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गंदा बूढ़ा आदमी दरअसल पूरा गंदा नहीं था

खुशवंत सिंह
खुशवंत सिंह एक समारोह में किसी महिला से बात करते हुए।

एडीटर अटैक- प्रशांत राजावत

….. डर्टी ओल्ड मैन जी हां हम बात कर रहे हैं प्रसिद्ध पत्रकार व लेखक खुशवंत सिंह की। खुशवंत सिंह को एक तबका डर्टी ओल्ड मैन नाम से भी जानता समझता है। हम इसी पर आज चर्चा करेंगे कि आखिर देश के प्रख्यात पत्रकार खुशवंत सिहं डर्टी ओल्ड मैन की छवि में कैसे कैद हुए, उन्हें ये नाम क्यों मिला।

अतीत में थोड़ा ले चलते हैं खुशवंत सिंह मूलरूप से हदाली पंजाब में पैदा हुए जो अब पाकिस्तान का हिस्सा है। लंदन से बैरिस्टर की पढ़ाई की। लाहौर में वकालत की, दिल्ली में भी वकालत की। पर उन्हें लगा ये उनके रुचि का क्षेत्र नहीं और उनका रुझान पत्रकारिता की ओर हुआ और ऐसे उन्होंने पत्रकारिता में कदम रखा। स्टेट्स मैन, हिंदुस्तान टॉइम्स का हिस्सा रहे औऱ तमाम बड़े अंग्रेजी अखबारों का। खुशवंत सिंह रईसों के रईस और दिलदार आदमी हैं। पैदाइशी रईस थे। दिल्ली के प्रसिद्ध उद्योगपति के बेटे थे और उनके पिता की कम्पनी में 6 हजार से ज्यादा कर्मचारी काम करते थे। कई बड़े बड़े बंगले खुशवंत सिंह के पास थे। कुछ पर तो अब सरकारी भवन चल रहे हैं। लुटियन जोन्स की ईमारतों का निर्माण खुशवंत सिंह के पिता ने ही करवाया था।

खुशवंत के रसूख की बात करें तो बीते जमाने से लेकर जबतक वो जीवित रहे बॉलीवुड, राजनीति, खेल, उद्योग जगत की बड़ी हस्तियां उनके महफिल का हिस्सा थीं।

राजमता गायत्री देवी से लेकर इंद्रा गांधी, मधुबाला से लेकर राजेश खन्ना उनके शागिर्द थे। खुशवंत सिंह सक्रिय पत्रकारिता से सन्यास लेने के बाद पत्र पत्रिकाओं में स्तंभ लिखते थे। एक बार उन्होंने अपने स्तंभ में मोहल्ले की रोड निर्माण को लेकर चिंता की तो सीधे प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने संज्ञान लेकर उसका सुधार करवाया। हालांकि मनमोहन सिंह उनके करीबी मित्र थे। दरअसल खुशवंत सिंह का मित्र होना किसी के लिए भी गर्व की बात थी।

एक बार का वाकया है कि राजेश खन्ना खुशवंत सिंह से मिलने उनके घर गए। दरवाजे पर घंटी बजाई तो नौकर बाहर निकला बोला क्या काम है। राजेश खन्ना बोले कि सिंह साहब से मिलना है। नौकर अंदर गया खुशवंत सिंह के पास बाहर आया तो बोला कि खुशवंत जी इस समय किसी से नहीं मिलते आप लेट हो गए। आप सोचिए सुपर स्टार राजेश खन्ना किसी के दरवाजे खड़ा हो और मिलने का आग्रह करे और अंदर बैठा शख्स मना कर दे। ये खुशवंत सिंह की औकात थी और मिजाज भी।

खुशवंत सिंह ने समय तय कर रखा था और एक निश्चित समय के बाद वो किसी से नहीं मिलते थे, फिर वो राजेश खन्ना हों या देश का राष्ट्रपति, प्रधानमंत्री।

