Home > साथी की ख़ूबी > बहुत सख़्त पर बहुत से थोड़ा ज्यादा नरम हैं ये सम्पादक

बहुत सख़्त पर बहुत से थोड़ा ज्यादा नरम हैं ये सम्पादक

गूगल खोज की वही पहली तस्वीर जिसमें श्री अकु श्रीवास्तव और प्रशांत राजावत।
गूगल खोज की वही पहली तस्वीर जिसमें श्री अकु श्रीवास्तव और प्रशांत राजावत।

(साथी की खूबी)

गूगल पर आप प्रशांत राजावत टाइप करेंगे हिंदी या अंग्रेजी किसी भी भाषा में तो इमेज में पहली जो तस्वीर दिखेगी उसमें प्रशांत राजावत यानी मैं और अकु (अवधेश कुमार) श्रीवास्तव जी आपको नजर आएंगे। अकु जी फिलहाल पंजाब केसरी समूह जालंधर के दिल्ली से प्रकाशित हिंदी दैनिक समाचार पत्र नवोदय टॉइम्स के कार्य़कारी सम्पादक हैं। आज उनका जन्मदिन है और मेरे सम्पादक रहे हैं तो उनके बारे में कुछ लिखने की भूमिका बनी।

 

अकु जी के साथ मैंने तकरीबन ढाई साल काम किया और जितना मैंने उनको जाना वो बहुत सख्त हैं पर बहुत से थोड़ा ज्यादा नरम हैं। किसी काम को लेकर वो आपको डांट भी देंगे तो फिर आप पर स्नेह भी जताएंगे। सम्पादकीय सहयोगियों को गलती पर जमकर झाड़ लगाने वाले अकु जी उतनी ही शिद्दत से सभी साथियों का ख्याल भी रखते हैं। मुझे याद है एक बार मैं देर रात दफ्तर से निकल रहा था मुझे वो रास्ते में मिल गए, वो भी गाड़ी से अपने घर जा रहे थे। मुझे देखा बोले यहां कैसे खड़े हो। मैंने कहा घर जा रहा हूं, तो बोले कैसे जाओगे। मैंने कहा मेट्रो से, तो बोले आराम से चले जाओगे न। वरना मेरे साथ चलो मैं कुछ दूर छोड़ दूंगा वहां से निकल जाना।

उस दिन मुझे लगा कि एक तेज तर्रार हमेशा त्यौरियां चढ़ाए रहने वाले सम्पादक दरअसल दिल से बहुत प्यारे हैं। उनमे दया और करुणा है। हालांकि वो सम्पादकीय साथियों को एक ही लय में काफी कुछ कह जाएंगे जब नाराज हों। पर उन्हें अपने क्रोध पर निराशा भी होती थी। कई बार वो कहते थे अपने सहयोगियों से कि तुम लोग क्यों ग़लती करते हो कि मुझे डांटना पड़े। क्यों मेरी भाषा खराब करते हो। मैं ऐसा नहीं चाहता।

अकु जी को मैंने एक ऐसे सम्पादक के रूप में जाना जो अपनी पेशेवर छवि को लेकर बहुत सतर्क दिखते थे। उनको लगता था कि प्रबंधन कभी भी कामकाज को लेकर उनपर और उनके सहयोगियों पर उंगली न उठा सके। इसलिए वो जीरो मिस्टेक रणनीति को लेकर चलते थे। इसी कारण वो कई बार सम्पादकीय साथियों के बुरे भी कहलाए। सख्त और अड़ियल सम्पादक बने रहे।

अकु जी का एक तकिया कलाम है अक्ल के दुश्मनों…..

जब भी कोई बात होती वो जरूर कहते अक्ल के दुश्मनों कुछ ठीक करो। हालांकि वो जानते थे कि अक्ल के दुश्मनों के पास भरपूर अक्ल है। पर वो चाहते थे कि अक्ल का भरपूर उपयोग हो और गलतियां न हों।

नवोदय टॉइम्स आज दिल्ली में किसी परिचय का मोहताज नहीं है। न गुणवत्ता के लिहाज से और न ही लोकप्रियता के हिसाब से। इसका पूरा श्रेय अक्ल के दुश्मनों को ही जाता है ये अकु जी जानते और मानते हैं। रही बात अकु जी की भूमिका की तो वो सर्वोपरि है ही। नवोदय टॉइम्स एक ऐसा अखबार है। जिसने प्रचार के नाम पर एक बैनर तक दिल्ली में नहीं लगाया। कोई प्रचार नहीं। समाचार पत्र के साथ पाठकों के लिए कोई बाल्टी और मग्गा की स्कीम नहीं। बावजूद नवोदय टॉइम्स ने तमाम बड़े अखबारों को पीछे ढकेलते हुए दिल्ली में अपनी साख बनाई है, जगह बनाई है। उसका सारा श्रेय अक्ल के दुश्मनों के मुखिया यानी आदरणीय अकु श्रीवास्तव जी को जाता है।

नवोदय टॉइम्स अगस्त 2013 को शुरू हुआ और आजका दिन। नवोदय दिल्ली के 4 शीर्ष अखबारों में एक है। मानक सर्वे एजेंसी एबीसी के अनुसार 1,22,024 प्रतियां प्रतिदन नवोदय टॉइम्स की प्रकाशित होती हैं।

