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प्रियंका ओम के नए कहानी संग्रह से एक कहानी

प्रियंका ओम की नई किताब का मुखपृष्ठ।
प्रियंका ओम की नई किताब का मुखपृष्ठ।

तंजानिया में रहीं भारतीय लेखिका प्रियंका ओम का दूसरा कहानी संग्रह बाजार में है। उनका दूसरा कहानी संग्रह मुझे तुम्हारे जाने से नफरत है नाम से प्रकाशित हुआ है। प्रकाशक है रेड ग्रेब। प्रियंका अपने पहले कहानी संग्रह वो अजीब लड़की से ही काफी नाम कमा चुकी हैं। बेबाक लेखन के लिए जानी जाती हैं। मूलरूप से जमशेदपुर से हैं। 

 

“लास्ट कॉफ़ी”

उस दिन पहली बार उसे लिफ़्ट में देखा !
21वें फ़्लोर से ग्राउंड फ़्लोर तक आते आते कुछ दो चार मिनट तक उसके साथ रही ! उसके हाथ में लैप टॉप था जो उसके साइज़ के अनुपात का ही था, स्लीक और छोटा सा ! B का बटन पहले से दबा हुआ था, शायद उसे कहीं दूर जाना था और उसकी कार बेस्मेंट में थी ! उसपे ज़्यादा ध्यान नहीं दिया मैंने या फिर उसमें ध्यान आकर्षित करने वाला कण नही था !

उसके स्ट्रॉंग पर्फ़्यूम की ख़ुशबू से लिफ़्ट का क्यूबिकल प्रदूषित हो गया था ! हाँ वो एक तरह का प्रदूषण ही था क्यूँकि उस ख़ुशबू में मेरा दम घुट रहा था ! पता नहीं पुरुषों का पर्फ़्यूम इतना स्ट्रोंग क्यूँ होता है ? और वो तो पानी से नहीं शायद पर्फ़्यूम से नहा कर निकला था !

ये संयोग ही था कि अगले दिन शाम को बग़ल के सूपर मार्केट से जब मैं ग्रोस्रीज़ लेकर आ रही थी घर से पहले मोड़ पर वो फिर से दिख गया ! मैं उसके पीछे थी ! वो बहुत तेज़ तेज़ चलकर आगे निकल गया ! मैं लिफ़्ट के पास पहुँची तो वो वहीं खड़ा दिखा ! लिफ़्ट मेरे पहुँचने के बाद आइ ! पहले वो फिर मैं अंदर गई ! उसने तेईश प्रेस किया और मैंने एक्कीईश ! उसने लिफ़्ट के अंदर लगे स्टेन्लेस स्टील की रेलिंग को पकड़ रखा था शायद बहुत थका हुआ था !

फिर बहुत दिनों बाद मिला था, मैं जैसे ही लिफ़्ट में
दाख़िल हुई उसने स्माइल से मेरा स्वागत किया, रॉयल ब्लू कलर का टेलर्ड सूट पहने अलहदा लग रहा था !
अच्छा पहनावा हमेशा ही व्यक्तित्व में चार चाँद लगा देता है ! कई बार साधारण सा दिखने वाला इंसान भी असाधारण लगने लगता है ! वो भी आज असाधारण लग रहा था !
मैंने उसके चेहरे की तरफ़ देखा और एक बार फिर हमारे बीच स्माइल का आदान प्रदान हुआ और उसने फट से अंग्रेज़ी में पूछ लिया “मैं कैसा लग रहा हूँ” ?!
मैंने फिर से उसकी तरफ़ देखा उसकी उम्र चौबीस पच्चीस से ज़्यादा नहीं होगी और इस कहानी को उसकी उम्र से कोई लेना देना भी नहीं है !
उसके बाल गीले थे, शायद आज पर्फ़्यूम से नही पानी से नहा कर निकला था जिसकी ख़ुशबू में मेरा दम नही घुट रहा था ! चेहरे पर उगी सुनहरी दाढ़ी मूँछें उसे बहुत आकर्षक बना रही थी और निश्चित ही आकर्षक दिखने के लिए ही उसने कई दिनो से शेव नहीं किया था और इससे उसके आकर्षित करने वाले कण जागृत हो गए थे ! दारसिटी के नीले समंदर सी उसकी नीली आँखें मुझे बहुत गहरी लग रही थी; डूबने या तैर कर पार कर जाने से पहले ही      कहा ” very attractive ( बहुत आकर्षक )”

जवाब में उसने कटरीना कैफ़ वाली हिंदी में “शुक्रिया” कहा !

