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महिला पत्रकार, जिसने विकलांग को आईएएस बनवाकर दम लिया

रमा नागराजन, रिपोर्टर टाइम्स ऑफ इंडिया दिल्ली
रमा नागराजन, रिपोर्टर टाइम्स ऑफ इंडिया दिल्ली

पत्रकार की छवि जब जेहन में आती है तो एक पढ़ांकू किस्म का तबका, जो हरसमय पढ़ने लिखने में तल्लीन ऐसा कुछ हम सोचते हैं। जो खबरों की दुनिया में खोया रहता है। रमा नागराज भी वैसी ही हैं। टाइम्स ऑफ इंडिया दिल्ली की पत्रकार हैं, हार्वर्ड विश्वविद्यालय की फैलोशिप स्वास्थ्य पत्रकारिता के लिए प्राप्त कर चुकी हैं। पर ये आम पत्रकारों से जरा हटके हैं। जब जन कल्याण की बात होती है या जनहित की तो इन्हें खबर से पहले मानवता नजर आती है। 

ऐसी ही मानवता की मिसाल पेश की रमा नागराज ने पढ़िए पूरी दास्तान-

रमा नागराजन, रिपोर्टर टाइम्स ऑफ इंडिया दिल्ली
मनीराम शर्मा, आईएएस अधिकारी

राजस्थान के अलवर जिले के गांव बंदनगढ़ी में 1975 में मनीराम का जन्म हुआ। मनीराम के गांव में कोई स्कूल नहीं था। केवल गांव के मंदिर में कुछ धर्मग्रंथ रखे थे। इस तरह श्री रामचरित मानस जी व श्रीमद भागवत जी को मनीराम ने दर्जनों बार घोट-घोटकर पढ़ा। ये भी इस गूंगे-बहरे बच्चे को पिता की मार से बचकर करना पड़ता था जो इसे भेड़ चराने के लिए कहते थे । दुर्भाग्यवश बहरापन उसके परिवार में है। उसकी मां, दादी व दोनों बहने भी बहरी थीं।

मनीराम को तपती रेत पर नंगे पैर 5 किलोमीटर चलकर स्कूल जाना पड़ता था। उसके मन में एक ही लगन थी कि बिना पढ़े लिखे वह अपने परिवार को गरीबी से उबार नहीं सकता। उसने इतनी मेहनत की कि 10वीं और 12वीं में बोर्ड की परीक्षा में क्रमशःपांचवी व सातवी स्थिति में आय़ा। माता पिता के लिए पटवारी या स्कूल का अध्यापक बनना किसी कलैक्टर से कम न था, जो अब वह बन सकता था पर उसे तो आगे जाना था। उसके प्राध्यापक ने उसके पिता को राजी कर लिया कि मनीराम को अलवर के कालेज में भेज दिया जाए। जहां ट्यूशन पढ़ाकर मनीराम ने आगे की पढ़ाई की और राज्य की लिपिक वर्ग की परीक्षा में सफल हो गया। पर वो आगे बढ़ना चाहता था। उसे पीएचडी करने का वजीफा मिल गया। पीएचडी की तो मन में लगन लग गई कि आईएएस में जाना है। सबने हतोत्साहित किया कि बहरे लोगों के लिए इस नौकरी में कोई संभावना नहीं है पर मनीराम ने फिर भी हिम्मत नहीं हारी।

रमा नागराजन, रिपोर्टर टाइम्स ऑफ इंडिया दिल्ली
मनीराम शर्मा, जिन्होंने विकलांगता को मात दी। 

2005 के संघ लोक सेवा आयोग की परीक्षा उत्तीर्ण कर ली। फिर भी भारत सरकार ने उसे बहरेपन के कारण नौकरी देने से मना कर दिया। मनीराम ने हिम्मत नहीं हारी औऱ 2006 में फिर ये परीक्षा पास कर ली। इस बार उन्हें पोस्ट एंड टेलीग्राफ अकाउंट्स की कमतर नौकरी दी गई, जो उन्होंने ले ली। तब उन्हें पहली बार एक बड़े डाक्टर ने बताया  कि आधुनिक तकनीक के आपरेशन से उनका बहरापन दूर हो सकता है। पर इसकी लागत 7 लाख रुपए आएगी। मनीराम के क्षेत्र के सांसद ने विभिन्न संगठनों के सहयोग से धन जुटाया और आपरेशन कराया। आपरेशन सफल रहा। इस तरह 25 वर्ष बाद मनीराम सुन सकते थे, पर इतने साल बहरे रहने के कारण उनकी बोली स्पष्ट नही ं थी। जब कुछ सुना ही नहीं तो बोल कैसे पाते। स्पीच थैरेपी के लिए एक लाख रुपया औऱ बहुत सारा समय चाहिए था, पर उन्हें तो लाल बहादुर शास्त्री अकादमी में प्रशिक्षण के लिए जाना था। मनीराम ने विपरीत परिस्थितियों में भी अभ्यास जारी रखा। नतीजतन वो अब बोल और सुन सकते थे। एक बार फिर उसी सिविल सेवा परीक्षा में बैठे और 2009 में तीसरी बार परीक्षा उत्तीर्ण की। इस बार मणिपुर में उन्हें उप जिलाधिकारी बनाया गया। 2015 में उनका काडर बदलकर हरियाणा मिल गया। तब से वे मुस्तैदी से अपना दायित्व निभा रहे हैं। फिलहाल हरियाणा के पलवल जिले के कलेक्टर हैं।

मनीराम के संघर्ष की सबसे बड़ी साथी हैं रमा नागराजन। रमा टॉइम्स ऑफ इंडिया की पत्रकार हैं। स्वास्थ्य से जुड़े मसलों पर काम करती हैं। विश्व प्रसिद्ध हार्वर्ड विश्वविद्यालय की फैलोशिप भी इन्हें हेल्थ कवरेज के लिए मिली। भारत सरकार जब मनीराम को उनकी विकलांगता का हवाला देकर नौकरी देने को तैयार नहीं था तब रमा नागराजन आगे आईं। उन्होंने इस मुद्दे को खबर नहीं मानवता के रूप में लिया और जुनून की हदतक मनीराम के लिए सरकार से लड़ाई लड़ी। इंडिया गेट पर हजारों लोगों के साथ रमा ने मनीराम के हक के लिए कैंडल मार्च निकाले। विरोध जताया। रमा का कहना था कि गूंगा-बहरा मनीराम नहीं सरकार है। लगातार खबरें लिखीं ताकि मनीराम को न्याय मिल सके।

आखिर ये संघर्ष सफल हुआ और रमा के संघर्ष की बदौलत मनीराम शर्मा को मणिपुर कैडर आबंटित हुआ। वरिष्ठ स्तंभकार विनीत नारायण कहते हैं कि उन्होंने जब रमा नागराजन द्वारा मानवता की मिसाल स्थापित करने की कहानी जानी तो उन्हें धन्यवाद कहा तो रमा ने उनसे बोला कि मैंने कुछ नहीं किया सबकुछ मनीराम के अदम्य साहस, कड़े इरादे और प्रबल इच्छाशक्ति के कारण संभव हो सका। रमा नागराज जैसे समर्पित पत्रकारों की देश को जरूरत है। सलाम रमा नागराज और प्रेरणा है मनीराम शर्मा की इच्छाशक्ति।

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