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मीडिया में महिलाः शोषण पर चुप्पी महंगी पड़ेगी

शोषण के खिलाफ चुप्पी
शोषण के खिलाफ चुप्पी

 

आज महिला दिवस है और देखिए मैंने जबसे ये पूर्व घोषणा की है कि मैं मीडिया में महिलाओं की स्थिति पर लिखूंगा तो महिला पत्रकार ही विरोध में उतर आई हैं। पता नहीं क्यों ये फितरत है महिलाओं की कि अपने खिलाफ हो रही हिंसा और शोषण को वर्षों से सहती आई हैं पर चुप हैं। कोई और बोले तब भी इन्हें कोई अंजान सा डर सताने लगता है।

मुझे पता है आपका डर। मीडिया मिरर पर मैंने एक श्रृंखला शुरू की थी मीडिया में महिला। इस श्रृंखला में महिला पत्रकारों को खुद ये बताना था कि अगर कभी उनके साथ किसी तरह का दुरव्यवहार हुआ हो, हिंसा हुई हो या किसी तरह का भेदभाव तो लिखें। मिरर पर मैंने श्रृंखला शुरू की और अपना मेल दिया पर एक भी मेल मेरे पास नहीं आया।

जबकि मेरी पत्रकार मित्र और मीडिया मिरर से जुड़ी कई महिला पत्रकार शोषण से जुड़ी तमाम घटनाएं बताती रहती हैं। जो पदोन्नति में भेदभाव, वर्क लोड से लेकर शारीरिक व मानसिक शोषण से जुड़ी होती हैं।

 पर सार्वजनिक लिखने पर उनको डर लगता है। जबकि श्रृंखला में ये भी व्यवस्था थी कि किसी संस्थान का और व्यक्ति का यहां तक कि पीड़ित महिला पत्रकार का भी काल्पनिक नाम ही प्रयोग में लाया जाएगा। पर किसी ने कुछ नहीं लिखा। यहां तक कि कुछ ने कहा लिखेंगे पर उन्होंने भी नहीं लिखा और अंत में कहा कि लिखेंगे तो बवंडर आ जाएगा।

अभी जब मैंने मीडिया में महिला शीर्षक से लेख की घोषणा मिरर पर की तो कुछ महिला पत्रकार विरोध में आ गईं। मैं उनके विरोध का सम्मान करता हूं।

एक बोलीं कि आपका अनुभव अभी कम है आप इस विषय पर लिखने योग्य नहीं है तो दूसरी बोलीं कि सब महिला पत्रकार शोषित नहीं हैं।

मैं दोनों बातों से सहमत हूं। मैं इस विषय पर लिखने के योग्य नहीं हूं। पर मैं अपना तो कुछ लिख ही नहीं रहा हूं। सब रिपोर्ट्स, पूर्व खबरों और महिला संगठनों द्वारा आयोजित कार्यशालाओं में रखी गई बाते हैं, मैं तो बस प्रस्तुतकर्ता हूं। तो टायपिंग करने योग्य तो मैं हूं ही। और दूसरी महिला पत्रकार का कथन कि सब महिला पत्रकार शोषित नहीं है। ठीक बात है। ये मैंने भी नहीं कहा पर विश्व स्तर पर महिलाओं के शोषण की दास्तान बताते मी टू अभियान को तो किसी महिला ने नहीं छोड़ा होगा। और शायद ही कोई महिला हो अपवाद स्वरूप जिसे जीवन में किसी तरह की हिंसा, शोषण, भेदभाव का सामना न करना पड़ा हो। बहरहाल मैं मीडिया में महिलाओं की स्थिति पर बात करने आया हूं उसी पर करके जाऊंगा।

मीडिया संस्थाओं में काम करने वाली महिलाओं के खिलाफ हिंसा पर पहले वैश्विक सर्वेक्षण में कहा गया है कि करीब दो तिहाई महिला पत्रकारों को कार्य के दौरान उत्पीड़न या धमकी का अनुभव सहना पड़ता है। वाशिंगटन के इंटरनेशनल वीमन्स मीडिया फाउंडेशन और लंदन के इंटरनेशनल न्यूज सेफ्टी इंस्टीटयूट के सर्वेक्षण में इस साल जुलाई से नवंबर के बीच 822 महिला मीडियाकर्मियों का साक्षात्कार किया।

साल 2013 में इंटरनेशनल न्यूज़ सेफ़्टी इंस्टीट्यूटऔर इंटरनेशनल वीमेन्स मीडिया फ़ाउंडेशनने दुनियाभर की 875 महिला पत्रकारों के साथ सर्वे किया.सर्वे के मुताबिक़ क़रीब दो-तिहाई महिला मीडियाकर्मियों ने काम के सिलसिले में धमकी और बदसुलूकी झेली है. ज़्यादातर मामलों में ज़िम्मेदार पुरुष सहकर्मी थे.वरिष्ठ पत्रकार पामेला फ़िलीपोज़ के मुताबिक़ भारत में ये ख़तरा कहीं ज़्यादा है.

 

ठीक है आप चुप रहिए अपने खिलाफ हो रहे शोषण औऱ भेदभाव पर और मुझे भी चुप करा दीजिए। पर इन रिपोर्ट्स को ध्यान से पढ़ लीजिए जो मैंने नहीं लिखीं। सभी नामजद हैं, केस थानों में दर्ज हैं और बीबीसी जैसे विश्वविख्यात संस्थानों की रिपोर्ट्स हैं, तो कुछ स्वयं आपकी जमात यानी महिला पत्रकार संगठनों में उठी आवाजें। रिसर्च भी संलग्न हैं। सर्वे भी। वैसे एक बात बोलूं। आप यूं चुप रहे तो आपके लिए कोई नहीं लड़ेगा। तनु शर्मा याद हैं कि भूल गए। हां इंडिया टीवी वाली एंकर जिसने चैनल के दफ्तर के बाहर आत्महत्या की कोशिश की थी। जान देने की कोशिश की। कोई लड़की यूं तो जान नहीं देगी। अगर आप महिला हैं तो इस बात को तो आप मान ही सकती हैं।

तनु शर्मा के साथ न सिर्फ उनके पुरुष अधिकारियों ने बल्कि महिला अधिकारियों ने भी बराबर अत्याचार किया। तनु शर्मा बच तो गईं और इंडिया टीवी अनवरत चल रहा है। पर उस पत्रकार का करियर खत्म हो गया जो बहुत काबिल और संभावना से भरी युवा पत्रकार थी। सिर्फ आपकी चुप्पियों की बदौलत। तनु शर्मा ने आत्महत्या करने की कोशिश की और वो भी दफ्तर में तो दुनिया जान गई पर न जाने कितनी तनु शर्मा और होंगी जो मीडिया की काली कोठरियों में पिस पिसकर घुट घुटकर जी रही होंगी और जब हद हो जाएगी तो फिर एक तनु शर्मा सामने आएगी। वो किसी फ्लैट से कूदेगी या जहर पी लेगी। एक खबर छपेगी उसके मौत की और कहानी खत्म। हम आपको कोई फर्क नहीं पड़ेगा, कितनी भी तनु शर्मा मरती रहें। क्योंकि मौत के तो हम आदी हैं।

तनु शर्मा मामले पर भी मैं कुछ नहीं बोलूंगा बीबीसी की रिपोर्ट् संलग्न है और तनु शर्मा का लिखा पत्र आत्महत्या के प्रयास के बाद का। पढ़िएगा शायद आपकी आत्मा आपको कुछ झकझोरे। आपके साथ शोषण नहीं हुआ अच्छी बात है। आप किसी की बहन हैं मेरी भी हैं। ईश्वर न करे कभी हो। पर शोषण के खिलाफ चुप्पी का मतलब है कि अगला नम्बर आपका है। ये भी मैं नहीं कहता किसी महान दार्शनिक ने कहा है।

एक औऱ बात। मीडिया में महिलाओं की स्थिति का आशय सिर्फ यौन शोषण नहीं है। मीडिया दफ्तरों में महिला शौचालय नहीं है, मातृत्व अवकाश नहीं हैं, उन्हें वेतन औऱ पदोन्नति नहीं मिलती। कई कारण हैं। हालांकि मेरे पास भी तमाम गंभीर सच्ची घटनाएं हैं जो बताती हैं कि देश में महिला पत्रकार किन संघर्षों से जूझती परिवार और पेट के लिए सबकुछ सह रही हैं। पर मैं नहीं लिखूंगा। मैं योग्य नहीं हूं न इस विषय पर लिखने के लिए। ठीक है। पर जो रिपोर्ट्स यहां पर उनको पढ़ लीजिए। बहुत सारी रिपोर्ट्स हैं। आहिस्ता आहिस्ता पढ़िए। 10 दिनों में पढ़िए। शायद आपको अहसास हो कि मैं जब चीख चीखकर कहता हूं कि महिला पत्रकारों का शोषण हो रहा है और उनके साथ कार्य़स्थलों में भेदभाव हो रहा है, इस बात में आखिर सच्चाई है।

