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डिजिटल की अच्छी समझ के लिए तीन ‘T’ पर कमांड जरूरीः अनुज खरे

नुज खरे।
दैनिक भास्कर द्वारा आयोजित एक कार्यक्रम में जावेद अख्तर के साथ दैनिक भास्कर डॉट कॉम के सम्पादक अनुज खरे।
दैनिक भास्कर डिजिटल के सम्पादक अनुज खरे,
 अनुज खरे, साथ हैं शाहरुख खान।

मीडिया मिरर की साक्षात्कार श्रृंखला बात-मुलाकात में इस बार हमारे अतिथि हैं दैनिक भास्कर डॉट कॉम के सम्पादक अनुज खरे। अनुज खरे पत्रकार के साथ साथ व्यंगकार भी हैं। व्यंग पर 3 किताबें लिख चुके हैं। अभी एकदम ताजा उनकी किताब है बातें-बेमतलब। व्यंग लिखते हैं निश्चित ही मजेदार इंसान हैं पर संजीदा भी। दैनिक भास्कर डॉट कॉम में काम कर रहे आदित्य मिश्रा का कहना है कि उन्हें खुशी है की वो अनुज खरे की टीम का हिस्सा हैं। आदित्य कहते हैं कि 7 साल की पत्रकारिता में इतना बेहतर सम्पादक नहीं देखा। बेहतर से आशय पेशेवर व निजी दोनों जीवन से है।

अनुज खरे ने भास्कर डॉट कॉम को जो मुकाम दिया है वो किसी से छिपा नहीं।

 

अनुज खरे से लम्बी बातचीत की मीडिया मिरर सम्पादक प्रशांत राजावत ने। श्री खरे ने खुलकर बातचीत की और उनकी बातचीत से डिजिटल मीडिया को आप और करीब से जान समझ पाएंगे। हालांकि वो कई गंभीर सवालों के जवाब देने से मुकर गए।  

 

 

बातचीतः-

सवालः (परम श्रद्धेय) अनुज खरे को प्रणाम। बेमतलब की बातें भी आप खूब करते हैं। तो शुरूआत यहीं से। क्या है नई किताब बातें-बेमतलब में।

जवाब- बातें-बेमतलब मेरे 36 चुनिंदा व्यंग्यों का संग्रह है। इसमें ज्यादातर नए हैं जो वर्तमान परिस्थितियों पर केंद्रित हैं। शीर्षक ही बेमतलब है, व्यंग्य तो बहुतई मतलब का है।

 

सवालः पहले भी दो किताबें लिख चुके हैं। परम श्रद्धेय खुद मैं और चिल्लर चिंतन। दोनों व्यंगात्मक लहजे की किताबें हैं। पर व्यंग्यशैली से परे कोई किताब लिखेंगे भविष्य में।

जवाब- फिलहाल तो मैं व्यंग्य ही लिख रहा हूं। इसी में मजा आ रहा है। जब मजा आता है तो फिर कोई काम, काम नहीं लगता है। सो भविष्य में भी व्यंग्य ही लिखना चाहूंगा। हां, वेब जर्नलिस्म की एक किताब लिखने की रूपरेखा जरूर दिल में है। लिखूंगा। लेकिन पहले एक नॉवेल को पूरा करना है जो कई दिनों से अधूरा पड़ा है।

 

सवालः अनुज खरे के अंदर व्यंग्यकार कैसे पैदा हुआ?

जवाब- हुआ  कुछ यूं था कि मेरे एक दोस्त ने मुझे अपनी 400-500 पेजों की एक किताब भयंकर तारीफ के साथ पढ़ने के लिए दी थी, पूरी पढ़ने पर उससे कुछ खास नहीं निकला। बाद में जब मैंने उन्हें इस बात का उलाहना दिया था, तो वे बेहद विनम्रता से बोले थे- हम लिखकर अकेले ही इतना ‘आनंद’ क्यों प्राप्त करते सो हमने तुम्हारे साथ अपना ‘आनंद’ शेयर कर लिया था। उसी क्षण इस

हमारे लेखक बनने की आवश्यकता प्रतिपादित हो गई थी। क्योंकि मार्केट में काफी खोजबीन करने के पश्चात भी उससे ज्यादा‘आनंददायक’ किताब उपलब्ध नहीं हो पा रही थी। अत: ये दायित्व मुझे स्वयं को ही लेना पड़ा, ताकि अपनी खुद लिखकर खुद ही किताब छपवाकर चैन सिस्टम के आधार पर सारे दोस्तों को देकर उन्हें भी ‘एन्जॉय’ कर सकूं। सो ऐसी महान भावना इस किताब की पृष्ठभूमि है, आप तो अनावश्यक ही उन गेंहुओं के बीच घुन बन गए हैं।

मेरा लगातार लिखना भी इन्हीं दोस्तों के उकसाव का परिणाम है, ये लोग समस्त मनुष्य जाति से न जाने किस जनम का बदला लेना चाहते थे। मैं तो ‘प्रारब्ध’के वशीभूत उनके हाथों में ‘खेल’गया और पिछले जन्मों के पाप के कारण ऐसा दुस्साहस कर गया। तो अगर आप लोग रचनाएं पढ़ लेते हो, तो मेरे तो प्रारब्ध कटेंगे और उन लोगों का बदला पूरा होगा, जिससे वे शांति से वैराग्य को प्राप्त हो पाएंगे और आप बैठे बिठाए पुण्य एकाउंट में कुछ सेविंग भी कर लेंगे।

 

सवालः पत्रकार और व्यंग्यकार। ज्यादा क्या हैं आप?

जवाब- दोनों ही भूमिकाओं को मुकम्मल तौर पर देखता हूं मैं..जब मैं पत्रकार होता हूं तो 100 फीसदी होता हूं। जब मैं व्यंग्यकार होता हूं तो 100 पर्सेंट होता हूं। दोनों ही भूमिकाओं में पूरी तरह से समर्पित हुए बिना आप न्याय नहीं कर सकते हैं।

 

सवालः पसंदीदा व्यंगकार।

जवाब-शरद जोशी और ज्ञान चतुर्वेदी।

 

सवालः थोड़ा अपने निजी जीवन के बारे में बताइए। कहां से हैं। पत्रकारिता की शुरूआत कब और कहां से हुई।

जवाब-बुंदेलखंड में छतरपुर से हूं। परिवार में पत्नी और दो बच्चे हैं। पिताजी के बार-बार होने वाले ट्रांसफर की वजह कई घाटों का पानी पिया है। शिक्षा के मामले में जनसंचार, इतिहास, पुरातत्व में स्नातकोत्तर किया। जिंदगी की पाठशाला से बहुत सीखा। पत्रकारिता की शुरूआत भोपाल से की। अनुभव जयपुर से मिला। नोएडा-दिल्ली से गहराई आई। फिलहाल भोपाल में हूं।

 

सवालः व्यंग्य रचने वालों को क्या गुस्सा भी आता है। मुझे लगता है नहीं आता होगा। आपको आता है?

जवाब- इसका जवाब कुछ अलग है। जैसे- हमारी फिल्मों में विलेन शुरुआत से लेकर अंत तक हीरो और उसके परिवार पर अत्याचार करता रहता है। आखिरी कुछ मिनटों में वो वक्त आता है जब हीरो विलेन का अंत करने वाला होता है। इस सीन के आने से पहले दर्शक में भी हीरो की बहन, मां-बाप, दोस्तों आदि पर किए गए अत्याचारों का गुस्सा भर जाता है। अंत में जब हीरो उस विलेन की पिटाई कर रहा होता है तो दर्शक के मन में भी यही भाव आता है कि कुचल कर रख दो साले को…., बड़ा परेशान किया है इसने। और विलेन के अंत के बाद दर्शक एक सुकून महसूस करता है। यही हाल सिस्टम से पिटे आम आदमी का होता है। सुबह जब वो अखबार में घोटाले, अपराध और अन्य नकारात्मक खबरों को देखता है तो उसका गुस्सा उबाल पर होता है। ऐसे में एक व्यंग्यकार का राजनेताओं और सिस्टम पर करारा प्रहार उसे वही सुकून देता है जो विलेन की हीरो द्वारा पिटाई के बाद दर्शकों को मिलता है। व्यंग्यकार सचमुच वो व्यक्ति हैं, जो आम आदमी को हर दिशा में अपने गुस्से को बाहर निकालने का मौका देते हैं। अपने साथ भी कुछ ऐसा ही है इसलिए लिखकर गुस्सा निकालते रहते हैं बस…!!

