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साहित्यकार उदय प्रकाश बता रहे हैं वो विदेशों में इतना ज्यादा क्यों घूमते हैं

उदय प्रकाश, कवि, कथाकार
जेनेवा में कवि व कथाकार उदय प्रकाश

कवि, कथाकार औऱ फिल्मकार उदय प्रकाश जी बता रहे हैं उनके विदेश में प्रवास का कारण, उदय जी भारत के प्रसिद्ध साहित्यकार हैं। कई विदेशी भाषाओं में उनकी रचनाओं का अनुवाद हो चुका है। गाजियाबाद रहते हैं। 

 

उदय जी की कलम सेः

 जब भी मैं देश से बाहर जाता हूँ , अक्सर जाता ही रहता हूँ

एक बात बोलनी है। ऐसा क्यों है कि जब भी मैं देश से बाहर जाता हूँ , अक्सर जाता ही रहता हूँ , तो दोस्त लोग कहते हैं कि मैं जर्मनी गया हूँ. जितना जर्मनी जाता हूँ, उतना ही अमेरिका भी जाता हूँ. दूसरे देशों को भी लगातार जाता ही रहता हूँ. जिन-जिन भाषाओं में मेरी रचनाओं के अनुवाद हैं, उन-उन भाषाओं के देशों में जाता रहता हूँ. अनुवादक, पाठक और वहां के लोग बुलाते हैं. लेकिन हर बार कहा जाता है , जर्मनी गया हूँ. क्या इसलिए कि जर्मनी में मेरा आधा परिवार , बेटा-बहू, पोता-पोती रहते हैं और जर्मनी मुझे प्रिय है. यहां प्रदूषण बहुत कम है. शांति मिलती है. हेमंत के रंग बहुत खींचते हैं. यहां लोग दोस्ताना हैं. खूब घूमता हूँ. स्वास्थ्य सुधरने लगता है. पढ़ने-लिखने वाला, सोचने-विचारने वाला समाज है अभी तक, किसी तरह बचा हुआ.
लेकिन दूसरे देश भी अच्छे लगते हैं. अमेरिका भी उतना ही अच्छा लगता है. शिकागो खासतौर पर. वहां भी कई बार जा चुका हूँ. पिछले दो साल अपने गाँव उन्ही महीनों में रहा आया, जब मुझे वहां होना था. अगले साल, २०१८ में तो छह-सात महीने वहीं बिताने का मन है. रूस जरूर अभी तक नहीं गया. हांलाकि जब दस साल पहले , २००७ में मेरे पुराने मित्र और साथी अनिल जनविजय ने सूचित किया कि मुझे वहां का पुश्किन सम्मान मिला है या उन्होंने खुद ही इसे अरेंज किया है और उसमें १५ दिन की रूस की यात्रा भी शामिल है तो बहुत खुशी हुई थी कि जीवन के सबसे युवा और ऊर्जावान समय को जिस विचारधारा की राजनीति के सुपुर्द-समर्पित किया था, वह देश और समाज अब वार्धक्य में अपनी धुंधली आँख से देखने को मिलेगा। लेकिन ऐसा नहीं हुआ। चार-पांच रोज़ पहले सुप्रसिद्ध अभिनेता इरफ़ान खान से बात हुई, वे सेंट पीटर्सबर्ग में अपनी आगामी फिल्म की शूटिंग कर रहे हैं.
रूस अब बदल चुका है. कहते हैं ट्रम्प के आने के बाद अमेरिका भी पहले जैसा नहीं रहा. हमारे देश की वास्तविक सत्ताएं, जैसा पहले से सोचती थीं, वैसा ही अब हमारे देश में इस समय हो रहा है. वह भी अपनी सत्ता-व्यवस्था के अनुरूप स्वाभाविक रूप से, लेकिन आपराधिक, असंवैधानिक और बहुत हिंसक तरीक़े से बदल रहा है.
दरअसल, इस भूगोल में कुछ ऐसे देश हैं, जहां सिर्फ सरकारें और उनके संस्थान आदि ही भेजा करते हैं. पाकिस्तान और चीन भी ऐसे ही देश हैं. नेपाल तो इसी साल, कई साल के बुलावे के बाद जा सका. युवा लेखक-संस्कृतिकर्मी और मेरे लिखे को चाहने वाले अजित बराल के निमंत्रण पर. नेपाल में ‘मोहन दास’ के बाद अब यग्यश द्वारा किया गया अनुवाद ‘नेलकटर’ कहानी संग्रह का लोकार्पण हुआ. ऐसा प्यार और सम्मान मिला कि लगता है वहां के स्वर्ग पोखरा में लंबा समय गुज़ारूं.
शिकागो से भी शायद जेसन की वजह से भी ऐसा ही नाता है. मिशिगन झील बेतहाशा अपने तट की ओर बुलाती रहती है. न्यूयार्क की हडसन नदी में मैं सोन और नर्मदा, गंगा और यमुना समेत अपने देश की तमाम नदियों के अतीत को खोजता हूँ. जर्मनी की राइन भी ऎसी ही नदी है. राइन के किनारे संसार के कितने साहित्यकार, संगीतकार , विचारक, वैज्ञानिक पैदा हुए , सोचता हूँ तो आश्चर्य से भर जाता हूँ. अभी फ्रांस के शहर लियों गया तो वहां की मध्यकालीन रंगशाला (एम्पीथियेटर) की विशालता और उसका रख-रखाव देख कर अचंभित ही हो रहा था कि वहां एक उस नदी से मुलाक़ात हो गयी, जिसका नाम सोन नदी है. वही सोन , जो मेरे गाँव में मेरे घर के पछीत में बहता है, और जो जर्मनी की नदी नेकार, जिसके किनारे कभी इक़बाल रहा करते थे, की तरह ही पुरुष नद है. अब अगर मैं यह आपको बताऊँ कि
फ्रांस का शहर लियों मेरे बेटे सिद्धार्थ की ससुराल भी है , तो आप इस संयोग के बारे में क्या कहेंगे कि मैंने अपने जन्मभूमि की नदी सोन को अपनी बहू के मायके में पा लिया।
अगले महीने इटली जाऊँगा। वहां के विश्वविद्यालय के विद्वान् अध्यापकों और छात्रों का बुलावा है. मेरे अनुवाद उस भाषा में भी हैं और कुछ शोध प्रबंध भी हैं. मेरे कुछ बहुत प्रिय लेखकों का देश भी है वह. विशेषकर उम्बर्तो इको और इटालो कालविनो का. अभी तक उम्बर्तो इको का ‘ट्रेवलिंग विद सालोमन’ नहीं पढ़ा था, जेनेवा से फ्राइबुर्ग आते हुए बस यात्रा में पढ़ गया और लगा ये तो मेरे ही तमाम यात्राओं के अनुभवों जैसे हैं. अभी-अभी जापानी भाषा में ‘पीली छतरी वाली लड़की’ आयी है, इसके पहले एक कहानी संग्रह आ चुका था, तो अब वहां भी जाऊँगा। नीदरलैंड तो सबसे पहले, चौदह-पंद्रह साल पहले अपनी कविताओं के डच भाषा में अनुवाद की वजह से गया था, ‘अंतर्राष्ट्रीय कविता महोत्सव’, रॉटरडम में हिस्सा लेने। बेल्जियम और नीदरलैंड में भी अन्य भाषाओं की तरह मेरी कविताओं के अनुवाद हैं.
अपने देश को मैं बहुत प्यार करता हूँ. देश के लोगों को भी. लेकिन दुःख होता है कि वर्णव्यवस्था और उसी के साथ गहराई से जुड़े हुए अन्याय, साम्प्रदायिकता और भ्रष्टाचार ने वहां ऎसी स्थितियां पैदा कर दी हैं कि कुछ समय वहां से दूर रह कर, साफ़-सुथरी सांस लेने और एक पूरी नींद सोने का मन करता है.
इसी वर्णव्यवस्था ने हम सब का जीवन तहस-नहस किया है और हम सबकी सृजनात्मक प्रतिभाओं के अलावा हमारे भविष्य को भी आघात पहुंचाया है. दुःख होता है और फ़िक्र कि हमारे समय के कई बेहतरीन दिमाग़ इन्हीं शातिर सत्तापरस्तों द्वारा समय-समय पर उछाले गये नक़ली और प्रायोजित मुद्दों पर अपना बेशक़ीमती समय ज़ाया करते हैं.
वर्णव्यवस्था और इसकी गोद में बैठे हुए अभिजनों की दुरभसंधियों को समाप्त किये बिना किसी बड़े परिवर्तन का सिर्फ स्वप्न ही देखा जा सकता है.
मैं वही करने का काम कुछ दशकों से कर रहा हूँ.
यहां इस समय दिन के ठीक बारह बज कर दस मिनट हुए हैं. बाहर मौसम बहुत सुखद है.
वहां तो अब शाम के चार बज रहे होंगे।

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