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मेरा काफ़ी समय सोचने में ही बीत जाता हैः सुशोभित सक्तावत

युवा लेखक और पत्रकार सुशोभित सक्तावत।
युवा लेखक और पत्रकार सुशोभित सक्तावत।
शोभित के साथ अभिनेत्री दीप्ति नवल।
सुशोभित के साथ अभिनेत्री दीप्ति नवल।

मीडिया मिरर की साक्षात्कार श्रंखला बात-मुलाकात में इस बार हमारे अतिथि हैं  इंदौर के युवा लेखक और पत्रकार सुशोभित सक्तावत। सुशोभित फेसबुक का चर्चित नाम हैं। इसके साथ ही अभिनेत्री दीप्ति नवल की आत्मकथा के सम्पादक भी हैं। आत्मकथा अंग्रेजी भाषा में प्रकाशित होगी। हाल ही में सुशोभित तब चर्चा में आए जब इनके आलेख के अंश साहित्यिक चोरी के अंतर्गत प्रसिद्ध पत्रिका हंस में पाए गए। 

सुशोभित माइकल जैक्सन की जीवनी लिख चुके हैं। सत्यजीत रॉय पर किताब लिख चुके हैं। पर दोनों किताबें अप्रकाशित हैं। वो कहते किताबों का प्रकाशन बहुधा अपने हाथ में नहीं होता। सुशोभित फिलवक्त नई दुनिया इंदौर से जुड़े हैं।

 

साहित्यिक मंचों से दूर रहने वाले सुशोभित सक्तावत ने तमाम मुद्दों पर मीडिया मिरर सम्पादक प्रशांत राजावत से लम्बी बातचीत की 

 

 

 सरकारी स्कूलों में पढ़ा हूं, उधार की यूनिफ़ॉर्म पहनी है और बहुत अभावों में जीवन व्यतीत हुआ। मेरे प्रारंभिक जीवन में ऐसा कुछ नहीं था, जो आने वाले समय में एक बेहतर भविष्य का वायदा करता हो

  • सुशोभित सक्तावत 

 

सवाल- जवाब 

सवालः सुशोभित सबसे पहले आपका बहुत बहुत स्वागत करता हूं मैं, मीडिया मिरर की ओर से। और धन्यवाद करता हूं कि आपने हमसे बातचीत के लिए समय निकाला। मैं वो सब जानना चाहता हूं जो लोग (यानि आपके प्रशंसक और आलोचक) दोनों जानना चाहते हैं।

उत्तर : आपका स्वागत है। मैंने बहुत इंटरव्यू लिए हैं, पहली बार मेरा इंटरव्यू लिया जा रहा है और मैं इससे उत्साहित हूं।

 

सवाल : अपने निजी जीवन के बारे में कुछ बताईए। घर, गांव। प्राथमिक और उच्च शिक्षा, करियर आदि के बारे में। 

उत्तर : मेरा जन्म झाबुआ में हुआ, लेकिन मेरे पुरखे राजस्थान के चित्तौड़गढ़ से यहां मध्यप्रदेश में माइग्रेट हुए थे। माता-पिता का अंतर्जातीय प्रेम विवाह था। चार वर्ष की अवस्था में हम उज्जैन चले आए, वहीं मेरी पढ़ाई और परवरिश हुई। सरकारी स्कूलों में पढ़ा हूं, उधार की यूनिफ़ॉर्म पहनी है और बहुत अभावों में जीवन व्यतीत हुआ। मेरे प्रारंभिक जीवन में ऐसा कुछ नहीं था, जो आने वाले समय में एक बेहतर भविष्य का वायदा करता हो।

 

सवालः सुशोभित के लेखक सुशोभित बनने की कहानी कहां से और कैसे प्रारंभ हुई। 

उत्तर : हर लेखक सबसे पहले एक पाठक होता है। एक लेखक की निर्मिति में दो चीज़ें काम करती हैं, एक तो उसका निजी मननपरक मानस, दूसरे उसका अध्यवसाय, जो कि उसकी कल्पनाओं को व्यापक क्षितिज देता है। बहुत प्रारंभ से ही किताबों की दुनिया से मेरा नाता जुड़ गया था। तब तो केवल अधिक से अधिक पढ़ने की भूख थी। लेकिन जब आप बहुत पढ़ते हैं तो लेखन का एक डौल आपके भीतर जाने-अनजाने उतरने लगता है और आप चीज़ों को एक भिन्न आलोक में देखने लगते हैं। जीवन बहुत अभिधामूलक होता है। लेखन के लिए जिस व्यंजनामूलकता की आवश्यकता होती है, वह एक निरंतर अभ्यास से ही फलीभूत होती है। वास्तव में जीवन और लेखन दोनों सहवर्ती और समांतर होने के साथ ही दो पूरी तरह से भिन्न संसार भी हैं।

