Home > किताब चर्चा > अहा जिंदगी से आलोक का जाना…

अहा जिंदगी से आलोक का जाना…

अहा जिंदगी पत्रिका
अहा जिंदगी पत्रिका

-एडीटर अटैक-

— नमस्कार, आदाब, शब्बा खैर।

मैं प्रशांत राजावत। कैसे हैं आप लोग।

हम मुद्दे पर आएं इससे पहले अहा जिंदगी के बारे में संक्षेप में जान लीजिए। अहा जिंदगी दैनिक भास्कर समूह की हिंदी भाषा की मासिक पारिवारिक पत्रिका है। 12 राज्यों में इसकी मौजूदगी है। दैनिक भास्कर के अनुसार 2012 में ही ये पत्रिका 4 लाख पाठकों के बीच और 1.25 लाख कॉपी के साथ उपलब्ध थी। पत्रिका की नींव 2004 में पड़ी थी। संस्थापक सम्पादक थे यशवंत व्यास। इसका प्रकाशन जयपुर से लगातार होता रहा।

निवर्तमान सम्पादक आलोक श्रीवास्तव ने बतौर सम्पादक 2011 से अहा जिंदगी में आमद दी और हाल ही में सम्पादक पद से इस्तीफा दे दिया। प्रसिद्ध अनुवादिका रचना भोला यामिनी कहती हैं कि जो आकर्षण और खासियत एक दौर में धर्मयुग पत्रिका में थी वही अहा जिंदगी में नजर आती है।

हालांकि ये सच भी है कि दैनिक भास्कर समूह ने एक सकारात्मक सामग्री परोसने के लिहाज से इस पत्रिका को पाठकों के सामने बड़ी ही खूबसूरती से पेश किया और सफल भी रहे। 12 जनवरी 2009 को अहा जिंदगी पत्रिका को धर्मवीर भारती पुरस्कार दिया गया था। अहा जिंदगी आज लोगों की जिंदगी में सलीका भरने के लिए देशभर में लोकप्रिय है।

 

अब आगे…

 

मैं महिने में किसी एक दिन खाना नहीं खाता हूं। अहा जिंदगी खरीदने के लिए।

  • कृष्णाकांत, छात्र हंसराज कॉलेज दिल्ली

 

2 दिन पहले अहा जिंदगी के सहायक सम्पादक देवाशीष प्रसून ने फेसबुक पर घोषणा की कि सम्पादक आलोक श्रीवास्तव और उन्होंने अहा जिंदगी से इस्तीफा दे दिया है।

देवीशीष की इस घोषणा के बाद मुझे अहा जिंदगी की बरबस ही याद आई। अहा जिंदगी की सामग्री, सजावट, लोकप्रियता सबकुछ याद आया। देवाशीष की पोस्ट के प्रतिक्रिया डिब्बे में ही हंसराज कॉलेज के छात्र कृष्णकांत की टीप देखी जिसे ऊपर यहां दिया।

हो सकता है आपके लिए कृष्णकांत का बयान सामान्य बात हो पर मेरे लिए बिल्कुल नहीं। यही है दीवानगी। यही है प्रेम और अनन्य प्रशंसक होने का सबूत। अहा जिंदगी के लिए अगर कोई कहता कि वो एक दिन का भोजन छोड़ देता है उसके खरीदने के लिए। ये न सिर्फ अहा जिंदगी के लिए बल्कि निवर्तमान व पूर्व सम्पादक के लिए भी गर्व की बात है। आलोक जी को तो ये बयान मढ़ाकर रख लेना चाहिए। क्योंकि ये उनके कार्यकाल की उपज है।

मुझे भारतीय मीडिया जगत में किसी भी विधा में दूर दूर तक कोई ऐसी पत्रिका या पेपर नजर नहीं आता जो अहा जिंदगी के समतुल्य हो।

मैं 2011-12 में पीएचडी के लिए महात्मा गांधी ग्रामोदय विश्वविद्यालय में था। वहां जब एक छात्र को पता लगा कि मैं मीडिया से हूं तो वो पास आया औऱ बोला कि अहा जिंदगी मुझे बहुत पसंद है। मैं अपने जरूरी खर्चों में कटौती करके इसे जरूर खरीदता हूं। उस लड़के का नाम पवन शर्मा था जो अब दिल्ली के केंद्रीय विद्यालय में शिक्षक है।

