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सम्पादक सुंदर चंद ठाकुर के रचनाकर्म की चर्चा

नवभारत टाइम्स मुंबई के सम्पादक सुंदर चंद ठाकुर
नवभारत टाइम्स मुंबई के सम्पादक सुंदर चंद ठाकुर

स्मृति, जड़ों और अस्तित्व के लिए लड़े जा रहे युद्ध 
(हिंदी लेखन में ‘देसी परंपरा’ बनाम ‘देसी आधुनिकता’ का संघर्ष)

सुन्दर चंद ठाकुर का उपन्यास ‘पत्थर पर दूब’ 2012 में प्रकाशित हुआ था और लेखकों के एक खास तबके में उसकी थोड़ी-बहुत चर्चा भी हुई थी. संभव है कि उपन्यास पर हुई सभी चर्चाएँ मेरी नजरों से न गुजरी हों, पिछले दिनों जब मैं उपन्यास के संसार का हिस्सा बना, लगा कि इस उपन्यास पर विस्तार से बातें होनी चाहिए थीं.
उपन्यास सरल-निश्छल सामाजिक ताने-बाने के बीच पले-बढ़े एक निम्न-मध्यवर्गीय महत्वाकांक्षी लड़के के फ़ौज का अफसर बनने के साथ ही अपनी स्थानीय जड़ों के अहसास के बीच आत्मीयता के अन्तरंग सूत्रों की तलाश में भटकते नौजवान की कहानी है. कहानी तीन स्तरों पर आगे बढ़ती है; उसकी पारिवारिक स्मृति-परंपरा, खुद के लिए अन्तरंग प्रेम की; और अंततः मनुष्य और राष्ट्रों के बीच बढ़ती दूरियां और ख़त्म होते चले जा रहे स्नेह-सूत्रों की तलाश!
उपन्यास की शुरुआत 26/11 के मुंबई आतंकवादी हमले के तनावग्रस्त माहौल के बीच भारतीय कमांडोज के बीच हो रहे संवाद से होती है:
“वह ऊंघती आँखों से देख रहा था – इमारतों के बीच सुदूर काले आसमान के सिरे से हल्का लाल रंग फूटने लगा था. उसने फर्श पर फैलाई दोनों टांगों को समेटा. उसकी पीठ एक पिलर पर टिकी हुई थी. पिछले आठ घंटे से वह यहाँ पोजीशन लिए बैठा था कि सामने की इमारत में कहीं कोई हरकत हो तो फायर करे. मगर ऐसा नहीं हुआ.
“वह खड़ा हो गया. उसने पिछले बीस घंटों से बूटों में कैद उँगलियाँ हिलाई. दायीं ओर नजर घुमाई तो कैप्टन बसोया से नजर मिली.
“मॉर्निंग सर!’ वह फुसफुसाकर बोला, चेहरे पर मुस्कान लाते हुए.
“मोर्निंग यार.’ उसने गन कंधे पर छोड़ दोनों हाथ आसमान की और फैलाकर अंगड़ाई भरी.”

 