धन्यवाद

आपका नाकाबिल साथी

प्रशांत राजावत

सम्पादक मीडिया मिरर

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महिला पत्रकार शोषण की शिकार: महिला आयोग

28 जनवरी 2013-  दूसरों के शोषण के खिलाफ आवाज बुलंद करने वाली महिला पत्रकार खुद ही भेदभाव और कई तरह के शोषण का शिकार हो रही हैं। यह बात राष्ट्रीय महिला आयोग ने महिला पत्रकारों की स्थिति पर कराए गए राष्ट्रीय स्तर के सर्वेक्षण के आधार पर कही है।
महिला आयोग की अध्यक्ष पूर्णिमा आडवाणी के मुताबिक आयोग ने तथाकथित अधिकार प्राप्त महिला पत्रकारों की दुर्दशा को उजागर करने के वास्ते राष्ट्रीय स्तर पर सर्वेक्षण अभियान चलाया है।

प्रेस इंस्टीच्यूट ऑफ इंडिया की जानीमानी पत्रकार उषा राय के नेतृत्व में चलाए जा रहे इस अभियान में देश भर की ग्यारह सौ महिला पत्रकारों का सर्वेक्षण किया जाना है। सुश्री आडवाणी के मुताबिक सर्वेक्षण में खास तौर पर भाषाई प्रेस में कार्यरत महिला पत्रकारों की दयनीय स्थिति के कई मामले सामने आए हैं। यह रिपोर्ट इस वर्ष अगस्त तक जारी कर दी जाएगी। सुश्री आडवाणी ने बताया कि रिपोर्ट आने के बाद महिला आयोग समाचार पत्रों व अन्य मीडिया संगठनों की बैठक बुलाकर इस मुद्दे पर विचार-विमर्श करेगा।

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विदेश भी देखिएः रूस की महिला पत्रकारों ने सांसदों, अधिकारियों पर लगाया यौन शोषण का आरोप 

मास्को, एएफपी। रूस की कई महिला पत्रकारों ने सांसदों और अधिकारियों पर यौन शोषण का आरोप लगाया है। इनमें से कुछ ने अपना नाम जाहिर नहीं किया है और कुछ ने अपनी पहचान बताई है।

हाल ही में संसद के निचले सदन डुमा की कार्यवाही कवर करने वाली दो पत्रकारों और निजी टीवी दोझद चैनल की टेलीविजन प्रोड्यूसर ने पहचान गुप्त रखते हुए डुमा की विदेश मामलों की समिति के प्रमुख लेओनिद स्लुत्सकी पर आरोप लगाया है। 50 वर्षीय स्लुत्सकी लिबरल डेमोक्रेटिक पार्टी के सांसद हैं। एक पत्रकार ने 22 फरवरी को चैनल से कहा कि पिछले वर्ष सांसद ने उनकी पीठ पर हाथ रखा और उसे ऊपर बढ़ाने लगे थे। टेलीविजन प्रोड्यूसर ने कहा कि स्लुत्सकी ने चूमने की कोशिश की थी और उनकी पीठ पर हाथ रखा था।

रूस के निजी टीवी चैनल आरटीवी की उप प्रधान संपादक येकातरिना कोत्रीकादजे ने खुलेआम आरोप लगाया है।

  • महिला पत्रकार वीपी राजीना ने जब यौन शोषण का मुद्दा उठाया तब उन्हे भी जान से मारने की धमकी मिलने लगीं।

 

यौन शोषण की शिकार महिला पत्रकार का इस्तीफाः- 

(पत्रकार ने एक महिला पर भी केस को रफा दफा करने का आरोप लगाया) 

तहलका के संपादक तरुण तेजपाल पर यौन उत्पीड़न का आरोप लगाने वाली महिला पत्रकार ने पत्रिका से इस्तीफा दे दिया है और तेजपाल एवं प्रबंधन संपादक शोमा चौधरी पर मामले को रफादफा करने का प्रयास करने और डाराने धमकाने, चरित्र हनन करने का हथकंडा अपनाने का आरोप लगाया है।

इन आरोपों को खारिज करते हुए चौधरी ने कहा, ‘बिना शर्त माफी मांगकर आप किस तरह से मामले को रफादफा करेंगे। उनकी बिना शर्त माफी को उन्हें खुद को बलात्कारी मान लेने के रूप में पेश किया जा रहा है। अगर लोग समझने का प्रयास करेंगे तब वे इस बात को समझ सकेंगे।’ बहरहाल, महिला पत्रकार ने कहा कि पत्रिका की कर्मचारी के रूप में ‘किसी प्रकार के दबाव से मुक्त होने के लिए’ उन्होंने इस्तीफा दिया है।

उन्होंने लिखा, ‘सात नवंबर के बाद घटना की श्रृंखलाओं के मद्देनजर यह केवल इतनी बात नहीं है कि तेजपाल ने कर्मचारी के तौर पर मुझे विफल किया बल्कि तहलका ने महिला, कर्मचारियों, पत्रकारों को समग्र रूप से विफल किया है। कृपया मेरा इस्तीफा तत्काल स्वीकार करें।’ गौरतलब है कि गोवा पुलिस ने तेजपाल के खिलाफ बलात्कार का मामला दर्ज किया है।
संपर्क किए जाने पर लड़की ने कहा कि उन्होंने तहलका से इस्तीफा दे दिया है। सूत्रों ने कहा कि महिला पत्रकार ने दो दिन पहले ही तहलका प्रबंधन को अपना इस्तीफा भेज दिया था क्योंकि वह संस्थान की कर्मचारी के रूप में किसी प्रकार के दबाव से मुक्त होना चाहती थी।
महिला पत्रकार ने शनिवार को एक बयान जारी कर कहा था कि तेजपाल को बचाने के लिए उनपर तथा उनके परिवार पर दबाव डाला जा रहा है और धमकाया जा रहा है। इस मामले में तहलका प्रबंधन से अप्रसन्न सलाहकार संपादक जय मजूमदार और सहायक संपादक रेवती लाउल ने भी इस्तीफे दे दिए हैं।
ऐसी खबरें हैं कि तहलका के साहित्य संपादक सौगत दासगुप्ता ने भी इस्तीफा दे दिया है और कई अन्य लोगों के भी आने वाले दिनों में पद छोड़ने की संभावना है।
गोवा पुलिस की तीन सदस्यीय टीम ने पिछले दो दिनों में तहलका की प्रबंध संपादक शोमा चौधरी और तीन अन्य कर्मचारियों से पूछताछ की। महिला पत्रकार ने तीन सहकर्मियों का जिक्र किया था, जिनके साथ उन्होंने गोवा के एक होटल की लिफ्ट में हुई कथित घटना के बाद बातचीत की थी।
उधर तेजपाल ने आज अग्रिम जमानत के लिए दिल्ली उच्च न्यायालय का दरवाजा खटखटाया। गोवा पुलिस ने इस घटना के संबंध में 22 नवंबर को तेजपाल के खिलाफ भारतीय दंड संहिता की विभिन्न धाराओं के तहत एक प्राथमिकी दर्ज की थी। (भाष)

 


विदेश के मामलेः-

  • ब्रिटेन के रक्षा मंत्री माइकल फालन ने गुरुवार को अपने पद से इस्तीफा दे दिया। उन पर महिला पत्रकार के साथ अनुचित यौन बर्ताव के आरोप थे।

 

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  • बीबीसी की रूसी सेवा में कार्यरत महिला पत्रकार फैरिडा रूस्तामोवा ने रूसी सांसद लिओनिद स्लूटस्काई पर एक इंटरव्यू के दौरान यौन शोषण करने का आरोप लगाया है।

 

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वैश्विक सर्वेक्षणः दो तिहाई महिला पत्रकारों को झेलना पड़ता है शोषण

मीडिया संस्थाओं में काम करने वाली महिलाओं के खिलाफ हिंसा पर पहले वैश्विक सर्वेक्षण में कहा गया है कि करीब दो तिहाई महिला पत्रकारों को कार्य के दौरान उत्पीडन या धमकी का अनुभव सहना पड़ता है। वाशिंगटन के इंटरनेशनल वीमन्स मीडिया फाउंडेशन और लंदन के इंटरनेशनल न्यूज सेफ्टी इंस्टीटयूट के सव्रेक्षण में इस साल जुलाई से नवंबर के बीच 822 महिला मीडियाकर्मियों का साक्षात्कार किया।

