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राष्ट्रवादी पत्रकारिता के ठेकेदार सिर्फ संघी पत्रकार ही नहीं

पत्रकारिता व मीडिया
पत्रकारिता व मीडिया

-एडीटर अटैक- 

 

प्रशांत राजावतः सम्पादक मीडिया मिरर व शोधार्थी महात्मा गांधी चित्रकूट ग्रामोदय विश्वविद्यालय चित्रकूट सतना म.प्र., 

सम्पर्कः (mediamirror.in@gmail.com)

 

 ,,हिंदी पत्रकारिता की कहानी भारतीय राष्ट्रीयता यानि राष्ट्रवाद की कहानी है। दरअसल पत्रकारिता का स्वरूप ही राष्ट्रवादी है। पत्रकारिता का उदय ही राष्ट्रवाद को प्रखर करने के उद्देश्य से हुआ था। अब आप चाहें तो इसे शाब्दिक रूप से एक शब्द संरचना में बांध सकते हैं कि राष्ट्रवादी पत्रकारिता। वरना पत्रकारिता शब्द स्वयं राष्ट्रवाद का बिम्ब है छाया है। आप पत्रकारिता को राष्ट्रवाद से अलग करके नहीं देख सकते,,

 

 

——– पत्रकारिता और राष्ट्रवाद परस्पर एक दूसरे के पूरक ही माने जा सकते हैं। दोनों का उद्देश्य जनमत निर्माण ही है। पत्रकारिता अतीत से लेकर वर्तमान तक राष्ट्रवाद को प्रबल बनाने का कार्य करती रही है, कुछेक अपवादों को छोड़ दें। पत्रकारिता का यही नैतिक धर्म भी है। आजादी के ठीक बाद पंडित दीनदयाल उपाध्याय, मदन मोहन मालवीय, अटल बिहारी वाजपेयी आदि ने राष्ट्रवादी पत्रकारिता से जो प्रकाश पुंज प्रकट किया था उसका उजियाला राष्ट्र निर्माण औऱ विकास में कितनी तेजी से फैला है ये किसी से छिपा नहीं।

राष्ट्रवादी पत्रकारिता के प्रमुख ध्वजा वाहक पंडित दीनदयाल उपाध्याय ने 1947 में राष्ट्रधर्म प्रकाशन लिमिटेड की स्थापना की थी जिसका उद्देश्य ही राष्ट्रवादी पत्रकारिता को विस्तार देना था। इसी प्रकाशन के अधीन स्वदेश, राष्ट्रधर्म, पांचजन्य प्रकाशित हुए। जो आज भी हिंदूराष्ट्र की प्रखर आवाज बने हुए हैं।

जब जब राष्ट्रवादी पत्रकारिता की बात होती है तो सुनने में थोड़ा अलग थलग लगता है कि पत्रकारिता के भी प्रकार हो सकते हैं। अब निश्चित है अगर पत्रकारिता को राष्ट्रवादी पत्रकारिता के रूप में इंगित करेंगे तो फिर गैर राष्ट्रवादी पत्रकारिता भी होगी। दोनों को समझने की आवश्यक्ता है, दोनों की प्रासंगिकता पर विमर्श की आवश्यक्ता है। दोनों किस्म की पत्रकारिता की उत्पत्ति के पीछे क्या कारण रहे ये भी जानना होगा। तभी हम राष्ट्रवादी पत्रकारिता के मर्म को समझ व जान पाएंगे।

राष्ट्रवादी पत्रकारिता के मर्म को जानने के लिए भारतीय पत्रकारिता के इतिहास की ओर चलते हैं। हिंदी पत्रकारिता की कहानी भारतीय राष्ट्रीयता यानि राष्ट्रवाद की कहानी है। अठारहवीं शताब्दी यानि भारत में आधुनिक ढंग की पत्रकारिता का उदय। कलकत्ता, बम्बई और मद्रास इन शहरों में कलकत्ता गजट, उदंत मार्तण्ड का प्रारंभ। फिर 1810 में मौलवी इकराम ने कलकत्ता से हिंदोस्तानी, पादरियों ने समाचार दर्पण, बंगला में समाचार चंद्रिका, संवाद कौमुदी, फारसी में जामे जहांनुमा और शमशुल अखबार तथा गुजराती के मुंबई समाचार आदि आए।

