Home > रचनाकर्म > ये पत्रकारिता के छात्रों को हुआ क्या है

ये पत्रकारिता के छात्रों को हुआ क्या है

नेशनल इंस्टीट्यूट ऑफ मास कम्युनिकेशन का नया बैच
मीडिया छात्र

न जवाबदेही, न अनुशासन, न धैर्य

— एडीटर अटैक—  प्रशांत राजावत, सम्पादक मीडिया मिरर 

 

मीडिया के छात्रों में गंभीरता, जिम्मेदारी और अनुशासन की बेहद कमी देखता हूं मैं आज के दौर में। इन्हें अपने संस्थान और कार्यस्थल में जो अंतर है वो नहीं पता होता। कॉलेज वाली मस्ती ही वो इंटर्नशिप के दौरान करते हैं। जब मन चाहा दफ्तर आए, जब मन चाहा गए। काम को लेकर सीखने में कोई दिलचस्पी नहीं, केवल ग्लैमर हावी।

– मनोज टिबड़ेवाल आकाश, प्रसिद्ध टीवी पत्रकार व एडीटर डायनामाइट न्यूज)

 

मीडिया के छात्रों में गंभीरता की बेहद कमी है। ये सिर्फ आपके पीछे अपने स्वार्थ औऱ मतलब के लिए जुड़ेंगे। आप इनसे कोई अपेक्षा रखें तो बेकार है। मुझसे नौकरी के लिए सैकड़ों छात्र संदेश करते हैं पर मुझे एक बार पत्रकार संघ के लिए मजीठिया मांग पर प्रदर्शन करना था, एक भी सामने नहीं आया।

वरिष्ठ पत्रकार ( नाम न देने की शर्त के बाद टिप्पणी)

 

… जब मैं कॉलेज में था तो मेरा एक सीनियर बताता था कि नौकरी पाने का सबसे आसान फार्मूला ये है कि फेसबुक में उन पत्रकारों को फॉलो करो जो न बहुत बड़े हो न बहुत छोटे दर्जे के। बीच वाली जमात को फॉलो करो और उनके हर पोस्ट पर बस वाह, बहुत बढ़िया, जय हो, आनंद आ गया, बहुत सही, क्या बात है लिखते रहो। इतना ध्यान रखो चूको मत जिन पत्रकारों को फॉलो करो उनकी हर पोस्ट पर लिखना जरूर है यही सब। आप 2 से 6 महीने में उनकी नजर में आएंगे और फिर धीरे से मैसेंजर में घुसपैठ और बात बने तो नम्बर लेन देन और बस जुगाड़ बिठाओ। ये आजके मीडिया छात्र खूब कर रहे हैं।

  • आईआईएमसी के पूर्व छात्र का बयान

 

 

इन बयानों को आपने पढ़ ही लिया होगा, हालांकि इन बयानों से हमारा कोई वास्ता नहीं। अब आगे…

सबसे पहले मैं ये स्पष्ट कर दूं मैं भी पत्रकारिता का छात्र रहा हूं। इसलिए मुझे पत्रकारिता के छात्रों से पूरी हमदर्दी है और उनके दुख दर्द और रोजगार को लेकर हो रही समस्याओं के बारे में बेहतर तरीके से समझ रखता हूं।

अब आते है विमर्श पर।

मैं एक ऐसे पोर्टल (मीडिया मिरर) का सम्पादक हूं जो मीडिया की खबरें प्रसारित करता है। ऐसे में मीडिया की पढ़ाई कर रहे छात्रों को लगता है कि मुझे बड़ी संख्या में पत्रकार जानते हैं और मैं उनकी मदद कर सकता हूं। इसलिए देशभर के तमाम मीडिया छात्र मुझे संदेश भेजते हैं, फोन करते हैं, ई मेल करते हैं कि मैं उनकी इंटर्नशिप और जॉब में मदद करूं।

उनका ऐसा सोचना जायज है या नहीं मुझे खुद नहीं पता क्योंकि मैं मीडिया हाउसों का न तो मालिक हूं और न ही एजेंट। बहरहाल वो मुझे संदेश भेजते हैं।