हिंदी में शुक्रिया कहकर उसने मुझे चौंका दिया था, कहीं ये भी हिंदी राइटर तो नहीं ? सोच कर मुझे मन ही मन हँसी आ गई ! हम हिंदी राइटर पाठकों पर धौंस ज़माने के लिये चाहे जितनी अंग्रेज़ी बोल ले लेकिन आभार ब्यक्त शुक्रिया कहकर ही करते हैं ! शुक्रिया कहना जैसे हमारे हिंदी राइटर होने का स्टांप होता है !

लेकिन ये हिंदी राइटर नहीं होगा ! ये तो किसी विदेशी मूल का है ! और कोई भी विदेशी हिंदी से सबसे पहले नमस्ते और शुक्रिया बोलना सीखता है इसने भी दार एस सलेम आकर सीख लिया है ! दार में तो आधी जनसंख्या भारतीय मूल की है यहाँ के अफ़्रीकन भी आते जाते हम भारतीय से “कैसे हो?” पूछ लेते है !

ख़ैर ग्राउंड फ़्लोर आ गया और मैं लिफ़्ट से बाहर निकल गई ! उसे आज भी पार्किंग में जाना था, लिफ़्ट बेस्मेंट में चली गई !

उस दिन रात खाने की टेबल पर मैंने हज़्बंड से पूछा आपको रॉयल ब्लू कलर कैसा लगता है !
नील जैसा लगता है ! हज़्बंड ने मुँह बनाते हुए कहा !
मैं मुस्कुरा दी !

उस दिन सूपर मार्केट में फिर मिल गया, किसी फ़िराक़ के शिलशिले में वो मुझसे बार बार टकरा रहा था !
मैं किताबें देख रही थी और वो वाइन, मुझपे नज़र पड़ते ही मेरे पास आ गाया !
तुम्हें किताबें पढ़ने का सौख है ? !
हाँ, ख़ास तौर से साहित्य !
क्या तुमने अफ़्रीकन साहित्य भी पढ़ी है ?
मुझे उसके मुँह से ये सुनकर बहुत अजीब लगा, एक फ़िरंगी भारतीय से अफ़्रीकन साहित्य पढ़ने की बात कह रहा था !

अफ़्रीकन साहित्य में क्या ख़ास है ?!

क्यूँकि अफ़्रीकन साहित्य प्रकृति के साथ जुड़े ज़िंदगी के अनुभव सुनाते है !आदिवासी साहित्य में पूर्वजों के ज्ञान-विज्ञान, कला-कौशल और इंसानी बेहतरी के अनुभवों का दर्शन मिलता है ! जीवन के प्रति ख़ास जिजीविषा दिखती है ! इनका बाज़ारवाद से कोई सम्बन्ध नही !

मुझे उसकी बातें रूमानी लग रही थी ! मैंने अफ़्रीकन साहित्य की एक किताब उठा ली ! वो बस मुस्कुराया था इस बात से बेख़बर कि उस कि उस वक़्त मुस्कुराते हुए वो मुझे घोर ज्ञानी लग रहा था   उसके चेहरे से एक तेज़ टपक रहा था और उसकी नीले रंग की आँखें प्रकाशमय !

अडोल्फ़ जर्मन है और पेशे से hair dresser है, उसे लगता है हर रोज़ अलग अलग हेर स्टाइल से अलग अलग दिखा जा सकता है; अक्सर बढ़ती उम्र में छोटे बाल आपकी उम्र कम कर देते है !
अब मुझे पक्का यक़ीन हो गया था ये राइटर नही है; इतिहास गवाह है आज तक एक भी बार्बर राइटर नही हुआ है !
उसने आगे बताया दारसिटी में अपने प्रवास के दौरान उसके जर्मन पिता एक भारतीय अफ़्रीकन के प्रेम पर पड़ गये थे जिसका अंत विवाह के रूप में परिणत होकर हुआ था ! उसकी मॉम के ग्रेट ग्रांड पेरेंट्स गुजरात से माइग्रेट होकर दारसिटी आ गए थे !

अडोल्फ़ को दारसिटी बहुत पसंद है क्यूँकि उसे समंदर पसंद है ! इसलिये अक्सर छुट्टियाँ बिताने यहाँ आता रहता है ! उसे ज़िंदगी में दो चीज़ें बहुत पसंद है ; एक समंदर दूसरा एकांत ! कई बार वो किसी टापू पर सारा दिन एकांत में बिताकर शाम ढले वापस आता है ! उसे शान्त समन्दर पसंद है, हाई टाइड को वो समंदर का ग़ुस्सा कहता है ! उसे यक़ीन है समंदर अपने अंदर बहुत से राज छुपाए हुए है और वो राज उसे अपनी ओर बुलाते है इसलिये समंदर और एकांत के अतिरिक्त उसे स्कूबा डाइविंग बहुत पसंद है !

मुझे वो अजीब लड़की ( मेरी पहली संग्रह ) सा अजीब लग रहा था, उसे समंदर के राज बुलाते है मुझे उसकी अजीबियत बुला रही थी ! उसकी बातों में समंदर की तरह ही राज छुपे थे जिन्हें बातों वाली स्कूबा डाइविंग से उसके मन के गुप्त तहख़ाने से वो सारे राज बाहर निकाल लेना चाहती थी जिसे छुपाने की उसकी असमर्थ कोशिशों की उछलन मुझे लुभा रही थी !

मैंने कॉफ़ी के लिये पूछा !
क्यूँकि मुझे बातें करते हुए कॉफ़ी पीना बहुत पसंद है लेकिन उसने सीधे सीधे शब्दों मे मना कर दिया !

उसका कॉफ़ी के लिये मना करना बहुत रूड लगा और तत्काल मुझे ग़ुस्सा आ गया लेकिन उसने अपने बास्केट से toblerone देते हुए कहा “ये तुम्हारे लिये” और chocolate देखते ही मेरा ग़ुस्सा फूल पर बैठी तितली की तरह उड़ गया !
हालाँकि मैं भी उसे मना करके ग़ुस्सा जता सकती थी लेकिन थैंक्स कह अपने well behaved होने का प्रमाण देते हुए पूछा “chocolate क्यूँ ?”
क्यूँकि तुम ग़ुस्से में हो !
तुम्हें कैसे पता मैं ग़ुस्से में हूँ ? !
वो हंसा था “तुम ग़ुस्से में कन्फ़्यूज़ लगती हो” !
और जब मैं कन्फ़्यूज़ लगती हूँ तो chocolate खाना पसंद करती हूँ कहते हुए मैं chocolate खाने लगी !
“और chocolate खाते हुए बच्ची बन जाती हो ” उसने मुझे देखते हुए कहा !
हर इंसान के अंदर एक छोटा बच्चा होता है जो कभी बड़ा नही होता मैंने बच्चे जैसे ही आँखें मटकाते हुए कहा !
हाँ और chocolate देखकर वो बच्चा बाहर निकल आता है उसने हँसते हुए कहा !
मेरे “हाँ शायद” कहते ही एक्किश्वाँ फ़्लोर आ गया था, लिफ़्ट का ऑटमैटिक दरवाज़ा खुला और मैं उसे विदा कहकर निकल गई!

मैं लिफ़्ट से निकल आइ थी लेकिन वो मेरे ज़ेहन से नहीं निकला !
ये किस तरह का शख़्स है ? अब तक जितनी बार भी मिला है हर बार अलग अलग लगा है; एक साथ कितनी जिंदगियाँ जीता है ? कहीं multiple personality disorder का शिकार तो नहीं !

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