प्रेस विज्ञप्ति के अनुसार, इसमें पाया गया कि महिला मीडियाकर्मियों को धमकी और उत्पीड़न की ज्यादातर घटनाएं कार्यस्थल पर होती हैं और ये काम पुरुष वरिष्ठ अधिकारियों, निरीक्षकों और सहकर्मियों द्वारा किया जाता है। आईडब्ल्यूडब्ल्यूएमएफ की कार्यकारी निदेशक एलीसा लीस मुनोज ने कहा कि यह हैरानी भरा है कि हमारे सर्वेक्षण में शामिल 822 में से आधे से ज्यादा (64.48 प्रतिशत) महिला पत्रकारों को अपने काम को लेकर किसी न किसी तरह की धमकी या शोषण का अनुभव हुआ।

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इंटरव्‍यू लेने गई पत्रकार का हुआ यौन शोषण, मालिक को बताया तो मालिक बोले मत करो शिकायतः-

नोएडा के एसपी सिटी दिनेश यादव ने इस मामले की जानकारी देते हुए बताया कि महिला ने अपनी शिकायत में आरोप लगाया कि तीन साल पहले जब करोल बाग स्थित आश्रम में वो नारायण साई का इंटरव्‍यू लेने गई थी। तब नारायण साई ने उनका यौन शोषण किया था। जब पीड़ित महिला ने इस बारे में अपने चैनल के हेड को बताया तो उन्‍होंने महिला को इस बारे में शिकायत दर्ज न करवाने को कहा। उसके बाद महिला ने वह न्‍यूज चैनल छोड़ दिया था। कुछ तस्‍वीरें भी महिला ने पुलिस को सौंपी 10 दिन पहले उस महिला ने एसएसपी धर्मेंद्र सिंह के पास एक शिकायत दर्ज करवाई थी। बाद में एसएसपी धर्मेंद्र सिंह ने यह शिकायत एसपी सिटी दिनेश यादव को भेज दी। गुरूवार को इस मामले में पुलिस ने नारायण साई के खिलाफ एफआईआर दर्ज कर ली है। इस मामले से संबंधित कुछ तस्‍वीरें भी महिला ने पुलिस को सौंपी हैं। नारायण साई के खिलाफ यह यौन शोषण करने का पहला मामला दर्ज नहीं हुआ है। बल्कि सूरत की एक महिला ने वर्ष 2002 और 2005 में नारायण साई के खिलाफ यौन शोषण करने का मामला दर्ज करवाया था। इस मामले में नारायण साई के ऊपर आरोप है कि उसने मामले को दबाने के लिए पुलिस, डॉक्‍टर और न्‍यायिक अधिकारियों को घूस देने की पेशकश की थी।

 


मीडिया में महिलाओं से भेदभावः

बीती सदी के आखरी दशक में हमारे मुल्क में नवउदारवादी अर्थव्यवस्था के अमल में आने के बाद एक उपभोक्ता की राजनीति और उपभोक्तावादी संस्कृति का उदय हुआ और इसका सीधा-सीधा असर हमारे मीडिया संस्थानों व समाचारों पर भी पड़ा। मीडिया का भूगोल और गणित दोनों ही हमारे देखते-देखते बदल गया। समाचार और सूचनाऐं महज कमोडिटी बनकर रह गईं। जिन्हें बेचकर बस ज्यादा से ज्यादा मुनाफा कमाया जा सकता है। जाहिर है ऐसे हालात में मीडिया के अंदर सामाजिक सरोकारों और कुछ अलग करने की खातिर आये युवाओं को निराशा का सामना करना पड़ा। उनके आदर्श, उनके सपने टूटे। मीडिया संस्थानों में काम करने वाले युवक-युवतियों को आये दिन दरपेश होने वाली समस्याएं वैसे तो अमूमन एक जैसी ही हैं लेकिन फिर भी महिलाओं को पुरूषो की बनिस्बत ज्यादा समस्याओं का सामना करना पड़ता है। उनकी समस्याओं पर यदि निगाह डालें तो ज्यादातर समस्याएं जैण्डर आधारित हैं। महिलाओं को दीगर प्रोफेशन की मानिंद यहां भी लैंगिक भेद-भाव झेलना पड़ता है।

शुरूआत उनकी नियुक्ति से होती है। इलैक्ट्रानिक मीडिया है तो महिलाओं के पेशेगत टेलेन्ट की बनिस्बत उनकी खूबसूरती और स्मार्टनेस को ज्यादा तरजीह दी जाती है। उनकी तमाम काबिलियतों को नजरअंदाज उन्हें सिर्फ और सिर्फ एंकरिंग के लिए रखा जाता है। जबकि वे फील्ड में भी पुरूषों की मानिंद रिर्पोटिंग कर सकती हैं। कई चैनलों में न जाने कितनी ऐसी लडकियां होंगी, जो पुरूषों के मुकाबले कम होशियार नहीं हैं, फिर भी उन्हें केवल महिला होने के नाते काम का वाजिब मौका नहीं मिलता। गर मौका मिलता भी है तो सॉफ्ट स्टोरी करने का। जबकि महिलाएं भी हार्ड न्यूज कर सकती हैं, जुझारू काम कर सकती हैं। प्रिंट मीडियो में दर्जनों ऐसी महिला पत्रकार हैं, जिनकी खबरों पर हंगामा मचता है। इलैक्ट्रोनिक मीडिया में भी बरखा दत्त, नलिनी सिंह और नीता शर्मा जैसी कई महिला रिर्पोटर हैं, जिन्हें गंभीर रिर्पोटिंग सौंपी गई और वे उन उम्मीदों पर खरी साबित उतरीं। महिलाओं को कमतर समझने वालों को ये जानना लाजमी होगा कि अब वैज्ञानिक खोजों ने यह साबित कर दिया है कि महिलाओं का मस्तिष्क उनके शरीर के आकार के मुताबिक होता है लेकिन उसमें तंत्रिकाओं का घनत्व पुरूषों के मुकाबले कई गुना ज्यादा होता है।

मीडिया संस्थानों में खासकर प्रिंट मीडिया में महिलाओं को अपनी नियुक्ति को लेकर अक्सर भेद-भाव का सामना करना पड़ता है। मीडिया संस्थानों के मालिक और संपादकों का माइन्ड सैट ही कुछ इस तरह का हो गया है कि वे लडकियों को प्रिंट मीडिया के रिर्पोटिंग के काबिल ही नहीं समझते। यदि लडकियां जैसे-तैसे अपनी काबिलियत की दम पर नौकरी में आ भी जाएं तो वे इन संस्थानों में सर्वोच्च पदों तक नहीं पहुंच पातीं। तकरीबन तीन साल पहले मीडिया स्टडीज ग्रुप के अनिल चमड़िया, जीतेन्द्र कुमार और सीएसडीएस के योगेन्द्र यादव ने हिन्दी, अंग्रेजी राष्ट्रीय मीडिया के प्रमुख पदों पर कार्यरत लोगों की सामाजिक पृष्ठभूमि का सर्वे किया था। जिसके नतीजे बेहद चौंकाने वाले थे। इस रिपोर्ट के मुताबिक हिन्दी, अंग्रेजी, उर्दू, प्रिंट व इलैक्ट्रानिक मीडिया में महज तीन फीसद महिलाएं ही आला ओहदों तक पहुंच पाती हैं। जाहिर है ये लैंगिक भेद-भाव का एक नमूना भर है। पितृसत्तात्मक मानसिकता, महिलाओं को हमेषा अपने से कमतर ही समझती आई है। अगर सिर्फ जैण्डर की ही बात करें और इलैक्ट्रानिक मीडिया के सारे चैनलों पर सरसरी नजर दौडाऐं तो देखने को मिलेगा कि टॉप मैनेजमेंट यानी सीनियर स्तर पर 90 फीसदी से ज्यादा मर्द हैं। वहीं जूनियर लेबिल पर लड़कियां ही लड़कियां नजर आयेंगी।

नियुक्ति के बाद यदि उनकी तनख्वाहों की ओर गौर करें तो, कुछ अपवादों को छोड़ दें तो उन्हें पुरुषों के मुकाबले कम तनख्वाहें मिलती हैं। जबकि काम उन्हें पुरूषों के बराबर ही करना होता है। कई मीडिया संस्थान तो महिलाओं को अपने यहां इसलिए ही रखते हैं कि उन्हें कम तनख्वाह पर रखा जा सकता है। जाहिर है औरत के जानिब पूंजीवादी समाज भी सामान्तवादी समाज की तरह ही बर्ताव करता है। बावजूद इसके मीडिया की चकाचौंध में लैंगिक विषमता का ये संवेदनशील मुद्दा गुम होकर रह जाता है। गोया कि तनख्वाहों के मामले में यह विषमता केवल प्रिंट मीडिया में ही महदूद नहीं है बल्कि इलैक्ट्रानिक मीडिया में भी महिला पत्रकारों को पुरुष पत्रकारों के मुकाबले कम तनख्वाह मिलती है। यूं तो हम आये दिन, मीडिया में ही लैंगिक विषमता के कई किस्से पढ़ते और देखते रहते हैं लेकिन मीडिया संस्थानों में काम करने वाली महिलाओं के हालात भी औरों से जुदा नहीं हैं। ये अफसोस की बात है कि समानता के तमाम वादों और दावों के बावजूद दीगर क्षेत्रों की तरह मीडिया में भी महिला पत्रकारों का आज तलक दोयम दर्जा बरकरार है। ऐसा नहीं कि ये कहानी सिर्फ हमारे मुल्क की है बल्कि सारी दुनिया में महिला पत्रकारों से इसी तरह का बर्ताव किया जाता है। गुजिश्ता बीस सालों में मीडिया के अंदर महिला प्रोफेशनल की तादाद बढ़ी है लेकिन आज भी उन्हें टॉक शोज, बिजनेस, सियासत व अर्थशास्त्र से संबंधित बीटों के लायक नहीं समझा जाता, इन बीटों पर पुरूषों को ही तरजीह दी जाती है। आम तौर पर टी.वी. या अखबारों के जरिये महिलाओं को लेकर बड़ी-बड़ी बातें करने वाले ज्यादातर पत्रकार अपने ही प्रोफेशन की महिलाओं को लेकर उतनी बड़ी सोच नहीं रखते। उनका नजरिया महिलाओं के जानिब तंग नजर ही बना रहता है।

हालिया बरसों में बढ़ते उपभोक्तावाद और बाजारवाद से उपजी अधकचरी सोच ने महिला पत्रकार की इमेज को काफी नुक्सान पहुंचाया है। इलैक्ट्रानिक मीडिया, महिला पत्रकारों का इस्तेमाल सिर्फ ग्लैमर्स एंकरिंग के लिए करता है। महिला पत्रकारों को खबर की बनिस्बत अपनी खूबसूरती पर ज्यादा ध्यान देने के लिए कहा जाता है। जाहिर है महिला एंकरों पर सुंदर दिखने का ये दबाब, तनाव हमेशा बना रहता है। मीडिया संस्थानों में कार्यरत महिलाओं की दीगर समस्याओं पर यदि गौर करें तो उनके यौन शोषण के किस्से आम हैं। शारीरिक शोषण की घटनाऐं अब महज टी.वी. कार्यक्रमों, धारावाहिकों और फिल्मों में काम करने के लिए उत्सुक युवा लड़कियों के साथ ही नहीं घटतीं बल्कि साफ सुथरे व सच दिखाने वाले इलैक्ट्रानिक चैनलों और उच्च आदर्र्शों वाले प्रिंट मीडिया में भी महिलाओं के साथ ये सब होता रहता है। अक्सर संघर्षशील युवा लड़कियां ही नहीं बल्कि अनुभवी महिला पत्रकार भी यौन शोषण का शिकार होती हैं।

बहरहाल, महिला पत्रकारों को अपनी नौकरी बचाये रखने के लिए कई तरह के समझौते करना पड़ते हैं लेकिन आधुनिक कहलाये जाने वाले मीडिया जगत में इस पर कभी बहस नहीं होती और महिलाएं भी अपनी पारिवारिक मजबूरियों और सामाजिक बदनामी के डर के चलते चुप्पी साध लेती हैं। महिला पत्रकारों के काम के घंटे अक्सर दिन से रात में तब्दील हो जाते हैं। दीगर प्रोफशन में पत्रकारिता के बनिस्बत महिलाओं को रात में नहीं रूकना पड़ता लेकिन पत्रकारिता में उन्हें रात की पाली में भी काम करना पड़ता है। उनसे ओवर टाईम कराया जाता है लेकिन कभी ओवर टाइम की तनख्वाह अलग से नहीं मिलती। चैनलों के बीच बढ़ रहीं गलाकाट प्रतिस्पधा ने महिलाओं की हालत ओर खराब करके रख दी है। पसमंजर यह है कि इलैक्ट्रानिक मीडिया में काम करने वाली शादीशुदा महिलाओं के लिए आज काम और घर के बीच ताल-मेल बिठाना मुश्किल हो गया है। ऐंसा भी नहीं है कि जिन महिलाओं की शादी नही हुई है उनके लिए राह आसान हो। दफ्तर में ज्यादा वक्त गुजारने की वजह से उन्हें परिवार और दोस्तों के लिए वक्त निकालना मुश्किल हो जाता है।

गोया कि मीडिया में पुरुषों के एकाधिकार को चुनौती देती आज की आधुनिक युवतियां मल्टीटॉस्किंग के लिए मजबूर हैं। कार्यालय तथा घर को सुचारू रूप से चलाने के लिए मानसिक तनाव से जूझना महिलाओं की रोजमर्रा की जिंदगी का हिस्सा बन चुका है। नारीवादी लेखिका भावना कहती हैं कि ”महिलाओं में जहां अपने अधिकारों के प्रति बढ़ती जागरूकता उन्हें आर्थिक रूप से आत्मनिर्भर बनने के लिए प्रेरित करती है, वहीं पारिवारिक मूल्यों के संरक्षण के प्रयासों एवं पितृसत्ता के अवशेषों ने उसे साधारण स्त्री से असाधारण स्त्री बनने के लिए लगातार दबाब डाला है।” जाहिर है यह दबाब और तनाव उसे शारीरिक, मानसिक रूप से बीमार बना रहे हैं। अभी हाल ही में एसएनडीटी महिला विश्वविद्यालय मुंबई में फिजियोलॉजी के हैड ऑफ डिर्पाटमेंट डॉ एच0एल0 कालिया ने केरियर तथा घर का प्रबन्धान करने वाली महिलाओं के ऊपर एक शोध किया, जिसमें कई चिन्ताजनक तथ्य उभर कर सामने आये। शोध के मुताबिक महिलाओं को कार्यालय में घंटों काम करने से कई शारीरिक व मानसिक रोग घेर लेते हैं। यही नहीं महिलाओं को ‘महिला’ होने की वजह से अतिरिक्त समस्याऐं झेलनी पड़ती हैं। ऑफिस के काम के अलावा उन पर हमेशा घर के कामों तथा परिवार के सदस्यों के भावनात्मक आवश्यकताओं की पूर्ति का दबाव हावी रहता है। जाहिर है दोनों क्षेत्रों से वाजिब इंसाफ न कर पाने का अपराध बोध भी उन्हें अतिरिक्त मेहनत करने के लिए उकसाता है, जिसके चलते वे बड़ी तादाद में मानसिक अवसाद से ग्रस्त हो रही हैं। ऑफिस में 8 से 10 घंटे काम करने के बाद वे घर के कामों में चक्करघिरनी सी घूमती रहती हैं।

मीडिया संस्थानों में दीगर कामकाजी समस्याओं के अलावा उन्हें कदम-कदम पर आये दिन पुरूषवादी मानसिकता का सामना करना पड़ता है। यदि कोई महिला अपनी काबिलियत की दम पर प्रमोशन पाती है तो पुरूष सहकर्मी उसकी काबिलियत को दरकिनार करते हुये अनैतिक उपायों का सहारा लेने का इल्जाम लगाने से बाज नहीं आते। महिला पत्रकार पर बॉस की चहेती होने का ताना आम है। बॉस एक पुरूष एंकर या रिर्पोटर की तारीफ करे या उसे एक अच्छा एसाइनमेंट सौंपे तो वह उसकी काबिलियत है लेकिन महिला एंकर या रिर्पोटर की तारीफ हो जाये तो बॉस उस पर ‘कुछ ज्यादा ही मेहरबान है’ के फिकरे पुरूष सहकर्मी कसने लगते हैं। लाख कहें लेकिन हमारे मुल्क में आधुनिकता आने के बावजूद आज भी पुरूषवादी मानसिकता में कोई तब्दीली नहीं आई है। एक छोटी से मिसाल से इसे जाना जा सकता है। अगर पुरूष एंकर कोई गलती करे तो बेवकूफ वही है लेकिन कोई फीमेल एंकर गलती करे तो हर फीमेल एंकर मूर्ख मानी जाती है।

कुल मिलाकर 1888 में जब रतलाम से हेमन्त कुमारी चौधरी ने ‘सुगृहणी’ का प्रकाशन शुरू किया था तो उन्होंने महिलाओं को सामाजिक और सांस्कृतिक स्तर पर साझेदार बनाने के मद्देनजर महिला पत्रकारिता की शुरूआत की थी। लेकिन मीडिया में आई बेतहाशा पूंजी ने महिला नुमाइंदगी को नये मायने दिये। यहां तक की उनकी भूमिका ही बदलकर रख दी जबकि महिलाओं ने दूसरे क्षेत्रों की मानिंद मीडिया में भी ये साबित कर दिखाया है कि वह हर वो काम कर सकती है जो पुरूष कर सकता है। बस जरूरत पुरूष मानसिकता में सुधार की है। रही बात महिलाओं के दरपेश चुनौतियों और समस्याओं के समाधान की। जैसे महिलाएं खुद दीगर क्षेत्रों में समस्याओं से बहादुरी से निपटती आई हैं वैसे ही मीडिया में आने वाली समस्याओं पर भी पार पा जाएंगी और वह दिन दूर नहीं, जब दीगर क्षेत्रों की तरह यहां भी महिलाएं शिखर चूमेंगी।

