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छत्तीसगढ़ में पत्रकार व पत्रकारिता दोनो संकट मेंः राजकुमार सोनी 

पत्रिका छत्तीसगढ़ के ब्यूरो प्रमुख राजकुमार सोनी
पत्रिका छत्तीसगढ़ के ब्यूरो प्रमुख राजकुमार सोनी

मीडिया मिरर की साक्षात्कार श्रंखला बात मुलाकात में इस बार हमारे अतिथि हैं  छत्तीसगढ़ राजस्थान पत्रिका अखबार के स्टेट ब्यूरो हेड राजकुमार सोनी। श्री सोनी से मीडिया मिरर ने लम्बी बातचीत की। छत्तीसगढ़ में पत्रकारिता की चुनौतियां, पुलिस और नक्सलियों के बीच पत्रकारों के सामंजस्य आदि प्रमुख मुद्दों पर बातचीत हुई। 

 

मीडिया मिरर सम्पादक प्रशांत राजावत के सवाल

पत्रिका के स्टेट ब्यूरो हेड राजकुमार सोनी के जवाब

 

सवालः आपकी तीन नई किताबें आ रही हैं। उनके बारे में कुछ बताइए। किस विषय पर हैं ये किताबें। खासतौर पर लाल गलियारे से और बदनाम गली के बारे में बताइए। बड़े दिलचस्प नाम हैं।

जवाब- जी… वर्ष २०१८ में तीन किताबें आ जाएगी। शायद जनवरी-फरवरी तक। दरअसल यह सारी किताबें मैंने पत्रकारिता से जुड़े हुए नए साथियों को ध्यान में रखकर तैयार की है। बहुत से नए साथी पत्रकारिता में आते हैं तो वे किसी न किसी स्टोरी पर काम के सिलसिले में मुलाकात करते ही हैं। वे उन खबरों की मांग भी करते हैं जो कभी प्रकाशित हुई थी। तीन किताबों में मेरी वह सारी स्टोरी शामिल है जिन पर मैंने काम किया है। एक किताब जिसका शीर्षक   ‘बदनाम गली  है वह रायपुर की तवायफ गली के बंद हो जाने के बाद की गई पड़ताल है। इस किताब में बस्तर के घोटुल के अलावा अन्य विषयों पर भी कुछ अच्छी स्टोरी शामिल है। दूसरी किताब   ‘भेडि़ए और जंगल की बेटियां   में बच्चियों की तस्करी का मसला शामिल है। इस पुस्तक में धान के कटोरे में खेती के संकट और किसान आत्महत्याओं पर लिखी खबरें भी शामिल है। तीसरी किताब ‘लाल गलियारे से में छत्तीसगढ़ के माओवादी इलाकों में की गई ग्राउंड रिपोर्टिंग शामिल है।

 

सवालः एक साथ तीन किताबें। ये लय कैसे बनी। 

जवाब– एक साथ तीन किताबों की लय बन गई। मुझे लगा अगर अब कुछ नया करना है तो पुराने सारे लिखे हुए को एक जगह समेट देना होगा। एक नाटक की किताब भी आनी है, उसके बाद कुछ नया करने की योजना है। मैं मूल रूप से भिलाई शहर का रहने वाला हूं। यह शहर मुझे बेहद आकॢषत करता है। बेकारी और मुफलिसी से भरे दिनों में इस शहर के लोगों ने खूब प्यार दिया। मटरगस्ती का मौका भी। यह शहर अपने ढंग से बदलता रहा है। अब भी बदल रहा है। मुझे इस शहर पर एक उपन्यास लिखना है जिसमें मैं भी कहीं शामिल रहूंगा।

सवालः आपने कोरस, घेरा, मोर्चा, गुरिल्ला आदि नाटक लिखे। नाटक का निर्देशन भी करते हैं। गायक भी हैं। रफी की आवाज में बड़ा सुंदर गाते हैं। पत्रकार भी हैं। किताबें भी लिखी हैं। कैसे कर लेते हैं इतनी सारी चीजें। लोगों से तो एक भी ठीक से नहीं होता।

जवाब-बस.. जो नाटक लिखे हैं वह किताब भी आ जाएगी अगले साल। पहले नाटकों में अभिनय भी करता था और निर्देशन भी, लेकिन पिछले कुछ सालों से छूट सा गया है। रंगमंच के साथी फिर से रंगमंच की तरफ लौटने को कहते हैं। सोचा है अब उनके लिए स्क्रिप्ट ही लिखी जाए। जहां तक गायकी का सवाल है तो मैं बिलकुल भी अच्छा नहीं गाता। अलबत्ता मेरे पिता बेहद अच्छे गायक थे। रफी साहब के जिस गाने को सुनकर आप कह रहे हैं दरअसल वह प्रेस क्लब में आयोजित की गई एक प्रतियोगिता में यूं ही गा दिया था मैंने। मित्र-यार तो कहते हैं कि मैं किशोर की नकल करता हूं। सही भी है उनकी बात। जब थियेटर से जुड़ा था तब मंच और नेपथ्य में नाटकों के लिए गीत लिखता था। उसकी धुन तैयार करता था और फिर गाता भी था।

सवालः आप अपने को सबसे बेहतर किस विधा में पाते हैं। लेखक, पत्रकार, नाट्य निर्देशक,गायक।

जवाब-क्या कहूं कि किस क्षेत्र में बेहतर हूं। इस सवाल को सुनकर लग रहा है कि मैं अचानक बेहद बड़ा एक्टर या पत्रकार हो गया हूं। हकीकत यही है कि मैं अभी भी सीख ही रहा हूं। मैं नाटक इसलिए नहीं करता रहा कि फिल्मी दुनिया का हिस्सा बनना है और पत्रकार इसलिए नहीं बना कि राज्यसभा या लोकसभा की टिकट हासिल करनी है। मुझे लगता है कि एक पत्रकार को बहुत सारी चीजें आनी ही चाहिए। अगर आप मोटर बाइक से किसी जंगल में कोई स्टोरी कवर करने गए हैं और बाइक का पिछला चक्का पंचर हो जाए तो आपको पंचर बनाना भी आना चाहिए।

 

सवालः बहुत सारी चीजें एक साथ करते हैं आप। कभी ऐसा नहीं लगता कि किसी एक विधा पर पूरा फोकस करते तो उस क्षेत्र के शिखर पर होते। 

जवाब-मैंने किसी भी तरह की बुंलदी पर पहुंचने के लिए कुछ नहीं किया। वैसे यह सच है कि जब हम किसी एक चीज पर फोकस करते हैं तो उसमें विशेषज्ञता हासिल करते हैं, लेकिन मुझे तो फिल्मी गीत भी अच्छे लगते हैं और शास्त्रीय संगीत भी पंसद है। मैं गंभीर फिल्में भी देखता हूं कई बार कुछ सीखने के लिहाज से बंडल फिल्म भी देख लेता हूं। मुझे आदिवासियों के बीच जाकर उनका गीत सुनना भी अच्छा लगता है। नदी-पहाड़-गुफाओं और कंदराओं में कई चीजें बिखरी पड़ी है। मुझे वहां मौजूद सारी चीजें पंसद है। जंगल में रात के अंधेरे में चमकने वाले जुगनू भी अच्छे लगते हैं।

 

सवालः मैने आपको सुना है। रफी की आवाज में गाते हैं। सार्वजनिक मंचों पर भी गाते हैं। कैसे हुई ये शुरूआत जब आपको लगा कि मैं गा सकता हूं। गाना चाहिए।

जवाब-रफी साहब की आवाज में गाना बेहद कठिन है। मैं उनके कुछ गीतों को ही गाने की असफल सी कोशिश करते रहता हूं। मुख्य रुप से किशोर दा को गाना अच्छा लगता है। जब रोजी-रोटी का संकट था तब भी सार्वजनिक मंचों पर गाने से बचता था। अब भी बचता हूं। दोस्त-यारों के चक्कर में गा लेता हूं बस…।

सवालः छत्तीसगढ़ से बाहर भी आपके लिखे नाटकों का मंचन हुआ है कभी।

जवाब- हमारी एक संस्था है-कोरस। इस संस्था के बैनर तले हमने जबलपुर, सोलन, शिमला, बड़ौदा, पटना सहित कई जगहों पर नाट्य प्रस्तुतियां दी है। हमारी टीम के नाटकों ने कई जगहों पर पुरस्कार भी हासिल किए हैं। पुरस्कारों की फेहरिस्त लंबी है।

 

सवालः मैं पढ़ रहा था कहीं आपके बारे में कि आपको साहसिक पत्रकारिता के लिए सम्मानित किया गया। वो किस तरह की रिपोर्ट थीं। संक्षेप में बताइए।

