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उदय प्रकाश राह चलते पुल बन जाते हैं विश्व साहित्य का

उदय प्रकाश, कवि, कथाकार
जेनेवा में कवि व कथाकार उदय प्रकाश

उदय प्रकाश ने विदेश में अपनी यात्रा के दौरान कितना शानदार अनुवाद किया है। पढ़िए

 

। क़मीज़ ।।

मुझे याद है एक बार मैं दौडा था तुम्हारे पीछे और तुम्हारी फहराती हुई क़मीज़ मैंने
हवाओं में टाँग दी थी।

एक बार, बहुत दिन हुए, मैंने एक भरपूर गिलास कुछ पिया था
और तुम्हारी तस्वीर सिहरती हुई
उस भरे हुए गिलास के कुछ में फिसल कर तैरने लगी थी।

और फिर वह कोई और नहीं, तुम ही तो थीं, जिसे मैंने एक लापरवाह
स्त्री की अकेली गुनगुनाहट के संगीत में एक दिन सुना था।

एक रात जब दोस्तों के साथ, अलाव की सुर्ख दहकती चिनगारियों के क़रीब बैठा मैं अपनी ही भाषा में कोई क़िस्सा सुना रहा था चाँदी की तरह चमकते सितारों-नक्षत्रों के दूर तक पसरे विस्तार के नीचे
वह कोई और नहीं, तुम ही थी, जो हँसती हुई
वहाँ धुँधली लड़खड़ाती परछाइयों के पीछे चुपचाप छुप गयीं थीं।

मेरी स्मृतियों में सवालों के वे आधे-अधूरे टूटे-बिखरे तुम्हारे जवाब यकीन दिलाते हैं कि तुम
अब भी कहीं हो, जीवित,
शहर की धक्का-मुक्की, हाय-तौबा के बीच किसी दरवाज़े के पीछे से
किसी रहस्य भरी परछाईं की आड़ में छुपी हुई
अपनी खोजती हुई आँखों से मुझे खोजती हुई।

या काई और पत्तियों के किसी ढेर के पीछे चुपचाप इंतज़ार करती हुई
किसी बलूत की मुड़ी हुई टहनी के नीचे बैठी हुई फिर से दूर भाग जाने को तैयार
ठीक तब, जब
मैं तुम्हारी कांपती हुई क़मीज़ हवाओं में टाँग दूँ …।

— कार्ल सैंडबर्ग 
(उदय प्रकाश, अडानाउ से बोन और फ्राइबर्ग जाते हुए ट्रेन में यों ही अनुवाद जैसा कुछ : १२ दिसंबर,२०१७)

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