा, खेल विशेषज्ञ

वरिष्ठ खेल पत्रकार पद्मपति शर्मा बता रहे हैं अपने साथी रमेश भट्ट की खूबी। आप भी पढ़िए। रमेश टीवी पत्रकारिता छोड़ अब उत्तराखंड के मुख्यमंत्री के मीडिया सचिव हैं। 

 

ओज से दीप्त इस उत्तराखंडी को मैंने एक पूर्ण समर्पित पत्रकार के रूप में पाया. पिछले 13 वर्षों के टीवी अनुभव के दौरान मैने जिन एंकरों को देखा उनमें रमेश अपनी ओजस्वी वाणी और समर्पण के लिहाज से मेरी किताब में पहली पायदान पर रहा है. उसकी गूंजती तार्किक आवाज श्रोताओं के सीधे दिल में उतरा करती थी. टीवी पत्रकारों की जिंदगी मैने देखी है. उनके पास आज की आपाधापी में पढ़ने का वक्त नहीं है. पर रमेश जैसे अपवाद हैं जो विषय पर आन एयर होने के पहले जम कर गृहकार्य करने में विश्वास करते हैं.

 

यदि यह कहूं कि मैं पूर्वजन्म पर विश्वास करता हूं तो कहीं से भी गलत नहीं है. हालांकि अभी तक मेरी ऐसे किसी शख्स से मुलाकात नहीं हुई है जिसे अपना पिछला जन्म याद हो. मगर हां, न जाने कितने ऐसे लोगों से मेरा पाला पड़ा है जिनका या तो मैं पूर्व जन्म का कर्ज चुका रहा हूं या कुछ ऐसे भी हैं जो मुझे पिछला कर्ज चुका रहे हैं. पिछली नौ सितंबर को कोलकाता एयरपोर्ट पर मिली एक छह माह की अबोध परी का मेरे प्रति अनुराग से ओतप्रोत लगभग 90 मिनट तक टकटकी लगाए रखना शायद इसी का ही एक हिस्सा रहा होगा. इसी उधेड़बुन के बीच एक ऐसा शख्स याद आ गया जो शायद मेरा पिछला कर्ज चुकाने के लिए ही धरती पर आया है. बताता हूं उस सुदर्शन युवक के बारे में.
” आप पदम पति सर बोल रहे हैं ?” जी हां मै ही बोल रहा हूं. ” सर, मेरा नाम रमेश भट्ट है और मैं लोकसभा टीवी में एंकर हूं. आफिस से घर लौटते समय मै कार ड्राइव करने के दौरान आकाशवाणी के एफएम बैंड पर स्पोर्टस स्कैन प्रोग्राम सुनता हूं और आपका मुरीद हूं. आकाशवाणी से आपका नंबर मिला है. 25 जनवरी को लोकसभा टीवी पर आयोजित एक विशेष खेल परिचर्चा में आपको हम आमंत्रित करना चाहते हैैं.”
दिग्गजों के साथ परिचर्चा में भागीदारी के लिए मिला न्यौता ठुकराने का सवाल ही नहीं था. यह बात 2011 की है. महुआ चैनल छोड़ने के बाद एक नये अवतार के साथ मैं टीवी की दुनिया में उतरा तो इसका पूरा श्रेय रमेश को ही जाता है. लोकसभा टीवी के सुबह के खेल समाचार रहे हों या शाम की परिचर्चाएं, ऊर्जा से भरे रमेश की एंकरिंग बरबस मोह लेती ही थी, उसका मेरे प्रति अनुराग भी वाकई किसी भक्त जैसा ही था. मैं हरदम यही सोचता कि रमेश यहां क्यों, उसे तो किसी बड़े निजी चैनल में बतौर प्रस्तोता होना चाहिए.
एफएम पर मेरी आवाज से हुई वह निकटता धीरे धीरे कब प्रगाढ़ता में बदल गयी, पता ही नहीं चला. परिस्थितियोंवश मुझे एक साल बाद काशी लौटना पड़ा और तब लगा कि अब बस – श्रद्धेय गुरुवर पंडित हजारी प्रसाद द्विवेदी जी की ये पंक्तियां हर समय कुरेदती रहतीं, ” पढ़ा पढ़ाया, लिखा लिखाया, अब न रहा कुछ बाकी, व्योमकेश दरवेश चलो तुम गंगा तट एकाकी.’ लेकिन प्रारब्ध की मंशा तो कुछ और ही थी.
बनारस लौटे चंद महीने ही हुए होंगे कि एक दिन फिर बजी फोन की घंटी और सामने वाला वही रमेश. “सर, एक नया चैनल शुरू होने जा रहा है. चैनल हेड शैलेश आपके पूर्व परिचित हैं और मीटिंग में आपके नाम की मैं चर्चा कर चुका हूं. आपको जोड़ना चाहता हूं.”
दो दिन बाद ही शैलेश भाई का फोन आ गया. पहले फोनो के लिए कहा. मैं वाराणसी से ही फोनो देने लगा “न्यूज नेशन” चैनल लांच होने के दो तीन दिन बाद से ही. रमेश ने खेल कर दिया. शैलेश भाई ने मिलने के लिए नोएडा बुलाया और पांच मार्च 2013 को वह मीटिंग ज्वाइनिंग में बदल गयी. बतौर खेल विशेषज्ञ एक और पारी शुरू करने के लिए यदि किसी एक को श्रेय देना होगा मुझे तो वह सिर्फ और सिर्फ रमेश ही है.
न्यूज नेशन का कार्यकाल अब एक इतिहास है. मगर वहां मैने रमेश को बहुत करीब से देखा, जाना और परखा.