 

सवालः आजतक आपकी कोई किताब प्रकाशित नहीं हुई। आप फेसबुक पर खूब लिखते हैं और खासे लोकप्रिय भी हैं। तो क्या आपको फेसबुकिया लेखक माना जाए। फेसबुकिया लेखक के रूप में आपको कोई आपत्ति तो नहीं।

उत्तर: आप चाहें तो मुझे फ़ेसबुकिया लेखक कह सकते हैं, मुझे कोई आपत्त‍ि नहीं होगी, क्योंकि यही सच है। और अगर फ़ेसबुक नहीं होता तो शायद कोई मेरा नाम भी नहीं जानता, यह भी उतना ही सच है।

 

सवालः आप फेसबुक पर लिखते हैं। पर काफी लोगों से मैंने सुना है कि फेसबुक पर अच्छा लेखन, गंभीर साहित्य की कमी है।

उत्तर : यह बहुत हद तक सही है, लेकिन कई अच्छे लोग भी फ़ेसबुक पर लिख रहे हैं। हर किसी की पहुंच तो पत्रिकाओं और उनके संपादकों तक होती नहीं है और हर कोई अपनी रचनाओं के प्रकाशन के लिए कई महीनों तक प्रतीक्षा नहीं कर सकता। फ़ेसबुक तात्कालिक माध्यम होता है। आप स्वयं अपनी वॉल के प्रकाशक और संपादक होते हैं। इस वजह से यहां पर बहुत सारा सतही लेखन भी प्रकाश में आ जाता है, लेकिन वह तो अवश्यंभावी ही है।

 

सवालः फेसबुक पर लिखने की शुरूआत कब से हुई। 

उत्तर: मैं वर्ष 2011 से फ़ेसबुक पर‍ लिख रहा हूं। इस अवधि में लगभग रोज़ ही मैंने कुछ ना कुछ लिखा है। लिखता तो मैं उससे पहले भी था, लेकिन अपनी नोटबुक में उसे दर्ज कर देता था। य‍हां पर सबकुछ लोकवृत्त में है और यह सार्वजनीनता आपके लिखने के विषयों में अनेक परिवर्तन भी कर देती हैं। मैंने फ़ेसबुक पर आकर अनेक वैसी चीज़ें लिखी हैं, जो वैसे हरगिज़ नहीं लिखता। और इससे मेरे लेखन को एक व्याप्त‍ि और परिविस्तार ही मिला है। अन्य का दबाव हमारे भीतर अनेक ग्रंथियां अगर रचता है तो वह हमारा परिमार्जन भी करता है।

 

सवालः आपने अपना निजी ब्लॉग या वेबसाइट क्यों नहीं बनाई। जबकि आपको 15 हजार से ज्यादा लोग फेसबुक पर ही पढ़ते हैं। आपके प्रशंसक हैं। अगर आपकी वेबसाईट या ब्लॉग को पढ़ेंगे तो आपको कुछ आर्थिक मदद भी मिलेगी। इसे आप अपने लेखन कार्य का पारिश्रमिक मान सकते हैं।

उत्तर : अब तो यह संख्या 15 हज़ार से आगे बढ़ गई है। मैं इससे पहले अपने दो ब्लॉग बना चुका हूं, किंतु अरुचि के कारण आगे नहीं बढ़ा पाया। फ़ेसबुक पर इंस्टेंट प्रतिक्रियाएं मिल जाती हैं। अनेक लोगों ने मुझसे कहा है कि मुझे यह सब ब्लॉग पर लिखना चाहिए। उनकी बात सही है। मुझे इस दिशा में अब सोचना चाहिए।

 

सवालः आप खेलों पर (खासतौर पर फुटबाल पर) लिखते हैं, विदेशी देशी साहित्य पर लिखते हैं, फिल्मों पर लिखते हैं और दीप्ती नवल पर भी। दीप्ती नवल पर आगे विस्तार में बात करेंगे। फिलहाल ये कि वाकई आपका पसंदीदा विषय कौन सा है, जिसमें आप लिखना पसंद करेंगे। ऐसा विषय जिसपर लिखने से आपको संतुष्टि मिलती हो।

उत्तर : मैंने क्रिकेट पर भी बहुत लिखा है। इधर तीन-चार साल से फ़ुटबॉल पर लिख रहा हूं। मैं हर विषय पर लिखना पसंद करता हूं। इसे गर्वोक्त‍ि ना माना जाए लेकिन सच यही है कि इधर पिछले कुछ सालों में जितने विषयों पर जितने अधिकार से मैंने लिखा है, उतना किसी और ने नहीं लिखा है और आप इसकी ताईद मेरी वॉल देखकर कर सकते हैं। हाल के दिनों में मैंने खानपान पर भी लिखना शुरू कर दिया और उसका अपना रस है। विलियम फ़ॉकनर कहता था कि लेखन का मतलब है मनुष्य की चेतना के अपने ही साथ द्वंद्व में होने से निर्मित समस्याओं की विवेचना। यह एक बहुत अच्छी परिभाषा है और मैं मनुष्य की चेतना के अनेकानेक आयामों का उद्घाटन करने में ही अधिक रुचि लेता हूं।

 

सवालः आप फेसबुक पर तमाम विषयों पर लिखते हैं। कभी ये गौर किया आपने कि आपके पाठक आपके द्वारा लिखे किस विषय को ज्यादा पसंद करते हैं। 

उत्तर: पाठकों को हिंदी सिनेमा, फिल्मी गीतों, खानपान की चीज़ों आदि पर लिखे लेख अधिक पसंद आते हैं। उन्हें प्रेम विषयक लेखन में भी बहुत रुचि रहती है। साहित्य और दर्शन संबंधी लेखों पर इतने पाठक नहीं मिलते। कविताओं पर पाठकों का उत्साह ठंडा रहता है। लेकिन कोई भी लेखक कभी पाठक की रुचियों के बारे में सोचकर नहीं लिख सकता है। उसके सामने पहली प्रतिज्ञा अपने लेखकीय दायित्व को पूरी करने की ही होती है।

 

सवालः आपने अबतक कितनी किताबें पढ़ डालीं।

उत्तर: इसका तो कोई हिसाब नहीं है। पिछले सत्रह सालों में पढ़ी गई किताबों का मैंने अवश्य लेखाजोखा रखा है, किंतु उसके लिए डायरी देखकर बताना होगा।

 

सवालः पढ़ने के अलावा खाली समय में क्या करते हैं।

उत्तर : कुछ ख़ास नहीं। स्लावाई ज़ीज़ेक ने कहा था, मेरी अपने आपमें रुचि नहीं, मैं जीवित तक नहीं रहना चाहता, मैं केवल सोचना चाहता हूं। कहना ना होगा मेरा भी काफ़ी समय सोचने में ही बीत जाता है। गहन चिंतन-मनन नहीं, बल्क‍ि अधिकतर तो वे दिवास्वप्न ही होते हैं।

 

सवालः अगर आप पठन पाठन के क्षेत्र में न होते तो सुशोभित का दूसरा पसंदीदा काम क्या होता।

उत्तर : मुझे मालूम नहीं, क्योंकि मुझमें कोई और गुण नहीं है। तब शायद मैं फलों और मिठाइयों की दुकान लगाता।

 

सवालः आपका पसंदीदा कोई एक विदेशी और देशी लेखक कौन है।

उत्तर : किसी एक का नाम लेना हो तो मैं हमेशा फ्रांत्स काफ्का का ही नाम लूंगा।

 

सवालः कोई एक किताब जो आपको सबसे ज्यादा पसंद हो। 

उत्तर : काफ्का, कम्प्लीट स्टोरीज।

 

सवालः विदेशी और भारतीय साहित्य में से श्रेष्ठ किसे मानते हैं।

उत्तर : यह एक वस्तुपरक जवाब नहीं हो सकता। मेरी अभिरुचि विदेशी साहित्य में इसलिए अधिक रही है, क्योंकि मनुष्य की चेतना में निहित अंधेरे कोनों का उन्होंने अधिक गहराई से साक्षात किया है। भारतीय साहित्य की ओर मैं भाषा और लोकजीवन के ब्योरों के लिए लौटता हूं, मनुष्यता के मनोजगत के गहन अवलोकन के लिए इतना नहीं।

 

सवालः आपने अपने बारे में कहीं लिखा था कि न तो आप खुद को कहानीकार मानते, और न ही कवि। आप खुद को गद्यकार मानते हैं। ऐसा क्यों। जबकि कविताएं तो आपने लिखीं हैं।

उत्तर : कविताएं लिखने से कोई कवि नहीं हो जाता। काव्य की प्रतिभा संगीत की तरह जन्मजात होती है। मैं अभ्यास से अच्छी कविताएं लिख सकता हूं, लेकिन मूलत: तो मैं वृत्तांतकार ही हूं। यह कोई ओढ़ी हुई विनयशीलता नहीं है, बहुत तटस्थ रूप से सत्य ही कह रहा हूं।

 

सवालः आप अपना प्रतिस्पर्धी या कहें समकक्ष लेखक किसे पाते हैं। (युवा या बुजुर्ग किसी भी वर्ग में) 

उत्तर :प्रतिस्पर्धा तो खैर एक गलत शब्द होगा, किंतु शैलेंद्र सिंह राठौर का अध्यवसाय, धैर्य और एकाग्रचित्त मेरे लिए अनुकरणीय है।

 

सवालः नए लेखकों में आपको कौन प्रभावित करता है। 

उत्तर : गीत चतुर्वेदी, सोमेश शुक्ल, मनोज कुमार झा, अमिताभ चौधरी (हालांकि यह उनका वास्तविक नाम नहीं है) इधर लिख रहे लेखकों में निश्च‍ित ही श्रेष्ठ हैं।

 

सवालः आपका वरिष्ठ साहित्यकारों से शीतयुद्ध चलता रहता है। ऐसा क्यों होता है। क्या सुशोभित उनकी लोकप्रियता या काम पर हावी हो रहे हैं। 

उत्तर : इसका मुख्य कारण तो मेरा वामविरोधी होना है। मेरी लोकप्रियता अभी इतनी नहीं है, जिससे उन्हें कोई ख़तरा महसूस हो।

 

सवालः लोग कहते हैं कि आपके चलते प्रसिद्ध लेखकों के सिंहासन खतरे में हैं। क्या कहेंगे इस पर। 

उत्तर : यह हर लिहाज़ से एक अतिशयोक्त‍ि है।

 

सवालः रजनी मोरवाल प्रसंग अब जग जाहिर है। आपने औऱ सबने बहुत कुछ लिखा। हंस सम्पादक की तरफ से माफीनामा की बात भी सामने आई है। संक्षेप में बताइए कैसे देखते हैं इस पूरे मामले को। और आप लगातार कह रहे हैं कि आप न्याय चाहते हैं। किस तरह का न्याय चाहते हैं आप। क्या हंस सम्पादक का लिखित माफीमाना और रजनी मोरवाल का हंस में प्रतिबंध होना पर्याप्त नहीं। 

उत्तर : उन्होंने बहुत निर्लज्जता से मेरी रचनाएं चुराई हैं और साक्ष्य सबके सामने हैं। उसकी कोई काट उनके पास नहीं है और क्षमायाचना करने के अलावा कोई और विकल्प उनके समक्ष नहीं रह गया है। अगर “हंस” पत्रिका भी अपना माफ़ीनामा छाप देती है तो यह श्रेष्ठ ही होगा।

 

सवालः दिल्ली के एक साहित्य समीक्षक ने आपकी ओर इशारा करते हुए हाल ही में लिखा कि कुछ फेसबुकिया लेखक अपने प्रशंसकों (जिनमें साहित्य व लेखन की न के बराबर समझ है) के लाईक औऱ तारीफ भरे कमेंट के मुगालते में पड़कर खुद को बड़ा लेखक मानने लगे हैं। आप क्या कहेंगे इस मामले पर। 

उत्तर : यह उनका अभिमत हो सकता है। अव्वल तो मैं अपने को बड़ा लेखक मानता नहीं और जितना भी मानता हूं वह लाइक्स कमेंट्स की संख्या के कारण नहीं है।

 

सवालः जैसा की आपने अपनी पोस्ट में लिखा कि रजनी मोरवाल मामले में आपसे हंस सम्पादक ने लिखित माफी के आश्वासन के बाद ये भी कहा कि आप हंस के लिए लिखें। तब आपके एक प्रशंसक ने लिखा कि हंस की किस्मत जागी है जो सुशोभित जैसा हीरा उन्हें मिल रहा है। किसी और ने कि महान लेखक प्रकाशक के पास नहीं प्रकाशक उसके पास आता है। किसी ने लिखा सुशोभित से ज्यादा हंस को शुभकामनाएं सुशोभित जैसा नगीना पाने के लिए। एक ने कहा जल्दी से रचनाएं भेजकर हंस को अनुग्रहित करें। बतौर 35 वर्ष के युवा के रूप में कैसे लेते हैं इन टिप्पणियों को।