छात्रों के संदेश की भाषा कैसी होती है एक बार उस पर नजरः-

ऐसे तमाम संदेश मिलते हैं। जो बेहद प्रभावहीन और असभ्य तरीके से भी किए जाते हैं। पहली बात ये कि मैं एक पोर्टल का एडीटर हूं जो मीडिया खबरों से जुड़ा है ठीक बात है और मुझे बड़ी संख्या में पत्रकार जानते हैं। पर पत्रकारों को जानने का मेरा उद्देश्य सिर्फ खबरों के लिए है, नौकरी या इंटर्नशिप के लिए सिफारिश करना नहीं। औऱ फिर तमाम तरह की स्थितियां होती हैं आपको सौ लोग जानते हैं उनमें से शायद 10 आपको मानते हों आप उनसे काम के लिए कह सकते हैं और उन 10 में से शायद 5 या उससे कम ही सक्षम हों कि अपने संस्थान में जॉब या इंटर्नशिप करवा सकें। यही सच्चाई है। रही बात मैं सम्पादकों से आपकी सिफारिश करूं जिनकों मैं व्यक्तिगत नहीं जानता उससे बेहतर है आप स्वयं उनसे मिले और रिज्यूमें दें।

मैं सार्वजनिक रूप से ये स्वीकार करता हूं कि मैं किसी एक छात्र की नौकरी लगवाने में सक्षम नहीं। सिफारिशों का स्वरूप जब मुझे नहीं पसंद तो आपके लिए उसका उपयोग क्यों करूंगा।

बावजूद कभी कभी मैं छात्रों की मदद कर देता हूं, जहां मुझे थोड़ी सी भी गुंजाइश लगती है कि फलां एडीटर मेरी बात का लिहाज करेगा। पर एक बात मैं स्पष्टतौर पर कहना चाहूंगा कि जब जब मैंने मीडिया छात्रों की मदद की अनुभव बेहद खराब रहे।

अनुभवः

  • एक छात्र बोला कि सर मुझे इंटर्नशिप की जरूरत है, मैंने उसे एक बड़े अखबार में भेजा, दो दिन उसने काम किया और ब्यूरो चीफ से बोला कुछ स्पेशल स्टोरी दीजिए करने को। और अगले दिन से फिर नहीं गया। न मुझे सूचना दी और न ही अखबार को। आप जब किसी से निवेदन करते हैं तो यह चाहते हैं कि आपका प्रतिनिधि अनुशासित और शिष्ट रहे। काम के प्रति ईमानदार। पर जब आप किसी की सिफारिश करें किसी बड़े अखबार में और वो 2 दिन के बाद अनुशासन हीनता के साथ गायब हो जाए आप की क्या इमेज बनेगी उस संस्थान में।

 

  • ऐसे ही एकबार देश के सबसे प्रतिष्ठित संस्थान आईआईएमसी की छात्रा का संदेश आया सर मुझे कहीं जॉब मिल सकती है, मैंने उसे एक हिंदी अखबार के एडीटर का फोन नम्बर दिया। उसकी बात हुई, एडीटर ने उसे बुलाया। मैंने उससे कहा बताना कि एडीटर ने क्या बोला। पर छात्रा ने जवाब देना उचित नहीं समझा।

 

  • हाल ही में माखनलाल विश्वविद्यालय की एक छात्रा का संदेश आया सर मेरी मदद करिए, मुझे दिल्ली में अगर जल्द काम नहीं मिला तो मुझे घर लौटना पड़ेगा। मैंने इनके लिए एक एडीटर से बात की तो एडीटर ने कहा कि भेज देना। मैंने इनको बोला कि आपकी बात हो गई है आपको जॉब मिल जाएगी, पर ये न ही गईं और न ही मुझे कोई जवाब दिया।

 

  • एक छात्र का माखनलाल पत्रकारिता विश्वविद्यालय से संदेश आया सर मुझे जॉब चाहिए, मैंने कहा जॉब मेरे पास नहीं है। फिर छात्र बोला कि आपको इतने लोग जानते हैं कहीं तो भेजिए न। अब इनकी शब्दावली देखिए कहीं तो भेजिए न जबकि मैं मना कर चुका हूं।

 

  • वर्धा जैसे प्रसिद्ध विश्वविद्यालय से एक दिन एक पीएचडी छात्रा का संदेश आय़ा सर मुझे आपकी मदद चाहिए आप मुझे कुछ पत्रकारों के संपर्क दे दीजिए। मैंने बोला आज बिजी हूं 2 दिन बाद। तो ये क्या बोलीं पता है। बोलीं आप आज देंगे या नहीं, ये बताईए। मेरे पास वक्त नहीं है। आज दे सकते हैं तो बोलिए।

मतलब एक बड़े विश्वविद्यालय की पीएचडी (मीडिया से) स्कॉलर की ये बातचीत शैली।

 

….  क्या विश्वास करूं मैं इन सबका, कि कितने गंभीर, कितने जरूरतमंद, कितने जवाबदेह और जिम्मेदार हैं ये छात्र-छात्राएं। आप इनके लिए किसी जगह एडीटर लेवल पर बात करतें हैं, और ये हर बात को हवा में लेते हैं। यकीनन मुझे मीडिया छात्रों की हरकतों से अब दुख होने लगा है। जितनी संजीदगी के साथ ये मदद के लिए संपर्क करते हैं कहते हैं उतनी ही लापरवाही के साथ संपर्क खत्म करते हैं। मुझे कई बार लगता है ये मीडिया के छात्रों को हुआ क्या है। क्या ये तफरी लेते हैं, क्या इनको काम की जरूरत होती है औऱ फिर अचानक नहीं होती। हो सकता है एक या दो बार कोई व्यक्तिगत समस्या हो पर मैंने हर मामले में मीडिया छात्रों का बेहद गैर जिम्मेदार पाया। ये बात सही है सभी छात्र वैसे नहीं होंगे जैसे मेरे पल्ले पड़े। पर ऐसे में विश्वास तो खत्म होता कि आप फिर किसी की रिस्क लेकर मदद करेंगे और वो आपकी छवि का दिवाला निकाल देगा।

मैं स्वयं पत्रकारिता का छात्र रहा हूं। मुझे अहसास है कि इंटर्नशिप और रोजगार के लिए कैसे मशक्कत करनी होती है। पर जब आपको अवसर मिलें तो उसे शालीनता से स्वीकार करिए और मेहनत से काम करिए। एक विश्वास पैदा करिए नियोक्ता पर, धीर गंभीर बनिए कम से कम दफ्तर में। मनोज टिबड़ेवाल जैसे वरिष्ठ पत्रकार अगर एकमत ये राय रखते हैं जो बयान ऊपर है उनका तो कहीं कुछ तो गड़बड़ है। उनकी छात्रों से कोई जातीय दुश्मनी नहीं न वो पूर्वागृह से ग्रसित हैं। अवसर बड़ी मुश्किल से बनते हैं और जब बन जाएं तो आप हल्केपन का प्रदर्शन करते हुए उन्हें गवां दें ये निराशाजनक है।

इंटर्नशिप वो जगह है जहां से आपके जॉब के अवसर तैयार होते हैं, आपके नेटवर्क तैयार होते हैं। इसलिए हमेशा पूरी गंभीरता से मेहनत के साथ इंटर्नशिप करें ताकि सिखाने वाले को लगे कि हां आपमें सीखने व कुछ कर गुजरने की ललक है।

आप कभी आईआईएमसी प्रबंधन के खिलाफ लिखकर, तो कभी आईआईएमसी में ही हवन यज्ञ, तो माखनलाल में गौ शाला के विरुद्ध मोर्चे पर उतर आते हैं। कभी भगवाधारियों के पुछल्ले तो कभी कम्युनिस्टों के गुर्गे नजर आते हैं, पर इन सबपर मैं नहीं जाऊंगा। हां पर नैतिक जिम्मेदारी आपको लेनी होगी क्योंकि आप कोई सामान्य छात्र नहीं। आप पत्रकारिता के छात्र हैं और पत्रकारिता वही विधा है जो समाज का आईना दिखाती है।

Share this: