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पत्रकार से व्यंगकार बने अनुज खरे और पीयूष पांडेय की चर्चा

दैनिक भास्कर डिजिटल के सम्पादक अनुज खरे,
दैनिक भास्कर डिजिटल के सम्पादक अनुज खरे, साथ हैं शाहरुख खान।

प्रसिद्ध व्यंगकार सुशील सिद्धार्थ व्यंगकारों का बचपन नाम से एक किताब सम्पादित कर रहे हैं जिसमें देशभर के व्यंगकारों का जिक्र है। मीडिया मिरर ने उसी कड़ी से दैनिक भास्कर डिजिटल के सम्पादक अनुज खरे व आजतक के पत्रकार पीयूष पांडेय के अंश को यहां आपके लिए प्रस्तुत किया है। इन दोनो पत्रकार साथियों की व्यंगबाण से सजी किताबें बाजार में हैं। यहां  जानकारी सुशील सिद्धार्थ जी के सौजन्य से हम प्रस्तुत कर रहे हैं। 

 

व्यंग्यकारों का बचपन ‘ अंश 22
अनुज खरे हमारी नयी पीढ़ी के गजब व्यंग्यकार हैं।नया तेवर,नया कलेवर रखने वाला एक पेवर लेखक।तकनीक के नवीनतम रूपों से खेलते हैं।इसलिए विषय चयन में अप्रत्याशित रोचकता आती है।शब्दों से कुलेलते हैं।नये कॉम्बिनेशन बनाते हैं।’कमीनता ‘ शब्द उनका आविष्कार है।
अनुज सरीखे व्यंग्यकारों की सख़्त ज़रूरत है।जो प्रसन्नमना गद्य को बरत सकें।बहुत गंभीर लगने वाले कुछ व्यंग्यकार हिंदी व्यंग्य को भीतरी मार दे रहे।ऐसे में अनुज की भाषा राहत देती है।कम लिखते हैं।मस्त लिखते हैं।बात सुनते हैं।सुधार के लिए तैयार रहते हैं।उनको शुभकामनाएं।
अनुज के मासूमातिमासूम बचपन का एक पवित्र अंश—
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अद्भुत ख़ूंखार किस्म की शरारतें
■ अनुज खरे
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बचपन में हम पर्याप्त मात्रा में छोटे एवं भारी तादाद में मासूम पाए जाते थे। हालांकि मोहल्लेवालों के विचार भी हमसे पर्याप्त मात्रा में अलग थे। रिश्तेदारों को हमारे इस मासूम वाले भाग पर भयंकर आपत्ति थी। उनकी आपत्ति हम आज तक दूर नहीं कर पाए हैं। एकाध बार किसी के घर के सोफे को जलाने को कोशिश करना या छत से किसी अंकल के ऊपर कुल्ला कर देना, ऐसा क्या बुरा हो गया कि वे आज तक हमें माफ नहीं कर पाए हैं।
खैर, उनकी जाने दीजिए मोहल्लेवालों का यह भी मानना था कि यह बालक अत्यंत मेधावी एवं परिश्रमी वृत्ति का है। कई घरों में पत्थर फेंकने, बच्चों से मारपीट करने, पतंग लूटने, रंग-बिरंगी आइसक्रीम चूसते रहने, बड़े-बूढ़ों को चिढ़ाने जैसे कई काम ये खाना खाने और सोने के अलावा एक ही दिन में कर डालता है। मेधावी होने का मामला कुछ इस तरह बैठा था कि हमारी अद्भुत खूंखार किस्म की शरारतें आज तक कई लोग भुला नहीं पाए हैं।
लोग बताते हैं कि(हालांकि हमारे दादाजी आज तक नहीं मानते) एक बार हमने पड़ोस के वर्मा अंकल के जूतों में लाल दंतमंजन पानी मिलाकर भर दिया था। बाद में जब उन्होंने जूते पहने और उसमें से लाल रंग का फव्वारा बाहर निकाला तो उसे देखकर वर्मा आंटी पछाड़ खाकर गिर गईं थी जिसे बाहर आकर हमने बताया था कि आंटी अंकल के ऊपर गिर गईं हैं। बाद में वे हमारी ठुकाई से ज्यादा अपनी सफाई देने में व्यस्त हो गए थे। इसी तरह एक बार हमने अपने ऊपर वाले घर में रहने वाले अवस्थी अंकल के जूते बांधकर बॉलकनी से लटक दिए थे, बेचारे पूरा घर ढूंढकर थकहार कर हवाई चप्पलें पहनकर ही उस दिन ऑफिस गए थे। बाद में पूछने पर हमने उन्हें बताया था कि बॉलकनी से लटकते इन जूतों में हम पौधे उगाना चाहते थे।
आज सोचकर लगता है क्या दिन थे वे, अहा.! अहा.!! मासूम सी ख्वाहिशें थीं। पेड़ा खिलाओ। जलेबी खाने का मन है। और देखो घरवाले ले भी आते थे कि बच्चे का दिल मत तोड़ो। कभी लगता था कि यार कि ये लोग खुद ही कितने मासूम हैं। आजकल के नए नकोरे मम्मी-पापा तो अपने से ही आगे नहीं सोच पाते। तब खेल में भी अलग ही तरह की बेईमानियां चलती थीं। हम भी एक नंबर के रोंटे थे। हमारे डर के कई बच्चों ने तो हमें खिलाना तक छोड़ दिया था कि बैटिंग कर लेगा तो भागने की जुगाड़ में लग जाएगा। हारेगा तो मानेगा नहीं अपना बल्ला लेकर भाग जाएगा। दूसरे का दाम नहीं नहीं चुकाने से बचने के 72000 बहाने बनाएगा। इससे फील्डिंग करवा नहीं सकते हैं सिर्फ बैटिंग करना चाहता है। बाउंडरी पर भी लगाओ तो विकेटकीपर से भी ज्यादा कॉट बिहाइंड की अपील करता है। नहीं मानने पर विकेटकीपर घटिया है मुझे बनाओ की हुज्जत करता है।
तो टीम इस तरह से डिजाइन की जाती थी कि मेरी बैटिंग सबसे बाद में आए। लेकिन हम भी मौका निकालकर कोई ना कोई बहाना बनाकर अपना सामान उठाकर उनका खेल बिगाड़कर ही मानते थे, सो वहां से भगा दिए गए। दोस्तों ने आगे चलकर अपनी समझ से हमारी इस
प्रतिभा का भी उपयोग कर लिया कि गुरु इतना बड़ा रोंटा है, इसे कहीं मैच
खेलने चलो तो अंपायर बनाओ। हमारे वाला आउट होगा तो देगा ही नहीं, हमें
फायदा होगा, सामने वाला पीटेगा तो भी हमें फायदा है।
सो हमें अकसर ही
अंपायर बनाया जाने लगा। शहर में हमारी निष्पक्षता के इतने किस्से मशहूर
हो गए कि कहीं से हम गुजरते लोग कहते, अबे वोई है ना जो परसों पिटा था।
जब हम पिट-पिटकर खासे फेमस हो गए, तो हमने खेलना ही छोड़ दिया, हालांकि
हमारे दुश्मनों ने फैलाया था कि खेलने के काबिल तो हम पहले से ही नहीं
थे, अंपायरिंग के भी काबिल नहीं रहे।

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पीयुष पांडेय
पीयूष पांडेय

बचपननामा : व्यंग्यकारों का बचपन ‘ में आज युवा व्यंग्यकार पीयूष पांडेय।
पीयूष पांडेय एकदम से एकदम सतर्क व्यंग्यकार हैं।ख़बरों के गर्भगृह में जॉब करते हैं।सबकी ख़बर लेते हैं।बस अन्य मीडियाकर्मियों की तरह अपनी ख़बर नहीं देते।
…मैं पीयूष से शायद एक बार मिला हूं।शायद इसलिए कि जब उनको ठीक से यादै नहीं तो मुझे भी डाउट होने लगता है।इसके बावजूद उनकी रचनाशीलता से ख़ूब मिलता रहता हूं।वे वनलाइनर के ‘एवन लाइनर’ व्यंग्यकार हैं।दरस्ल फेसबुक तुलनात्मक नज़रिया भी देता है।यानी,उधर हाफ़िज सईद रिहा हुआ,इधर फेबु पर अगणित मुहाफ़िज टूट पड़े।ताकि समाज उनके योगदान से वंचित न रह जाए।ऐसे ‘बच्चे बूढ़े और जवान,पहनें यंग इंडिया बनियान’ माहौल में पीयूष की प्रतिभा चकित करती है।वे मौलिक वाक्य रचते हैं।पीयूष और मुंबई निवासी अमित शर्मा के वनलाइनर मैं ज़रूर पढ़ता हूं।
पीयूष मल्टीलाइनर भी जबरैजबर हैं।उनके व्यंग्य उनकी पीढ़ी और नये कल्चर की नुमाइंदगी करते हैं।इस मामले में उनके साथ भोपाल निवासी अनुज खरे नज़र आते हैं।ये दोनों अपनी नवीनतम समझ के चलते मेरे प्रिय व्यंग्यकार हैं।
पीयूष साफ़गो हैं।ख़ुशदिल हैं।बहुत मसरूफ़ हैं।मसरूफ़ियत के बावजूद फोन रिसीव करते हैं।वरना आलम यह है कि जिस किसी का किसी अख़बार में साढ़े तीन सौ शब्दीय व्यंग्यनुमा छप जाता है,वह दो शब्द बात करना उचित नहीं समझता।पीयूष सहमत और असहमत सलीके से होते हैं।उनके बहुत से फालोअर्स हैं,वे मेरी बात का समर्थन करेंगे।
आज पीयूष पांडेय के बचपन का संस्मरण—
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पैदा होने को लेकर मेरा ‘डिमोशन’ किया गया
■ पीयूष पांडेय
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बचपन इतना मस्त बीता कि इसकी आदत लग गई। मां-बाप ने हैसियत से ज्यादा सुविधाएं और शायद इच्छा से ज्यादा आज़ादी दी। नतीजा आज भी दिल कई बार बड़ा होने से इंकार कर देता है।
पैदा नानी के यहां दिल्ली में हुआ लेकिन बचपन कटा छोटे से कस्बे औरेया में, जहां बापू बैंक में कार्यरत थे।
पैदाइश से जुड़ा एक ताजा सनसनीखेज खुलासा अभी 20-25 दिन पहले ही हुआ। मुझे बताया गया था कि मेरा जन्म दिल्ली के लेडी हॉर्डिंग हॉस्पीटल में हुआ था। लेकिन-अभी 15 दिन पहले अचानक बातों बातों में मां ने कहा कि मेरा जन्म पुरानी दिल्ली के मारवाडी चिकित्सालय में हुआ था।
इस खुलासे के बाद मैं करीब 15 मिनट अवसाद में रहा। एक तो ऐसा लगा कि पैदा होने को लेकर मेरा ‘डिमोशन’ किया गया। दूसरा, बतौर पत्रकार मैंने यदा-कदा लेडी हार्डिंग हॉस्पीटल की खबरों को बेवजह अतिरिक्त तवज्जो दी !