सुंदर चंद ठाकुर के बारे में 
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1968 में पिथोरागढ़ के एक गाँव में जन्मे सुन्दर चंद ठाकुर 1992 के विज्ञान ग्रेजुएट हैं. 1992 से 97 तक भारतीय सेना में कमीशन-अधिकारी रहे और इस दौरान पंद्रह महीनों के लिए सोमालिया में संयुक्त राष्ट्र शांति सेना में सदस्य के रूप में तैनात रहे. उनके दो कविता संग्रह ‘किसी रंग की छाया’ और ‘एक दुनिया है असंख्य’ चर्चित रहे हैं, जिनके आधार पर उन्हें 2001 में भारतीय भाषा परिषद् का युवा पुरस्कार ओर 2003 का भारत भूषण अग्रवाल स्मृति पुरस्कार प्रदान किया गया. पत्रकार के रूप में भी उनकी एक विशिष्ट छवि निर्मित हुई है. पंकज बिष्ट की मासिक पत्रिका ‘समयांतर’ के लिए उन्होंने कई वर्षों तक विशेषांकों के आधार लेख, समीक्षाएँ और अनुवाद का काम किया. कविताओं का जर्मन, बांग्ला, मराठी, अंग्रेजी आदि में अनेक अनुवाद हुए हैं और उन्होंने खुद भी रूस के चर्चित कवि येवुत्शेंको की जीवनी का अनुवाद किया जो ‘एक अजब दास्ताँ’ के नाम से प्रकाशित हुआ. ‘हंस’ में उनका लेख ‘धर्म, सेक्स और नैतिकता’ बेहद चर्चित रहा. इस समय वो टाइम्स ऑफ़ इंडिया के हिंदी दैनिक ‘नवभारत टाइम्स’ के मुंबई संस्करण के स्थानिक संपादक हैं. 
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‘पत्थर पर दूब’ जीवनी शैली में लिखा गया आत्मकथात्मक उपन्यास का भ्रम देता है जो बात कुछ हद तक सही भी है. अपने लेखकीय वक्तव्य में लेखक लिखते हैं, “लगभग तीन साल के निरंतर लेखन के बाद इस उपन्यास को पूरा करके लग रहा है कि जैसे मन से कोई बोझ उतर गया हो, जैसे मैंने कोई उधार चुकता कर दिया हो. पिता फौज में थे इसलिए मैं बचपन से ही फ़ौज और फौजी जीवन के बहुत करीब रहा. भारतीय सेना में पांच साल की नौकरी के दौरान तो मैं खुद इस फौजी जीवन का हिस्सा ही बन गया. फ़ौज छोड़ने के बाद भी अपने कोर्समेट्स के जरिये मैं उससे जुड़ा रहा. कारगिल की लड़ाई के दौरान मेरे इन्हीं साथियों ने जब अपने अनुभव साझा किये, मैंने तभी से उन अनुभवों को आपके साथ शेयर करने का मन बना लिया था… यह 26/11 के मुंबई हमले के बाद हुए कमांडो ऑपरेशन के दौरान था, जब मुझे उपन्यास लिखा ले जाने वाली प्रेरणा मिली… इस उपन्यास में बहुत-सी सच्ची घटनाएँ और सच्चे ब्योरे हैं…”
आज की पीढ़ी के लिए, जहाँ व्यक्ति एक टापू की शक्ल लेता चला जा रहा है, इस तरह की भाषा और सामाजिक कंसर्न लगभग दुर्लभ होते जा रहे हैं. दरअसल, पीढ़ियों के बीच आज दिखाई दे रहे इस बदलाव को लाने में स्वतंत्र भारत के सांस्कृतिक नियोजन से जुड़ी विडम्बनाओं की लम्बी भूमिका है जिसकी शुरुआत आजादी के बाद का दशक बीतने के साथ ही हो गयी थी. अगर 1947 को भारत के सामाजिक और सांस्कृतिक क्षेत्र में परिवर्तन की घटना मानें तो बहुत साफ दिखाई देगा कि इस वर्ष घटित राजनीतिक घटना को भारत के आम जन-मानस ने किसी परिवर्तन की तरह स्वीकार नहीं किया. यह घटना भारत की आजादी को लेकर चल रहे संघर्ष को नियोजित कर रही दो हस्तियों – गाँधी और नेहरू – के अहम के टकराव के रूप में ज्यादा दिखाई देती है. शासक और शासित के बीच ऐसे राजनीतिक समीकरण नयी चीज नहीं हैं, मगर हमारे देश में यह इस रूप में नयी घटना थी कि जिस आम आदमी के द्वारा यह लड़ाई लड़ी गई, आजाद भारत में उसे हाशिए में धकेलकर सारा नियोजन इन दो हस्तियों के सनक भरे निर्णयों के बीच सिमटता चला गया.
यह अनायास नहीं है कि नेहरू और गाँधी के इन्हीं सनक भरे विवादों के बीच तीन समानांतर देश उगते चले गए – एक भारत, एक इंडिया और एक हिंदोस्तान… और इसे आज बहुत साफ पहचाना जा सकता है कि आजाद भारत की सारी ऊर्जा इन तीनों ‘देशों’ को एक संप्रभु चेहरे में पिरोने की कोशिश में खर्च होती रही… चूँकि ये निर्णय ‘आजाद भारत’ के कथित निर्माताओं के निर्णय थे, इसलिये इन पर पुनर्विचार संभव नहीं था. चूँकि मज़बूरी थी, इसलिए पूरी अवधि यह सिलसिला जारी रहा और लोगों को एक कड़वी घूँट की तरह इसे निगलना पड़ा.

इन्हीं निर्णयों में एक था भाषा सम्बन्धी निर्णय. सच है कि भाषा हुक्मरानों के द्वारा नहीं बनती, आम लोग ही उसे बनाते और विकसित करते हैं, मगर भाषा के अनेक दायरे हैं, जिनमें से एक उसका वह शिष्ट रूप है जिससे समाज के मूल्य और उसकी संस्कृति की आधारशिला निर्मित होती है, वह मध्यवर्ग रूपाकार लेता है जो अपने समाज को शेष संसार के साथ जोड़ता हुआ अपनी अलग और विशिष्ट पहचान बनाता है. भाषा का यह रास्ता अपने समाज के नायकों के द्वारा बनायी गई पगडंडियों पर पांव रखकर ही निर्मित होता है. जाने या अनजाने.

कुछ देर ठहर कर औपनिवेशिक भारत में अंग्रेजों के द्वारा अपनी भाषा को भारत की मुख्य भाषा के रूप में लागू करने के निर्णय को ध्यान में रखें. सन 1835 में मेकॉले ने, जो उस समय गवर्नर जनरल की शासन समिति के एक प्रमुख सदस्य थे, अंगरेजी शिक्षा का प्रचार करने के प्रश्न को एक नए उदार ढंग से सरकार तथा अंगरेजी जनता के सामने रखा. उन्होंने अपनी स्मृति टिप्पणी में इस प्रकार के उद्गार व्यक्त किये :
“हो सकता है कि योरोपीय शिक्षा-दीक्षा के ग्रहण करने से भारतीय जनता का मस्तिष्क इतना विकसित हो जाए कि वह वर्तमान शासन पद्धति से उकता उठे और वह योरोपीय शासन पद्धति की राजनीतिक संस्थाओं की माँग करने लगे. यह तो मैं नहीं कह सकता कि वह दिन कभी आएगा या नहीं; परन्तु यदि वह आया तो अवश्य ही वह अंगरेजों के इतिहास में अति गर्व का दिन होगा… हो सकता है कि राजदंड हमारे हाथ से निकल जाय… परन्तु क्या ही अच्छी वह विजय है जिसमें दूसरी ओर पराजय होती ही नहीं.”
मेकॉले के इस प्रस्ताव को अंग्रेजी बनाम हिंदी या भारतीय भाषाओँ के रूप में न देखकर मातृभाषा की अस्मिता के रूप में देखा जाना चाहिए. अंग्रेज उन दिनों भारत के शासक थे, इसलिए भाषा के रूप में उनका अधिक रुझान अपनी भाषा यानी अंग्रेजी के प्रति होना स्वाभाविक था. बावजूद इसके गवर्नर जनरल की समिति में अंग्रेजी शिक्षा पद्धति को प्रोत्साहन देने के प्रस्ताव का विरोध हुआ. स्वयं गवर्नर जनरल विलियम बेन्टिंग ने कहा – ‘संभव है भारत की देशी शिक्षा पद्धति में हस्तक्षेप करने से लाभ की तुलना में हानि अधिक हो, मैं यह बात अनुभव के आधार पर कह रहा हूँ; अन्य भारतीय संस्थाओं में हस्तक्षेप करने का फल अच्छा नहीं निकला है.’ वास्तविकता यह है कि महीनों तक मेकॉले की टिप्पणी विवाद का विषय बनी रही, परन्तु अंत में समिति ने बहुमत से मेकॉले के प्रस्ताव को इस रूप में स्वीकार किया कि ‘भारत के लोगों में योरोपीय साहित्य तथा विज्ञान का प्रसार करना अंग्रेजी सरकार का महान ध्येय होना चाहिए; अतः शिक्षा सम्बन्धी अनुदान की सम्पूर्ण धनराशि का उपभोग केवल अंग्रेजी शिक्षा प्रदान करने के लिए किया जाय.’

गाँधी और नेहरू, आजाद भारत के ये दोनों निर्माता मेकॉले की इसी शिक्षा और भाषा नीति की उपज थे. अंतर ये था कि गाँधी भारतीय भाषाओँ की वकालत करते थे जब कि नेहरू इन्हें लेकर संशयग्रस्त थे. हालाँकि तब एक तीसरी शुद्धतावादी धारा भी मौजूद थी जो ज्ञान की पुरानी (संस्कृतनिष्ठ) भाषा की पक्षपाती थी, मगर वह भारत की राष्ट्रभाषा घोषित होने के बावजूद भारत के आमजन की भाषा आज तक नहीं बन पाई, न बोलचाल की और न ज्ञान की.
इसी बिंदु पर आकर हम यह बात विश्वास से कह सकते हैं कि मेकॉले, जिनके मानसपुत्र नेहरू थे, विजयी हुए और उनकी भाषा अंग्रेजी भारत की मुख्य भाषा बनी. सवाल यह है कि गाँधी और उनकी भाषा वह दर्जा क्यों हासिल नहीं कर सकी? दरअसल, आजादी के बाद ही नहीं, उस संघर्ष के दौरान भी, जो नया मध्यवर्ग विकसित हुआ उसके एकमात्र रोल मॉडल नेहरू बने, अपनी भाषा, पोषाक, लहजे और वर्गीय चेतना में. इस तरह भारतीय राजनीति के विकल्पहीन नायक के रूप में नेहरू उभरे, जो आज तक भी विकल्पहीन हैं.

