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श्रीदेवी कवरेज पर आजतक के प्रबंध सम्पादक की सफाई

श्रीदेवी
सुप्रिय प्रसाद के चैनल आजतक में पूरी तरह से समझाया गया कि बाथटब ऐसा होता है।
  • श्रीदेवी मौत की खबरों को लेकर आलोचना में घिरी भारतीय टीवी मीडिया का बचाव करते हुए आजतक के प्रबंध संपादक क्या कह रहे हैं जान लीजिए। साथ ही देश के दिग्गज पत्रकारों के बयान भी। 

 

 क्या इस आलोचना का टीवी न्यूज़ चैनलों पर कोई फ़र्क पड़ा? वे इस बारे में क्या सोचते हैं? यह पूछने पर आज तक के मैनेजिंग एडिटर सुप्रिय प्रसाद ने कहा कि “मान लीजिए ये ख़बर आती है कि श्रीदेवी की बाथटब में डूबकर मौत हो गई तो क्या आपके मन में ये देखने की उत्सुकता नहीं होगी कि बाथटब कैसा होता है, उसमें डूबकर कोई कैसे मर सकता है? हमारे बहुत से दर्शक ग्रामीण इलाक़ों के हैं, वो नहीं जानते बाथटब कैसा होता है. इसमें दिक्कत क्या है?”

उन्होंने कहा कि जिन लोगों को टेलीविज़न की समझ नहीं है, वही इस पर सवाल खड़े कर रहे हैं. सुप्रिय प्रसाद ने कहा कि टेलीविज़न का कवरेज़ उतना ही हो रहा है, जितना किसी बड़ी ख़बर का होना चाहिए.

 

वरिष्ठ पत्रकार और न्यूज़़लॉन्ड्री की एडिटर इन चीफ़ मधु त्रेहन भी इस तरह की सनसनीखेज़ रिपोर्टिंग को सही नहीं मानतीं.

उन्होंने कहा, “दो दिन से भारतीय मीडिया में जो चल रहा है वो पत्रकारिता नहीं है. पत्रकारिता तो तथ्यों पर होती है. यहां तो पूरी कवरेज ही अटकलों पर हो रही है. किसी को पूरी बात नहीं पता. मीडिया श्रीदेवी के फ़ेस लिफ़्ट और डाइट पिल पर बात कर रहा है. पत्रकारों को अपनी इज़्ज़त बनाकर रखनी चाहिए.”

 

वरिष्ठ पत्रकार और इंडियन एक्सप्रेस की कॉलमनिस्ट शुभ्रा गुप्ता की राय भी उनसे जुदा नहीं है.

शुभ्रा कहती हैं, “मान लिया कि किसी सेलेब्रिटी की अचानक मौत के बाद उनके बारे में जानने की जिज्ञासा होती है लेकिन फ़िलहाल जो चल रहा है उसे दर्शकों की जिज्ञासा का शोषण करना कह सकते हैं. ज़्यादातर टीवी चैनल्स ने निजता और मर्यादा को ताक पर रख दिया है. इन लोगों से पूछना चाहिए कि अगर उनके अपने परिवार की किसी महिला के बारे में ऐसी बातें की जातीं तो उन्हें कैसा लगता.”

 

यह पूछे जाने पर कि क्या श्रीदेवी का महिला होना एक वजह हो सकता है? शुभ्रा कहती हैं, “बिल्कुल. ये कोई पहली बार नहीं है जब ऐसा हो रहा है. प्रिंसेस डायना की मौत के समय भी मीडिया ने उनकी निजी ज़िंदगी की धज्जियां उड़ा दी थीं. वो आख़िरी समय में किसके साथ थीं, क्या कर रही थीं, हर चीज़ पर लिखा गया था. श्रीदेवी एक एक्टर थीं. उनके काम के बारे में बात करो. मौत से जुड़े तथ्य भी बताओ. लेकिन किसी के आख़िरी 15 मिनट से आपको क्या मतलब है? क्या ज़रूरत है इतना जानने की?”

मीडिया तो इन अटकलों का भी इश्यू बना रहा है कि श्रीदेवी के ख़ून में शराब के अंश मिले.

शुभ्रा ग़ुस्से से कहती हैं, “2018 चल रहा है. ऐसे में हम एक औरत के शराब पीने पर भी हैरानी जताएं तो हमें सोचना चाहिए कि क्या हम सौ साल पीछे जाने की कोशिश कर रहे हैं. मान लिया कि अति हर चीज़ की ख़तरनाक है. लेकिन कोई महिला या पुरूष शराब पीता है या नहीं, ये उनका निजी मामला है. मीडिया ऐसी बातें करके क्या साबित करना चाहता है.”क्या इसके लिए दर्शक भी कुछ हद तक ज़िम्मेदार हैं?

मधु त्रेहन कहती हैं. “अगर हम कचरा कंज़्यूम कर रहे हैं तो हमें कचरा ही मिलेगा. अगर इन चैनल को ये दिखाकर भी टीआरपी मिलती रहे तो इन्हें लगेगा कि लोग यही देखना चाहते हैं. लोग चैनल बदलकर वोट क्यों नहीं करते कि हमें यह पसंद नहीं?”

वरिष्ठ पत्रकार राजदीप सरदेसाई ने ट्विटर पर लिखा, “यह पहली बार नहीं है जब भारतीय न्यूज़ चैनल, बग़ैर किसी असल जानकारी के, फ़ोरेंसिक एक्सपर्ट, डॉक्टर और जासूस बने बैठे हैं. ना हम लोगों को शांति से जीने देते हैं, ना मरने.”

वीर सांघवी ने लिखा, “किसी की मौत के समय भारतीय टीवी चैनलों और गिद्धों में क्या फ़र्क रह जाता है? कुछ काम ऐसे हैं जिन्हें करने में गिद्धों को भी शर्म आ जाए, लेकिन हमारे टीवी चैनल्स को नहीं आती…

(सभी बयान बीबीसी हिंदी से साभार)

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