ओज से दीप्त इस उत्तराखंडी को मैंने एक पूर्ण समर्पित पत्रकार के रूप में पाया. पिछले 13 वर्षों के टीवी अनुभव के दौरान मैने जिन एंकरों को देखा उनमें रमेश अपनी ओजस्वी वाणी और समर्पण के लिहाज से मेरी किताब में पहली पायदान पर रहा है. उसकी गूंजती तार्किक आवाज श्रोताओं के सीधे दिल में उतरा करती थी. टीवी पत्रकारों की जिंदगी मैने देखी है. उनके पास आज की आपाधापी में पढ़ने का वक्त नहीं है. पर रमेश जैसे अपवाद हैं जो विषय पर आन एयर होने के पहले जम कर गृहकार्य करने में विश्वास करते हैं. जब आप विषय से वाकिफ होकर उतरते हैं तो जाहिर है कि आप महफिल लूटेंगे ही. रमेश ऐसे ही दर्शकों के दिलों पर राज करता था. पढ़ना, पढ़ना और पढ़ना, सिर्फ इसी मूलमंत्र का हर वक्त जाप रमेश को ब्राडकास्ट की दुनिया में एवरेस्ट पर पहुंचाने वाला ही था कि एचानक एक नया मोड़ आ गया.
” डाक्टर, मैं उत्तराखंड के मुख्य मंत्री श्री त्रिवेद्र सिंह रावत के ओएसडी के रूप में जुड़ गया हूं”. यह सुन कर एक बार तो झटका लगा. क्योंकि रमेश की राह जो बदल गयी थी. मगर फिर सोचा कि देश को आज रमेश जैसे देशहित के लिए समर्पित ईमानदार युवकों की भारतीय राजनीति की दिशा और दशा बदलने के लिहाज से सख्त जरूरत है. चैनल के कार्यकाल के दौरान रमेश ने मेरा नया नामकरण हर समस्या का इलाज करने वाला ‘डाक्टर’ कर दिया था. वायुसेना अधिकारी का यशस्वी पुत्र, दो परी जैसी बेटियों का पिता रमेश अपने इस नये यात्रा पथ पर पड़ने वाले समस्त अवरोधों को पार कर राजनीतिक लक्ष्य के शिखर पर पहुंचे, अपने इस पुत्रवत युवक के लिए परमात्मा से मेरी यही गुहार है.

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