बचपन को अगर 13 साल की उम्र सीमा में रखना एक शर्त है तो फिर मेरे बचपन का मतलब सिर्फ और सिर्फ खेल है। क्रिकेट से कंचे तक। शतरंज से पतंगबाजी तक। लेकिन क्रिकेट से जुड़ी कई यादें हैं। वेस्टइंडीज के खिलाफ सुनील गावस्कर ने जिस टेस्ट में 236 रन बनाए थे, उस मैच की कमेंट्री मैंने ट्रांजिस्टर पर सुनी थी। छह-सात साल का रहा होऊंगा। गावस्कर ने 200 रन पूरे किए तो मैं झूमने लगा। उसी दौरान एक दिन पापा ने नया बैट दिलाया। दुकानदार ने मना किया कि कॉर्क की गेंद से मत खेलना। लेकिन वो बचपन ही क्या, जो सीधे सीधे बड़ों की बात मान ले। मैंने कॉर्क की गेंद से ही खेला और बैट टूट गया। दोपहर से शाम तक दिल धक-धक करता रहा कि आज पापा ज़रुर ठोकेंगे। पापा घर आए तो उन्होंने सिर्फ एक लाइन कही- ‘क्रिकेटर बनना है तो अभी कई बैट टूटेंगे। कोई बात नहीं।’

बचपन को याद करता हूं तो होली याद आती है। होली से बहुत डर लगता था। होली पर दादी के यहां आगरा जाना होता था। जितनी देर रंग खेला जाता-दादी मुझे अपनी गोद में लेकर अंदर के कमरे में बैठी रहतीं। यह हर साल का नियम था। लेकिन-फिर एक साल हम आगरा नहीं जा पाए। औरेया में ही रहे। सुबह सुबह सारे दोस्त घर आ गए। उस दिन अचानक होली का डर निकल गया। दोस्तों ने खूब रंगा। खूब रंगवाया। फिर उनके साथ नहर पर जाकर नहाया। होली की मस्ती को पहली बार महसूस किया।

बचपन में पढ़ने लिखने से अपना सिर्फ उतना वास्ता था कि स्कूल में हर बरस क्लासोन्नति मिल जाए। आठवीं तक जिस स्कूल में पढ़ा-उसका नाम था वीनस कॉन्वेंट इंग्लिश स्कूल। बताइए कॉन्वेंट भी और इंग्लिश भी !! इस स्कूल में पढ़ने के बाद मेरी इंग्लिश जितनी अच्छी होनी चाहिए थी, उतनी थी। सच कहूं तो यह स्कूल था ही नहीं। हम सुबह-सुबह बैट-पैड वगैरह लेकर स्कूल जाते थे, और इंटरवल के बाद बाहर मैदान में खेलने चले जाते थे। छुट्टी तक। जब कभी मना किया जाता तो कई छात्रों के साथ स्कूल से भाग जाते। स्कूल के सामने रेशम फार्म था। तो वहीं घुसकर शहतूत खाते।

मेरा बचपन दरअसल मस्ती की पाठशाला रहा। कोई खास परेशानी नहीं। छोटे से कस्बे में रहते हुए भी पूरा लुत्फ। बिजली आती नहीं थी, लेकिन बिन बिजली के कैसे मजे लिए जाए-ये सीखा। मच्छरों से सीधे दो दो हाथ का हुनर भी बचपन में सीख गए। छत पर पानी छिड़कने के बाद तारों को गिनते हुए सोने का मज़ा आज भी बहुत याद आता है। जन्माष्टमी पर झांकी सजाने का कार्य हर साल धूम धाम से होता था तो उसकी याद भी बरबस आ ही जाती है।

और हां…मर्डर की खबरें हर चौथे रोज़ आती थीं। एक मर्डर अगले दो-तीन दिन तक गप्प के लिए मसाला तैयार कर देता था कि फिर मर्डर हो जाता था किसी का…….

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