 

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हिन्दी प्रिन्ट मीडिया में महिलाओं की सोचनीय दशा

 

प्रस्तुत लेख रानू तोमर (एम फिल डेवलपमेंट स्टर्डीज) के लेख पर आधारित है। रानू तोमर ने मीडिया में लिंग भेदभाव को अपने शोध से स्पष्ट किया है। खास तौर पर हिन्दी प्रिंट मीडिया में पत्रकार महिलाओं की स्थिति पर प्रकाश डाला है।
समाज का चैथा स्तम्भ माने जाने वाले मीडिया में भी महिला मुद्दों व इस व्यवसाय में काम करने वाली महिलाओं के साथ भेदभाव भारतीय समाज की पुरुष प्रधान मानसिकता को दर्शाता है।
पितृसत्तात्मक पुरुष प्रधान मानसिकता कितनी गहराई से पैठी है इसका अंदाजा हम भारतीय प्रिन्ट मीडिया में कार्यरत पत्रकारों की स्थिति से लगा सकते हैं।
इस क्षेत्र में कार्यरत महिलाओं के साथ न केवल उनके मेहनताने में पुरुषों की अपेक्षा भेदभाव बरकरार है बल्कि काम के घंटे से लेकर काम की जगह में सुरक्षा जैसी दिक्कतों को महिला पत्रकारों ने माना है।
अम्मू जोसेफ जिन्होंने कामकाजी महिलाओं के मामलों को प्रिन्ट मीडिया के माध्यम से डील किया, ने अपने बयानों में व्याख्यतित किया है कि भारतीय प्रिन्ट मीडिया में महिलाओं से सम्बन्धित मुद्दे जैसे उनकी शिक्षा, रोजगार के क्षेत्र मेें आगे बढ़ने या बढ़ाने को मीडिया केन्द्रित नहीं करता है। उसके लिए ये मुद्दे बहुत कम अहमियत रखते हैं। वहीं इसकी तुलना में सेक्स व अपराध की रिपोर्टों को मीडिया ज्यादा तूल देता है क्योंकि इसका एक बड़ा बाजार आज के वैश्वीकरण के जमाने में बनता है।
वहीं रामा झा(1992) जिन्होंने एक दशक तक महिलाओं के संघर्षों को कवर किया, ने बताया कि मीडिया में रिपोर्टरों द्वारा तैयार रिपोर्टों को बहुत अहमियत नहीं दी जाती। उनकी खबरों को प्रमुखता से आगे के पेजों में जगह नहीं दी जाती यहां तक कि उनके शोधों पर भी शक जाहिर किया जाता है जो महिलाओं की क्षमताओं पर सवाल उठाता है।
प्रिंट मीडिया में कार्यरत महिलाओं को न केवल समान काम का समान वेतन नहीं दिया जाता है बल्कि जर्नलिस्ट एक्ट 1957 का भी उल्लघंन किया जाता है जिसके अंतर्गत वेतन बोर्ड, रोजगार सुरक्षा व कार्य के दौरान सुरक्षा आदि सभी चीजों को नजरअंदाज किया जाता है।
इस क्षेत्र में कार्यरत महिलाओं को मातृत्व काल में न केवल अपनी नौकरी सेे हाथ धोना पड़ता है बल्कि संतान उत्पत्ति के बाद भी काम करने की इच्छा होने पर भी कार्य नहीं मिल पाता।
जर्नलिस्ट एक्ट के अंतर्गत सभी पुरुष व महिला पत्रकारों को समान वेतन देना शामिल है परन्तु ‘नवभारत टाइम्स’ में कार्यरत पूनम पांडे बताती हैं कि हिन्दी दैनिक अखबारों में काम करने वाली महिलाओं का वेतन पुरुषों की तुलना में कम होता है जबकि अंग्रेजी अखबारों में कार्यरत महिलाओं को बराबर वेतन दिया जाता है।
इसी प्रकार घरेलू कामकाज का बोझ महिलाओं पर होने के कारण उन्हें रात्रिकालीन ड्यूटी में न रखने की बात एक्ट में शामिल है फिर भी उनसे देर रात तक काम लिया जाता है।
कार्यस्थलों में सभी पुरुषों व अधिकारियों द्वारा महिलाओं का यौन शोषण होने की बात महिला पत्रकारों ने बताई। सर्वेश जो कि हिन्दुस्तान दैनिक की एक सीनियर फोटोग्राफिक पत्रकार हैं, ने स्वीकारा कि उन्होंने स्वयं यौन शोषण को सहा है। यह बात उन्होंने अपनी एक सहकर्मी को बताई। बाद में उस लड़की को अपनी नौकरी से हाथ धोना पड़ा।
‘दैनिक जागरण’ की माला दीक्षित जिन्होंने 1996 में एक लीगल रिपोर्टर के रूप में हिन्दी प्रिन्ट मीडिया में काम किया, बताया कि ज्यादातर महिलाओं को अपनी यात्रा का खर्च स्वयं वहन करना पड़ता है। सबसे ज्यादा दिक्कत उन्हें रात्रि शिफ्ट में काम करके घर वापस जाने में होती है। समाज में महिलाओं के लिए सुरक्षित माहौल न होने के कारण रात को वापस जाने के लिए उन्हें अपने पुरुष सहकर्मियों से घर छोड़ने की अपील करनी पड़ती है जोकि शर्मनाक है।
इसी प्रकार नीलम जीना जो कि ‘विशाल आन्ध्र भारत’ में काम करती हैं, ने बताया कि अपने काम के शुरुआती दिनों में उन्हें सार्वजनिक (पुरुषों के साथ) शौचालय का प्रयोग करना पड़ा। काम की जगह में महिलाओं के लिए अलग शौचालय तक की व्यवस्था नहीं थी।
स्मिता मिश्रा जो कि ‘दैनिक भास्कर’ की पत्रकार हैं ने बताया कि यहां ऐसे नियमों को बनाया जाता है जिनका जिक्र तक पहले नहीं किया जाता, महिला पत्रकारों पर थोप दिया जाता है। जर्नलिस्ट एक्ट (1955) के अनुसार कामकाजी समय दिन में 6 घंटे व रात में साढे पांच घंटे का है। परंतु यहां 10 से 12 घंटे काम करवाना आम बात है जो कि नियमों को सीधे-सीधे ताक पर रखना है।
इसके अलावा नौकरी पाने, बरकरार रखने से लेकर तमाम संघर्ष महिलाओं को अपने कार्यालय के दौरान करने पड़ते हैं। सर्वेश ‘हिन्दुस्तान’ बताती हैं कि उन्हें काम करते 20 साल हो गये हैं। फोटोग्राफी के अपने कैरियर में 3 साल उन्होंने कान्ट्रेक्ट बेस पर संघर्ष किया। आज वे अपने संघर्षों के बल पर जानी-मानी फोटोग्राफर हैं, जिन्होंने कारगिल युद्ध से लेकर कई कवरेज दिये।
बहुत ही कम महिला पत्रकार रिपोर्टर हिन्दी प्रिन्ट मीडिया के उच्च अधिकारियों के पद तक पहुंच पाती हैं। मृणाल पाण्डे जो कि चीफ फार्मर एडीटर की पद पर पहुंच पाई हैं के अलावा अन्य किसी महिला का प्रमोशन यहां तक नहीं हुआ, एक सोचनीय प्रश्न बनता है। जबकि कई अंग्रेजी अखबारों मसलन ‘इंडियन एक्सप्रेस’ से लेकर ‘दि हिंदू’ तक मध्य व उच्च पद पर महिलायें प्रोन्नत हुई हैं और उन्होंने अपनी बेहतर कुशलता का परिचय दिया है।
जानी मानी पत्रकार आर अखिलेश्वरी कहती हैं कि महिलाओं को पहाड़ के बराबर काम तो दे दिया जाता है पर उनकी व उनके काम की कोई पहचान नहीं बन पाती और न सराहा जाता है।
पति-पत्नी दोनों के एक पेशे में होेने पर भी पति प्रतियोगिता में पत्नी को आगे बढ़ता नहीं झेल पाता। वहीं अन्य साथी सहकर्मी भी महिला सहकर्मी को आगे न बढ़ने देने के लिए हतोत्साहित करने के साथ-साथ अडंगे भी लगाते हैं।
वहीं पूरे मीडिया जगत में महिलाओं के लिए उम्र बढ़ना भी एक परेशानी की बात बन जाती है। मीडिया में 20 से 35 वर्ष की महिलायें-लड़कियों को ही ज्यादा अहमियत दी जाती है। 50 वर्ष तक की उम्र की महिलाओं का मात्र 17 प्रतिशत व रिपोर्टरों का 7 प्रतिशत रहता है। जबकि पुरुष रिपोर्टरों की नौकरियां उम्र के 50वें व 60वें वर्ष तक जारी रहती हैं।
इसी प्रकार काम के क्षेत्र बांटने में भी लिंग भेदभाव बरकरार रहता है जैसे स्थानीय खबरें राष्ट्रीय व अंतर्राष्ट्रीय खबरों की तुलना में कम अहमियत रखती हैं जबकि महिला रिपोर्टरों को स्थानीय खबरों को जुटाने के लिए ही ज्यादा भेजा जाता है। सम्पूर्ण खबरों में स्थानीय खबरों में 44 प्रतिशत, राष्ट्रीय 34 प्रतिशत व अंतर्राष्ट्रीय 32 प्रतिशत खबरें महिलाओं द्वारा जारी की जाती हंै।
महिला रिपोर्टरों को खासतौर पर सेलिब्रिटी या सामाजिक व लीगल खबरों के लिए ही ज्यादा नियुक्त किया जाता है और इस प्रकार उनकी खबरों को मीडिया में ‘सोफ्ट न्यूज’ की संज्ञा दी जाती है। वहीं गरीबी, वाॅलफेयर या उपभोक्ता मुद्दों का 52 प्रतिशत न्यूज पुरुष रिपोर्टरों द्वारा तैयार करवाई जाती है।
उपरोक्त सभी तथ्य(पे्रस एक्ट इंडिया 2004 की रिपोर्ट) बताते हैं कि स्त्री-पुरुष गैर बराबरी समाज के एक अहम क्षेत्र मीडिया में किस कदर हावी हैं वहीं ग्लैमर व फिल्मी मीडिया महिलाओं को उपभोग के रूप में पेश कर महिलाओं को चकाचैंध भरी रोशनी के रूप में परोसता है।
दोनों रूपों में महिलाओं की गरिमा को क्षति पहुंचती है। जहां ग्लैमर के रूप में महिला एक वस्तु(पीस) में तब्दील कर दी जाती है तो दूसरी जगह उसके परिश्रम को हेय दृष्टि से देख उसके साथ नाइंसाफी होती है।
अतः सभ्य समाज के लिए यह एक सोचनी प्रश्न है कि इस गैरबराबरी को किस प्रकार तोड़ा जा सकेगा?