‘पत्थर पर दूब’ के सन्दर्भ में भाषा का यह प्रसंग इसलिए कि आजादी के बाद ज्ञान की भाषा पर अंग्रेजी का दबाव इतना अधिक बढ़ा है कि भारतीय साहित्य में ‘भारतीय अंगरेजी’ नामक एक नई भाषा ही विकसित होती चली गयी जिसमें लिखा गया साहित्य ही भारतीय साहित्य का पर्याय बन गया है और आधुनिक भारत के पढ़े-लिखे मध्यवर्ग के बीच यह सबसे लोकप्रिय, प्रेरक और संपन्न साहित्य के रूप में उभरा है. यही नहीं, हिंदी और अन्य भारतीय भाषाओँ के साहित्य के पढ़े-लिखे और ज्ञान-संपन्न चरित्रों की भाषा भी अंग्रेजी बन गयी है.
यह एक अलग मुद्दा है कि यह अच्छा हुआ या नहीं, (जिसका कोई विकल्प नहीं है, उस पर बहस करने का कोई अर्थ नहीं है) मगर हिंदी समाज का पढ़ा-लिखा तबका इसके वर्चस्व को स्वीकार कर चुका है. केवल रचनात्मक साहित्य के चरित्रों की भाषा ही नहीं, अंग्रेजी ज्ञान के दूसरे अनुशासनों के अलावा देसी भाषाओँ के बीच आने वाले वैचारिक प्रसंगों को व्यक्त करने वाली भाषा भी अंग्रेजी बन चुकी है.
अंग्रेजी अपनी शर्तों पर तो अपने समाज में फ़ैल रही ही है, उसका विस्तार संसार की समृद्ध भाषाओँ के साहित्य में पूरी शान से हो रहा है. यह स्थिति भी चिंता का सबब नहीं है, (यह बात तो स्वागत-योग्य है) चिंता की बात यह है कि भारतीय लेखकों में (खासकर हिंदी के) जितना ही आकर्षण अंग्रेजी और विदेशी भाषाओँ के प्रति बढ़ा है, अपनी स्थानीय भाषाओँ के प्रति उतनी ही उदासीनता बढ़ी है.
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मगर भाषा तो पात्रों के सामाजिक वर्ग के अनुसार ही होगी. इस लिहाज से ‘पत्थर पर दूब’ का भाषा चयन स्वाभाविक और सफल लगता है. जैसा कि पहले संकेत किया, उपन्यास में तीन सामाजिक वर्गों से जुड़ी कथाएँ हैं और प्रत्येक कथा में उस समाज के बीच बोली जाने वाली भाषा का प्रयोग किया गया है : लेखक की पैतृक परंपरा से जुड़े पात्रों में कुमाऊंनी हिंदी, फौजी अफसरों में अंग्रेजी हिंदी और कमांडोज के बीच उनकी तकनीकी हिंदी. हिंदी लेखकों के बीच अंग्रेजी को आतंक की भाषा के रूप में अपनाने की जो बात इस लेख में कही गयी है, यह उपन्यास उससे मुक्त है क्योंकि इसमें भाषा को उसके मूल और स्वाभाविक लय के साथ अपनाया गया है. यही कारण है कि अनेक पृष्ठों तक भी देवनागरी लिपि में लिखी गयी अंग्रेजी भाषा न तो अटपटी लगती और न अस्पष्ट. उसके स्थान पर अगर हिंदी या कोई दूसरी भाषा का प्रयोग किया गया होता तो निश्चय ही वह अस्वाभाविक भाषा होती.
भाषा और साहित्य अंततः सामाजिक मूल्यों और संस्कारों से रूपाकार प्रदान करने वाले घटक होते हैं इसलिए इनके जरिए हम समाज के देश-काल की धडकनों और चरित्र को जान सकते हैं. पिछले कुछ वर्षों (या महीनों) से हिंदी में एक शब्द ‘देसी आधुनिकता’ का प्रयोग किया जाने लगा है. कुछ दिनों तक मैं इस शब्द को समझ नहीं पाया; दो-चार दफे इस शब्द से गुजरने के बाद पकड़ में आया कि इस शब्द को ‘आधुनिकता’ के देसी संस्करण के अर्थ में प्रयोग किया जा रहा था. यह फिकरा उन लेखकों के लिए प्रयुक्त किया गया था जो अंग्रेजी और हिंदी दोनों में लिखते हैं मगर संसार की समृद्ध भाषाओँ के जानकार इन लेखकों के आदर्श भी अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर चर्चित लेखक हैं. अमूमन हिंदी का लेखक-पाठक उन रचनाकारों और उनकी कृतियों से परिचित नहीं होता (उन्हें विस्तार से पढ़े होने का तो सवाल ही नहीं है) इसलिए ऐसे लेखक हिंदी समाज के बीच ज्ञान की नयी लहर के प्रतीक और इस रूप में ‘आधुनिक’ बन जाते हैं. मेकॉले महाशय इस तरह की घुट्टी पिला ही गए थे, अंग्रेजी बोलना और पढ़ना आधुनिक होने की शर्त बन ही चुकी थी, इसलिए हिंदी या भारतीय भाषाओँ में लिखने वाले को कैसे ‘आधुनिक’ कहा जा सकता था. वे तो ‘देसी’ आधुनिक ही हो सकते थे.
कुछ वर्ष पहले यह शब्द मैंने कवि केदारनाथ सिंह के लिए प्रयुक्त किया गया देखा, तब मैंने इसे इस रूप में समझा कि शायद लोक जीवन से जुड़े होने के कारण उनके लिए इस शब्द का प्रयोग किया गया हो, मगर इसी सप्ताह कवि कुँवर नारायण के सन्दर्भ में जब इस शब्द का प्रयोग सुना (जिनका भारत या हिंदी के लोक समाज के साथ दूर-दूर तक कोई सम्बन्ध नहीं है) तो मेरा माथा ठनका और मुझे लगा कि ‘आधुनिक’ का अर्थ हिंदी समाज की उस ग्रंथि के साथ है, जिसमें हर वह लेखक बड़ा और आधुनिक है जो खुद अंग्रेजी जानता हो और आम हिंदी पाठक की समझ में न आता हो. ऐसे लेखकों को बहुत साफ पहचाना जा सकता है. यहीं से मुझे बहुत साफ तरीके से हिंदी लेखकों की दो धाराएँ दिखाई दीं – देसी परंपरा के लेखक और देसी आधुनिकता के लेखक. हिंदी समाज की स्वाभाविक धड़कनों से जुड़े देसी लेखक और विदेशी साहित्य की धड़कनों से उपजे देसी भाषा के लेखक. इसीलिए पहली तरह के लेखक हिंदी समाज के बीच स्वाभाविक रूप से रस-बस जाते हैं, दूसरी तरह के लेखकों को आत्मसात करने के लिए पहले उस विदेशी साहित्य की संवेदना से गुजरना जरूरी है जिसके बीच से उनका संसार अंकुरित हुआ है.

