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शबाना आजमी भले ही कितनी बड़ी अभिनेत्री हों, उनमें मुझे बौद्धिकता नजर नहीं आई

शबाना आजमी, अभिनेत्री
शबाना आजमी, अभिनेत्री
उमेश चतुर्वेदी, वरिष्ठ पत्रकार
उमेश चतुर्वेदी, वरिष्ठ पत्रकार

वरिष्ठ पत्रकार एवं आकाशवाणी में सलाहकार उमेश चतुर्वेदी जी अपने पुराने दौर को याद करते हुए हिंदी अखबारों की कार्य पद्धति के बारे में कुछ बता रहे हैं। उमेश जी दिल्ली रहते हैं। देश भर की पत्र पत्रिकाओं में उनके नियमित स्तंभ छपते हैं। उनके आलेखों में समाज को दिशा देने की पर्याप्त क्षमता है। 

 

2002 की बात है..उन दिनों हिंदी के अखबारों में एक परिपाटी शुरू हुई। बड़े और नामचीन लोगों के लेख छापना। ये लोग लेखक या पत्रकार नहीं थे..बल्कि दूसरे क्षेत्रों के नामी हस्ती थे। वैसे यह परिपाटी अंग्रेजी अखबारों की नकल थी। उन दिनों मैं दैनिक भास्कर के दिल्ली ब्यूरो में था। ब्यूरो में जूनियर था और लिखने की थोड़ी-बहुत समझ थी, इसलिए उन दिनों के संपादक बड़े और नामचीन लोगों से लेख लिखवाने के लिए मेरी ही ड्यूटी लगाते। उनका नाम लेना जरूरी नहीं समझता..।
लेख लिखवाना क्या था, नामचीन हस्ती से मिलना, उससे किसी प्रासंगिक मुद्दे पर उसकी राय जानना और उनके नाम से संपादकीय पेज के लिए एक लेख लिखकर दे देना। इस कड़ी में पूर्व प्रधानमंत्री चंद्रशेखर, पूर्व प्रधानमंत्री विश्वनाथ प्रताप सिंह, तब राज्यसभा की मनोनीत सदस्य शबाना आजमी और विश्व या भारत सुंदरी रह चुकी नफीसा अली आदि से मैं मिलता रहा..उनकी राय लेता और उनके नाम से लेख लिखकर अखबार को देता और वे लेख उन हस्तियों के नाम से छपते रहे। अपना नाम कहीं पांच प्वाइंट में प्रस्तुति में भी नहीं छपता था।

तत्कालीन संपादक को हिंदी वाले मूर्ख नजर आते थे..लेकिन रोटी तब भी वे हिंदी से कमाते थे..और आज भी कमाते हैं..खैर..संपादकीय पेज के लिए इन नामचीन हस्तियों के नाम लेख लिखने के क्रम में उनकी राय बटोरते सबसे ज्यादा प्रभावित दोनों पूर्व प्रधानमंत्रियों ने ही किया। दोनों के पास स्पष्ट विचार थे..तथ्य थे। वे चाहते तो खुद भी लिख सकते थे। एक बार तो चंद्रशेखर के लिए मैंने सिर्फ स्टेनो की भूमिका निभाई। पूरा लेख उन्होंने लिखवा दिया था।

बहरहाल इस मामले में शबाना आजमी और नफीसा अली-दोनों ने खासा निराश किया। शबाना तो दिल्ली के अशोक रोड के उस बंगले में सुबह-सुबह बुला लेती थीं, जिसमें अभी शांता कुमार रहते हैं। आठ बजे के करीब मैं भागते हुए उनके पास पहुंचता था। तब तुरंत नहाकर आईं शबाना खुले बालों के साथ कुर्सी पर बैठ जातीं और रह-रहकर अपने बालों को झटकते हुए पानी की फुहारें आस-पास फैलाती रहती थीं..उस वक्त उनकी जुबान पर चार शब्द होते..फासीवाद, फासिस्ट, सांप्रदायिकता और धर्मनिरपेक्षता। तत्कालीन मुद्दों के साथ इन चारों शब्दों को जोड़कर बमुश्किल दस लाइने बोलतीं और फिर कहतीं कि इसी के आधार पर लेख लिख दीजिए। इतना ही नहीं, वे कहतीं कि छापने से पहले लेख को दिखा लें। यह बात और है तीन बार उनसे मैंने प्रत्यक्ष बात की और तीनों ही बार इन्हीं चार शब्दों के इर्द-गिर्द उनका सानिध्य लाभ प्राप्त करता रहा। लेकिन एक बार भी मैंने उनके नाम पर लिखे लेख को छापने से पहले उन्हें नहीं दिखाया।

बाद में मैंने उस वक्त के संपादक से साफ कह दिया कि शबाना के नाम पर लेख लिखने के लिए मुझे विषय बता दिया जाए। बेकार में सुबह-सुबह नींद खराब कर मुझे जाने से मुक्ति मिलेगी और मैं लेख लिखकर दे दूंगा। लब्बोलुआब यह कि शबाना भले ही कितनी बड़ी अभिनेत्री हों, उनमें मुझे बौद्धिकता नजर नहीं आई और इससे मैं निराश हुआ। बाद में संसद कभी रिपोर्ट करने पहुंचा तो वे देखती या दिखतीं भी तो मेरे मन में उनके प्रति कोई भाव या आकर्षण नहीं होता था..संसद के मुख्य दरवाजे पर कभी वे मुझे गौर से देखतीं..उन्हें शायद गुस्सा भी आता होगा कि यह टुटपूंजिया पत्रकार उन्हें भाव नहीं दे रहा..एक बार मेरे के तब के कैमरा मैन नवीन बंसल ने मेरा ध्यान इसकी ओर आकर्षित भी किया था। जाहिर है कि फिर भी मैं उनके पास नहीं गया।

मेरी एक कमजोरी है, अगर किसी नामचीन हस्ती ने बौद्धिक रूप से प्रभावित नहीं किया तो मैं उसकी तरफ शायद ही आकर्षित हो पाता हूं..पद्मावती फिल्म पर जारी विवाद और गोवा फिल्म समारोह से न्यूड और एस दुर्गा को हटाने को लेकर जिस तरह उन्होंने आक्रामक रवैया अख्तियार कर रखा है तो उससे लोगों को ऐसा ही लगता है कि वे प्रखर बौद्धिक हैं और उनकी सोच बड़ी व्यापक है..लेकिन उनके नाम पर पांच-सात बार लेख लिखने के दौरान मुझे कभी ऐसा नहीं लगा कि वे गहरे अंतरतम और बौद्धिक सोच से लैस हैं..

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