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महिला पत्रकार ने की आत्महत्या की कोशिशः-

दिल्ली से सटे नोएडा में एक टीवी एंकर की दफ़्तर के बाहर आत्महत्या की कोशिश वैसी सुर्ख़ी नहीं बन सकी, जैसा कि ऐसे दूसरे मामलों में बनती है. टीवी एंकर तनु शर्मा ने अपने एम्प्लॉयर पर प्रताड़ना का आरोप लगाया है, और इंडिया टीवी ने उन पर काम में कोताही का.

इस मामले में पुलिस केस दोनों तरफ़ से दर्ज हुए हैं. इसकी मीडिया को ‘ख़बर’ तो है पर ‘कवरेज’ नहीं. समाचार चैनलों के दफ़्तरों के आसपास चाय-सुट्टा के ठीयों पर मीडियाकर्मियों की बातचीत में ज़रूर इसका ज़िक्र है कहीं बेबसी के साथ, कहीं ग़ुस्से और कहीं अविश्वास के साथ.

इस मामले के बारे में इसके अलावा कहीं कोई बात चल रही है, तो वह सोशल मीडिया और मीडिया पर नज़र रखने वाली वेबसाइट्स पर है. दो एक अंग्रेज़ी अख़बारों ने ज़रूर इस मामले को छापा.

मीडिया में काम की जगह पर प्रताड़ना के आरोपों से जुड़ा ये पहला मामला नहीं है. पर तहलका मैगज़ीन के संपादक तरुण तेजपाल के ख़िलाफ़ यौन हिंसा के आरोप को छोड़ दें, तो इससे पहले भी, मीडिया की मुख्यधारा ने अपने ही कर्मियों के साथ प्रताड़ना के किसी अन्य मामले को ख़बरों में जगह नहीं दी है.

बीबीसी ने इसी ख़ामोशी के पीछे की ‘कहानी’ टटोलने की कोशिश की.

तनु शर्मा बनाम इंडिया टीवी

उत्तर प्रदेश पुलिस के मुताबिक़ इंडिया टीवी की एंकर तनु शर्मा ने 22 जून को चैनल के दफ़्तर के आगे ज़हर खाकर आत्महत्या करने की कोशिश की. फ़ेसबुक पर एक ग़ुबार भरा स्टेटस लिखने के बाद.

दफ़्तर के लोगों और पुलिस ने ही उन्हें वक़्त रहते अस्पताल पंहुचाया. तनु बच गईं. अगले दिन घर लौटने पर पुलिस को दिए अपने बयान में तनु ने कहा कि इंडिया टीवी की एक वरिष्ठ सहयोगी ने उन्हें “राजनेताओं और कॉरपोरेट जगत के बड़े लोगों को मिलने” और “ग़लत काम करने को बार-बार कहा”.

तनु के मुताबिक़, “इन अश्लील प्रस्तावों के लिए मना करने के कारण मुझे परेशान किया जाने लगा, इसकी शिकायत एक और सीनियर से की तो उन्होंने भी मदद नहीं की, बल्कि कहा कि ये प्रस्ताव सही हैं”.

यह बात भी ग़ौर करने लायक़ है कि तनु ने जिन दो वरिष्ठ कर्मियों पर आरोप लगाया है, उनमें से एक महिला है.

तनु का आरोप है कि परेशान होकर उन्होंने एसएमएस के ज़रिए अपने बॉस को लिखा, “मैं इस्तीफ़ा दे रही हूं”, और कंपनी ने इसे औपचारिक इस्तीफ़ा मान लिया, और “इस सबसे मैं ज़हर खाने पर मजबूर हुई”.

इंडिया टीवी ने तनु के आरोपों को बेबुनियाद बताता है. बीबीसी को भेजे एक लिखित जवाब में इंडिया टीवी ने अपने वकील की मार्फ़त कहा है- “तनु ने चार महीने पहले इस चैनल में नौकरी की और वो शुरुआत से ही अपने काम में लापरवाही बरतती रहीं, इसके बारे में उन्हें समझाया गया तो अब वो उन्हीं वरिष्ठकर्मियों को नीचा दिखाने की कोशिश कर रही हैं.”

इंडिया टीवी ने बीबीसी हिंदी को इस तरह के “ग़ैरक़ानूनी आरोपों” को प्लेटफ़ॉर्म देने से बचने की हिदायत भी दी.

इंडिया टीवी ने बीबीसी के सवालों के जवाब में कहा, “तनु के बर्ताव को देखते हुए उनके इस्तीफ़े को मंज़ूर करने में हमें कोई झिझक नहीं थी, और उनके कॉन्ट्रैक्ट में इस्तीफ़ा देने के किसी एक माध्यम की चर्चा भी नहीं है, इसलिए हमें एसएमएस भी मंज़ूर है.”

फ़िलहाल मीडिया की सुर्खि़यों से बाहर पुलिस मामले की तहक़ीक़ात कर रही है.


 

मीडिया उद्योग में महिलाओं को ख़तरा?

साल 2013 में ‘इंटरनेशनल न्यूज़ सेफ़्टी इंस्टीट्यूट’ और ‘इंटरनेशनल वीमेन्स मीडिया फ़ाउंडेशन’ ने दुनियाभर की 875 महिला पत्रकारों के साथ सर्वे किया.

सर्वे के मुताबिक़ क़रीब दो-तिहाई महिला मीडियाकर्मियों ने काम के सिलसिले में धमकी और बदसुलूकी झेली है. ज़्यादातर मामलों में ज़िम्मेदार पुरुष सहकर्मी थे.

वरिष्ठ पत्रकार पामेला फ़िलीपोज़ के मुताबिक़ भारत में ये ख़तरा कहीं ज़्यादा है.

पामेला कहती हैं, “इसके बारे में चर्चा ही नहीं होती, क्योंकि ख़ुद पत्रकार ही इस मुद्दे को उठाने से डरते हैं और ये चुप्पी मीडिया कंपनियों और उनके कर्मियों के बीच के असमान रिश्ते को दर्शाती है.”

प्रिंट मीडिया को नियमित करने के लिए 1978 में प्रेस काउंसिल ऑफ़ इंडिया की स्थापना की गई थी. पर इससे बिल्कुल अलग, टीवी मीडिया में जब तेज़ी से विस्तार हुआ तो साथ-साथ उसमें काम करनेवाले लोगों के लिए कोई क़ानून या नियम नहीं बनाए गए.