‘पत्थर पर दूब’ ठेठ देसी ठाठ का उपन्यास है, क्योंकि यह देसी संवेदना का ही नहीं, भारत की ठेठ देसी आधुनिकता का भी उपन्यास है. सबसे पहले तो हमें यह समझना होगा कि रचना के उत्स का आधार कहाँ होता है. इसके साथ ही यह जानना भी उतना ही जरूरी है कि लेखक की संवेदना का उत्स कहाँ है. यह बताने की जरूरत नहीं होनी चाहिए कि रचना का उत्स सिर्फ और सिर्फ ‘स्थानीय’ ही होगा, और संवेदना का उत्स जितना ही व्यापक और मानव-व्यापी होगा, वह उतनी ही बड़ी रचना होगी. ‘पत्थर पर दूब’ अपने इन दोनों उत्सों से अंकुरित हुई है इसीलिए मैंने इस आलेख के आरम्भ में ही इसे हिंदी उपन्यास की परंपरा में एक घटना स्वीकार किया है.

मगर मेरे कह देने भर से तो यह सिद्ध नहीं हो जायेगा, इसके साथ एक जागरूक पाठक के रूप में जुड़ना पड़ेगा. मुझे विश्वास है कि यह उपन्यास आपको निराश नहीं करेगा और हिंदी लेखन के उस संसार की यात्रा कराएगा, जिस पर अभी किसी भी लेखक की नजर नहीं पड़ी है.

328 पृष्ठों के इस उपन्यास के प्रकाशक हैं : राजकमल प्रकाशन, 1-बी, नेताजी सुभाष मार्ग, दरियागंज, नई दिल्ली – 110002. मूल्य : रू. 395.

-आलेख साभार लक्ष्मन सिंह विष्ट, वरिष्ठ साहित्यकार उत्तराखंड 

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