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ब्रेकिंग न्यूज से पहले देशहितः संदर्भ ट्रिब्यून की खबर

ट्रिब्यून
ट्रिब्यून में छपी रचना खेरा की वो खबर जो देशभर में चर्चा में है।

      – एडीटर अटैक- मीडिया मिरर सम्पादक का नियमित स्तम्भ- 

आधार को निराधार बताने वाली रिपोर्टर पर सरकार का शिकंजा सही या गलत

  • हाल ही में द ट्रिब्यून की संवाददाता रचना खेरा पर सरकार ने केस दर्ज कराया है। दरअसल रचना ने आधार कार्ड की एक खबर लिखी थी अपने अखबार में जिसमें दावा किया गया था कि कोई भी व्यक्ति 500 रुपए खर्च करके किसी भी व्यक्ति की निजी जानकारी उसके आधार कार्ड के जरिए पा सकता है।

रिपोर्टर ने उन तकनीकी मामलों को उजागर किया था, जिसमें आधार कार्ड की गोपनीयता पर प्रश्नचिंन्ह खड़े होते हैं। आनन फानन में सरकार ने रचना खेरा के खिलाफ केस दर्ज करवा दिया। सरकार को लगा कि रचना ने जो रिपोर्ट लीक की है उससे आधार कार्ड की गोपनीयता में सेंध लगी है। हालांकि पूरे मामले में रिपोर्टर के खिलाफ केस दर्ज होने के बाद पत्रकार संगठन, कई वरिष्ठ पत्रकार व स्वयं द ट्रिब्यून के सम्पादक रचना खेरा के पक्ष में सामने आए हैं। ट्रिब्यून के सम्पादक हरीश खरे ने तो खास सम्पादकीय लिखकर अपने रिपोर्टर का पक्ष लिया है और कहा है संस्थान उनके साथ है।

पूरे मामले पर गौर करें तो सबसे पेचीदा बात ये है कि रिपोर्टर पर केस दर्ज होना। कुछ लोग इसे सरकार की ज्यादती बता रहे हैं तो कुछ अभिव्यक्ति की आजादी पर हमला। या पत्रकारिता को बांधने का प्रयास। कुछ मीडिया विशेषज्ञ ये भी कह रहे हैं कि क्या मीडिया सिर्फ सरकार की चाटुकारिता के लिए बना है।

पर मुद्दा ये भी है कि आखिर सरकार ने मामला दर्ज क्यों करवाया। क्या मामला फौरी तौर पर बगैर सोचे समझे दर्ज करवाया गया। लगता तो नहीं है कि मामला फौरी तौर पर दर्ज करवाया गया होगा। दरअसल मामले फौरी तौर पर दर्ज करवाए ही नहीं जाते। और ऐसा भी नहीं है कि इस मामले में सरकार की ओर से कोई पूर्वाग्रह हो।

तो फिर माजरा क्या है। सरकार इतनी संजीदा क्यों हो जाती है कभी कभी। इससे पहले एनडीटीवी पर भी बैन सरकार ने लगाया था हाल में ही। इसके अलावा भी सरकार व प्रशासन द्वारा समय समय पर पत्रकारों पर सख्ती की खबरें आती रहती हैं। खैर उन पर चर्चा बाद में खेरा पर ही केंद्रित होकर बात करना फिलवक्त प्रासंगिक है।

दरअसल जब चोट हमारी कौम पर होती है तो हम सोच समझ से परे होकर व्यापक नजरिए से चीजों को देखना बंद कर देते हैं। कोई भी कौम हो। डॉक्टर, फिल्म निर्देशक, अभिनेता किसी पर बात आई सब एक स्वर में बोल उठेंगे सिवाय ये जानने के कि सच क्या है। और कई बार सच जानते भी हैं पर कौम के खिलाफ जाने का साहस करने का मतलब है कौम से खिलाफत। और इसके नुकसान भी हैं।

यही हाल पत्रकारिता के भी हैं।

जब गौरी लंकेश को कुतिया कहा जाता है तब भी कुछ पत्रकार चुप रहते हैं तो कभी बिना मतलब के मुद्दों पर भी वाचाल हो जाते हैं। ये कौम के समर्थन की बात है। सही और गलत से कोई मतलब नहीं।