पामेला के मुताबिक़ वो ऐसे क़ायदे बनाने में किसी की रुचि भी नहीं देखती हैं.

टेलीविज़न पत्रकारों का प्रतिनिधित्व करने के लिए हाल ही में ‘ब्रॉडकास्टिंग एडीटर्स एसोसिएशन’ बनाई गई लेकिन इस संगठन ने भी तनु शर्मा के मामले में अभी तक अपनी कोई राय ज़ाहिर नहीं की है. न ही संपादकों के संगठन ‘एडीटर्स गिल्ड ऑफ़ इंडिया’ की ओर से इस विषय पर कोई बयान आया है.


 

न्यूज़ चैनल या अपनी जागीर?

तनु शर्मा के आरोपों के सामने आने के बाद दिल्ली में पत्रकारों के संगठन ‘प्रेस क्लब ऑफ़ इंडिया’ और महिला पत्रकारों के संगठन ‘इंडियन वीमेन्स प्रेस कोर’ ने एक संयुक्त प्रेस वार्ता की और कहा कि, “ये मामला एक बार फिर याद दिलाता है कि मीडिया संस्थानों में युवा महिला पत्रकार ऐसे माहौल में काम कर रही हैं जो अच्छे नहीं कहे जा सकते.”

इसी वार्ता में बुलाए गए वरिष्ठ पत्रकारों में से एक, सीएनएन-आईबीएन/आईबीएन-7 के मैनेजिंग एडिटर, विनय तिवारी ने कहा कि टीवी न्यूज़ चैनलों में नेतृत्व की भूमिका निभा रहे कई लोग, “उन जगहों को सामन्ती विचारधारा के तहत अपनी जागीर की तरह चला रहे हैं.”

विनय तिवारी के मुताबिक़ पत्रकारिता जगत की दिक़्क़त प्रोसेस और परसेप्शन के फ़र्क़ में हैं. क्योंकि कोई ठोस और यूनीफ़ॉर्म प्रक्रिया भारतीय चैनलों में नहीं है, जिसकी समझ में जैसे आता है, चैनल चलाता है.

उन्होंने कहा, “ये समझ बहुत व्यक्तिगत होती है, इसलिए जो लोग फ़ैसले करने की भूमिका में हैं, उनके हाथ में बहुत ताक़त है. उस ताक़त का ग़लत इस्तेमाल होने की गुंजाइश बढ़ जाती है.“

ये ताक़त महिला ही नहीं पुरुष पत्रकारों के ख़िलाफ़ भी अक्सर इस्तेमाल होती है.

अकेले खड़े पत्रकार

चौबीस घंटे दुनियाभर की ख़बरों को तेज़ी से प्रसारित करने की ज़रूरत के चलते टीवी न्यूज़ चैनलों में काम करने के तौर तरीक़े मुश्किल माने जाते हैं.

वरिष्ठ पत्रकार प्रभात शुंगलू ने भारतीय चैनलों में सालों काम करने के बाद एक उपन्यास भी लिखा है.

शुंगलू के मुताबिक़ आम जनता की नज़र में न्यूज़ चैनलों के प्रति बहुत इज़्ज़त और विश्वास होता है और प्रताड़ना के आरोप उसे धूमिल करने की शक्ति रखते हैं.

बीबीसी से बातचीत में उन्होंने कहा, “कहीं ना कहीं टीवी न्यूज़ चैनलों में एकजुटता दिखती है, जिसके तहत वो एक-दूसरे के बारे में ऐसे आरोप या वारदातों को सामने नहीं लाना चाहते, ऐसी शिकायतों को नज़रअंदाज़ करने की एक अनकही सहमति दिखती है.”

अमरीका, ब्रिटेन जैसे अन्य देशों में आज भी पत्रकारों की प्रभावी यूनियन काम कर रही हैं. पर भारत में प्रेस मीडिया के अलावा रेडियो, टीवी जैसे नए माध्यमों में कोई पत्रकार संघ नहीं है.

दिल्ली यूनियन ऑफ़ जर्नलिस्ट्स की अध्यक्ष सुजाता मधोक के मुताबिक़ इस वजह से टीवी पत्रकार बिल्कुल अकेले पड़ जाते हैं, “जब आपका साथ देने के लिए कोई आपके साथ नहीं खड़ा है, तो आप अपने हक़ या समाज के हक़ के लिए कैसे लड़ सकते हैं?”

साथ ही वो मानती हैं कि कॉन्ट्रैक्ट पर नौकरी के चलन ने मौजूदा संघ को भी कमज़ोर किया है.

सुजाता कहती हैं कि तनु शर्मा के मामले में किसकी ग़लती है ये फ़ैसला अभी नहीं सुनाया जा सकता लेकिन ऐसी घटना अगर किसी और कंपनी में होती तो उसको सामने लाने में मीडिया ही आगे होती.

उनके मुताबिक़, “मीडिया में ऐसी सांठ-गांठ है कि एक-दूसरे पर वो निशाना नहीं साधते, एकदम चुप्पी इसी वजह से है.”

  • बीबीसी की दिव्या आर्य की रिपोर्ट साभार

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कितनी सुरक्षित हैं महिला पत्रकारः-

  • ‘बहुत मजबूत हूं मैं। सारी जिंदगी मेहनत की। संघर्ष किया। हर परेशानी से पार पाने की कोशिश करते-करते यहां तक पहुंची लेकिन आज बहुत मजबूर महसूस कर रही हूं। अपने सपनों को टूटते देखना, जिंदगी को एक ही झटके में सड़क पर देखना इतना भी आसां नहीं होता। जो लोग सारी जिंदगी अपने ख्वाबों को पूरा करने के लिए मेहनत करते है और जो जान लगा देते है उनके लिए एक सुबह अपने बिखरे सपनों के साथ उठना मौत से कम नहीं। इंडिया टीवी ने जो कुछ किया मेरे साथ वो एक भयानक सपने से कम नहीं। प्रसाद सर, मैं आपको कभी माफ नहीं करूंगी। अनीता शर्मा, आपके लिए तो शब्द ही नहीं है। एक औरत होकर भी आप ऐसा कर सकती है। अफसोस रहेगा कि मैंने इंडिया टीवी ज्वाइन किया और ऐसे लोगों के साथ काम किया जो विश्वासघात करते हैं, षड्यंत्र करते हैं।’ इंडिया टीवी की एंकर तनु शर्मा ने अपने फेसबुक वॉल पर लिखे गए सुसाइड नोट में अपने साथ हुए मानसिक उत्पीड़न की दास्तान को कुछ इस तरह बयां किया। वह चैनल में दो वरिष्ठ अधिकारियों के द्वारा किए जा रहे उत्पीड़न को लेकर तनाव में थी। उसने 22 जून को इंडिया टीवी कार्यालय के बाहर नशीला पदार्थ खाकर आत्महत्या का प्रयास किया था। हालांकि समय रहते अस्पताल पहुंचाने के कारण उसकी जान बचा ली गई। देश के एक राष्ट्रीय समाचार चैनल की एक एंकर का खुद खबर बन जाना दुखदायी है और सोचनीय भी। चैनल के सामने ही उसने आत्महत्या की कोशिश की और चैनल प्रबंधन पर सवाल खड़े किए। चैनल प्रबंधन के आपराधिक, गैर जिम्मेदाराना और उत्पीड़नकारी रुख के चलते तनु शर्मा को खुदकुशी की कोशिश के लिए मजबूर होना पड़ा। घटना के बाद दोषियों के खिलाफ कार्रवाई की जगह चैनल प्रबंधन उन्हें बचाने में जुट गया है। चैनल की तरफ से तनु शर्मा पर ही आत्महत्या की कोशिश का मामला दर्ज करवा दिया गया जिसके बाद तनु ने भी 26 जून को पुलिस को लिखित में अपना बयान दिया।

    बयान के मुताबिक 5 फरवरी 2014 को चैनल ज्वाइन करने के बाद से ही तनु के वरिष्ठों ने उसे परेशान करना शुरू कर दिया था। तनु शर्मा ने पुलिस को दिए चार पेज लंबे स्वहस्ताक्षरित बयान में लिखा है कि फरवरी में नियुक्ति के बाद पहले तो अनीता शर्मा ने उसकी तारीफ करते हुए उसे अपने जाल में फंसाना चाहा। वो उसकी तारीफ में उसके अंगों के बारे में टिप्पणी करती थी। कहती थी कि उसका शरीर बहुत खुबसूरत है और इसे वो अपने आगे बढ़ने के लिए इस्तेमाल कर सकती है। तनु शर्मा को कार्यस्थल पर लगातार बेईज्जत और प्रताड़ित किया जा रहा था। साथ ही शारीरिक संबंध बनाकर आगे बढ़ने जैसे तरीके बताए जाते थे। तनु शर्मा ने अपने साथ हो रहे मानसिक उत्पीड़न के बारे में कई बार चैनल प्रबंधक को लिखित में शिकायत की लेकिन इसके बावजूद उसकी कोई मदद नहीं की।

