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शैक्षणिक संस्थाओं में अंग्रेजी की अनिवार्यता पर प्रतिबंध लगेः वेदप्रताप वैदिक

डॉ. वेदप्रताप वैदिक
डॉ. वेदप्रताप वैदिक

जाने माने पत्रकार वेदप्रताप वैदिक भाषा को लेकर अपनी बात रख रहे हैं। दिलचस्प है। बतातें चलें कि वैदिक ही वो व्यक्ति हैं जो अटल बिहारी वाजपेयी को सदैव हिंदी बोलने के लिए कहते रहते थे। चाहे वो संयुक्त राष्ट्र का मंच हो या कोई और मंच। इतना ही नहीं वैदिक जवाहर लाल नेहरू विश्वविद्यालय से पीएचडी कर रहे थे। उन्होंने शोध प्रबंध हिंदी में लिखा था। जिसे जेएनयू ने स्वीकार नहीं किया था। अंततः वैदिक भी अपनी बात पर अड़ गए। कोर्ट गए औऱ जीत हुई। 

कुल मिलाकर हिंदी भाषा के लिए उनकी लड़ाई जारी है। 

 

2018 में ये 11 काम करें

डॉ. वेदप्रताप वैदिक

पिछला साल बीत गया। सच पूछा जाए तो साढ़े तीन साल बीत गए। अब बस डेढ़ साल बचा है। जो बीत गया, सो बीत गया। अब उस पर छाती पीटने और माथा कूटने से क्या फायदा है। देश को क्या पता था कि हम खोदेंगे पहाड़ और उसमें से चुहिया भी नहीं निकलेगी लेकिन अब इस 2018 के साल में कुछ चमत्कारी काम हो गए तो 2019 में यही सरकार लौट सकती है और उससे भी बड़ी बात यह कि देश की नय्या डूबने से बच सकती है।

तो क्या-क्या किया जाए 2018 में ? सबसे पहले तो देश की अर्थ-व्यवस्था को सुधारा जाए। नोटबंदी और जीएसटी ने जो धक्का लगाया है, उससे रोजगार, व्यापार और खेती को उबारा जाए। दूसरा, गरीबी की रेखा को 28 और 32 रु. से उठाकर कम से कम 100 रु. रोज किया जाए। तीसरा, देश में शिक्षा और चिकित्सा को लगभग हवा और पानी की तरह सर्वसुलभ बनाया जाए ताकि इनके नाम पर चल रही लूट-पाट बंद हो जाए। चौथा, हमारी संसद, सरकार और अदालतों से अंग्रेजी को हटाया जाए ताकि देश के मुट्ठीभर लोगों को मिलनेवाले खास फायदे आम आदमी को भी मिलने लगें। पांचवां, शैक्षणिक संस्थाओं से अंग्रेजी की अनिवार्यता और अंग्रेजी माध्यम की पढ़ाई पर सख्त प्रतिबंध लगे लेकिन अंग्रेजी समेत कई विदेशी भाषाओं को स्वेच्छया पढ़ने-पढ़ाने का इंतजाम किया जाए। छठा, देश में शराबबंदी याने पूर्ण नशाबंदी का वातावरण बनाया जाए। लोगों से धूम्रपान छुड़वाया जाए। सातवां, मांसाहार के नुकसानों से लोगों को सावधान किया जाए। गोवध अपने आप रुकेगा। आठवां, देश में वृक्षारोपण और प्रदूषणमुक्तता का प्रबल अभियान चलाया जाए। नौवां, दहेज, पर्दा-प्रथा, मृत्युभोज, वैवाहिक फिजूलखर्ची आदि सामाजिक बुराइयों के विरुद्ध अभियान चलाया जाए। दसवां, मजहबी कानूनों और प्रथाओं को ताक पर रखकर स्त्री-पुरुष समानता के लिए पूरे देश में एक-जैसा कानून लागू हो। तीन तलाक के साथ बहुपत्नी प्रथा भी खत्म हो। ग्यारहवां, जातीय उपनाम लगाने पर प्रतिबंध हो। जातीय संगठन गैर-कानूनी घोषित हों। जातीय आरक्षण समाप्त हो और भारत को समतामूलक समाज बनाया जाए।

 

स्वभाषा: मोदी कुछ तो करें!

डॉ. वेदप्रताप वैदिक

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को अचानक हिंदी और भारतीय भाषाओं की याद आई, यह जानकर मेरा हृदय प्रसन्नता से भर गया। हमारे महान वैज्ञानिक प्रो. सत्येंद्रनाथ बोस की 125 वीं जन्म-गांठ पर बोलते हुए मोदी ने विज्ञान और स्वभाषा के संबंधों पर अपने विचार व्यक्त किए। ऐसे विचार मेरी याद में आज तक किसी प्रधानमंत्री ने व्यक्त नहीं किए। प्रधानमंत्री के मुख से ये विचार निकले हैं, इसलिए अब इन्हें उनके ही माना जाएगा, चाहे फिर ये मेरे या आपके या किसी भाषण लिखनेवाले अफसर के ही क्यों न हों ?

मोदी ने कहा कि विज्ञान की पढ़ाई और अनुसंधान यदि भारतीय भाषाओं में हो तो विज्ञान जनता से जुड़ेगा। नौजवानों में लोकप्रिय होगा। उसका फायदा आम जनता को ज्यादा मिलेगा। वैज्ञानिक लोग यदि अपने मूल ज्ञान का प्रयोग आम आदमी की जिंदगी को बेहतर बनाने के लिए करें तो उनकी पूछ बढ़ेगी। उन्होंने बताया कि सत्येन बोस विज्ञान को भारतीय भाषाओं के माध्यम से पढ़ाने के पक्षधर थे। उन्होंने बांग्ला भाषा में एक विज्ञान पत्रिका भी प्रकाशित की थी।

ऐसे उत्तम विचार व्यक्त करने के लिए मैं मोदी की तारीफ पहले ही कर चुका हूं लेकिन मैं पूछता हूं कि क्या मोदी को हमने इसीलिए प्रधानमंत्री बनाया है ? ऐसे और इससे भी अच्छे विचार तो कोई भी व्यक्त कर सकता है लेकिन किसी प्रधानमंत्री या सरकार के मुखिया से क्या सिर्फ यही उम्मीद की जाती है ? वह भाषण जरुर झाड़े या उपदेश जरुर करे, लेकिन इसके साथ-साथ हम उससे कुछ कर दिखाने की आशा भी करते हैं। मोदी यह बताए कि पिछले साढ़े तीन साल में मोदी ने देश में एक भी ऐसा कालेज स्थापित किया, जो मेडिकल, इंजीनियरी, विज्ञान और कानून आदि की उच्च शिक्षा भारतीय भाषाओं के माध्यम से देता हो ? राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ को इस मुद्दे पर गंभीरता से विचार करना होगा कि उसका श्रेष्ठ स्वयंसेवक प्रधानमंत्री की कुर्सी में बैठकर भी इतना लाचार क्यों है ? वह इस दिशा में शून्य क्यों है ? अंग्रेजी की गुलामी करनेवाले अन्य प्रधानमंत्रियों से वह अलग और बेहतर साबित क्यों नहीं हो रहा है ?

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