रचना खेरा मामले पर नजर डालें तो पाएंगे उन्होंने एक ऐसी खबर लिखी जिससे सरकार की फिलवक्त सबसे प्रभावी योजना पर सवाल खड़े हुए। खबर तो खबर है। पर हर खबर को खबर के नजरिए से पेश करेंगे तो देश संकट में आ जाएगा। देश में अस्थिरता आ जाएगी। मेरी ये बात जिन पत्रकारों को बुरी लगे वो उस विषय की गर्त में जाएं जब रवीश कुमार कहते हैं कि आतंकवादी और सेना की मुठभेड़ जारी हो। तब आप सिर्फ आतंकियों की रिपोर्टिंग करें औऱ सेना को छोड़ दें। ये एकपक्षीय पत्रकारिता है। मतलब ये कि खबर थी कि चार आतंकियों को किसी घर में साजिशन पकड़ लिया गया और फिर गोली मार दी गई। पर आप सब जानते हुए सेना के खिलाफ नहीं जा सकते क्योंकि राष्ट्रवाद पत्रकारिता से ऊपर है। और राष्ट्रवाद कहता है कि देश की रक्षा में लीन सेना के खिलाफ खबरें कैसे कर सकते हैं आप। अंततः आपको लिखना होगा सेना ने कड़ी मुठभेड़ के बाद जान जोखिम में डालकर आतंकियों को मार गिराया। पर हकीकत तो ये थी आतंकी किसी के घर में ठहरे थे। मुखबिरी हुई। सैनिक पहुंचे, घेर लिया। आत्मसमर्पण के लिए तैयार आतंकियों को उड़ा दिया गया।

कई मामले जब पत्रकारिता पर राष्ट्रवाद हावी हो जाता है।

मेरा मतलब सिर्फ इतना है कि रवीश जब कहते हैं कि सेना के जवान आतंकियों के साथ दुर्व्यवहार करते हैं, आम नागरिकों को परेशान करते हैं, नार्थ ईस्ट में महिलाओं से बलात्कार करते हैं (जिसके लिए इरोम शर्मिला ने जीवन दांव पर लगा दिया)। तब आपकी कलम राष्ट्रवाद के नाम पर रुक जानी चाहिए। जैसा की एनडीटीवी मामले में हुआ। सेना मामलों की रिपोर्टिंग की एनडीटीवी ने। रक्षा मंत्रालय को लगा इस रिपोर्टिंग से सेना की खुफिया जानकारी लीक हो सकती हैं। तो एनडीटीवी को एक दिन के लिए बैन किया गया। विरोध में रवीश कुमार ने ब्लैक स्क्रीन कर पपेट शो किया था।

अगर तब आपको लगा था कि एनडीटीवी के साथ सही हुआ, तो रचना खेरा मामले में भी आप सरकार के पक्ष में जा सकते हैं। ये तो और गंभीर मसला है। भारत के किसी भी व्यक्ति की विशेष पहचान में सेंध कैसे संभव है आप इसको बता रहे हैं खबर के नाम पर। औऱ चाहते हैं सरकार चुप रहे। गजब है। खबर के नाम पर कुछ भी।

फिर आप ये भी बताइए कि परमाणु बम समय आने पर चलेगा नहीं, सेना के हथियार प्रभावी नहीं या वो कंडम हैं। खबरें तो कई मिल जाएंगी। पर खबरों की प्रस्तुति से पूर्व आपको ये सोचना होगा कि इस खबर से देशहित का कोई नुकसान तो नहीं होगा।

कोई भी खबर देश से ऊपर नहीं है।

रचना खेरा मामले में एक पक्ष कह रहा है कि आधार कार्ड की खबर जरूरी थी। कम से कम खबर के बाद सरकार आधार कार्ड गोपनीयता के मामले की कमियों को दुरुस्त करेगी। पर ऐसा बोलने वाले लोगों को ये समझना होगा कि इस खबर का उद्देश्य ऐसा कतई नहीं है। कम से कम ट्रिब्यून इतना सशक्त अखबार है कि उसके सम्पादक अगर खबर को प्रकाशित न करते हुए भी सरकार को इस मामले से अवगत कराते तो सरकार गंभीरता से उनके इस प्रकरण पर संज्ञान लेती।

ये खबर व्यवस्था सुधार के लिए नहीं लिखी गई। ये तय है। देश के कई गोपनीय तंत्र, विभाग, लोग अपने अपने तरीके से काम कर रहे हैं औऱ उनमें तमाम खामियां हैं। पर जहां देश की पहचान, सुरक्षा औऱ अस्मिता पर संकट आ जाए ऐसी खबरों का क्या वजूद।

कश्मीर में आतंकवादी प्रभावित इलाकों में काम कर रहे संवाददाताओं से मिलिये कभी। सेना की इतनी गंभीर खामियों की लिस्ट उनके पास ससबूत है कि हर रोज ब्रेकिंग बने। पर आपने कभी किसी भी अखबार, टीवी या रेडियो में सेना के खिलाफ जरा भी कुछ पढ़ा या सुना है। नहीं सुना होगा। इसका एक ही कारण है। समझौता। पत्रकार भी समझौता करते हैं। ब्रेकिंग से ऊपर देश है। कश्मीर के पत्रकार अगर ब्रेकिंग के लालच में आ गए तो देश में अस्थिरता छा जाएगी। सेना में बगावत हो जाएगी। देश की सुरक्षा खतरे में पड़ जाएगी।