नवोदय टीम ने शुरू से लेकर अबतक अकु जी के नेतृत्व में काम किया है, वो काबिले तारीफ न सही पर काबिले गौर जरूर है कि कैसे एक अखबार स्थापित किया जाता है। और न सिर्फ स्थापित बल्कि लोकप्रिय।

मुझे याद है शुरूआत में नवोदय के छायाकार मिहिर सिंह को सम्पादक अकु जी बोला कि एक कार्यक्रम में चले जाना तो मिहिर ने बोला कि सर आयोजक भाव नहीं देते और फिर वहां से कोई आमंत्रण भी तो नहीं है। इस पर अकु जी बोला कि हमारा अखबार अभी शिशु है, बड़े होने में देर लगेगी। बस हमे धैर्य और मेहनत के साथ काम करते जाना है। आज अखबार की लोकप्रियता देख ऐसा लगता है मानो अकु श्रीवास्तव की सोच सुनियोजित थी। उसी सोच को लेकर वो चलते रहे और मौन मुखर हो गया।

समय प्रबंधन को लेकर बेहद चुस्त रहते अकु जी। मेरे ढाई वर्ष के कामकाज के दौरान मैंने कभी ऐसा नहीं देखा कि वो दफ्तर में बैठे न मिले हों या कहीं दौरे पर हैं या छुट्टी पर तो बात और है। कपड़े पहनने के शौकीन। अनुशासन पसंद। मुझे याद है कि नवोदय के समाचार संपादक रितेश रंजन जी को वो अक्सर कहते कि यार शर्ट दबा लिया करो। चूंकि रितेश जी का अपना अंदाज है मस्तमौला, सहज-सरल। एकदिन रितेश जी शर्ट दबाकर दिखे तो बोले हां जंच रहे हो। साफ-सफाई अकु जी को बेहद पसंद है। जब भी कोई सहयोगी टॉयलेट में गुटखा थूककर आता तो जरूर फटकारते। बोलते अक्ल के दुश्मनो….

अकु जी को लेकर एक आम रॉय जो मैंने बहुत लोगों से सुनी वो ये की वो छोटी छोटी बातों पर भी बहुत गौर करते हैं। दखल बहुत करते हैं कामकाज पर। जैसे डेस्क पर आकर सब- एडीटर की पीछे खड़े हो जाना। लोगों का मानना था कि सम्पादक को एक स्तर बनाकर रखना चाहिए पर अकु जी का मिजाज इस मामले में थोड़ा अलग था।

एक वर्ग बेशक इसको सम्पादक की ज्यादती या बेवजह की दखलंदाजी माने पर मेरा मानना है कि उनके अंदर काम को लेकर एक जुनून है। वो अगर किसी रिपोर्ट को करने को बोलते थे तो उसे खुद पढ़ते और फिर अखबार के पन्ने पर भी पेज बनते समय देखते। वो कल के लिए कोई मौका नहीं छोड़ते। क्योंकि अखबार कल के लिए अवसर नहीं देता, वो जानते हैं। गलती आज सुधर गई तो ठीक वरना वो अमिट है। दरअसल वो केबिन प्रेमी सम्पादक नहीं हैं।

पद को लेकर उनके अंदर कोई अभिमान नहीं दिखा कभी। कई बार ऐसा हुआ कि कोई कम्प्यूटर सेट खराब है या अन्य कोई वजह जिसके चलते किसी को कम्प्यूटर न मिल पा रहा हो काम के लिए तो वो अपनी सीट छोड़ देते थे और बोलते मेरी सीट में बैठकर काम करो। इस परंपरा से दूर रहे कि सम्पादक की कुर्सी पर अधीनस्थ सहयोगी बैठेगा तो उनका मान कम हो जाएगा।

आमतौर पर काम में व्यस्त रहते। हंसते-बोलते कम। पर साथियों की छोटी से छोटी समस्याओं पर मैंने उन्हें चिंतित देखा है। किसी की सैलरी न आई हो, पीएफ संबंधी समस्या, आई कार्ड की समस्या या कोई और। अकु जी पूरे मामलों पर न सिर्फ नजर रखते बल्कि सुलझाते भी। वरना एक सम्पादक को आमतौर पर इस तरह की समस्याओं से क्या लेना देना।

अकु जी हिंदुस्तान और अमर उजाला के सम्पादक रहे। देश के वरिष्ठ सम्पादकों में से एक हैं। मूलरूप से लखनऊ निवासी हैं। उन्होंने एक घोषित परिभाषा दी थी कि पत्रकारिता में कोई कम या ज्यादा अनुभवी नहीं होता। सब बराबर हैं। वो कहते थे कि पत्रकारिता में किसी ने 2 साल लगकर काम कर लिया वो भी परिपक्व हो जाता है।

अंतिम बात ये कि हो सकता है उनके साथ काम करते वक्त आप उनके मिजाज से सहमत न हों पर एक दौर में आप ये महसूस करेंगे कि उनके नेतृत्व में आपने बहुत कुछ सीखा औऱ जाना है। और उनके अंदर भी एक दिल है जो सख्त नहीं नरम है।

  • प्रशांत राजावत, सम्पादक मीडिया मिरर

 

(साथी की खूबी कॉलम में अगली बार फिर किसी शख्सियत से मिलवाएंगे)

 

Share this: