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पौने दो करोड़ के अनुबंध वाली हिंदी किताब भी गुम गई

रेखना मेरी जान उपन्यास के लेखक रत्नेश्वर सिंह अपनी किताब के साथ
रेखना मेरी जान उपन्यास के लेखक रत्नेश्वर सिंह अपनी किताब के साथ

एडीटर अटैक-प्रशांत राजावत

 

आशा है आपलोग ठीक होंगे। तो फिर शुरू किया जाए अपना अटैक। यानी एडीटर अटैक।

अच्छा ये बताइए रेखना मेरी जान क्या है। ये महज शब्द समूह है या किसी फिल्म या किताब का नाम। किसी जगह का नाम या कुछ और। कभी सुना है ये। …..

ओके। मैं बता देता हूं। रेखना मेरी जान एकदम नई नवेली किताब है। जिसका प्रकाशक है ब्लूवर्ड। हिंदी की किताब है। अब जब आपने किताब का नाम नहीं सुना तो लेखक को नहीं ही जानते होंगे। किताब के लेखक हैं रत्नेश्वर सिंह।

आगे बढ़ने से पहले बताते चलें कि रेखना मेरी जान के संदर्भ में दैनिक भास्कर की खबर कहती है कि हिंदी साहित्य में ऐसा पहली बार है जब किसी भारतीय प्रकाशक द्वारा लेखक को एक उपन्यास के लिए लगभग पौने 2 करोड़ रुपए की राशि का अनुबंध किया गया हो।

इस डील को किताब के प्रचार में भी खूब भुनाया गया। बाजार में किताब आने से पहले ही लेखक औऱ प्रकाशक ने किताब की विषयवस्तु से ज्यादा पौने 2 करोड़ वाली डील की चर्चा की। मीडिया ने भी डील को लेकर खबरें गढ़ीं। साथ ही लेखक ने ये भी बताया कि किताब की 10 लाख प्रतियां बेचने का लक्ष्य रखा गया है।

इन तमाम हथकंडों के बावजूद अब जबकि किताब प्रकाशित हो चुकी है। बाजार में है। पर इसको कौन पढ़ रहा और कौन जान रहा है। कहीं कोई चर्चा नहीं। न मीडिया में और न ही लेखकों औऱ पाठकों के बीच।

हालांकि साहित्य समीक्षक विनोद अनुपम ने पूर्व में ही रेखना मेरी जान के लिए एक दैनिक अखबार में लिखा था कि इस किताब को प्रकाशित होने से पूर्व ही सुर्खियां मिल रही हैं। पर उन्होंने यह भी लिखा था किताब के संदर्भ में कि किसी फिल्म को कितना भी बेहतर प्रमोट किया जाए पर सिनेमाघरों में चलाने के लिए बेहतर कहानी और अभिनय ही काम आता है। अनुपम ने आगे लिखा था कि रेखना मेरी जान को जिस तरह प्रचारित किया गया उसी तरह ये पाठकों के दिल में जगह बना पाती है ये देखना होगा।।

आगे बढ़ते हैं…

संक्षिप्त में बता दें कि किताब का मूल्य 225 रुपए है। ऑनलाइन भी उपलब्ध है। किताब में एक प्रेम कहानी है जो ग्लोबल वार्मिंग के समीकरणों के साथ आगे बढ़ती है।

मैं एक आम पाठक की तरह सोचता और समझता हूं। और पाता हूं कि अगर अबतक की सबसे ज्यादा धनराशि के अनुबंध वाली किताब की ये स्थिति है कि उसका नाम, उसके लेखक का नाम कोई नहीं जानता। एक अरब की आबादी में अगर एक लाख लोग जानते भी हैं तो मैं उन्हें गंभीरता से नहीं लेना चाहता। मैं ये भी बता दूं कि रेखना मेरी जान के लेखक पूर्व में किताब लिख चुके हैं जिन्हें बेस्ट सेलर का तमगा भी मिला। पटना पुस्तक मेले से भी जुड़े हैं। ऐसी स्थिति में इनको जानने वालों की जमात काफी लम्बी है। इनकी किताब रेखना मेरी जान को लोग खरीद रहे होंगे, कितने लोगों ने अब तक खरीदा ये तो लेखक या प्रकाशक ही बता सकते हैं। पर मैंने आम पाठक तो दूर की बात चुनिंदा लेखकों को छोड़ अबतक किसी के हाथ में ये किताब नहीं देखी। फर्जी प्रचार की बात औऱ है।

जिनके हाथ में किताब देखी बहुत संभव है उनको ये किताब उपहार स्वरूप प्रकाशक या लेखक द्वारा अवलोकन और समीक्षा के लिए भेजी गई हो।

हालांकि हिंदी राष्ट्र में हिंदी किताबें बर्चस्व खोती जा रही हैं ये जगजाहिर है। पर सवाल ये उठता है कि अगर किसी किताब के एवज में लेखक से इतनी बड़ी राशि के साथ डील की गई है और बावजूद किताब आम पाठकों से दूर है। इसका मतलब मेरी समझ में नहीं आता। तय बात है अगर प्रकाशक ने किताब के लेखक के साथ पौने दो करोड़ का अनुबंध किया है तो जरूर किताब में दम होगा। किताब की विषयवस्तु और शैली आला दर्जे की होगी। अगर वाकई किताब आला दर्जे की है तो फिर लोगों के हाथों में क्यों नहीं, लोगों की जुबान में क्यों नहीं। फेसबुक के पन्नों पर क्यों नहीं। मीडिया की सुर्खियों में क्यों नहीं।