    अपने बयान में तनु शर्मा ने कई जगह लिखा है कि उसकी जिंदगी इन लोगों ने मिलकर नरक बना दी है। आखिरकार तंग आकर तनु शर्मा ने आत्महत्या का प्रयास किया। इस मामले में सबसे संदेहास्पद भूमिका पुलिस की रही है और किसी भी तरह की मिलीभगत से इंकार नहीं किया जा सकता है। तनु शर्मा के बयान की कॉपी में स्पष्ट दिख जाता है कि उसने किन-किन लोगों के नाम लिए हैं और किन-किन पर आरोप लगाया है। तीन लोगों को अपनी मौत का जिम्मेदार बताते हुए आत्महत्या का प्रयास करने के पूर्व लिखे गए सुसाइड नोट में लिखा है कि रितु धवन, अनीता शर्मा विष्ट और एमएन प्रसाद के उत्पीड़न और असहयोग से क्षुब्ध होकर वो आत्महत्या कर रही है।

    बाद में पुलिस को दिए बयान में भी उसने इन्हीं तीनों पर असहयोग, प्रताडि़त करने और कार्यस्थल पर गरिमापूर्ण व्यवहार न करने का आरोप लगाया है। कानूनन ये किसी के खिलाफ एफआईआर करने के लिए काफी होता है, लेकिन पुलिस के लिए शायद ये पर्याप्त नहीं था इसलिए उसने रितु धवन को ऊंची पहुंच और रसूख का लाभ देते हुए एफआईआर की जद से बाहर रखा। इतना ही नहीं, इसके बाद पीड़िता तनु शर्मा पर ही धाराएं लगाकर उसे जेल भेजे जाने की साजिश होने लगी है।

    अब तक इस घटनाक्रम में राजनीतिक संरक्षण, पुलिस की लापरवाही, लीपापोती और कानूनी कार्यवाही का डर दिखा कर मामले को पूरी तरह से जनता की पहुंच से दूर रखा गया है ताकि ये संवेदनशील मुद्दा जनाक्रोश से दूर रहे। यहां तक कि इस मामले में इलेक्ट्रॉनिक मीडिया भी उदासीनता बरत रहा है। इलेक्ट्रॉनिक मीडिया की तरफ से अब तक इस खबर को प्रसारित ही नहीं किया गया है। प्रिंट मीडिया में जरूर कुछ समाचार पत्रों ने इस मामले से जुड़ी खबरें प्रकाशित की हैं। इस मामले में मीडिया की खुद की चुप्पी सवाल खड़े करती है। लगता है इस मामले में प्रतिद्वंदिता को दरकिनार करते हुए एक आपसी सहमति की स्थिति में दिख रहे हैं, जिसमें एक दूसरे की गलतियां छिपाने का अलिखित समझौता किया गया है।

    हालांकि सोशल मीडिया के माध्यम से कुछ वरिष्ठ मीडियाकर्मियों ने तनु शर्मा को न्याय दिलाने की मुहिम छेड़ी है। इस मुहिम में समाज सेवी, छात्र, मजदूर यूनियन से जुड़े कार्यकर्ता और अनेक लोग शामिल हो रहे हैं। सोशल मीडिया और न्यूज पोर्टल के माध्यम से इस मसले से जुड़ी खबरें लगातार आ रही हैं। जर्नलिस्ट्स यूनियन फॉर सिविल सोसाइटी (जेयूसीएस) ने तनु शर्मा के साथ हुए मानसिक उत्पीड़न और दुव्र्यवहार की निंदा की है। कहा है तनु शर्मा ने पुलिस को जो बयान दिया वह लोकतंत्र के चैथे स्तंभ के पीछे की छिपी हुई गंदगी को उजागर करता है। जेयूसीएस ने इस पूरे प्रकरण की सीबीआई जांच की मांग की गई ताकि यह साफ हो जाए कि आखिर वे कौन से राजनेता और उद्योगपति है जिनके पास इंडिया टीवी अपने महिला पत्रकारों को भेजने की कोशिश करता था। जेयूसीएस ने प्रेस काउंसिल ऑफ इंडिया से मांग की है कि वह इस पूरे प्रकरण को गंभीरता से लेते हुए मीडिया संस्थानों में महिला पत्रकारों के यौन उत्पीड़न पर एक उच्चस्तरीय जांच आयोग बनाए और इस पर निश्चित समयावधि के अंदर अपनी रिपोर्ट रखे।

    बहरहाल, मीडिया में काम की जगह पर प्रताड़ना के आरोपों से जुड़ा ये पहला मामला नहीं है। साल 2013 में इंटरनेशनल न्यूज सेफ्टी इंस्टीट्यूट’ और ‘इंटरनेशनल वीमेंस मीडिया फाउंडेशन’ ने दुनियाभर की 875 महिला पत्रकारों के साथ एक सर्वे किया। सर्वे के मुताबिक करीब दो-तिहाई महिला मीडियाकर्मियों ने काम के सिलसिले में धमकी और बदसलूकी झेली है। ज्यादातर मामलों में जिम्मेदार पुरुष सहकर्मी थे। तनु शर्मा मामला एक बार फिर याद दिलाता है कि मीडिया संस्थानों में युवा महिला पत्रकार कितनी सुरक्षित हैं और उन्हें किस माहौल में काम करना पड़ता है।

भड़ास मीडिया से साभार

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मीडिया सम्मेलन जयपुर से-

जयपुर में 7 व 8 अप्रैल 2001 को देशभर की महिला पत्रकारों की एक कार्यशाला पत्रकारिता में महिलाएं विषय पर आय़ोजित की गई। इसे बेंगलौर की संस्था वायसेस, जयपुर की संस्था विविधा औऱ विमेन इन जर्नलिज्म मेकिंग न्यूज की लेखिका अम्मू जोसेफ ने मिलकर किया। जिसमें कुछ गंभीर मुद्दे उठे।

  • बिहार की महिला पत्रकारों ने बताया कि आमतौर पर दूसरों के शोषण पर लिखने वाली महिला पत्रकार खुद किस तरह शोषण का शिकार हैं। यदि वे अपने किसी साथी के शोषण की शिकायत प्रबंधन से करती हैं तो प्रायः उस पर कोई एक्शन नहीं लिया जाता। कई बार तो ऐसा हुआ जिस आदमी की शिकायत की गई उसे ही प्रमोट किया गया।
  • कार्यशाला में कहा गया कि आमतौर पर महिलाएं लड़ नहीं पातीं। पत्रकारिता में इन दिनों कांट्रैक्ट जॉब बढ़े हैं। प्रायः महिलाओं को अपनी नौकरी जाने का खतरा बना रहता है।
  • कार्यशाला में महिला पत्रकारों ने कार्यस्थलों पर न्याय न मिलने की बात कही। कई स्थानों पर तो जिस महिला ने शिकायत की उसे ही नौकरी से निकाल दिया गया। यौन शोषण की घटनाओं पर महिलाएं चुप हो जाती हैं या फिर नौकरी छोड़कर चली जाती हैं।
  • कार्य़शाला में ये बात स्पष्ट रूप से कही गई कि जबतक महिला पत्रकार पुरुष साथियों से डरती रहेंगी वो कुछ नहीं कर पाएंगी। देशभर की महिला पत्रकारों को लड़ना होगा अपने हक के लिए।
  • हिंदी भाषी क्षेत्रों की महिला पत्रकारों ने यौन उत्पीड़न की शिकायत सबसे ज्यादा की।
  • कार्यस्थलों पर महिला शौचालय न होने की भी बात सामने आई।
  • महिला पत्रकारों ने प्रमोशन नीति में भेदभाव या सही काम न मिलने की भी बात कही।
  • कार्यशाला में आई न्यूज एजेंसी की एक महिला पत्रकार ने कहा कि हमारे पुरुष साथी इस बात पर ध्यान नहीं देते कि हमने क्या लिख रहे हैं कैसा काम कर रहे हैं। उनका ध्यान इस बात पर रहता है कि हम किसके साथ घूम रहे हैं।
  • महिला पत्रकारों ने वर्षों तक पदोन्नति न देने सही ग्रेड न देने, प्रबंधन की मनमानी की शिकायत की।
  • कार्यशाला में आई उर्दू भाषा की पत्रकार ने कहा कि कार्यस्थल में अकेली महिला पत्रकार हैं इस कारण अक्सर पुरुष साथी इश्क करने औऱ फूल पेश करने की बातें करने लगते हैं।
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