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तरन्नुम में डूबी उनकी कविताएं कानों में गूंजतीं हैं

गीतकार प्रमोद तिवारी
गीतकार प्रमोद तिवारी

गीतकार औऱ कवि प्रमोद तिवारी का सड़क हादसे में दो दिन पहले निधन हो गया। उन्हें याद कर रहे भोपाल के वरिष्ठ टीवी पत्रकार ब्रजेश राजपूत। 

आज सुबह करेली में मिली इस दुखद खबर ने बैचेन कर दिया कि हमारे प्रमोद तिवारी जी अब दुनिया में नहीं रहे, कल रात उन्नाव के पास हुयी सडक दुर्घटना ने उनके स्नेह का साया हमसे हमेशा के लिये छीन लिया। उफ भरोसा ही नहीं हो रहा।
प्रमोद जी का साथ ९४-९५ में दैनिक जागरण नोएडा से मिला था वो हमारे चीफ सब एडीटर थे और हम सब यानिकी मैं, गोपाल शुक्ला, उपेन्द्र स्वामी और अखिलेश कुमार नौसिखिये नये नवेले उप संपादक, वो वहां कानपुर से पनिशमेंट पोस्टिंग पर भेजे गये थे और अपने परिवार से दूर हम सब उनके घर के हो गये थे। मजे मजे में वो हमें अखबार का काम सिखाते और तनाव दूर करने के लिये बीच बीच में उनकी गजलें, कविताएं छंद और किस्से सुनने मिलते।
बाद के सालों में वो जागरण से अलग हो गये और मंच के स्थापित कवि गीतकार बन गये। तरन्नुम में डूबी उनकी कविताएं और गीत अब तक कानों में गूंजतीं हैं। भोपाल आते ही सुबह उनका फोन आता सुनो ब्रजेश, अपन आ गये हैं भोपाल, वक्त मिले तो आ जाना गपियाने, नहीं भी आओगे तो भी हमारे नालायक छोटे भाई तो कहलाओगे ही, अच्छा अब खुश रहो हम रखते हैं। कुछ साल पहले हम ग्वालियर में थे शहर में प्रमोद जी के कवि सम्मेलन के होर्डिंग और फोटो लगे हुये थे, काम खत्म कर हम अपने देव श्रीमाली जी के साथ पहुंचे कवि सम्मेलन में थोडे लेट हो गये थे जैसे ही सभागार में पहुंचे प्रमोद जी ने उलाहना मारा आइये हुजूर कविता के लिये आपने समय निकाला फिर मुझे पहचाना तो मंच से ही कहा अरे अपना छोटा भाई आया है इतने दिनों बाद मिला है तो भाईचारे पर कविताएं सुनिये..पूरे हाल के लोग हमें देखने लगे जहां बैठने को जगह नहीं मिल रही थी वहां लोग अपने बगल में बैठाने को उतावले हो गये..अब ऐसा प्यार स्नेह देने वाला भाई कहां मिलेगा..
प्रमोद जी का ये शेर कभी नहीं भूलूंगा, जब उनको अखबार की नौकरी से निकाला गया था..
मेरे अंजाम का अजब ये फैसला हुआ।
उसने मुझे सजा दी और मैं रिहा हुआ।।
निराशा में भी आशा तलाशने वाले ऐसे कवि प्रमोद जी को भावभीनी श्रद्धांजलि..भगवान आपको अपने श्री चरणों में जगह दे क्योंकि आप उनको भी इस कलयुग की निराश करने वाली घटनाओं में हंसायेंगे और गुदगुदायेंगे..🙏🙏

प्रमोद तिवारी जी की बेहतरीन कविता। 
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याद बहुत
आते हैं
गुड्डे-गुड़ियों बाले दिन
दस पैसे में
दो चूरन की पुड़ियों
वाले दिन
ओलम, इमला, पाटी, बुदका
खड़ियों वाले दिन
बात-बात में
फूट रही
फुलझड़ियों वाले दिन

पनवाड़ी की चढ़ी उधारी
घूमें मस्त निठल्ले
कोई मेला-हाट न छूटे
टका नहीं है पल्ले
कॉलर खड़े किये
हाथों में
घड़ियो वाले दिन
ट्रांजिस्टर पर
हवामहल की
कड़ियों वाले दिन

लिख-लिख, पढ़-पढ़
चूमें-फाड़ें
बिना नाम की चिट्ठी
सुबह दुपहरी शाम उसी की
बातें खट्टी-मिट्ठी
रूमालों में फूलों की
पंखुड़ियों वाले दिन
हड़बड़ियों में
बार-बार
गड़बड़ियों वाले दिन

सुबह-शाम की
दण्ड-बैठकें
दूध पियें भर लोटा
दंगल की ललकार सामने
घूमें कसे लंगोटा
मोटी-मोटी रोटी
घी की
भड़ियों वाले दिन
गइया, भैंसी
बैल, बकरियाँ
पड़ियों वाले दिन

दिन-दिन बरसे पानी
भीगे छप्पर
आँखें मींचे
बूढ़ादबा रही हैं झाडू
सिलबट्टा के नीचे
टोना सब बेकार
जोंक, मिचकुड़ियों वाले दिन
घुटनों-घुटनों पानी
फुंसी-फुड़ियों वाले दिन

घर भीतर
मनिहार चढ़ाये
चुड़ियाँ कसी-कसी सी
पास खड़े
भइया मुसकायें
भौजी फँसी-फँसी सी
देहरी पर
निगरानी करतीं
बुढ़ियों वाले दिन
बाहर लाठी-मूँछें
और पगड़ियों वाले दिन

तेज धार करती
बंजारन
चक्का खूब घुमाये
दाब दाँत के बीच कटारी
मंद-मंद मुसकाये
पूरा गली-मोहल्ला
घायल
छुरियों वाले दिन
दुरियों-छुरियों
छूट रही
छुरछुरियों वाले दिन

‘शोले’ देख
छुपा है ‘बीरू’
दरवाजे के पीछे
चाचा ढूँढ रहे हैं
बटुआ फिर
तकिया के नीचे
चाची बेंत
छुपाती घूमें
छड़ियों वाले दिन
हल्दी गर्म दूध के संग
फिटकरियों वाले दिन

ये वो दिन थे
जब हम लोफर
आवारा कहलाये
इससे ज्यादा
इस जीवन में
कुछ भी कमा न पाये
मँहगाई में
फिर से वो
मंदड़ियों वाले दिन
कोई लौटा दे
चूरन की
पुड़ियों वाले दिन
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