जवाब- माओवादी इलाकों में की गई कुछ रिपोर्टिंग के लिए पुरस्कृत करने वाली संस्थाओं ने यह माना था कि शायद मैंने कुछ ठीक-ठाक काम किया है। सच तो यह है कि जो भी पुरस्कार मुझे मिला है उसमें मुझसे ज्यादा मेरे संस्थान का साहस निहित है। तीन साल तहलका हिंदी के लिए काम किया तब भी छत्तीसगढ़ के चप्पे-चप्पे की स्टोरी लिखी, लेकिन एक रोज मेरा तबादला कर दिया गया। किसी एक सेठ ने फे्रंचाइंजी ले ली थी तहलका की। पता नहीं अब क्या हाल है। फिलहाल पत्रिका में हूं और खबरें लिख रहा हूं।

 

सवालः पत्रकारिता पर चर्चा करते हैं। छत्तीसगढ़ की पत्रकारिता को आपने करीब से देखा है। अगर आप अपने शब्दों में छत्तीसगढ़ की वर्तमान पत्रकारिता को परिभाषित करें। तो कैसें करेंगे। दशा औऱ दिशा

जवाब- छत्तीसगढ़ में पत्रकारिता और पत्रकार दोनों संकट में हैं। कई पत्रकारों की हत्या हो चुकी है। कई पत्रकार झूठे मुकदमे झेल रहे हैं। यहां एक अघोषित आपातकाल लागू है। जहां आपातकाल लागू है वहां दशा और दिशा क्या होगी। अभिव्यक्ति के खतरे उठाने ही होंगे… तोडऩे ही होंगे गढ़ और मठ सारे। हम लोग डटे हुए हैं। कब किस खबर पर परिजनों पर झूठे मुकदमे लद जाएंगे कुछ नहीं कहा जा सकता। कब कोई जेल में ठूंस देगा या गोली मार देगा कुछ नहीं कहा जा सकता।

सवालः छत्तीसगढ़ में नक्सली बेल्ट को छोड़ दें बावजूद अन्य इलाकों में भी पत्रकारों के लिए स्थिति सामान्य नहीं है। क्या ये सच है।

जवाब- नक्सली बेल्ट में तो पत्रकार दोधारी तलवार पर काम कर रहे हैं। उन्हें माओवादी और पुलिस दोनों तरफ से धमकी-मिलती है। अन्य इलाकों में भी स्थिति सामान्य नहीं है।

 

सवालः अभी एबीपी न्यूज के एंकर अभिषार बता रहे थे कि वर्तमान रमन सरकार व उनके मंत्रियों का मीडिया पर काफी नियंत्रण है। अगर ये सच है, तो कोई घटना जिसके आप प्रत्यक्षदर्शी हों।

जवाब- अभिषार जी और उनके जैसे तमाम बड़े पत्रकार हकीकत से वाकिफ है, बावजूद इसके वे एक भी बार जमीनी रिपोर्टिंग के लिए छत्तीसगढ़ आना जरूरी नहीं समझते। दिल्ली के पत्रकारों के साथ सबसे बड़ी दिक्कत यहीं है कि वहां एक पाश इलाके की मौत की खबर को वे पूरे दिन टीवी पर चलाते हैं, लेकिन यहां माओवादी इलाकों में मारे जाने वाले बेकसूर ग्रामीणों पर चुप्पी साध लेते हैं।

 

सवालः छत्तीसगढ़ में मीडिया के लिए कई बड़ी खबरें हैं। पर वो दिल्ली तक क्यों नहीं पहुंच पातीं।

जवाब- छत्तीसगढ़ में मीडिया के लिए कई बड़ी खबरें तो हैं, लेकिन वह मीडिया तक नहीं पहुंच पाती। अगर पहुंच भी गई तो कौन सा मीडिया छाप लेगा? कौन ठीक ढंग की पड़ताल करेगा? यह भी एक बड़ा सवाल है।
सवालः छत्तीसगढ़ में आप सबसे बड़ी समस्या के रूप क्या पाते हैं। नक्सवाद, बेरोजगारी, पिछड़ापन, अशिक्षा, स्वास्थ्य सेवाएं, बदहाल किसान, उद्योगीकरण की मार से प्रभावित पर्यावरण व गरीब।

जवाब-छत्तीसगढ़ को माओवाद की चुनौती विरासत में मिली है। देश के अन्य हिस्सों की तरह यहां भी बेरोजगार है। स्वास्थ्य सेवाएं तो लचर है ही। विशेषकर बस्तर और सरगुजा जैसे इलाकों में हम आज भी खाट में मरीजों को लाना-ले जाना देखते हैं और छापते हैं। अशिक्षा तो है ही लेकिन धान के कटोरे में खेती का रकबा भी घट रहा है। समस्याएं तो और भी है।

सवालः बहुत पहले की बात है कोई पत्रकार ही मुझे बता रहा था कि छत्तीसगढ़ में औद्योगिक घरानों की बड़ी मनमानी है। ये सरकार और मीडिया से सांठगांठ करके गरीबों की जमीने हड़प रहे हैं और अपना विस्तार कर रहे हैं। क्या वाकई मीडिया की मिलीभगत भी है ऐसे मामलों में।

जवाब- इसमें कोई दो मत नहीं कि आदिवासी और ग्रामीणों की जमीनों पर डाका डाला जा रहा है। लगभग दो साल पहले रोगदा बांध को ही बेच दिया गया। मीडिया में गरीब आदिवासियों के बेघरबार किए जाने को लेकर तह में जाने वाली खबरें बहुत कम आ पाती है इसलिए मीडिया की भूमिका को लेकर भी सवाल उठते हैं।

सवालः नक्सल प्रभावित क्षेत्रों में नक्सल मामलों की रिपोर्टिंग के दौरान क्या चुनौतियां हैं। छत्तीसगढ़ के वरिष्ठ पत्रकार बाबूलाल शर्मा कहते हैं कि पुलिस और नक्सली दोनों को साधकर चलना पड़ता है पत्रकार को। वरना दोनो से खतरा। क्या है सच्चाई थोड़ा प्रकाश डालें।

जवाब- माओवाद प्रभावित इलाकों में पुलिस तो यह कतई नहीं चाहती है कि उनकी सच्चाई सामने आए। माओवादी अपने हिसाब से रिपोर्टिंग चाहते हैं। यह सच है कि एक पत्रकार को माओवादी इलाकों की रिपोर्टिंग के दौरान संतुलन कायम रखना पड़ता है। यह संतुलन कायम भी रहना चाहिए। वैसे निजी तौर पर मेरा मानना है कि हिंसा चाहे माओवादियों की तरफ से हो या पुलिस प्रायोजित… वह बंद होनी चाहिए।

 

सवालः पुलिस अधिकारी कल्लूरी वाकई खलनायक थे या पत्रकारों ने बना डाला। कहते हैं पत्रकारों को भी नहीं बख्सतें थे।

जवाब– कल्लूरी साहब के बारे में सरकार ज्यादा अच्छे से बता सकती है। वैसे यह सच है कि वे जब तक बस्तर में पदस्थ थे तब तक मानवाधिकार कार्यकर्ता और पत्रकार उनकी कार्यशैली को लेकर सवाल उठाते थे।

 

सवालः कल्लूरी ने एक बार बयान दिया था कि ये पत्रकार एक्टिविस्ट से मिलकर पुलिस के पीछे पड़े रहते हैं।

जवाब- पत्रकार केवल पुलिस की विज्ञप्ति ही नहीं छाप सकता। अगर वह पत्रकार है तो। एक अच्छे पत्रकार को सबसे मिलना-जुलना चाहिए चाहे वह सामाजिक कार्यकर्ता हो या कोई और।

 

सवालः अच्छा जहां तक मैं पढ़ता हूं छत्तीसगढ़ नक्सली मामलों को। पढ़ता हूं आएदिन पुलिस और मानव अधिकार कार्यकत्ताओं में झड़प होती रहती है। माजरा क्या है।

जवाब-पुलिस और मानवाधिकार कार्यकर्ता आपस में भिंडते तो रहते हैं। यह भिंडना ठीक भी है। जहां भी मानवाधिकारों का हनन होगा वहां हस्तक्षेप जरूरी भी है। एक अच्छे लोकतंत्र में सबको सहमति और असहमति प्रकट करने का अधिकार है।

 

सवालः पुलिस कहती है कि एक्टिविस्ट नक्सलियों से मिले हैं और एक्टिविस्ट कहते हैं कि पुलिस अत्याचार कर रही है। सच क्या है। आप बतौर पत्रकार किस तरह देखते हैं।

 जवाब- फिलहाल बस्तर एक युद्ध क्षेत्र में तब्दील है। जहां-जहां भी युद्ध चलता है वहां- वहां सैकड़ों तरह के आरोप-प्रत्यारोप साथ चलते हैं। एक पत्रकार के नजरिए से मैं पाता हूं कि बस्तर में पुलिस ज्यादती जरूरत से ज्यादा है। पुलिस ने वहां के स्थानीय रहवासियों को कभी भी भरोसे में लेकर काम नहीं किया इसलिए माओवाद की समस्या चुनौती के तौर पर विद्यमान है। पुलिस के बड़े अफसर भी मानते हैं कि अभी आदिवासियों का भरोसा जीतना बाकी है।

 

सवालः एक बहुत सामान्य सा प्रश्न मेरे जेहन में अक्सर उठता है कि छत्तीसगढ़ में न्याय और सामंजस्यता के लिए हमेशा से बाहरी लोगों की जरूरत क्यों पड़ती है। वहां नेता भी हैं, सरकारें भी है, पुलिस भी और सामाजिक संगठन भी। फिर विदेशों से पढ़े लिखे बेला भाटिया, नंदिनी सुंदर, ईशा खंडेलवाल और अरुंधति रॉय जैसे लोग यहां अगुवा क्यों हैं।

 जवाब-पता नहीं आपकी नजर में बाहरी कौन है? मैं तो माओवादियों को भी इस देश का नागरिक मानता हूं और बेला भाटिया, नंदिनी सुंदर को भी। देश के किसी भी हिस्से की पुलिस जो बस्तर में पदस्थ है वह भी बाहरी नहीं है। जहां तक न्याय और सामंजस्यता का सवाल है तो एक सवाल यह भी है कि माओवाद के खात्मे के नाम पर हम ऐसा कृत्य ही क्यों करें कि हमें सवालों के कटघरे में खड़ा होना पड़े? जब पुलिस सही माओवादियों को पकड़ेंगी तो कोई क्यों विरोध करेगा। माओवादियों के नाम पर यदि बेकसूर ग्रामीण मारे जाएंगे तो देर-सबेर विरोध दिखेगा ही।

 

सवालः कहते हैं कि मानवअधिकार कार्यकत्ताओं को नक्सली फंडिंग करते हैं पुलिस को दबाने के लिए।

जवाब- मानवाधिकार कार्यकर्ताओं को कहां से फडिंग होती है इस बारे में या मानवाधिकार कार्यकर्ता बता सकते हैं या उनके बही-खातों की पड़ताल करने वाली पुलिस।

 

सवालः पत्रकार संतोष यादव के बारे में कहा जाता है कि कल्लूरी के बारे में उन्होंने कुछ व्हाट्सएप पर मजाक लिख दिया था, उन्हे गिरफ्तार कर लिया गया। इतनी सख्ती क्या अब भी है। ऐसे तो कोई पत्रकार डर डर के पुलिस के खिलाफ खबरें लिखता होगा, या लिखता ही नहीं होगा।

 जवाब- बस्तर में कई पत्रकार पुलिसिया जुल्म के शिकार हुए हैं। इस बारे में पहले भी काफी कुछ छप चुका है। अब भी छप ही रहा है।

 

सवालः सोनी सोरी के साथ पुलिस ने जो किया क्या अब भी इस तरह की घटनाए दबे छिपे होती होंगी।

 जवाब-सोनी सोरी माओवादी गतिविधियों में लिप्त थीं या नहीं या तय करने का अधिकार न्यायालय को है, लेकिन एक महिला के साथ पुलिस ने जो ज्यादती की वह निदंनीय है। बस्तर के आदिवासी सीधे-सादे हैं। भोले-भाले है। बस्तर की पृष्ठभूमि चंबल से अलग है… अन्यथा सोरी भी फूलन देवी बन जाती।

 

सवालः कहते हैं कि समस्या से बेहतर ये है कि समाधान खोजो। पत्रकार और पुलिस के बीच संबंध बेहतर कैसे हों इसके लिए आपके पास कोई उपाय।

जवाब- पुलिस और पत्रकार ही नहीं… सबके बीच बेहतर तालमेल से ही किसी भी राज्य का विकास संभव है। उपाय यहीं है कि सरकार असहमति के किसी भी स्वर को कुचलने का उपक्रम न करें। असहमति पर गौर करके ही रास्ता खोजा जा सकता है। छत्तीसगढ़ का कोई भी पत्रकार नहीं चाहता है कि पुलिस और माओवादियों के बीच बेकसूर आदिवासी मौत के घाट उतारे जाएं। हर पत्रकार अमन-चैन देखने का पक्षधर है। मैं भी हूं।

 

सवालः एक्टिविस्ट कहते हैं कि पुलिस फर्जी एनकाउंटर करती हैं, साधारण आदिवासियों या जन जातियों को नक्सली बताकर गिरफ्तार कर लेती है, उनकी महिलाओं के साथ जोर जबरदस्ती करती है। क्या वाकई पुलिस वहां इस स्तर की है या एक्टिविस्ट की भी कुछ अपनी राजनीति है।

 जवाब-सामाजिक कार्यकर्ता ही नहीं.. अब तो ग्रामीण भी खुलकर कहते हैं कि पुलिस उनके साथ किस तरह की ज्यादती करती है। यह जमीनी हकीकत ग्राउंड पर जाकर ही जानी जा सकती है। दिल्ली से बैठकर केवल प्राइम टाइम पर बहस ही हो सकती है।

 

सवालः हर बड़े चैनल व अखबार (हिंदी व अंग्रेजी दोनो) के संवाददाता छत्तीसगढ़ में हैं। पर हम दिल्ली में बैठे लोग एक्सक्लूसिव के नाम पर बस नक्सलियों की मौत या नक्सलियों के हमले में पुलिस वालों की मौत की खबरें पढ़ते हैं। औऱ समस्याएं या कुछ अच्छा क्यों नहीं दिखाया जाता।

 जवाब- बड़े अखबार और चैनल किस तरह की पॉलिसी पर चलते हैं यह तो वे ही बता सकते हैं। लेकिन हम माओवादी इलाकों की दूसरी समस्याओं पर भी गौर फरमाते हैं।

 

सवालः छत्तीसगढ़ में सबसे लोकप्रिय अखबार व चैनल कौन सा है।

जवाब- छत्तीसगढ़ में पत्रिका के आने के बाद पत्रकारिता की धार तेज हुई है। हम बेहतर है यह हम नहीं कहते हैं। पाठक हमारी खबरों पर भरोसा करता है। चैनल का नहीं पता क्योंकि कई स्थानीय चैनल चल रहे हैं। मैं किसी भी चैनल की खबर को नहीं देखता।

 

सवालः आप स्टेट ब्यूरो हेड हैं। स्थानीय पत्रकारिता में पेड न्यूज का क्या प्रभाव है।

  जवाब- फिलहाल तो पेड न्यूज का प्रभाव नहीं दिखता है। जब चुनाव करीब होंगे तब कोई राय कायम होगी।

 

सवालः औद्योगिक घराने, सरकारें विज्ञापन का दबाव देकर खबरें अपने हिसाब से प्रकाशित करवाती हैं। आपके साथ क्या अनुभव हैं।

जवाब-मैं अपने अखबार में सिर्फ खबरों तक ही सीमित हूं इसलिए यह अनुभव अभी नहीं मिला है कि किस तरह का दवाब होता है।

 

सवालः जिस समूह के आप हिस्सा हैं यानी कि राजस्थान पत्रिका समूह। बहुत क्रांतिकारी अखबार और उसके मालिक भी। पर फिलवक्त मजीठिया वेज बोर्ड को लेकर सबसे ज्यादा प्रताडित पत्रिका समूह के ही पत्रकार हैं। राजस्थान, मप्र में बड़ी संख्या में मामले कोर्ट में लंबित हैं। क्या आपके यहां भी प्रबंधकों का विरोध है। मजीठिया को लेकर आपकी राय क्या है।

जवाब- मैं बहुत पैसे-वैसे को लेकर पत्रकारिता में नहीं आया था। इस मजीठिया बोर्ड- वोर्ड के तामझाम से भी दूर हूं। मेरे पास पत्रकारिता में नेतागिरी करने के लिए वक्त भी नहीं है। दूसरी तरह की नेतागिरी करने में भी कोई रुचि नहीं है मेरी।

 

सवालः बीबीसी छत्तीसगढ़ के आलोक पुतुल से मेरी बात हो रही थी एक दिन। उन्होंने कहा कि छत्तीसगढ़ में पत्रकारिता करना आसान नहीं। पुलिस की गुंडागर्दी चरम पर है। क्या कहेंगे।

जवाब- आलोक जी की बात से सहमत हूं। छत्तीसगढ़ में पत्रकारिता का जोखिम बढ़ गया है।

 

सवालः क्या कहेंगे नई पीढ़ी से जो पत्रकारिता में आना चाहती है। 
जवाब-नई पीढ़ी से यहीं कहूंगा कि वे उम्मीद का दामन न छोड़े। अंधेरा तो है, लेकिन उम्मीद है कि एक दिन सब कुछ बेहतर होगा

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