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जब राजीव गांधी बोले थे देखो मेरे पैरों पर प्रेस बैठी है

एक साक्षात्कार के दौरान राजीव गांधी और अरुण पुरी।
एक साक्षात्कार के दौरान राजीव गांधी और अरुण पुरी।

वरिष्ठ पत्रकार प्रशांत टंडन बता रहे आजतक के मुखिया अरुण पुरी औऱ राजीव गांधी के रिश्तों की कहानी। राजीव औऱ अरुण पुरी दून स्कूल में पढ़े हैं। दोनो सहपाठी और मित्र थे। पर कैसे एक घटना ने सब कुछ बदल दिया। ये आलेख तब प्रकाश में आया जब हाल ही में अरुण पुरी ने सोनिया गांधी का साक्षात्कार किया। एक दौर में कहा जाता था देश को दो दून ब्वायज चला रहे हैं वो थे अरुण पुरी औऱ राजीव गांधी। 

 

सरकार और मीडिया के रिश्तों की अद्भुत कहानी के किरदार हैं गांधी परिवार और अरुण पुरी:

कल इंडिया टुडे कॉन्क्लेव में अरुण पुरी जब सोनिया गांधी का इंटरव्यू ले रहे थे तब दोनों तरफ से सहजता देख कर अच्छा लगा – ये दो पुराने रिश्तों का भारत मिलाप भी था.

राजीव गांधी और अरुण पुरी दून स्कूल के सहपाठी थे. राजीव की कैबिनेट में भी दून स्कूल के सहपाठी थे. इंडिया टुडे मैगजीन उस वक़्त एजेंडा सेट करती थी. मज़ाक में कहा जाता था DOSCO is running India today..(देश दून स्कूल ओल्ड ब्व्याज़ चला रहे हैं)

इस तस्वीर ने रिश्ते बिगाड़ दिये थे: 

दून स्कूल में फोटो सेशन के दौरान अरुण पुरी, राजीव गांधी व अन्य।
दून स्कूल में फोटो सेशन के दौरान अरुण पुरी, राजीव गांधी व अन्य

बात 1985 की है दून स्कूल के 1960 के बैच का रीयूनियन था. यादगार तस्वीर खिंच रही थी. राजीव गांधी प्रधानमंत्री थे और अरुण पुरी इंडिया टुडे के संपादक. फोटोग्राफर ने कुछ इस तरह सबको बैठाया की राजीव गांधी कुर्सी मे थे और अरुण पुरी ठीक उनके सामने ज़मीन पर. (नीले कोट ने सबसे आगे). किस्सा मशहूर है कि तस्वीर खिचते वक़्त राजीव गांधी ने मज़ाक में कह दिया “look Press is sitting at my foot” (प्रेस मेरे कदमों में हैं) सब हँस दिये और ये तस्वीर खिंच गई.

कहते हैं कि अरुण पुरी ने इस मज़ाक को सहजता से नहीं लिया और दो दोस्तों में रिश्ते तल्ख हो गए. जब बोफोर्स हुआ तब इंडिया टुडे ने बढ़ चढ़ कर रिपोर्टिंग की. उन्ही दिनो राष्ट्रपति ज्ञानी ज़ैल सिंह और राजीव गांधी के रिश्ते भी मधुर नहीं थे. ज़ैल सिंह ने पोस्टल बिल को मंजूरी नहीं दी थी. इंडिया टुडे ने ज़ैल सिंह का सनसनीखेज इंटरव्यू छापा. वहीं से राजीव गांधी की मिस्टर क्लीन की इमेज को बड़ा धक्का लगा था. वो स्टोरी प्रभु चावला ने की थी. वो भी कल के कॉन्क्लेव में एकरिंग कर रहे थे.

ये तस्वीर कारण बनी हो या नहीं पर प्रेस और सरकार के रिश्ते वैसे ही होने चाहिए जैसे राजीव गांधी और अरुण पुरी के थे. और प्रेस विपक्ष के साथ भी वैसा ही सहज होना चाहिए जैसा कल के कॉन्क्लेव में अरुण पुरी और सोनिया गांधी दिखे.

अफसोस कि हो उल्टा रहा है मीडिया सरकार के साथ है और जवाबदेही विपक्ष की तय कर रहा है. और सब जगह के साथ इन्ही अरुण पुरी के चैनलों में भी वही हो रहा है जो अपने आप में एक मिसाल हैं.

 

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