कई सवाल हैं। क्या सच में पौने 2 करोड़ के अनुबंध की बात सच है या महज किताब को प्रचारित करने का एक फंडा। हो सकता है लेखक औऱ प्रकाशक के बीच आपसी सामंजस्य के बाद महज सस्ती लोकप्रियता के लिए ये बात उड़ाई गई हो। अगर ऐसा है तो घोर अपराध है ये साहित्य जगत में। और अगर अनुबंध की बात सच है तो किताब उच्चश्रेणी की होगी। एक और तथ्य। माना कि अनुबंध की बात सच है पर किताब ही प्रभावहीन है। तो इसका भी सीधा सा मतलब है कि प्रकाशक इतना बड़ा रिस्क कैसे ले सकता है। हालांकि प्रकाशक कोई गलती करे ये समझ नहीं आता।

चलिए इस पर भी मंथन कर लेते हैं कि सब सही है किताब भी बेहतरीन है, लेखक के साथ इतनी बड़ी डील की घोषणा भी सही है। तो क्या हिंदी का वर्तमान ही डांवाडोल है। ये मान लिया जाए।

अगर एक ठीक ठाक प्रचारित हिंदी लेखक की इतनी बेहतरीन और उच्च अनुबंध वाली किताब को पाठक नहीं मिल रहे हैं तो मान ही लिया जाए कि हिंदी लेखक पर्य़ावरण का नुक्सान बस कर रहे हैं। कागज पेड़ों की बलि देकर ही तो बनते हैं। फिर तो किताब छपवाने से बेहतर है पर्य़ावरण की रक्षा। आत्मसंतुष्टि के लिए अगर लिखना है तो ब्लॉग लिखिये-पेड़ बचाइए।

अंग्रेजी और हिंदी का द्वंद सदियों से रहा है। ये नया नहीं है। पर एक दौर था जब भारत में अंग्रेजी आज के जितनी समृद्ध नहीं थी और न ही मनोरंजन के आधुनिक साधन थे। तब हिंदी के उपन्यास, कहानी, कविता संग्रह खूब पढ़े जाते थे। हर युवा के तकिये के नीचे एक उपन्यास जरूर होता था। मैं दावे के साथ कह सकता हूं कि अगर मुंशी प्रेमचंद, दिनकर, बच्चन, पंत, फिर धर्मवीर भारती, फिर वेदप्रकाश शर्मा के जमाने में सूचना तकनीक और अंग्रेजी ज्ञान आज के जितना विस्तृत होता तो शायद उनको भी मशक्कत करनी पड़ती। वर्तमान में भारत का पूरा युवा पाठक अंग्रेजी साहित्य की दिशा में मुड़ गया है। जिसमें जहां मस्तमौला युवाओं के लिए चेतन, दुरोजय, रविंदर जैसे मसखरे लेखक मौजूद हैं वहीं गंभीर साहित्य प्रेमियों के लिए केएल्हो पाउलो, मो यान, इशिगेरो, मुराकामी जैसे अंतरराष्ट्रीय श्रेष्ठ लेखक मौजूद हैं। अमीष और देवदत्त पटनायक ने भी अंग्रेजी में एक खास किस्म का पाठक तैयार कर लिया है। आज का युवा किताबों के रूप में हल्का साहित्य नहीं पढ़ना चाहता।

ऐसा नहीं है कि हिंदी में श्रेष्ठ साहित्य नहीं रचा गया पर पारदर्शिता के साथ अध्ययन करें तो पाएंगे चाहे तकनीक हो, विज्ञान हो, फिल्म हो, साहित्य हो श्रेष्ठता के पैमाने पर हम अभी भी विदेशों से सौ साल पीछे हैं। साहित्य के नोबेल को ही देख लें। गीतांजलि के बाद हम आजतक साहित्य के नोबेल की बाट जोहते फिर रहे हैं। शायद ही कोई ही भविष्यवक्ता ये दावा कर पाए कि आगे सौ वर्षों में भी भारत से कोई साहित्य का नोबेल ले पाएगा। और उसमे भी हिंदी साहित्य में।

मुझे नहीं पता कि हिंदी साहित्य की दिशा औऱ दशा क्या होगी और क्या होनी चाहिए नए भारत में। पर जो स्थिति है भारत में हिंदी किताबों की वो गाल बजाने से ज्यादा कुछ नहीं। पिछले 5 वर्षों में प्रकाशित बेस्ट सेलर हिंदी किताबों की कुल प्रसार संख्या भी जोड़ेंगे तो आपको निराशा ही हाथ लगेगी। शायद ये संख्या विदेश की किसी बेस्ट सेलर किताब की आधी भी न हो।

हिंदी किताबें और साहित्य कैसे समृद्ध होगा जब नई पीढ़ी हिंदी के अक्षरों को, शब्दों को, शब्दकोशों को नहीं पहचानती। हिंदी में बात नहीं करती। हिंदी बोलने पर पब्लिक स्कूलों में फाइन का प्रावधान है। बावजूद मैं यही प्रार्थना करूंगा कि फिर कोई दिनकर, प्रेमचंद और रेणु पैदा हो। और टैब की जगह नए हिंदी लेखकों की किताबें युवाओं के बैग में पाई जाएं।

( एडीटर अटैक मीडिया मिरर सम्पादक का नियमित कॉलम है।)

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