खुशवंत सिंह वही शख्स हैं जिन्होंने पदम पुरस्कार लेने से मना कर दिया था तो सरकार ने पुनः आग्रह करके कुछ सालों बाद सौंपा। जब कोई विदेशी पत्रकार या लेखक भारत आता किसी खोज या रिपोर्ट के लिए तो वो सबसे पहले खुशवंत सिंह से मिलना चाहता, क्योंकि खुशवंत सिंह से ज्यादा प्रमाणिक जानकारी भारतीय राजनीति, पत्रकारिता के बारे में शायद ही कोई दे पाता।

शबाब औऱ शराब के शौकीन मस्तमौला खुशवंत सिंह ने कभी कुछ छिपाया नहीं। 85 की उम्र में जब उनसे एक पत्रकार ने पूछा कि आप किस बात की कमी इस उम्र में महसूस करते हैं तो उन्होंने कहा कि शरीर बूढ़ा है आंख तो बदमाश है अब भी। उन्होंने कहा कि वो इस उम्र ने आसक्रीम और सैक्स को मिस करते हैं। खुशवंत सिंह के इसी बेबाकपन ने उनको ओल्ड डर्टी मैन यानी गंदा बूढ़ा आदमी की छवि में पेश किया।

खुशवंत सिंह से जब बीबीसी ने पूछा कि आप अपनी डर्टी ओल्ड मैन की छवि के बारे में क्या कहेंगे। तो उन्होंने साफ कहा था कि हां मैं किसी सीमा में बंधकर नहीं रहता जो मन में है बगैर समाज की चिंता किए बगैर बोलता हूं। फिर वो सेक्स की बात हो या खूबसूरत लड़कियों की। खुशवंत कहते थे हां मैं सेक्स पर खुले विचार रखता हूं और मेरे इर्द गिर्द मेरे घर में खूबसूरत लड़कियों का जमावड़ा रहता है। अब जिन्हें ओल्ड डर्टी मैन बोलना है बोलता रहे। मुझे कोई फर्क नहीं पड़ता।

खुशवंत सिंह कहते थे कि जब वो लुटियन जोन्स की इमारतों के गुंबदों को देखते हैं तो महिलाओं के स्तनों की याद आती है। मस्तमौला खुशवंत कुछ भी बोलते, कुछ भी कहते। उन्हें कोई फर्क नहीं पड़ता कोई क्या सोचेगा। वो सेक्स पर बोलते, तो कभी लड़कियों पर लेकिन इसके बाद भी उनके चाहने वालों की देश विदेश में कोई कमी न थी। देश के दिग्गज लोग उनके जबरदस्त कायल थे। इसका मतलब है अभिव्यक्ति और विचार बहिष्कार का कारण नहीं होते।

खुशवंत परम विद्वान थे, प्रसिद्ध लेखक औऱ पत्रकार थे। वो जब भी बोलते स्वयं के बारे में बोलते किसी व्यक्ति या संस्था के खिलाफ वो विवादित बोल बोलने से सदैव बचते। खुशवंत कहते थे कि वो शराब के बिना नहीं रह सकते, वो ये भी कहते थे कि वो किसी धर्म को नहीं मानते किसी मजहब को नहीं मानते, पर जब उन्हें किसी धर्म की ओर से सम्मानित किया जाता तो वो सम्मान स्वीकार भी कर लेते। कहते किसी का दिल नहीं दुखाऊंगा। 20 मार्च 2014 को उनका निधन हो गया था।

ट्रेन टू पाकिस्तान औऱ कंपनी ऑफ वूमन जैसी लोकप्रिय किताब उन्होंने ही रची हैं। खुशवंत तीन चीजों के विशेष प्रेमी थे दिल्ली, लेखन औऱ खूबसूरत महिलाएं। वो खुद को दिल्ली का सबसे दिलफेंक और यारबाज बूढ़ा मानते थे।

  • एडीटर अटैक मीडिया मिरर सम्पादक का नियमित कॉलम है।
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