उत्तर : यह प्रतिक्रियाएं उत्साह से जन्मी हैं और उत्साह जगाती हैं। इससे अधिक इस बारे में कुछ नहीं कहा जा सकता।

 

 

सवालः थोड़ा सवालों का स्वाद बदलते हैं। दीप्ति नवल पर आप एक किताब लिख रहे हैं। शायद उनकी जीवनी। आपकी पहली किताब होगी ये। कब तक प्रकाशित होगी। किस भाषा में है। 

उत्तर : मैं दीप्त‍ि की जीवनी नहीं लिख रहा, दीप्त‍ि आत्मकथा लिख रही हैं, जिसका संपादन मैं कर रहा हूं। किताब तब प्रकाशित होगी, जब दीप्त‍ि उस पर अपना काम पूरा कर लेंगी।

 

सवालः दीप्ति पर किताब का प्रस्ताव कैसे मिला। 

उत्तर : मैं उनकी फ़ेसबुक पोस्ट्स पर कमेंट्स किया करता था। मेरी भाषाशैली ने उनका ध्यान खींचा। फिर मैंने उनकी किताबें पढ़कर उस पर अपने नोट्स उनसे मेल पर शेयर किए। उन्हें अच्छा लगा। मुम्बई में हमारी भेंट हुई और इस तरह यह काम शुरू हुआ।

 

सवालः पहली किताब में लिखने में इतनी देर क्यों लगा दी। 

उत्तर : मैंने अपनी पहली किताब वर्ष 2009 में लिखी थी, जो कि माइकल जैक्सन की जीवनी थी। वह कभी छपी नहीं। फिर मैंने 2011 में सत्यजित राय के सिनेमा पर एक पुस्तक लिखी। वह भी अभी तक छपी नहीं है। किताबों का छपना बहुधा हमारे हाथ में नहीं होता।

 

सवालः दीप्ति नवल पर आपने वैसे भी बहुत लिखा है। उनके प्रति इतना आकर्षण क्यों। 

उत्तर : निजी कारण हैं!

 

सवालः आपके चाहने वालों की संख्या को देखते हुए दीप्ति नवल पर आपकी किताब तो बेस्ट सेलर हो जाएगी ये मान लिया जाए।

उत्तर : दीप्त‍ि जो भी लिखेंगी, वह उनके ही कारण चर्चित होगा, मेरे कारण नहीं।

 

सवालः  बेस्ट सेलर को लेकर आपकी क्या धारणा है। जिस तरह से भारत में खासतौर पर हिंदी साहित्य में किताबों को बेस्ट सेलर का तमगा दिया जा रहा है। उस पर आप जरूर अपना पक्ष रखें। 

उत्तर : बेस्टसेलर का मानदंड विक्रय से अधिक पाठकों के बीच लोकप्रियता से होना चाहिए। अलबत्ता दोनों ही मानदंड श्रेष्ठ साहित्य का प्रमाण नहीं हैं।

 

सवालः आपको कभी प्रकाशकों ने प्रस्ताव दिया कि कोई किताब लिखें। 

उत्तर : अब कुछ प्रस्ताव मिल रहे हैं।

 

सवालः आजकल की नई वाली हिंदी के नए लेखकों की तरह आप साहित्य उत्सवों में नहीं दिखते वक्ता के रूप में। क्या आपको बुलाया नहीं जाता या बुलाने पर भी जाना पसंद नहीं करते। 

उत्तर : मुझे अकसर बुलाया जाता है। दिल्ली में होने वाले युवा साहित्य सम्मेलन में दो साल से बुलावा आ रहा है, किंतु मैं कभी किसी सार्वजनिक समारोह में नहीं जाता। मंच पर तो दूर, दीर्घा में भी सहभागी के रूप में उसमें सम्मिलित नहीं होता। मैं इससे भरसक बचने का प्रयास करता हूं।

 

अंत में आपको आपकी नई किताब के लिए बहुत बहुत शुभकामनाएं।

उत्तर : पुस्तक के प्रकाशन के बाद ही मैं आपकी शुभकामनाएं स्वीकार करूंगा। बातचीत के लिए धन्यवाद।

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