 

सवालः व्यंग्ययात्रा, लफ्ज, अट्टहास, आउटलुक, कई अखबारों में आपके व्यंग छपे। कोई ऐसी याद जब किसी प्रतिष्ठित व्यंगकार ने या औऱ किसी सेलिब्रिटी ने आपके व्यंग पढ़कर आपको संदेश भेजा हो। जिससे आपको प्रोत्साहन मिला हो।

जवाब- दो यादें हैं- पहली, मेरा एक व्यंग्य है जिसका विषय जिसमें एक आदमी सॉरी कहना चाहता है लेकिन उसे कोई ऐसी बात ही नहीं मिलती है जिसे यादकर वो किसी से सॉरी कह सके। एक मेरे प्रिय व्यंग्यकार ज्ञान चतुर्वेदी ने “`किस्सा मामूली आदमी की मामूली ख्वाहिश का` शीर्षक इस व्यंग्य पर मुझे बहुत बधाई दी। इसका विषय और विषय से डील करने का तरीका उन्हें बहुत पसंद आया।

दूसरी याद, कुछ यूं है कि दिल्ली से किसी बंदे ने मेरी किताब “परम श्रद्धेय मैं खुद…“ पढ़कर एक मेल के साथ 1100 रुपए का एक चेक भेजा। मेल में लिखा था आपको एडवांस पेमेंट कर रहा हूं आप जब भी अपनी तीसरी किताब लिखेंगे वो मैं पढ़ना चाहूंगा। उसका इंतजार करना चाहूंगा। वो चेक आज भी फ्रेम करवाकर मैंने रखा हुआ है। किसी लेखक के लिए इससे बड़ा प्रोत्साहन कुछ नहीं हो सकता है।

 

सवालः साक्षात्कार से पहले जब मैंने आप पर शोध किया तो बड़ी दिलचस्प जानकारी मिली। ट्विन्स क्लब। भोपाल ट्विंस क्लब के संस्थापक भी हैं। चीन भी गए थे क्लब की ओर से। अब तो तय है कि आपको गुस्सा नहीं आता होगा। बहरहाल हमारे पाठकों को बताइए ट्विंस क्लब के बारे में। भोपाल में कैसे इसकी शुरूआत का ख्याल आया। लिम्का बुक में ये क्यों दर्ज है। इससे लोग कैसे जुड़ सकते हैं।

जवाब- जी हां, भोपाल में हमारा ट्विंस क्लब है। इसे देश का पहला ट्विंस क्लब होने के नाते लिम्का बुक में शामिल किया गया है। इसमें सैकड़ों ट्विंस जुड़े हुए हैं। कोई भी जो ट्विंस है इस क्लब से जुड़ सकता है। इसके लिए उसे akhareakc1@gmail.com मेल आईडी पर अपनी फोटोज और डिटेल शेयर करना होगा। इसके बाद वो हमारे क्लब का हिस्सा बन जाएगा। उसे निरंतर क्लब की गतिविधियों के बारे में सूचना दी जाएगी। हम लगभग पांच साल से लगातार चाइना के ट्विंस फेस्टिवल में जा रहे हैं। वहां दुनिया की लगभग 150 जोड़ियां हिस्सा लेती हैं। वहां एक शहर है मोजियांग इस शहर में यह फेस्ट आयोजित होता है। इस शहर में ही 100 से ऊपर ट्विंस हैं। चाइना के ट्विंस फेस्ट की सबसे बड़ी यादगार है-  वहां आपसे इतने ज्यादा आटोग्राफ लिए जाते हैं कि सेलेब जैसी फीलिंग आने लगती है। वहां एक तीन किलोमीटर लंबा लांग टेबल डिनर प्रोग्राम भी होता है। जिसके लिए लोगों को टिकट खरीदकर ट्विंस के साथ डिनर करना होता है। जब लोग आपके साथ खाने के लिए टूट पड़ते हैं। सेल्फी के लिए मचलते हैं। तो यकीन जानिए वो लम्हा यकीनन इतना अद्भुत होता है, जो बयां नहीं किया जा सकता है।

 

सवालः थोड़ा सवालों का टेस्ट बदलते हैं। डिजिटल मीडिया (दैनिक भास्कर डॉट कॉम) के सम्पादक हैं। भारत में डिजिटल मीडिया के भविष्य को लेकर क्या कहेंगे।

जवाब- भविष्य में डिजिटल मीडिया की ताकत बढ़ती ही दिखाई देगी। यंग जनरेशन का कंज्मप्शन पैटर्न पूरी तरह से डिजिटल पर शिफ्ट होगा। तो एडवर्टाइजर से लेकर सभी इसी पर फोकस करेंगे। स्पीड, रीच, इंटरएक्टिविटी इसकी सबसे बड़ी ताकत है। जो निश्चित तौर पर लोगों को इससे जुड़ने पर मजबूर करेंगे।

 

सवालः   वर्तमान में मीडिया का सबसे सशक्त माध्यम किसे मानते हैं और क्यों। डिजिटल, प्रिंट और इलेक्ट्रॉनिक में से।

जवाब:  मुझे लगता है इन तीनों का अपना -अपना वर्चस्व है, लेकिन एक खास मीडिया जो इनके समानान्तर चुनौती दे रहा है वो है सोशल मीडिया। सुविधा के लिए आप इसे डिजिटल मीडिया का भी एक हिस्सा मान सकते हैं। आज के दौर में लोगों तक पहुंच (REACH) और उन्हें प्रतिक्रिया (Engagement )देने के लिए प्रेरित करने का इससे अच्छा माध्यम कुछ नहीं। यूजर का तीन बड़े मीडिया फार्मेट्स में से किन्हीं दो के बिना काम भी चल जाए लेकिन सोशल मीडिया के बिना उसे अधूरापन सा लगता है। मेरा आकलन है कि 4G टेक्नोलॉजी जितनी सुलभ और सस्ती होती जाएगी सभी मीडिया फार्मेट्स में से सोशल मीडिया सबसे तेजी से बढ़ता रहेगा।

 

सवालः  मीडिया घराने (चाहे वो प्रिंट मीडिया या इलेक्ट्रॉनिक मीडिया में स्थापित हों) अब डिजिटल मीडिया की ओर आकर्षित हैं। डिजिटल मीडिया के लिए अच्छा निवेश कर रहे हैं। डिजिटल टीम को सैलरी भी अच्छी दे रहे हैं। कुछ मीडिया विश्लेषक तो ये भी कह रहे हैं कि मीडिया संस्थानों के मालिक पूरा फोकस डिजिटल मीडिया पर कर रहे हैं। कितनी सच्चाई है। औऱ सच्चाई है अगर। तो क्यों इतना झुकाव इस ओर?

जवाब:  हां, ये पूरी तरह से सच है और कहना होगा कि डिजिटल मीडिया में हिंदी बहुत ताकत के साथ उभर रही है। कहीं भी, कभी भी लेकिन सुविधा और छोटे स्वरूप में बड़ी संभावनाओं के द्वार खोल रहा है डिजिटल मीडिया। लगभग सभी प्रोग्रेसिव मीडिया ग्रुप्स खुद का ट्रांसफार्मेशन कर रहे हैं। हम मीडिया कन्वर्जेन्स या सम्मिलन की दिशा में तेजी से बढ़ रहे हैं। डिजिटल मीडिया की ताकत को कोई कम नहीं आंक रहा, इसीलिए नए एक्सपेरिमेंट्स सामने आ रहे हैं। आप DainikBhaskar.com का उदाहरण ही लें तो पाएंगे कि हमने अपनी अप्रोच और ऑफरिंग्स को 360 डिग्री चेंज किया है। हमने सबसे पहले मोबाइल फ्रेंडली विजुअल कंटेंट के ट्रेंड्स को समझा और उसे सफलता से हर लेवल पर लागू किया। आज हम गर्व से कह सकते हैं कि कंटेंट में जो वैराइटी और स्टिकीनेस हमारे पास है, वो हिंदी में एक जगह कहीं नहीं मिलेगी। इस चेंज का फायदा मीडिया ग्रुप्स को ही नहीं, डिजिटल वर्ल्ड में करिअर ग्रोथ चाहने वाले हर व्यक्ति को मिल रहा है।

 

सवालः  डिजिटल मीडिया के पत्रकार में कौन सी खूबियां आवश्यक हैं।

जवाब: एक अच्छे डिजिटल मीडिया जर्नलिस्ट के लिए बेसिक खूबियां तो प्रिंट और इलेक्ट्रॉनिक की तरह है, पर यहां सबसे जरूरी है कि आपको रीयल टाइम में ट्रेंड पकड़ने आते हों। यहां ‘रेस अगेंस्ट टाइम’ वाला फैक्टर काम करता है और कवरेज स्कोप अनलिमिटेड है। इलेक्ट्रॉनिक की तरह यहां न टाइम स्लॉट की बंदिश है और न प्रिंट की तरह स्पेस की। डिजिटल की अच्छी समझ के लिए इन तीन ‘T’ पर कमांड जरूरी है- ट्रेंड, ट्रैफिक और टेक्नोलॉजी। आपको ये तीन T साधने आते हों और इनके हिसाब से आप अपने कंटेंट को कस्टमाइज्ड कर लें तो आप इस फार्मेट में फिट बने रहेंगे।

 

सवालः डिजिटल मीडिया में मैं सपाट शीर्षक कभी नहीं देखता। शीर्षक होते है जैसे  ताज आखिर क्यों है शिवमंदिर जाने, अब इस जगह जाएंगे मोदी। मतलब किस जगह जाएंगे मोदी जानने के लिए बेवसाईट खोलो। यही मामला है। सपाट लिखेंगे तो दर्शक घट जाएंगे।

जवाब- हां, शुरूआत में इस तरह की समस्या थी लेकिन रीडर अब इस तरह के क्लिकबेट शीर्षक रिजेक्ट करने लगा है। उसे शीर्षक में कही गई बातें तथ्यात्मक रूप से खबरों में चाहिए हैं। मीडिया हाउस अब इस पर बहुत फोकस कर रहे हैं।

 

 सवालः जब बेव पोर्टल की खबरों पर उंगली उठ रही है ऐसे में आपके पोर्टल की कोई ऐसी खबर जिसका जनहित में व्यापक असर पड़ा हो उस पर कार्रवाई हुई हो। आप सिद्ध करिए कि डिजिटल मीडिया भी गंभीर खबरें करते हैं।

जवाब- हमने फेक न्यूज का पूरा सेक्शन शुरू किया है। जिसमें लगातार हम फेक खबरों को लेकर रीडर्स को जानकारी दे रहे हैं। उन्हें सचेत कर रहे हैं। हाल ही भोपाल में हुए गैंगरेप पर रेलवे एसपी के असंवेदनशील रवैया की खबर, जिस पर एसपी को सस्पेंड किया गया, सहित जनहित की ऐसी खबरों संख्या काफी है।  मंदिर को मिले दान का क्या किया जाता है? जैसी व्यापक महत्व वाली खबरें भी हमने की हैं। इसी खबर के लिए लगभग 1000 पेजों को पढ़कर तथ्य निकाले गए थे।

 

सवालः हमारे पाठकों के सवाल 

 

सवालः   डिजिटल मीडिया लोगों में भ्रम पैदा करती है। उसे रोकने के क्या उपाय हैः  परमवीर, नोएडा से

जवाब:  इसे भ्रम की बजाए फेक न्यूज़ कहना ज्यादा सही होगा। ये रीडर को भ्रमित से ज्यादा परेशान करती है क्योंकि इसमें कहीं न कहीं देश-समाज की ऐसी खबरें होती हैं जो यूटिलिटी या प्राइड से जुड़ी होती है। इसका दायरा भी बहुत बड़ा है, मीडिया हॉउसेज की सीमाओं से परे दुनियाभर में कहीं से, कोई भी एक फेक स्टोरी गढ़कर उसे मिनटों में सोशल मीडिया पर वायरल कर सकता है। टेक्नोलॉजी का यूज करके फेक फोटो और वीडियो बनाकर मॉस इंपैक्ट पैदा कर सकता है। इसे रोकना का कोई फुलप्रूफ मॉडल नहीं बन सकता क्योंकि यूजर्स खुद ही फेक न्यूज़ कंट्रीब्यूटर्स और डिस्ट्रीब्यूटर्स बन जाते हैं। ऐसे में हमारी जिम्मेदारी बढ़ जाती है, इसीलिए DainikBhaskar.com पर हम लगातार No Fake News खबरें देते रहते हैं ताकि रीडर्स को सही-गलत का पता चल सके।

 

सवाल- हिंदी मीडिया पोर्टल्स में अंग्रेजी शब्दों का प्रयोग क्यों? चेतन, जबलपुर से

जवाब:  इस पर काफी कहा-लिखा जा चुका है सो संक्षिप्त में फिर से स्पष्ट कर देता हूं। सभी जगह अंग्रेजी के उन्हीं शब्दों का प्रयोग किया जाता है जो आम बोलचाल में एक्सेप्टेड हैं। डिजिटल ही नहीं बल्कि सभी माध्यमों प्रिंट, इलेक्ट्रोनिक में भी….पुनर्मूल्यांकन, पुलिस अधीक्षक, विद्यालय, विश्वविद्यालय, क्रियांन्वयन, संस्तुति, जैसे शब्द बहुत बोले नहीं जाते हैं तो इनके बोलचाल वाले शब्दों का इस्तेमाल कर लिया जाता है।

 

सवाल- मध्यप्रदेश के मेडिकल एडमिशन स्केम पर बुक लिखेंगे कभी। कब लिखेंगे और किताब का मुख्य विंदु क्या होगाः पूजा, दिल्ली से

जवाब:  मैंने एक व्यंग्य लिखा था- “अध्यात्म का मार्केट….“ जिसमें एक इसी तरह के विषय को केंद्र में रखकर व्यंग्य लिखा था। फिर एक नाटक लिखा था “नौटंकी राजा..“ जिसका विषय व्यस्था की बुराइयां थीं। यह नाटक दिल्ली सहित कई शहरों में खेला गया। लोगों ने सराहा। तो इसी विधा का इस्तेमाल करते हुए मेडिकल एडमिशन स्केम पर बुक तो नहीं लिखूंगा लेकिन इसके विषय उठाकर व्यंग्य जरूर लिखूंगा।

 

वो सवाल जिनके जवाब अनुज खरे ने नहीं दिएः-

सवालः दैनिक भास्कर डॉट कॉम की प्रतिस्पर्धा किस न्यूज वेब पोर्टल से है। साथ ही आपकी नजर में आपके पोर्टल को छोड़कर कौन सा पोर्टल भारत में सबसे बेहतर है और क्यों।

 

सवालः मीडिया के डिजिटल स्वरूप के बाद कुछ समस्याएं भी सामने आई हैं। पत्रकार भी अब मीडिया के डिजिटलीकरण पर सवाल उठा रहे हैं। दिल्ली की पत्रकार निदा रहमान ने हाल ही में कहा कि कुकुरमुत्तों से उगे न्यूज पोर्टल्स ने सबसे ज्यादा साम्प्रदायिक तथाकथित पत्रकार पैदा किए हैं। छत्तीसगढ़ दैनिक भास्कर के पत्रकार कहा कि कि वेबसाईट बनाकर हर कोई पत्रकार बन बैठा है। खासतौर पर छत्तीसगढ़ में वेबसाईट वाले प्रेस के नाम पर जमकर वसूली कर रहे हैं। क्या कहेंगे आप इस मुद्दे पर।

 

सवालः एक रिपोर्ट के अनुसार भारत में बड़े संस्थानों के वेब पोर्टल्स तो ठीक हैं, जिनके करोड़ों में दर्शक हैं।  उन्हें एड से अच्छी कमाई हो जाती है। पर जो छोटे मोटे न्यूज पोर्टल्स हैं उन्हें चलते रहने में दिक्कत है। रिपोर्ट का कहना था कि भारत में आज भी ज्यादातर बेव पोर्ट्ल्स एड के लिए गूगल पर निर्भर हैं, सीधे तौर पर उन्हें एड नहीं मिलता। गूगल एड पहले ही भारी कमीशन ले लेता है एड देने वाले से और बहुत कम पैसा पोर्टल्स को देता है। ऐसे में रिपोर्ट कहती है कि गूगल एडसेंस पर निर्भर डिजिटल मीडिया का भविष्य सुरक्षित नहीं है। मतलब आपको पैसा नहीं मिलेगा तो आप कब तक सर्वाइव कर सकते हैं। इसका एक ताजा उदाहरण द वायर से मिला। द वायर बड़ा न्यूज पोर्टल है बावजूद उसने आर्थिक तंगी जताते हुए अपने पाठकों से आर्थिक मदद करने की अपील की। क्या कहेंगे इस विषय पर।

 

 सवालः दैनिक भास्कर डॉट कॉम के प्रतिदिन कितने दर्शक हैं। न्यूज पोर्टल्स में ये किस पायदान पर है।

 सवालः दैनिक भास्कर के डिजिटल पोर्टल्स की गूगल एड से हर माह कितनी कमाई है।

 

सवालः डिजिटल मीडिया में कॉपी पेस्ट खूब होता है। मतलब कहीं से भी खबर उठाकर चेप देना जस का तस। मैं खुद गवाह हूं बड़े न्यूज पोर्टल्स का जो ऐसा करते हैं। अभी पिछले दिनों एक बड़े मीडिया संस्थान की न्यूज साईट देख रहा था। कई खबरें उसमें बीबीसी हिंदी से जस की तस उठाई गई थीं। क्या कहेंगे इस प्रथा पर। डिजिटल टीम कॉपी पेस्ट में यकीन करती है।

 

सवालः आप भारत के प्रतिष्ठित न्यूज साईट के सम्पादक हैं। मैं देख रहा हूं कई ऐसी खबरें डिजिटल मीडिया में क्रिएट की जाती हैं जिन्हें आप सबके सामने नहीं पढ़ सकते। उनका कोई जन सरोकार भी नहीं। एकदम फूहड़ टाइप की। बीबीसी हो, भास्कर डॉट कॉम हो, आजतक हो, नवभारत हो, अमर उजाला हो, पंजाब केसरी हो। सभी इसमें आगे हैं। लल्लनटॉप के तो कहने ही क्या। किस पॉलिसी का परिणाम हैं ऐसी खबरें और शीर्षक।

उनमें से कुछ खबरों के शीर्षकः-

–    छोटा लिंग, निराश क्यों, हिटलर का भी छोटा था (लल्लनटॉप)

–    चुड़ैलें, जो पुरुषों के लिंग चुरातीं, फिर लिंगों को पालतू बना लेतीं(लल्लनटॉप)

–    जिन्हें लगता है कि लड़कियां नहीं पादती, वो पढ़ें (लल्लनटॉप)

–    गू उठाने वाला जीता मैग्सेसे (लल्लनटॉप)

–    बॉलीवुड में आकर फूले इन अभिनेत्रियों के ब्रेस्ट (हिंदी समय)

–    प्रियंका चोपड़ा की नाभि की पोल खोलेंगी बिकिनी की तस्वीरें (अमर उजाला)

–    हद ही हो गई बाथरूम में युवा कर रहे सबसे ज्यादा ये काम (एनबीटी ऑनलाइन)

–    क्या सपना नहीं जानती सेफ सेक्स के बारे में ( दैनिक भास्कर डॉट काम)

–    पर्स में हमेशा कंडोम रखते हैं रणवीर सिहं (जनसत्ता)

 

एक आम पाठक ये जानना चाहता है कि आखिर बड़े मीडिया समूह, काबिल पत्रकारों से भरे डिजिटल पोर्ट्ल्स में ये खबरें क्यों हैं।

 

सवालः अभी हाल ही में यूपी के लोकप्रिय चैनल हिंदी खबर के बेव पोर्टल पर खबर आई कि बॉलीवुड में आकर फूले इन अभिनेत्रियों के ब्रेस्ट, नाम सुनकर चौंक जाएंगे आप। इस शीर्षक पर पाठकों ने नाराजगी जताई। तो सम्पादक अतुल अग्रवाल ने सफाई दी कि कई खबरें होती। हर एक में सम्पादक की नजर नहीं होती। हर खबर के लिए सम्पादक दोषी नहीं। हालांकि उन्होंने माना कि ये शीर्षक किसी भी लिहाज से उचित नहीं। क्या आप मानते हैं कि बतौर सम्पादक आपभी अपने पोर्टल की हर खबर पर नजर नहीं रख सकते। और अगर आपके पोर्टल में भी कुछ गलत खबरें जाती हैं तो उसके लिए आप जवाबदेह नहीं।

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