यहां मैंने अहा जिंदगी के दो प्रशंसकों से आपको मिलवाया, पर सच तो ये है कि अहा जिंदगी को ऐसे ही सुधी पाठक मिले और वो भी एक खास वर्ग के। खासतौर पर शिक्षा, कला, संस्कृति, समाज, दर्शन, धर्म, साहित्य, इतिहास में किसी की दिलचस्पी हो और उसके हाथ अहा जिंदगी का कोई पुराना अंक भी लग जाए तो वो उसे शुरू से लेकर अंत तक पढ़ डालेगा।

मैं एक बार जयपुर यात्रा पर था अपने किसी दोस्त के यहां रुका था वो उसदिन कबाड़ बेच रहे थे घर का। पर मैं देख रहा था कि तमाम किताबें, अखबार, पत्रिकाएं कबाड़ में थीं पर अहा जिंदगी का हर अंक एक अलग जगह क्रमवार सुरक्षित था। मैंने पूछा इनको भी बेच दीजिए। तब वो बोले कि ये कबाड़ नहीं।

सच जिसने अहा जिंदगी पढ़ी वो इस बात को समझ सकता है।

अहा जिंदगी की जब बात हो तो आलोक श्रीवास्तव औऱ यशवंत व्यास की बात न हो तो मजा नहीं आएगा।

यशवंत ने अगर अहा जिंदगी को बनाया है तो आलोक श्रीवास्तव ने संवारा है। चूंकि निवर्तमान सम्पादक आलोक जी नवम्बर के बाद अहा जिंदगी के साथ नहीं होंगे तो ये देखने वाली बात होगी कि इस पत्रिका को कौन सम्पादित करेगा। निश्चित रूप से अहा जिंदगी की जिम्मेदारी जिन नए कंधों पर होगी उन कंधों पर सुनहरी विरासत को बचाने का जबरदस्त बोझ होगा।

निवर्तमान सम्पादक आलोक श्रीवास्तव की अहा जिंदगी पत्रिका के सम्पादक से इतर भी अपनी एक अलग मुकम्मल पहचान है। उनकी लम्बी कविताओं का मैं ही नहीं एक बड़ा समूह प्रशंसक है।

आलोक जी के बारे में मैंने कल कई लोगों से बात की जिन्होंने उनके साथ काम किया या उनसे जुड़े रहे। बातचीत के बाद जो पता लगा वो ये है कि आलोक मिजाजी आदमी हैं। पारदर्शिता के साथ काम करते हैं। अपने काम के साथ समझौता उन्हें पसंद नहीं। बगैर किसी दबाव के बेहतर कामकाज पेश करना उनकी फितरत है। अहा जिंदगी को भी उन्होंने प्रबंधन औऱ पत्रिका के लिए लिखने वाले लेखकों – पाठकों के दबाव से सदैव मुक्त रखा।

एक बार की घटना है। राजस्थान के एक वरिष्ठ पत्रकार आलोक जी के पास अपने एक नियमित स्तंभ के सिलसिले में गए। ये पत्रकार बोले कि वो चाहते हैं कि हर महीने उनका स्तंभ अहा जिंदगी में प्रकाशित हो। आलोक जी ने स्तंभ की रूपरेखा देखी औऱ बोले कि हम तीन महीने में एक बार दे सकते हैं। लेकिन इस बात से लेखक सहमत न हुए। फिर आलोक बोले कि 2 महीने में एक बार दे सकते हैं।

अंततः स्वीकृति बनी। मतलब सीधा सा ये है कि आलोक अपनी पत्रिका और अपने उद्देश्य को लेकर बिल्कुल स्पष्ट राय रखते थे। चूंकि अहा जिंदगी भारत की लोकप्रिय पत्रिकाओं में से एक है। तो हर लेखक चाहता है कि उसके लिए लिखे। ऐसे में कई बार ये हुआ कि आलोक जी को लेखक वर्ग से भी शीतयुद्ध करने पड़े। एक बार आलोक जी ने इस बात का खुलासा भी किया था कि साहित्य जगत के कुछ बड़े लोगों को लगता है कि मैं उनकी उपेक्षा करता हूं।

