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मीडिया ऐसा निर्लज्ज सत्ता-अनुयायी कभी नहीं हुआ

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जाने-माने साहित्यकार अशोक वाजपेयी कभी कभार नाम से नियमित स्तम्भ लिखते रहे हैं जनसत्ता में। अब किसी पोर्टल के लिए वही स्तम्भ लिखते हैं। पढ़िए कभी कभार में मीडिया के हालचाल।

 

मीडिया के एक बड़े हिस्से में विषमता, ग़ैर-बराबरी, बेरोज़गारी और वादाख़िलाफ़ी जैसे ज़रूरी मुद्दों को ओझल करने की एक होड़ सी लग गई है

 

जो लोग हमारे मीडिया पर तीखी नज़र रखते हैं उन्होंने नोट किया है कि इन दिनों मीडिया, ख़ासकर इलेक्ट्रॉनिक मीडिया में बहुत ही तुच्छ और नज़रन्दाज़ किए जाने के क़ाबिल मुद्दों को उठाया और बढ़ा-चढ़ाकर यों पेश किया जा रहा है जैसे कि वे ही सबसे ज़रूरी मुद्दे हैं. दरअसल बढ़ती विषमता, ग़ैर-बराबरी, भयानक बेरोज़गारी, लगातार वादाख़िलाफ़ी आदि ज़रूरी मुद्दों को ध्यान से ओझल किए जाने की एक होड़ सी लग गई है. सर्वथा अप्रासंगिक को इतनी जगह और समय मिल रहे हैं जितने का न तो वह पात्र है, न ही जिसकी कोई तात्कालिकता है.

इसके साथ-साथ एक और वृत्ति भी, दबी-छुपी नहीं, साफ़ नज़र आती है कि दृश्य को बार-बार हिन्दू-मुस्लिम तनाव और संबंधों के संदर्भ में उभारा जा रहा है. यह धारणा पूरी बेशर्मी से फैलाई जा रही है कि यही सन्दर्भ आज का असली सन्दर्भ है. ऐसा अचानक या अपने आप उभरे घटनाक्रम से नहीं हो रहा है. इसके पीछे सत्तारूढ़ शक्तियों की रणनीति है जिसे मीडिया का एक बड़ा हिस्सा, जिसे कुछ अब गोदी मीडिया भी कहने लगे हैं, मुदित मन आगे बढ़ा रहा और पोस रहा है. यह रणनीति है संसद के अगले चुनावों में हिंदू-मुस्लिम तनाव को बढ़ाकर ध्रुवीकरण पैदा करना ताकि भ्रष्टाचार, विकास, बेरोज़गारी आदि मुद्दे पीछे धकेल दिए जाएं और यह मुद्दा निर्णायक भूमिका निभाने लगे. मीडिया का एक बड़ा हिस्सा, अपनी सारी नैतिकता को ताक में रखकर इस एजेंडे को आगे बढ़ाने की चतुर चाल चल रहा है. भारतीय लोकतंत्र के इतिहास में इससे अधिक अनैतिक दौर पहले कभी नहीं आया कि मीडिया का एक बहुत बड़ा हिस्सा इस क़दर निर्लज्ज सत्ता-अनुयायी हो जाए.

इस विकराल और विशाल विकृति के परिणाम, ज़ाहिर है, बेहद अवांछनीय होने जा रहे हैं. ऐसे में असहमति की आवाज़ें मीडिया द्वारा उपेक्षित की जाएंगी यह तय है. यह उन्हें हताश भी कर सकता है. यह उन्हें एक तरह की अवांछनीय हीरोइक्स (वीरतापूर्ण कारनामा) की तरफ़ भी ठेल सकता है. भारतीय बुद्धिजीवी पहले ही एक तरह की वर्ण-व्यवस्था के शिकार हैं. असली और प्रभावशाली बुद्धिजीवी अब अंग्रेज़ी में ही होते हैं और ऐसा भ्रम ख़ासा व्यापक हो गया है कि भारतीय भाषाओं में बुद्धिजीवी हैं ही नहीं!

