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हिंदी समाज को अंग्रेजी के सामने खुद को नंगा करने में मजा आता है. 

आदिवासी नहीं नाचेंगे
आदिवासी नहीं नाचेंगे

कुमाऊं विश्वविद्यालय नैनीताल के पूर्व अधिष्ठाता व प्रसिद्ध साहित्कार लक्ष्मन सिंह विष्ट की कलम सेः-

 

  • किताब पर प्रतिबन्ध कोई समाधान नहीं है, ऐसे लेखकों का सार्वजनिक बहिष्कार होना चाहिए.

राजकपूर की बेहद घटिया फिल्म ‘राम तेरी गंगा मैली’ के एक दृश्य को लेकर जब पत्रकार-विचारक मृणाल पांडे ने उन पर मुकदमा ठोका था तो सिर्फ इसलिए नहीं कि फिल्म में एक युवती के स्तनों को सरे आम प्रदर्शित किया गया था. मृणाल जी की आपत्ति लोगों के मन में बसी उस रूढ़ छवि को लेकर थी जिसमें पहाड़ी लड़की को सिर्फ एक सेक्स प्रतीक के रूप में देखा जाता रहा है, सीधी-सादी, दूसरों पर सहज ही भरोसा करने वाली और फिर खुद को लुटाकर आंसू बहाने वाली अबला! मानो उसकी अपनी कोई निजी पहचान ही नहीं है, वह सिर्फ इस्तेमाल की चीज है.

पिछले दिनों संथाली आदिवासियों को लेकर अंग्रेजी में लिखी गयी एक किताब The Adivasi Will Not Dance (आदिवासी नहीं नाचेंगे) खासी चर्चा में रही. इस किताब को साहित्य अकादेमी के द्वारा 2015 का ‘अकादेमी युवा पुरस्कार’ दिया गया. The Statesman ने इसके बारे में लिखा, ‘भारतीय कहानी लेखन में सौमेंद्र शेखर एक नई आवाज हैं.’ The Indian Express ने लिखा, ‘हाशिए से कही गयी, लोकप्रिय धारा के विपरीत, ये कहानियाँ बहुत हुनर और मानवीयता से लिखी गयी हैं.’ Mumbai Mirror ने लिखा, ‘कहानियों का एक बेहतरीन संकलन जो आदिवासियों के बारे में हमारी गढ़ी धारणाओं को तोड़ता है.’

पिछले दिनों दून लिटरेरी फेस्टिवल, देहरादून के बुकस्टाल में जब इसका हिंदी अनुवाद दिखा तो उसे खरीदकर ले आया. फुर्सत होने पर पढ़ने बैठा तो मन हुआ कि आखिरी शीर्षक कथा से शुरुआत की जाये. कहानी सचमुच अच्छी लगी, क्योंकि उसमें झारखण्ड के आदिवासी संथाली समाज को चारों ओर से अमानवीयता की हद तक नारकीय जिंदगी सौपने वाले राज-तंत्र का बेहद खुला चित्रण है और उस समाज के प्रति चिंता जगाता है. कहानी इस ताने-बाने के सहारे बुनी गयी है कि झारखण्ड में भारत के राष्ट्रपति का दौरा है, उनके सामने प्रदेश प्रशासन आदिवासी नृत्य प्रदर्शित करना चाहता है मगर ज्यों ही कथा-नायक को लगता है कि उसके आदिवासी समाज का सिर्फ इस्तेमाल किया जा रहा है, वह अपने साथियों के साथ नाचने से मना कर देता है. इस कहानी में भी स्त्री सम्बन्धी अपमानजनक शब्दावली का बार-बार प्रयोग किया गया है मगर प्रभावशाली कथ्य होने के कारण उस ओर ध्यान नहीं जाता. बाद में झारखण्ड सरकार ने इस किताब पर प्रतिबन्ध लगा दिया था जो संभवतः अभी जारी है.

मुझे नहीं मालूम कि किताब के लेखक खुद संथाली हैं, परिचय में कहा गया है कि उनका जन्म और पोषण झारखण्ड में ही हुआ. उसके संथाली होने पर इसलिए यकीन नहीं होता क्योंकि संथाली युवतियों के उसने अपनी कहानियों में जो चित्र खींचे हैं, वे उसके अपने समाज के लिए ही नहीं, किसी भी स्त्री के लिए असहनीय और अपमानजनक हैं. इन कहानियों की चर्चा करना एक तरह से कीचड़ में बिम्ब तलाशना होगा, यहाँ मैं सिर्फ एक कहानी का जिक्र करना चाहता हूँ, ‘सिर्फ एक रंडी.’

जिसे अंग्रेजी में पोर्न लेखन कहा जाता है, मुझे नहीं मालूम कि उसमें पठनीयता के क्या गुण होते हैं, बहुत साफ दिखाई देता है कि यह कहानी आदिवासी औरतों को लेकर भावनाहीन शहरी समाज के द्वारा टपकाई जाने वाली लार को उसी समाज के पढ़े-लिखे पुरुषों की ग्रंथि के रूप में दिखाया गया है. घाटिया बम्बइया फिल्मों में भी इतनी अभद्र-अश्लीलता नहीं दिखाई जाती है. कहानी के इन दृश्यों को सामान्य उद्धरणों की तरह भी प्रस्तुत नहीं किया जा सकता. संथाली लोक भाषा के शब्दों का प्रयोग भी कहानियों में किया गया है, मगर कहीं भी उनमें संथाली समाज नहीं है, सब जगह संथाली युवतियों के शोषण के नाम पर उनकी सेक्स-अतृप्त देह और कामसूत्र के आसन हैं. ‘कामसूत्र’ में तो उनका खास सन्दर्भ है, यहाँ तक कि ‘राम तेरी गंगा मैली’ में भी युवती अपनी भूखी बच्ची को दूध पिला रही होती है, मगर अपनी जड़ों से कटे इस भावनाहीन लेखक में तो यह भी विवेक नहीं है कि अपनी माँ की निर्वस्त्र देह को देखकर किसी के मन में काम-उत्तेजना नहीं पनपती. (लेखक के परिचय में कहा गया है कि वह पेशे से डॉक्टर है.) हो सकता है, जो आदिवासी अपनी जड़ों से छिटककर ठूँठ बन गया हो, ये उसकी अनुभूति हो. मजेदार बात यह है कि इस लेखक को अनेक राष्ट्रीय और अंतर्राष्ट्रीय सम्मान मिले हैं, उसे इंटरनेशनल डब्लिन लिटरेरी अवार्ड 2016 के लिए नामित किया गया है.

ऐसे लेखक को पढ़ने की सिफारिश करना भी एक प्रकार से व्यर्थ का प्रचार देना होगा, मगर आज का हमारा प्रचार-तंत्र ऐसे ही लोगों को तो हीरो बना रहा है. हिंदी और दूसरी भारतीय भाषाओँ का उत्कृष्ट लेखन हाशिए में धकेला जाता रहा है और अंग्रेजी के नाम पर कुछ भी कूड़ा-करकट खूब बिक रहा है. अगर कभी ऐसे विरोधाभासों की ओर इशारा किया जाता है तो हिंदी के ही लेखक इसे उनकी कुंठा कहते हैं.

झारखण्ड सरकार के द्वारा किताब पर लगाये गए प्रतिबन्ध को लेकर अनेक कथित बुद्धिजीवियों ने विरोध दर्ज किया है, क्या किसी भी सभ्य समाज को ऐसे लेखक का पक्ष लेना चाहिए जो स्त्री को सिर्फ एक सेक्स सिंबल के रूप में प्रोजेक्ट करता हो. यही नहीं, उसका रस ले-लेकर लम्बे चित्र खींचता हो. और उस समाज का, जो उसका अपना ही है और जो बाहरी लोगों के शोषण से आज तक भी न उबार पाया है.

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