इन तमाम समाचार पत्रों की उत्पत्ति का कारण जानेंगे तो राष्ट्रवादी पत्रकारिता की सुगंध पहले आने लगेगी। भारतीय पत्रकारिता के ये संक्षिप्त संदर्भ देने का आशय यही था कि दरअसल पत्रकारिता का स्वरूप ही राष्ट्रवादी है। पत्रकारिता का उदय ही राष्ट्रवाद को प्रखर करने के उद्देश्य से हुआ। अब आप चाहें तो इसे शाब्दिक रूप से एक शब्द संरचना में बांध सकते हैं कि राष्ट्रवादी पत्रकारिता। वरना पत्रकारिता शब्द स्वयं राष्ट्रवाद का बिम्ब है छाया है। आप पत्रकारिता को राष्ट्रवाद से अलग करके नहीं देख सकते। पत्रकारिता का मतलब जन चेतना, जनमत निर्माण, राष्ट्र विकास, राष्ट्रवाद ही है। राजा मोहन राय, महात्मा गांधी, मदन मोहन मालवीय फिर कालांतर में स्वतंत्रता पश्चात दीन दयाल उपाध्याय, अटल बिहारी वाजपेयी, राजीव लोचन अग्निहोत्री, महेंद्र कुलश्रेष्ठ, गिरीश चंद्र मिश्र, वचनेश त्रिपाठी घोषित रूप से राष्ट्रवादी पत्रकारिता के अगुवा बने रहे।

चूंकि राष्ट्रवादी पत्रकारिता के आधार स्तंभ पत्रकार स्वतंत्रता के बाद घोषित रूप से हिंदू संगठनों के प्रभाव में रहे तो इनको वैचारिक पत्रकारिता से जोड़कर देखा जाने लगा। ऐसा माने जाने लगा कि राष्ट्रवादी पत्रकारिता का दम भरने वाले पत्रकार एक सोच विशेष, एक कौम विशेष (हिंदू), एक धर्म विशेष के लिए कार्यरत हैं। जबकि राष्ट्र का हिस्सा तो हर वो कौम, जाति, वर्ग, धर्म है जो हमारे देश में है। चाहे वो हिंदू, मुसलमान, सिक्ख ईसाई या पारसी हों।

अगर राष्ट्रवादी पत्रकारिता की बात होगी तो उसे आप जाति, वर्ग, धर्म, मजहब, कौम के नाम पर बांट नहीं सकते। राष्ट्रवादी पत्रकारिता राष्ट्र के हित के लिए कार्य करने के उद्देश्य के लिए होनी चाहिए न कि एक धर्म व कौम विशेष के लिए। जब राष्ट्रवादी पत्रकारिता पर ऐसे धब्बे लगने लगे, तबसे राष्ट्रवादी पत्रकारिता पर उंगली उठने लगी। और अपने अपने तरीके से चिंतन मंथन होने लगा कि वाकई राष्ट्रवादी पत्रकारिता है क्या, होनी क्या चाहिए। इसे नए नए तरीके से परिभाषित किया जाने लगा। औऱ मूल राष्ट्रवादी पत्रकारिता आरोपों के घेरे में आ गई।

पत्रकारिता का ही एक धड़ा है जो आज भी इस पक्ष में नहीं है पत्रकारिता को किसी उपनाम (राष्ट्रवादी) के साथ जोड़कर कहने की जरूरत है। क्योंकि पत्रकारिता का ध्येय राष्ट्रवाद ही है। पत्रकारिता का उदय राष्ट्रहित के लिए हुआ था, चाहे गणेश शंकर विद्यार्थी हों या महात्मा गाधी, पंडित मालवीय सभी ने जनमत निर्माण और देश की अखंडता और एकता की रक्षा के लिए पत्रकारिता का प्रारंभ किया। हां ये और बात है समय के साथ हर रोज बदलती पत्रकारिता वर्तमान में राष्ट्रवादी पत्रकारिता से इतर व्यावसायिक पत्रकारिता हो गई है इसमें कोई शक नहीं है।

चूंकि वर्तमान में पत्रकारिता अब अतीत की भांति राष्ट्रहित के लिए संकल्पित न होकर व्यापार के लिए बाजार के अनुरूप सजी धजी है तो हम राष्ट्रवादी पत्रकारिता को वर्तमान परिप्रेक्ष्य से जोड़े तो निराशा ही हाथ लगेगी। इतना ही नहीं अगर घोषित रूप से आप राष्ट्रवादी पत्रकारिता करने की बात करते हैं तो आपको पत्रकारिता जगत ही संकीर्ण विचारधारा से प्रभावित मान बैठेगा या मान लेता है।

जैसे कुछ समाचार पत्र, पत्रिकाएं, न्यूज चैनल अगर राष्ट्रवादी पत्रकारिता करने की बात कहते हैं तो जनता तो बाद की बात है पत्रकारिता का एक धड़ा ऐसे संस्थानों पर एक पक्षीय पत्रकारिता करने का आरोप लगाता है और मानता है कि ऐसे मीडिया संस्थान धार्मिक भावनाएं, जातीय भावनाएं भड़काकर देश में धार्मिक और जातीय असंतुलन पैदा करने की फिराक में रहते हैं।

वर्तमान परिप्रेक्ष्य में देखे तो धर्मनिरपेक्ष राष्ट्र में राष्ट्रवादी पत्रकारिता ही अब एक आरोप या कुंठित कार्य जैसी मानी जा चुकी है। राष्ट्रवादी पत्रकारिता पर ये प्रहार चिंतनीय और निंदनीय है। दरअसल थोड़ा बारीकी से समझना होगा। राष्ट्रवादी पत्रकारिता के लिए जो साथी एक तयशुदा पक्षपात की परिभाषा गढ़ चुके हैं वो और वो पत्रकार या संस्थान जो राष्ट्रवादी पत्रकारिता के झंडाबदार हैं दोनों को राष्ट्रवादी पत्रकारिता के ध्येय को समझना होगा, शायद तब राष्ट्रवादी पत्रकारिता वर्तमान में भी अतीत की तरह अलौकिक होकर किसी अवांछित और तथाकथित आरोपों से मुक्त हो पाए।

राष्ट्रवादी पत्रकारिता को वर्तमान में जो पक्षपात पूर्ण नजरों से देखते हैं उन्हें व्यापक परिदृश्य में समझना होगा। दरअसल राष्ट्रवादी पत्रकारिता की जब बात होती है हिंदू संगठनों के अधीन या संरक्षण में चल रहे समचार पत्र या चैनल ही क्यों ध्यान में आते हैं। पांच्यजन्य, स्वदेश, सुदर्शन। मतलब सीधा सा कि आरएसएस से जुड़े मीडिया संस्थान ही क्यों राष्ट्रवादी पत्रकारिता के कारक माने जाते हैं और बने हुए हैं। अभी इन मिडिया संस्थानों की कार्यशैली पर कोई टिप्पणी नहीं करूंगा पर क्या राष्ट्रवादी पत्रकारिता का ठेका या कहें दूसरे लहजे में जिम्मेदारी सिर्फ इन्ही मीडिया संस्थानों की है जो मुट्ठी भर हैं और सक्रिय मीडिया (मतलब ज्यादा प्रचार प्रसार से दूर) का हिस्सा नहीं। हम एक पाठक के रूप में इन मीडिया संस्थानों को हेय नजरों से क्यो देखते हैं क्योंकि ये गला फाड़ फाड़कर कह रहे हैं कि ये राष्ट्रवादी पत्रकारिता कर रहे हैं, इसलिए। या ये एक पक्षीय हैं।

क्या राष्ट्रवादी पत्रकारिता हरएक मीडिया संस्थान का उद्देश्य नहीं होना चाहिए। देश के प्रमुख अखबारों, पत्रिकाओं और चैनलों को क्या राष्ट्रवादी पत्रकारिता नहीं करना चाहिए। और ऐसा नहीं है कि राष्ट्रवादी पत्रकारिता हो नहीं रही है इन बड़े मीडिया संस्थाओं में। बस उसको समझने का फेर है। राष्ट्रवादी पत्रकारिता को वर्तमान में जिस सुनियोजित ढांचे में लोग जान समझ रहे हैं वो घातक है। दरअसल कोई भी ऐसी खबर, रिपोर्ट, खुलासा, सामग्री, तस्वीर जिससे देश का हित हो, देश के नागरिकों का हित हो वही राष्ट्रवादी पत्रकारिता है। इसमें एकपक्षीय और दोपक्षीय जैसी कोई बात नहीं। थोड़ी देर के लिए कुछ स्वघोषित उन मीडिया संस्थानों को अलग कर दें जो राषट्रवादी पत्रकारिता करने की बात करते हैं और हम सब उन्हें एक पक्षीय पत्रकारिता करने के आरोपी के रूप में देखते या समझते हैं।

पर व्यापक परिदृश्य में देखें तो तब तो आप समझेंगे कि वर्तमान परिप्रेक्ष्य में राष्ट्रवादी पत्रकारिता की नितांत आवश्यकता है। जिससे व्यावसायिक होता मीडिया दूरी बनाता जा रहा है।

राष्ट्रवादी पत्रकारिता बनाम पत्रकारिता मानकों का हननः

वर्तमान में राष्ट्रवादी पत्रकारिता को लेकर एक पशोपेश की स्थिति बनी हुई है। बहस और द्वंद इस बात को लेकर है कि क्या राष्ट्रवादी पत्रकारिता की धारणा को आधार मानते हुए कोई पत्रकार निष्पक्ष पत्रकारिता कर सकता है।

यहां पहले वरिष्ठ टीवी पत्रकार रवीश कुमार के इस कथन को पहले समझना होगाः-

क्या राष्ट्रवाद पत्रकारिता में दिखना चाहिएः कश्मीर की हिंसा के कवरेज को राष्ट्रहित, देशहित, एकता, अखंडता के नाम से परखा जा रहा है। जेएनयू के समय भी राष्ट्रवाद उभरा था। कैराना में फर्जी खबर के दम पर इसी मीडिया ने वहां कश्मीर तक पैदा कर दिया था। वही मीडिया अब कश्मीर में राष्ट्रवाद का ढोल पीट रहा है। कश्मीर में आतंकवाद, झारखंड में नक्सलवाद और पूर्वोत्तर भारत में उग्रवाद इन तीनों जगहों के कवरेज करते समय एक पत्रकार की दुविधा क्या होती होगी। वो अपनी खबरों को किस पैमाने से देखता होगा। सुरक्षा बलों के जवान भी शहीद होते हैं, आम लोग भी मारे जाते हैं और बागी उग्रवादी भी मारे जाते हैं। अब एक का कवरेज हो या तीनों का।

एक स्थिति है कि पत्रकार सैनिकों के साथ बंकर से रिपोर्टिंग करें, जवानों की बंदूक किस तरफ है आपको वही दिखे, जाहिर है पक्ष सुरक्षा बलों का ही ज्यादा होगा। दूसरी स्थिति है कि पत्रकार उस तरफ से कवरेज करें जहां सुरक्षा बलों की गोली चल रही हो, लोग सुरक्षाबलों पर पत्थर मार रहे हों ऐसे में आपको सिर्फ लोग दिखेंगे, सुरक्षा बल नहीं। तीसरी स्थिति है कि पत्रकार कहीं बीच में हों और दोनो तरफ घट रही घटनाओं की अधिक से अधिक जानकारी दें।

आप बताएं इनमे से कौन सी स्थिति बेहतर है। अगर दूसरी और तीसरी स्थिति बंद कर दी जाए तो क्या आप पूरी तस्वीर जान पाएंगे। आपको यह भी पूछना होगा कि आप जानना क्या चाहते हैं। हर तरह की सूचना या सिर्फ एक तरह की सूचना। एक तरह की सूचना आपको सक्षम नागरिक बनाती है या हर तरह की सूचना आपको सक्षम नागरिक बनाती है।

पत्रकार क्या करे। राष्ट्रवाद की जो आपकी समझ है उसके हिसाब से रिपोर्टिंग करे, राष्ट्रवादी पत्रकारिता करे या घटना के हर पक्ष की बात रखे। इस क्रम में वो ज्यादतियां भी करता है, बदमाशियां भी करता है, यह बात ध्यान में है, लेकिन राष्ट्रवाद की कौन सी बंदिश उस पर लागू हो…। क्या हम और आप स्पष्ट हैं। सेना और सरकार का पक्ष अंतिम है, इसकी छूट मीडिया हर मामले में लेने लगे तो दर्शको का क्या होगा…। सोचा है कभी।

 

रवीश कुमार के कथन का विश्लेषणः रवीश कुमार जिस पत्रकारिता की बात कर रहे हैं यकीनन वो मानक पत्रकारिता कही जा सकती है। इसमे कोई संदेह नहीं। क्योंकि पत्रकारिता में आप किसी एक पक्ष की बात नहीं कर सकते और आपको सभी पक्ष साथ में लेकर खबरें करना होंगी। मतलब आप पीडित का पक्ष रखेंगे तो आरोपी का पक्ष भी जानना और रखना आदर्श पत्रकारिता का धर्म है और रवीश इसी की बात कर रहे हैं। पर उनका निष्पक्ष पत्रकारिता में राष्ट्रवाद को अवरोध मानना एक समझ का फेर है। क्योंकि राष्ट्रवाद या राष्ट्रवादी पत्रकारिता का आशय ये बिल्कुल नहीं है कि आप नैतिक पत्रकारिता न करें। राष्ट्रवादी पत्रकारिता भी निष्पक्ष और पारदर्शी पत्रकारिता की वाहक है। दरअसल राष्ट्रवादी पत्रकारिता की अबतक कोई तयशुदा परिभाषा नहीं है या है भी तो वो हर व्यक्ति के हिसाब से अलग अलग है। वर्तमान परिप्रेक्ष्य में राष्ट्रवादी पत्रकारिता की एक नई और आदर्श परिभाषा गढ़ने की आवश्यक्ता है। ताकि लोग राष्ट्रवादी पत्रकारिता को एक पक्षीय या अनैतिक पत्रकारिता या पत्रकिरता मानकों का हनन करने वाली न समझें।

ऱाष्ट्रवादी पत्रकारिता या राष्ट्रवाद किसी पत्रकार पर ये मानसिक दबाव नहीं बनाता कि आप पत्रकारिता मूल्यों को ताक में रखकर रिपोर्टिंग करें क्योंकि आरोपी पक्ष देशहित के लिए समर्पित या कार्यरत है। राष्ट्रवादी पत्रकारिता या पत्रकारिता में विभेद जैसी कोई बात नहीं। ठीक है भारतीय सेना पर कोई आरोप हैं राष्ट्रवादी पत्रकारिता से प्रभावित पत्रकार उन्हें बचाने की कोशिश करेगा या उस पक्ष को नहीं रखेगा जिसमें सेना पर लांछन लगे, जबकि आरोप सच हों। यहां सिर्फ इसलिए पत्रकार ऐसा करे या करता होगा क्योंकि सेना राष्ट्रहित में लगी है। इसको ऐसे समझें, देश में हो रहे भ्रष्टाचार, अत्याचारों, दंगों में अगर देश के ही नागरिक संलिप्त हैं तो फिर तो राष्ट्रवादी पत्रकारिता यहां भी निष्पक्ष खबरें प्रस्तुत करने में आड़े आएगी, क्योंकि राष्ट्र के नागरिकों की कमियों को उजागर करना भी राष्ट्रवाद या राष्ट्रवादी पत्रकारिता के खिलाफ जाना ही है।

पर ऐसा बिल्कुल नही है। यही समझने की जरूरत है राष्ट्रवादी पत्रकारिता में ऐसी कोई नीति नहीं है कि आप पारदर्शी पत्रकारिता न करें, जो रवीश कुमार अपने तरीके से कह और समझ रहे हैं।

कसाब पकड़ा जाता है, मीडिया ने कसाब के आतंकी कारनामों को छापा तो वहीं उसकी उन अपीलों को भी सामने रखा जिसमें उसने खुद को मासूम व निर्दोष बताया, कसाब के पिता का भी पक्ष रखा। आतंकी अफजल गुरू को लगातार मीडिया ने राष्ट्रवाद के खिलाफ खड़ा होने वाला घोर आतंकी करार दिया तो वहीं अफजल के बेटे के परीक्षा में बेहतर प्रदर्शन करने पर उतनी ही साफगोई से प्रकाशित किया जैसे सभी बच्चों को स्थान मिलता है। यही राष्ट्रवादी पत्रकारिता है और ऐसा नहीं है कि वर्तमान समय में राष्ट्रवादी पत्रकारिता नहीं हो रही है। हर दिन हर रोज हर मीडिया संस्थान देशहित से जुड़े विषयों पर चर्चा करते हैं, खबरें करते हैं ये राष्ट्रवादी पत्रकारिता ही है। बस राष्ट्रवादी पत्रकारिता को एक ढांचे से बाहर निकालना होगा। सेना में हो रहे भ्रष्टाचार को भी मीडिया ने सामने रखा तो पुलिसिया तंत्र पर भी सवाल उठाए। अफस्पा प्रभावित क्षेत्रों में सेना द्वारा की गई बर्बरता पर भी खबरें की। और ये राष्ट्रवादी पत्रकारिता के दायरे में ही है। आरोपी औऱ आरोप के पक्ष में राष्ट्रवादी पत्रकारिता कभी नहीं रही फिर बेशक वो आरोप राष्ट्र के नागरिकों पर ही क्यों न हों, सेना पर क्यों न हों।

वर्तमान परिप्रेक्ष्य में राष्ट्रवादी पत्रकारिता की नितांत आवश्यक्ता है और राष्ट्रवादी पत्रकारिता को व्यापक दृष्टि से समझने व देखने की जरूरत है। संकुचित मानसिकता को लेकर कुछ लोगों की गढ़ी हुई परिभाषा जिसमें हम सब राष्ट्रवादी पत्रकारिता को समझते आए हैं उससे बाहर निकलना होगा। यही नहीं ऱाष्ट्रवादी पत्रकारिता के नाम पर पक्षपात पूर्ण पत्रकारिता कर रहे पत्रकारों या अखबारों, चैनलों से भ्रमित होकर राष्ट्रवादी पत्रकारिता को देखना भी उचित नही होगा।

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