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मालिनी अवस्थी की नजर से देखिए त्रिनिडाड को

त्रिनिडाड में मालिनी अवस्थी।
त्रिनिडाड में मालिनी अवस्थी।

लोकगायिका मालिनी अवस्थी हाल ही में त्रिनिडाड से लौटी हैं। तीन संक्षिप्त हिस्सों में उन्होंने त्रिनिडाड का जिक्र किया है। उन्ही की कलम से

 

१)

हज़ारों मील की दूरी, विदेशी भूमि, विदेशी भाषा, खान-पान, पहनावा, विश्वास, संस्कृति भी उनकी भारतीयता को मिटा न सकी।

वे श्रमिक बन कर यहां पहुँचे थे, उन्होंने त्रिनिडाड में पहले से बसे अफ्रीकन नागरिकों के विरोध को सहा, शासको के अत्याचार को सहा, लेकिन अपनी सनातन संस्कृति को न छोड़ा। 
दत्तात्रेय सनातन धर्म मंदिर में पच्चासी फीट ऊंची हनुमान जी की मूर्ति को देख जब मैंने अपना शीश झुकाया तो मंदिर के मुख्य पुजारी बोले, हम अब अपने पुर्वजों की भाषा नही जानते लेकिन अंग्रेज़ी और स्पेनिश में हनुमान जी पर आपको किसी भी हिन्दुस्तानी से बेहतर बता सकते हैं।

उनकी बात सही निकली।

भाग 2

स्वीरें ध्यान से देखें, गिरमिटिया भाइयों बहनों की रजिस्ट्रेशन के दस्तावेजों में से कुछ छवियाँ आपके संज्ञान के लिए

बात उस समय की है जब सम्पूर्ण विश्व में दास प्रथा समाप्त हो चुकी थी। यूरोपीय शक्तियों की साम्राज्यवादी नीतियों ने दास प्रथा का विकल्प ढूंढ निकाला और भारत में ईस्ट इंडिया कंपनी से करार कर सभी यूरोपीय शक्तियों ने 1826 से लेकर 1920 तक यह लगभग पैंतीस लाख पुरुष और महिलाएं बच्चे फ्रांस, डच और अंग्रेज़ी उपनिवेशों में काम करने के लिए ले जाये गए। मॉरीशस, रियूनियन, फ्रेंच गयाना, त्रिनिडाड, सूरीनाम, फिजी आदि देशों में गन्ने की खेती की आड़ में श्रमिक बना कर लाये गए भारतीयों में अधिक संख्या उत्तरप्रदेश एवं बिहार से गये लोगों की थी। इसके अतिरिक्त, मद्रास, पांडिचेरी और केरल से भी लोग इस प्रवासन में शामिल थे। आधुनिक इतिहास में इतने बड़े पैमाने पर कराए गये प्रवासन का दूसरा उदाहरण नही मिलता।
कैरेबियन द्वीपों में सबसे पहले गिरमिटिया भाई 1838 में कलकत्ता से चलकर जमैका पहुँचे
और 30 मई 1845 को फ़तेह रज़ाक नाम का जहाज़ भारत से गिरमिटिया श्रमिकों को लेकर त्रिनिडाड के नेल्सन द्वीप पहुँचा और फिर यह सिलसिला चलता ही रहा। त्रिनिडाड में आये अधिकतर गिरमिटिया उत्तरप्रदेश के रहनेवाले थे। त्रिनिडाड में बसे भारतीय बताते हैं कि उन्होंने अपने पूर्वजों से यही सुना है कि अठारह सौ सत्तावन में भारत के प्रथम स्वतंत्रता संग्राम में शामिल अनेक वीर क्रांतिकारियों के विद्रोही तेवर से भयभीत ब्रिटिश सरकार ने अवध प्रान्त के बागियों को जबरन जहाज़ में भरकर कलकत्ता से त्रिनिदाद भिजवा दिया। 1857 और 1858 में भारतीय युवाओं से भरे हुए जहाजों की खेप त्रिनिडाड पहुँचने के पर्याप्त प्रमाणों से इस अवधारणा को बल मिलता है।
त्रिनिडाड में गिरमिटिया भारतीयों के पूर्वजों के प्राचीन अभिलेखों को जब मैंने स्वयं देखा, तो पाया कि अधिकांश गिरमिटिया पूर्वज उत्तरप्रदेश में लखनऊ लखीमपुर बहराईच फैज़ाबाद गोंडा जौनपुर प्रतापगढ़ बाराबंकी गोरखपुर के रहनेवाले थे। और अधिकतर गिरमिटिया भाइयों की उम्र अठारह उन्नीस से तीस वर्ष के मध्य थी!
उस समय भारत पराधीन था, सामाजिक स्थिति बहुत अच्छी न थी। यूरोपीय देशों ने धन के बदले काम का प्रस्ताव दिया और एग्रीमेंट पर दस्तखत कराया।बेहतर अवसर देखकर अनेक उत्साही युवाओं ने इस “एग्रीमेंट” को स्वीकार किया और कलकत्ता पहुँच कर जहाज़ में बैठकर निकल पड़े अनजाने सफ़र को। एग्रीमेंट को गिरमिट कहनेवाले इसीलिए गिरमिटिया कहलाये। पराधीन थे और पराधीन हो कर अनजाने अनचीन्हे देश जा पहुँचे। अंग्रेजों के अत्याचार का सामना करते हुए उन्होंने कठोर श्रम द्वारा जंगल, पथरीली भूमि और दलदल को उपजाऊ भूमि के रूप में तब्दील कर दिया।

न भोजन पर्याप्त मिलता, न जीने के मौलिक अधिकार! ऐसे में गिरमिटिया भाइयों की प्राणशक्ति बनी राम में उनकी आस्था! रामचरितमानस, हनुमान चालीसा, उनके विश्वास का सबसे बड़े सम्बल बने! आधे पेट रहकर अंग्रेजों के कोड़े खाते हुए भारतीयों के लिए हनुमान जी का बल और राम का संघर्ष उनके लिए संजीवनी बन गया।
नीचे तस्वीरें ध्यान से देखें, गिरमिटिया भाइयों बहनों की रजिस्ट्रेशन के दस्तावेजों में से कुछ छवियाँ आपके संज्ञान के लिए

भाग ३

त्रिनिडाड में लगी साधु की मूर्ती
त्रिनिडाड में लगी साधु की मूर्ती

पराई धरती पर अपने सनातन धर्म और संस्कृति को बचाने की त्रिनिडाड में बसे गिरमिटिया भाइयों की संघर्ष गाथा को शिव दास साधु की जीवन गाथा से समझा जा सकता है। शिव दास साधु को यह बात बहुत विचलित करती थी कि गिरमिटिया भारतीयों के मूल अधिकारों का हनन इस सीमा तक था, कि उन्हें मृत्यु के बाद, शव को जलाने तक का अधिकार नही था। अंतिम संस्कार के अधिकार से वंचित किये जाने के कारण गिरमिटिया भाईयों के अंदर बहुत आक्रोश था। शिव दास साधु ने अंग्रेजी सरकार से अंतिम संस्कार हेतु अलग से छोटा सा भूखंड मांगा जो अंग्रेज़ी सरकार ने देने से मना कर दिया। बार बार मांग मंजूर न होने के बाद शिव दास साधु ने घोषणा की, कि समुद्र पर किसी का स्वामित्व नही है अतः वे समुद्र को पाटकर उसमे अपने समाज के लिए अंतिम संस्कार की भूमि जुटाएंगे। अंग्रेज़ों की प्रताड़ना और प्रकृति का कोप सहकर भी शिव दास साधु समुद्र में मिट्टी भरने का प्रयास करते रहे, उनके साहस और समर्पण ने सम्पूर्ण गिरमिटिया समाज को एकजुट कर इस कार्य में प्रवृत्त कर दिया और अंततः समंदर ने उनके आगे समर्पण कर दिया और स्थानीय जनता और शासन के विरोध के बावजूद शिव दास साधु भारतीयों के अंतिम संस्कार के लिए भूमि निर्मित करने में सफल हुए। यह कहानी सुनाते हुए एक स्थानीय व्यक्ति के मुख से निकला कि शिव दास साधु के प्रयास से हमारे लोगों को सम्मान पूर्वक मृत्यु का अधिकार मिला मुक्ति मिली।
सागर किनारे बना श्वेत मंदिर और साधु की मूर्ति और पार्श्व में चिताओं से उठता धुंवा और कुछ नही, भारतीय संस्कृति की आभा से प्रदीप्त दीपशिखा सी प्रतीत होती है।
आज त्रिनिडाड में लगभग चालीस प्रतिशत हिन्दू धर्म मतावलंबी हैं और बहुत यत्नपूर्वक सनातन धर्म एवं भारतीय संस्कृति का संरक्षण कर रहे हैं।

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