मैं पूर्णतया ये तो नहीं कहता कि रचना खेरा मामले में सरकार का कदम सही है या रचना खेरा को इस खबर से बचना चाहिए था। पर हां खबरों का परिसीमन जरूरी है। सरकार ने कोर्ट के अंदर और उसके बाद सेना की मुठभेड़ की लाइव रिपोर्टिंग क्यों बैन कर दी। यकीनन इसलिए ये देशहित में है। अच्छा है आप भारत में पत्रकार हैं। चीन में होते तो देशद्रोह के आरोप में बंद हो जाते। हर देश का एक चार्टर एक मसौदा है। चाहे अमेरिका हो या रूस या कोई और। आप उस दिशा में खोजी खबरें नहीं कर सकते।

मुझे मेरी कौम के खिलाफ जाने की आदत है, जब बात सच के साथ देने की हो। सरकारें बहुत आसानी से गलत फैसला नहीं लेतीं। बड़े बड़े संविधान विशेषज्ञ, नीति निर्धारक, प्रशासनिक अधिकारियों के विमर्श के बाद ही रचना खेरा पर कारर्वाई की गई होगी। आप तह तक जाएंगे कौम के प्रेम को किनारे रख। तो पाएंगे सरकारी बंदिशें कुछ हद तक सही हैं। वरना आप परमाणु बम को भी कंडम घोषित कर देंगे। मूर्धन्य पत्रकारों की कमी नहीं देश में।

उत्तराखंड सरकार ने अपने सचिवालय के अनुभागों में पत्रकारों के जाने पर पूर्ण रोक के आदेश दिए हैं। ये आदेश पहले भी थे। पर मानता कोई नहीं था। होता ये था कि सरकार की गोपनीय बैठकों का मसौदा बैठक से पहले ही सार्जनिक हो जाता था। पत्रकार इसे खबर मानकर पेश कर देते थे। पर वाकई एक नीति जिस पर चर्चा और संशोधन की गुंजाइश है उसको आप ब्रेकिंग का जामा पहनाकर आधा अधूरा छाप देते हैं। इसलिए अब पत्रकारों के प्रवेश में पूर्ण प्रतिबंध है। जब ऐसे प्रतिबंध लगते हैं। तो पत्रकारों को अखरते हैं। पत्रकारों ने हाल ही में मुख्य न्यायधीश से मांग की है कि कोर्ट के अंदर रिपोर्टिंग की अनुमति मिले। अभी निर्णय होना इस मामले में बाकी है। पर कोर्ट के अंदर से ही रिपोर्टिंग होने लगी तो आप सोचिए बाबा राम रहीम मामले में तो उनके अनुयायी कोर्ट में ही आ धमकते।

कहना सिर्फ इतना है नियमों की संरचना बहुत सोच समझकर बनाई जाती है। आप आंख मूंदकर उसका विरोध नहीं कर सकते। एक समय चिदंबरम को जब दैनिक जागरण के पत्रकार ने जूता फेंककर मारा था। उसके बाद मुझे याद है ग्वालियर में दिग्विजय सिंह की पीसी में पत्रकारों के जूते उतरवा लिए गए थे।

नियम तो नियम हैं। संसद में प्रवेश के लिए पीआईबी अनिवार्य़ है। सबको अनिवार्य कर देंगे तो क्या हाल होगा। सोचा है। आप मांग कर सकते हैं कि सबको अनिवार्य़ कर दो।

व्यवस्था, नियम और कानून सख्त तो होते हैं पर एक बेहतर कार्यप्रणाली के लिए इनका होना आवश्यक भी है।

 

 

(नोटः रचना खेरा मामले में आगे की खबर ये है कि आधार कार्ड से जुड़े विभागीय अधिकारियों ने ट्रिब्यून के सम्पादक को पत्र लिखकर स्पष्टीकरण मांगा है कि वो बताएं कि क्या आधार कार्ड की खबर करने वाली रिपोर्टर के पास फिंगर प्रिंट व आंखों के स्कैन संबंधी जानकारी जुटाने के तथ्य भी हैं। सोमवार तक स्पष्टीकरण की बात कही गई थी। आधार कार्ड विभाग का तो ये कहना है कि खबर गलत है। आधार कार्ड का डेटा पूरी तरह सुरक्षित है। बहरहाल अगर ट्रिब्यून ने अपनी सफाई में ये कह दिया कि उसकी खोजी खबर में फिंगर प्रिंट व आंखों के स्कैन जुटाने संबंधी कोई उपाय नहीं बताए गए तो यकीनन खबर गलत हो जाएगी।

 

प्रशांत राजावत- सम्पादक मीडिया मिरर  

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