आलोक जी का ये सार्वजनिक कथन था। इसका सीधा सा आशय है कि आलोक रिश्ते बनाने के लिए नहीं बेहतर काम के भूखे थे।

आलोक जी के पुराने साथी विमल मिश्र ने मीडिया मिरर से कहा कि आलोक नवभारत टॉइम्स में उनके साथी रहे हैं। उनकी योग्यता तो निर्विवाद है ही, अन्याय उन्हें बर्दाश्त नहीं। कुल मिलाकर एक क्रांतिकारी व्यक्तित्व। वो जहां जाएंगे उसको चमका देंगे।

चूंकि ये आलोक प्रसंग है, पर मुझसे बहुत लोगों ने कहा कि जब अहा जिंदगी की बात हो तो यशवंत व्यास के योगदान को कतई नहीं भूलना चाहिए। कल ही किसी ने कहा कि यशवंत व्यास के कार्यकाल में ही अहा जिंदगी ने एक मुकाम पा लिया था। और सुखद ये रहा कि जिस मुकाम पर अहा जिंदगी को छोड़कर यशवंत गए थे आलोक जी ने न सिर्फ वो मुकाम पत्रिका के लिए बनाए रखा बल्कि वो अब जब खुद अहा जिंदगी से अलग हो रहे हैं तो ये पत्रिका देशभर में अपनी विशेष सामग्री और प्रस्तुतिकरण के लिए जानी जाती है।

पुरातन काल से एक प्रथा रही है उत्तराधिकारी की। उत्तराधिकारी की चिंता सदैव निवर्तमान शासक को रही है। ठीक वही परम्परा मीडिया में आज भी जीवंत है। पुराने सम्पादक के जाने के बाद न सिर्फ प्रबंधन को, संस्था के कर्मचारी को बल्कि पाठकों को भी ये चिंता सताती है कि नया उत्तराधिकारी (सम्पादक) कैसा होगा।

यशवंत के उत्तराधिकारी के रूप में आलोक एक श्रेष्ठ सम्पादक बनकर उभरे। अहा जिंदगी को एक नई पहचान दी, और लोकप्रियता दी। उनकी विदाई निश्चित ही धक्का है अहा जिंदगी के सुधी पाठकों के लिए। 2 दिन पहले जब देवीशीष ने आलोक व खुद के जाने की घोषणा की तो लोगों के ये भी सवाल थे कि क्या अहा जिंदगी बंद होने जा रही है। इसका सीधा सा मतलब है कि आलोक और अहा जिंदगी एक दूसरे के पर्य़ाय बन गए थे। मीडिया में सम्पादकों का जाना किसी बड़ी घटना की तरह नहीं देखा जाता। ये प्रक्रिया का हिस्सा है। पर मैं एक बार फिर कह दूं कि आलोक श्रीवास्तव का उत्तराधिकारी यानि अहा जिंदगी के नए सम्पादक को पीठ मजबूत करके कार्यक्षेत्र में उतरना होगा। अहा जिंदगी की लोकप्रियता, सफलता, सुधी पाठक इन सबको जस का तस बनाए रखना उसके लिए बहुत बड़ी बात होगी। सबसे खास बात ये है कि सरस सलिल (पता नहीं अब छप रही है या नहीं) में कोई आए कोई जाए फर्क नहीं पड़ता। उसका पाठक बस स्टैंड औऱ स्टेशन वाला है। पर अहा जिंदगी का पाठक कोई सामान्य पाठक नहीं है।

वरिष्ठ साहित्यकार, कलाकार, शिक्षा के क्षेत्र से जुड़े विद्वान, प्रशासनिक अधिकारी व विषय विशेषज्ञ और शोधार्थी इसके पाठक हैं। ये पाठक जिस सामग्री के आदी हैं आप उससे जरा भी कम हुए, आप खतरे में पड़ सकते हैं।

बहरहाल आलोक जी जहां भी जाएं वहां आलोक फैलाएं, और अहा जिंदगी में जो भी नए सम्पादक आएं वो पाठकों के विश्वास को बनाए रखें। ऐसी कामना।

 

(एडीटर अटैक मीडिया मिरर सम्पादक का नियमित कालम है)

Share this: