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पत्रकारिता योग्य लोगों को डिजर्व नहीं करतीः संजय सिंह

मुख संजय कुमार सिंह।
वरिष्ठ पत्रकार व अनुवाद कम्युनिकेशन के प्रमुख संजय कुमार सिंह।

मीडिया मिरर की साक्षात्कार श्रंखला बात मुलाकात में इस बार हमारे अतिथि हैं वरिष्ठ पत्रकार व अनुवाद कम्युनिकेशन के संस्थापक संजय कुमार सिंह। संजय जी प्रभात खबर, आज और लम्बे समय तक जनसत्ता दिल्ली का हिस्सा रहे। फिलहाल पत्रकारिता से दूर हैं अपनी अनुवाद संस्था चलाते हैं। मूलरूप से जमशेदपुर से हैं अभी दिल्ली से सटे गाजियाबाद में रहते हैं। संजय जी ने हाल ही में अपने पत्रकारिता अनुभवों पर आधारित किताब लिखी है, उनका कहना है ये किताब पत्रकारिता के छात्रों को जरूर पढ़नी चाहिए।

 

संजय कुमार सिंह से मीडिया मिरर सम्पादक प्रशांत राजावत की विशेष बातचीतः-  

 

सवालःआपने हाल ही में पत्रकारिता पर किताब लिखी है सबसे पहले बधाई आपको। शुरूआत यहीं से करते हैं सबसे पहले ये बताईये लोग आपकी किताब क्यों पढ़ें।

जवाब : शुक्रिया। अगर कोई पत्रकारिता को अपना पेशा बनाना चाहता है तो उसे इस पेशे को ठीक से जान-समझ लेना चाहिए। अब तो पत्रकार बनने के लिए लोग लाखों की फीस देकर डिग्री लेते हैं तो कुछ खर्च इस पेशे के बारे में जानने पर भी करना चाहिए। मैंने जब नौकरी की थी तो मुझे स्ट्रिंगर का फर्क नहीं पता था। मुझे डेस्क और रिपोर्टिंग टीम अलग होतीहै यह भी मालूम नहीं था। मैं नहीं कहता मेरी किताब पत्रकारिता पर संपूर्ण है या सब कुछ बताती है पर अगर आप नौकरी करने आएंगे तो किन स्थितियों का सामना करना पड़ेगा इसका अनुमान आपको जरूर होगा। कुछ लोग पुराने लोगों से पत्रकारिता की अच्छाइयां सुनकर भी प्रभावित रहते हैं वो जान सकेंगे कि वैसी स्थिति अब हो ही नहीं सकती।

सवालः आपकी किताब मैंने पढ़ी है, आपने विशेषरूप से पत्रकारिता के छात्रों को इसे पढ़ने की अपील की है। जबकि मैं ये कह सकता हूं कि आपकी किताब पढ़कर वो हतोत्साहित हो जाएंगे या हो सकता है वो अपने करियर को लेकर चिंतित हो जाएं।

जवाब : मेरी किताब मुख्य रूप से उन लोगों के लिए है जो कुछ और कर सकते हैं। मसलन यूपीएससी से लेकर राज्य सेवा आयोग और बैंक की नौकरियों तक। बुराइयां वहां भी हैं उन्हें भी जान लें और तुलना करेंगे तो पाएंगे कि यहां हालात ज्यादा बुरे हैं। मैंने लिखा है कि कॉरपोरेट की सभी बुराइयां हैं अच्छाई कोई भी नहीं है। प्रतिभा और क्षमता के लिहाज से हर तरह के लोग होते हैं। अगर आप कुछ और नहीं कर सकते हैं, कोई विकल्प ही नहीं है तो इस किताब को पढ़ा हुआ भावी पत्रकार अपने भविष्य को लेकर बहुत आशावान नहीं होगा। विकल्प तलाशता रहेगा। और मौका मिलेगा तो उसका उपयोग करेगा। मेरी तरह इसे ही सर्वश्रेष्ठ मानकर यहीं फंसा नहीं रहेगा। निश्चित रूप से स्थितियां हतोत्साहित और चिन्तित करने वाली हैं। इसीलिए मैंने अपने बेटे को ऑफर होने के बावजूद इसमें जाने से मना किया। तैयारी रखनी चाहिए। अगर पहले से पता हो तो बेहतर तैयारी हो सकती है।

सवालः बड़े संक्षेप में बताइए क्या आप चाहते हैं पत्रकारिता को युवा पीढ़ी करियर के रूप में न अपनाए।

जवाब : जो कुछ बेहतर कर सकते हैं। वो तो नहीं अपनाए। यह पेशा फिलहाल योग्य लोगों को डिजर्व नहीं करती है।

सवालः आप प्रभात खबर में रहे, आज में रहे फिर जनसत्ता में लम्बे समय तक रहे। जनसत्ता में आपके सम्पादक कौन थे जनसत्ता में। कोई एक संस्मरण साझा करिए उनसे जुड़ा जो यादगार हो।

जवाब : जनसत्ता में मेरा चयन प्रभाष जोशी ने किया था। इंटरव्यू टीम में बनवारी जी भी थे। बनवारी जी ने इंटरव्यू के समय ही कह दिया था कि पैसे कम मिलेंगे और इतने में दिल्ली में रहना मुश्किल है। कैसे रहोगे। इसका जिक्र किताब में है। बाद में राहुल देव और ओम थानवी आए। राहुल देव बहुत कम समय रहे। ओम थानवी संपादक थे तभी मैंने वीआरएस ले लिया। ज्यादातर अच्छे संस्मरण किताब में हैं। कल ही प्रेस क्लब में कुछ मित्रों से चर्चा हो रही थी तो एक और मामला याद आया जो किताब में कोई प्रसंग न होने से रह गया। जनसत्ता में हमलोगों को काम करने की इतनी आजादी थी और हमलोगों ने उसका इतना उपयोग किया कि वही जनसत्ता को अनूठा बनाता था। मुझे याद है राजस्थान के किसी स्ट्रिंगर ने राजस्थान के एक अखबार के खिलाफ कोई खबर भेजी थी। वेतन वगैरह का ही मामला था। किसी पत्रकार ने आत्महत्या कर ली थी। मैंने बिना किसी से पूछे, किसी को दिखाए, कोई चर्चा किए छाप दिया। वह शत प्रतिशत मेरा निर्णय था। यह जानते हुए कि अखबार में अखबार के खिलाफ खबर छाप रहा हूं। विवाद हो सकता है। पर मुझे जरा भी डर नहीं था। कोई चिन्ता नहीं थी। खबर छपी किसी ने पूछा भी नहीं। दफ्तर में कोई चर्चा नहीं हुई। बाद में मैंने डाक से आने वाले छोटे अखबारों में से किसी में पढ़ा था (मेरे पास है नहीं) कि जनसत्ता में वह खबर क्यों और किसलिए छपी और छपवाई गई। मुझे अच्छी तरह याद है कि किसी ने इशारों में भी उस खबर को छापने के लिए नहीं कहा था और चूंकि खबर थी ही वैसी, मैंने किसी से पूछा नहीं था। लेकिन बाहरी दुनिया में चर्चा होती थी कि खबर छपवाई गई है।

सवालः पत्रकारिता से आपका मोहभंग क्यों हुआ।

जवाब :खराब सेवा शर्तों के कारण। कम वेतन, सुविधाएं नहीं के बराबर और 15 साल तरक्की न मिलना। इसका भी जिक्र किताब में है।

सवालः आप अंग्रेजी पत्रकारिता और अंग्रेजी पत्रकार को हर जगह हिंदी पत्रकारिता और हिंदी पत्रकार से श्रेष्ठ बताते हैं अपनी किताब में। ऐसा क्यों।

जवाब : हां, ऐसा मेरा अनुभव है। मैंने कॉपी देखी है, संपादन किया है, और सूचनाएं लाने के लिए कहा है – उसपर प्रतिक्रिया देखी है। अच्छे रिपोर्टर का टालू अंदाज देखा है (यह कम वेतन या सुविधाओं अथवा संसाधनों के कारण भी हो सकता है)। एक ही घटना की अंग्रेजी और हिन्दी की रिपोर्ट पढ़ी है, उनकी तुलना ही है। और आज भी मैं अंग्रेजी के अखबारों में छपी खबरों को हिन्दी वालों से बेहतर पाता हूं। कुछेक अपवाद हैं, होते हैं। लेकिन आमतौर पर मेरी राय यही है और अगर मैं ऐसा कहता हूं तो वह किसी पूर्वग्रह के कारण नहीं है।

सवालः शायद आप सक्रिय पत्रकारिता में होते तो ऐसी मारक किताब नहीं लिख पाते।

जवाब : बिल्कुल। नौकरी मिलने की कोई उम्मीद होती तब भी नहीं लिख पाता। अगर फ्री-लांसिंग कर रहा होता या टीवी चर्चा में जा रहा होता तो भी मीडिया पर ऐसी किताब लिखना संभव नहीं था। मैं शुरू से अनएमप्याबल हूं। जनसत्ता अपवाद रहा।

सवालः रवीश कुमार को सुशांत सिन्हा, सुशांत सिन्हा को विनीत कुमार, अर्नब गोस्वामी को अभिषार यानि पत्रकार ही पत्रकार को कटघरे में खड़ा कर रहे हैं। किस तरह से लेते हैं इन सब मामलों को। क्या आपके दौर में भी ये होता था। ये पत्रकारिता के लिए कितना उचित है।

जवाब : मुझे पत्रकारिता की यही विशेषता पसंद है। आपको दूसरों को भ्रष्ट कहने के लिए खुद ऐसा होना होगा कि कोई आप पर ऊंगली ना उठा सके। टांग खिचाई तब भी होती थी और दमदार होती थी। कई उदाहरण हैं। राजीव शुक्ल ने रविवार में राजीव गांधी से अच्छा इंटरव्यू किया तो पूरी कहानी सार्वजनिक हुई कि दोनों राजीवों की कितनी दोस्ती है। कैसे करीबी हुई आदि (इसीलिए इंटरव्यू अच्छा है)। यह कोई निन्दा या कटघरे में खड़ा करने जैसा नहीं था पर खुलासा तो था ही। सूचनाएं थीं। आज की स्थिति तो बहुत ही बुरी और शर्मनाक है। इसपर कुछ भी बोलना कीचड़ में पत्थर फेंकना है। पर मौका है तो कीचड़ से क्या डरना। अब तो गोली खाने के लिए तैयार रहने का समय है। मेरा मानना है कि अगर रवीश गिनती के सरकार विरोधी और असरदार पत्रकार रह गए हैं तो मौजूदा स्थिति में उनका समर्थन किया जाना चाहिए। खुलकर साथ दिया जाना चाहिए। विरोध का मौका भविष्य में मिलेगा ही। और अभी रवीश के विरोध का मतलब इस नालायक सरकार का समर्थन है। इसके बावजूद विरोध स्तरीय होता तो मैं तारीफ करता। यह बताना कि रवीश ने (निजी तौर पर या बंद कमरे में अपने सहयोगी से) कहा कि मुझे अमिताभ बच्चन से ज्यादा लोग देखते हैं – बेमतलब है। मैं नहीं जानता कि असल में क्या कहा, किस संदर्भ में कहा, किसे सुनाने या कहां रिकार्ड कराने के लिए कहा या कहा भी कि नहीं। पर अगर कहा भी हो तो ऐसी खबर नहीं है जिससे रवीश घटिया पत्रकार के रूप में सामने आते हों। (यह कहीं हाइलेटेड था इसलिए याद है)। ऐसे पत्रकारों वाली आज की पत्रकारिता तो यही है। उचित अनुचित की क्या बात करूं। मैंने अब पढ़ना-देखना छोड़ दिया है।

सवालः आपकी नजर में सबसे बेहतर एक अखबार एक चैनल और एक वेबसाईट कौन है जो निष्पक्ष हो, अच्छी खबरें करता हो।

जवाब : मैं सिर्फ सिफारिशी खबरें पढ़ता और देखता हूं। सबको समभाव से नहीं देखता। इसलिए इस सवाल का जवाब देना उचित नहीं होगा। समाचार कार्यक्रमों में मुझे रवीश का प्राइम टाइम पसंद है। नियमित देखता हूं और फोन पर भी देख सकता हूं। कभी छूट जाए, चर्चा हो तो यू ट्यूब पर भी देखता हूं।

सवालः प्रभाष जोशी बहुत प्रयोगधर्मी सम्पादक रहे हैं। उनका कोई एक खास प्रयोग जिसका हिस्सा आप रहे हों।

जवाब :दिल्ली दफ्तर में हड़ताल थी तो प्रबंधन का प्रस्ताव था कि चंडीगढ़ से कुछ छापा जाए तो यहां बिक सके और जनसत्ता की खाली जगह भर सके। उस समय चंडीगढ़ से दिल्ली के लिए साप्ताहिक जनसत्ता छापने का प्रयोग हुआ था। दैनिक अखबार का अस्थायी साप्ताहिक रूप। गजब की कल्पना थी और जोरदार तैयारी। एक अंक मस्त निकला था। पर वो प्रयोग चला नहीं। उन दिनों चंडीगढ़ से दिल्ली का दैनिक अखबार छापना और उसे यहां समय से पहूंचाना संभव नहीं था।

सवालः आपने कई जगह किताब में लिखा कि मीडिया में नौकरी के लिए जुगाड़ जरूरी है। क्या आप की नियुक्ति भी जुगाड़ से हुई थी, क्या जनसत्ता में जुगाड़ चलता है।

जवाब : मीडिया में नियुक्ति के लिए अब जुगाड़ जरूरी है। मैंने ये भी लिखा है कि जिस साल मेरा सेलेक्शन हुआ उसके बाद वैसी परीक्षा (अखबार में रिक्ति निकाल कर) एक ही बार और हुई। मेरी नियुक्ति तो टेस्ट के बाद हुई थी और जब मैं दिल्ली आया था तब जनसत्ता तो दूर मैं पत्रकारिता में किसी को दूर-दूर तक नहीं जानता था। और पहली बार दिल्ली जनसत्ता का टेस्ट देने ही आया था। मैं यह तो नहीं कहूंगा कि जनसत्ता में जुगाड़ नहीं चलता था क्योंकि हमलोग यह कहते रहे हैं कि प्रभाषजी की चलनी में छेद थे। पर इसका दोष प्रभाष जी को देना उचित नहीं होगा (अब वे नहीं हैं)। किसी भी संस्थान में नीचे के लोग ही चयन करते हैं और नीचे की सिफारिश का असर होता ही है। मोटे अर्थों में यही जुगाड़ है। अगर, जनसत्ता में जुगाड़ चलता था – का सीधा जवाब देना हो तो मैं साथी अंबरीश कुमार के मामले का हवाला दूंगा। उन्होंने सार्वजनिक रूप से लिखा है कि वे किसी की सिफारिश लेकर आए थे तो उनसे कहा गया कि प्रभाष जी के पास छह महीने तक मिलने का वक्त नहीं है। सिफारिशों पर जनसत्ता का माहौल समझने के लिए एक अध्याय में मैंने साथी दयाशंकर पांडे के ब्लॉग का अंश लिखा है। पूरा ब्लॉग पढ़कर जनसत्ता के माहौल को अच्छी तरह समझा जा सकता है।

सवालः आप एक अनुवाद संस्था के प्रमुख हैं। कैसे काम करती है आपकी संस्था। थोड़ा बताएं।

जवाब : अनुवाद की हमारी संस्था कागजी ही है। पत्नी स्वत्वाधिकारी हैं और यह एक फर्म है जो कई छोटे-बड़े कॉरपोरेट्स, एनजीओ, स्वायत्त संस्थाओं आदि में काम करने के लिए पंजीकृत है। कॉरपोरेट्स का काम करने के लिए फर्म के रूप में पंजीकरण कराना होता है, सो बना लिया था। पुराने नियम से 10 लाख तक (बढ़ता हुआ यहां तक पहुंचा था) का कारोबार करने वालों को किसी सरकारी पंजीकरण आदि की आवश्यकता नहीं थी। सो हमलोग टीडीएस रीफंड लेने के लिए आयकर रिटर्न ही फाइल करते हैं। किसी टैक्स के लिए पंजीकृत नहीं है। इसका लाभ ही था। पर जीएसटी लागू होने के बाद कॉरपोरेट्स ने (जीएसटी के नियमानुसार) राज्य के बाहर की फर्म होने के नाते काम देना बंद कर दिया। मेरे ज्यादातर ग्राहक कॉरपोरेट्स गुड़गांव, दिल्ली और बंगलौर में हैं। अब छह जून को इस नियम में छूट की घोषणा हुई है पर यह 31 मार्च तक ही है। मैं जितना काम करता हूं उतने के लिए जीएसटी पंजीकरण व्यावहारिक नहीं है और पंजीकरण कराए बगैर काम बढ़ना संभव नहीं है। इसलिए काम बंद होना तय है। कुछ और करना पड़ेगा। सोच रहा हूं। जहां तक काम का सवाल है, हम जहां पंजीकृत हैं उनके यहां काम निकलता है तो वे हमें ई मेल कर देते हैं। हम अनुवाद उन्हें भेज देते हैं। महीने भर का बिल महीने के आखिरी दिन भेज देते हैं। ग्राहक अपने नियम और समय के अनुसार भुगतान भेज देते हैं। बहुत अच्छा और सहज था इस तरह काम करना पर जीएसटी ने मार डाला।

सवालः अनुवादकों और प्रकाशकों के बीच बड़ी असमंजस की स्थिति है। अनुवादकों के आरोप हैं उन्हें उचित पारिश्रमिक नहीं मिलता और क्रेडिट भी।

जवाब : मैंने शुरू में पुस्तकों का अनुवाद किया है और बाद में कुछ अनुवाद का संपादन भी। मुझे तो पैसे ठीक मिले तभी काम किया पर जब मैं ज्यादा पैसों की उम्मीद करने लगा तो काम मिलना बंद हो गया। मुझे श्रेय भी मिला। हमेशा लेखक के नाम के साथ लगभग बराबर फौन्ट साइज में। अब मैं परिचित लेखकों के सिफारिशी किताबों का अनुवाद ही करता हूं। इसलिए कोई झंझट नहीं है। अनुवाद के संपादन में मैं श्रेय लेने के पक्ष में नहीं हूं। इसलिए कभी मांगा ही नहीं। एक विदेशी प्रकाशक ने अनुवादक के तौर पर लेखक के नाम के साथ मेरा नाम नहीं दिया। मैंने उससे झगड़ा भी किया पर यह कांट्रैक्ट में नहीं था। और लेखक के साथ प्रकाशक के कांट्रैक्ट में जहां जाना था वहीं गया। संयोग से वह किताब वैट पर थी। मेरी कॉपी खो गई और रिकार्ड के लिए दूसरी कॉपी नहीं मिली। मेरे पास उसका प्रूफ भर है। अब जीएसटी लागू होने के बाद रीप्रिंट की संभावना भी नहीं है।

सवालः मैं एक बड़े अखबार में था। सम्पादक ने पूछा कि तुम कौन सा अखबार पढ़ते हो तो मैंने कहा कि जनसत्ता। तब वो बोले कि जनसत्ता भी कोई अखबार है। एक साल पुरानी बात है। दिल्ली का एक बड़ा सम्पादक ऐसा क्यों कह सकता है।

जवाब :दो कारण हैं। पहला तो यही कि जनसत्ता अब पहले जैसा नहीं रहा। हालांकि अब भी दूसरे कई अखबारों से अच्छा है। दूसरा, जो लोग जनसत्ता में नहीं रखे गए उनके मन में अजीब कुंठा है और यह भिन्न मौके पर ऐसे बयान के रूप में व्यक्त होता रहता है। मैं नहीं जानता आप किसकी बात कर रहे हैं, उनकी मौजूदा संपादक से निजी खुन्नस या अपनी योग्यता को लेकर आत्मविश्वास जैसा भी कुछ हो सकता है।

सवालः आपने कहा कि मीडिया कॉलेजों में आप पढ़ा सकते थे। पर आप उसके पक्ष में भी नहीं। क्यों।

जवाब : सच तो यही है कि मुझे कोई ऑफर नहीं मिला और ना मैंने कोशिश की। कोशिश नहीं करने का कारण यह रहा कि जब यह पेशा ठीक नहीं है तो मैं क्यों न लोगों को सच बताऊं जिससे वे इस पेशे में आएं ही नहीं। निश्चित रूप से मेरा ऐसा करना संस्थान को अच्छा नहीं लगता। छात्रों को सच बताए बगैर मैं अपना काम पूरा नहीं करता। इसलिए मैंने इससे बचने की कोशिश की।

सवालः आपको लोग वामपंथी कहते हैं, कुछ कांग्रेसी। सच क्या है।

जवाब :मैं कुछ नहीं हूं। अनएमप्लायबेल होने की हद तक स्वतंत्र, आजाद। जनसत्ता में आने के बाद से मेरा किसी पार्टी से कोई संबंध नहीं रहा। औपचारिक भी नहीं। मैं किसी पत्रकार यूनियन का सक्रिय सदस्य भी नहीं रहा। मैं जिसे पत्रकारों की यूनियन समझकर जुड़ा वह किसी पार्टी से संबंधित रही तो मैं ज्यादातर अलग ही रहा। मैट्रिक की परीक्षा के बाद विधानसभा चुनाव में मैं भाजपा का एजेंट था। कई फर्जी वोटर्स को वोट नहीं देने दिए थे। (उस समय वोटर्स आईकार्ड नहीं होते थे और मोहल्ले के चुनाव एजेंट ही मतदाताओं की पहचान के लिए रखे जाते थे जो फर्जी वोटर तो चैलेंज करते थे कि पड़ोसी का नाम बताओ या उससे कहलाओ या चलो घर दिखाओ)। तब उस क्षेत्र में भाजपा सिर्फ 126 वोट से जीती थी। शाम को मतदान के बाद मेरी पार्टी का कोई भी नेता (बड़ा नहीं, छोटा भी) नहीं था और चुनाव अधिकारी ने मुझे अकेले निकलने नहीं दिया। कुछ लोगों को मेरे साथ घर जाने के लिए कहा था। इस विधायक के नेतृत्व में जमशेदपुर में रामनवमी का जुलूस निकला और दंगा हो गया। उसके बाद कई साल तक चुनाव और राजनीति, पार्टी से दूर रहा। जनसत्ता आने से पहले जमशेदपुर (पूर्व) से चुनाव में राजीव गांधी के एक मित्र दरायुस नरीमन कांग्रेस उम्मीदवार थे। मुझे याद नहीं है वे खुद, उनकी पत्नी या दोनों घर आए थे और मां से चुनाव में काम करने के लिए कहा था। मां चुनाव में काफी सक्रिय रहीं। तब मैं प्रेस चलाता था। इसलिए चुनाव में मेरी कोई भागीदारी नहीं रही। नरीमन चुनाव जीत गए – दिल्ली में मेरी एक-दो बार उनसे मुलाकात हुई। चुनाव जीतने के तुरंत बाद उनकी नौकरानी ने उनपर बलात्कार का आरोप लगाया (जिसका उन्होंने खंडन किया था, मुझसे निजी बातचीत में भी यही कहा जो मुझे कहीं लिखना नहीं था) और संयोग से यह जनसत्ता में विस्तार से छपा था। वो जनसत्ता से नाराज थे ही। मैं फिर उनसे मिलने नहीं गया। उन्होंने राजनीति छोड़ दी। मैंने उनसे मिलना छोड़ दिया। राजनीति से मेरा इतना ही संबंध है। वामपंथ से मेरा ऐसा कोई अस्थायी संबंध भी नहीं रहा।

सवालः हिंदी पत्रकारिता को लेकर बहुत चिंता है आपको मन में। पर क्या कोई सुझाव भी है जिससे इसकी स्थिति में सुधार हो।

जवाब : बहुत हैं। पर मैं यह दावा नहीं करूंगा कि मुझे मौका मिले तो मैं कुछ नया, अनूठा कर सकता हूं। मेरा मानना है कि जागरण के मालिक संजय गुप्ता या एक्सप्रेस के मौजूदा मालिक अनंत गोयनका या ऐसा ही कोई नया उद्यमी (जो मीडिया में है और कुछ नया करना चाहता है) एसपी सिंह या एमजे अकबर या उदयन शर्मा जैसा कोई युवा संपादक ढूंढ़ पाए और अखबार से शुरू के पांच साल मुनाफे की उम्मीद न करें तभी कुछ हिन्दी में अच्छा और नया किया जा सकता है।

सवालः आपकी नजर में दिल्ली में आप सबसे बेहतर हिंदी अखबार किसे मानते हैं।

जवाब : मेरे घर पर नवोदय टाइम्स आता है। अखबार नियमित लेने के लिए आकलन का जो तरीका हो सकता है और घर में आते रहने का जो पैमाना हो सकता है – उनके हिसाब से यही सर्वश्रेष्ठ है। लेकिन मानक से बहुत नीचे। बहुत ही कमजोर टीम का तैयार किया लगता है।

सवालः आजकल कुछ पत्रकार बीजेपी के हैं, कुछ कांग्रेस बांकी बचे लेफ्ट। जमकर चमचागीरी सरकार की करते हैं मीडिया संस्थान। क्या आपके समय में भी चमचागीरी होती थी। हालांकि आपने किताब जिक्र किया है मुलायम सिंह द्वारा कुछ लाभ देने का। 

जवाब : हां। खूब होता था। एक्सप्रेस की हड़ताल का भी जिक्र है। तब अरुण शौरी ने आरोप लगाया था कि एक्सप्रेस में हड़ताल सरकार या कांग्रेस की वजह से हुई। हड़ताल के विरोध में विपक्ष के तमाम नेता आए जब हमलोग अस्पताल में थे तो देखने आने वालों में भाजपा के ही नेता ज्यादा थे। मुझे दो नाम याद आ रहे हैं – विजया राजे सिंधिया और अरुण जेटली। हम जिस नर्सिंग होम में थे उसके मालिक के भाजपा से संबंध तब जग जाहिर थे। इन तथ्यों के आलोक में अब तो यही लगता है कि एक्सप्रेस भाजपा समर्थक अखबार था। पर कह सकता हूं कि समर्थन जरूर था चमचागीरी कहीं नहीं थी। हड़ताल में हमलोगों की पिटाई हुई तो टाइम्स के गिरिलाल जैन ने लिखा कि पत्रकार क्यों गए थे अखबार लोड कराने। यह पत्रकारों का काम नहीं है – इस तरह उन्होंने हमारा या एक्सप्रेस का विरोध किया था, यह सरकार का समर्थन भी हो सकता है। पर एक तर्क था, स्तर था। और प्रभाष जी ने उसका जवाब दिया। उसमें भी तर्क औऱ स्तर है। यह सब किताब में है। पर अब वह स्तर कहां है। मुलायम सिंह के मामले का जिक्र मैंने स्तर गिरना बताने के लिए ही किया है। मुलायम सिंह का इंटरव्यू चल रहा था उसमें जाहिर है किसी क्रिटिकल सवाल पर उन्होंने कहा होगा कि मैंने प्लॉट भी तो दिया है … (नोएडा का प्लॉट जहां अब पूरा का पूरा मीडिया केंद्र है)। मेरा मानना है कि उसे एडिट किया जाना चाहिए था। पर चूंकि लगभग सभी मीडिया संस्थान को प्लॉट दिए गए थे इसलिए उसे खास लाभ नहीं माना गया होगा। और वह दिखाया गया।

 

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