जो हो, इस दौर में स्वतंत्रता-समता-न्याय के मूल्यों का दबाव दृश्य पर बनाने, उनकी रक्षा करने की नागरिक ज़िम्मेदारी लगता है कि लेखकों-कलाकारों को निभाना पड़ेगी. यह एक तरह से आपद्धर्म (केवल संकट या आपातकाल के समय अपनाया गया धर्म) होगा पर इसे निभाना रचनात्मक और बौद्धिक दोनों मोर्चों पर होगा. जिस तरह का बंटवारा, मनमुटाव, ख़ेमेबाज़ी, अवसरवादिता आदि हिन्दी के लेखक-समाज में है उससे यह उम्मीद करना कि वह मौक़े की नज़ाकत समझकर इतिहास के इस तीखे मोड़ पर इन तुच्छताओं से ऊपर उठने की हिम्मत और सदाशयता-उदारता दिखाएगा कठिन लगता है. पर जो चुनौतियां सामने हैं उनसे निपटने में लोकतंत्र के एक मुखर-सृजनशील हिस्से की विफलता बहुत महंगी साबित हो सकती है. खुद उनके लिए और लोकतंत्र के लिए. शायद जल्दी ही लेखकों-कलाकारों को इस संदर्भ में सजग और एकजुट, सक्रिय और ज़िम्मेदार करने के लिए एक अभियान छेड़ना चाहिए. हममें से कुछ लोग इसके लिए तैयार हैं.

तीन कविमित्र

इन दिनों अपने तीन कविमित्रों की सामग्री व्यवस्थित कराने में लगा हूं ताकि वे जल्दी ही प्रकाशित हो सकें. उन्हें याद करता हूं और लगता है कि तीनों की ही असमय मृत्यु हुई. वे तीनों अब नहीं हैं और उनका न होना उन्हें बार-बार स्मृति में सजीव करता रहता है: कहते हैं जब तक किसी दिवंगत को कोई याद करता है तब तक वह जीवित रहता है.

रमेश दत्त मेरे लगभग बालसखा थे. हमारी दोस्ती स्कूल के दिनों में हुई थी. हम दो अलग स्कूलों में पढ़ते थे और वे मुझसे एक क्लास पीछे थे. पर सागर में उन दिनों हम प्रायः रोज़ मिलते थे; सारा शहर कई बार गर्मियों की तपती धूप में भी घूमते थे और कई पुस्तकें हमने साथ-साथ पढ़ी थीं. दोनों का व्यसन कविता में रुचि था. रमेश बुन्देलखंडी संस्कृति और लोक में रसे-पगे थे. लोहियाई समाजवाद में हमारी दिलचस्पी साथ जागी थी और सागर में उन दिनों ऐसा कुछ सार्वजनिक शायद ही होता हो जिसमें हम साथ-साथ न होते हों.

जितेन्द्र कुमार से दोस्ती उनकी कविता के चलते सागर में ही हुई थी. वे उन दिनों अंग्रेज़ी में एमए करने की सोच रहे थे और उनके पास पैसे नहीं थे. अपने पिता से कहकर मैंने उन्हें विश्वविद्यालय में क्लर्की पर लगा दिया था. बाद में वे केंद्रीय स्कूल में अध्यापक नियुक्त हो गए और देश में कई भागों में उनकी तैनाती हुई. वे कविता आदि के बारे में किसी और की रुचि या दृष्टि के दबाव या आतंक में कभी नहीं आते थे. कई मामलों में वे मेरी तीखी आलोचना भी करते थे जो रमेश ने कभी नहीं की.

कमलेश से दोस्ती दिल्ली में हुई जब हम कुछ युवा श्रीकान्त वर्मा मंडली के सदस्य बने. जितेन्द्र से बिलकुल अलग वे बेहद पढ़ाकू थे और ऐसा कोई मानवीय विषय नहीं था जिसका उन्होंने कुछ न कुछ अध्ययन न किया हो. किसी नई पुस्तक का नाम लेने पर कमलेश उसके लेखक की पिछली पुस्तक का सहज भाव से ज़िक्र कर देते थे. उन्होंने जानबूझकर अपने को हिंदी के चालू परिवेश से दूर किया और अपनी निराली राह अपनाई. रमेश ने तो सागर में लायब्रेरियन की नौकरी कर ली थी. जितेन्द्र की पढ़ने में बहुत रुचि नहीं रही और कमलेश तो एक जीवित पुस्तकालय ही थे.

तीनों अपनी रचनाओं के बारे में सिरे से लापरवाह रहे. न कभी छपाने में दिलचस्पी ली, न कभी सम्हालकर रखने में. तीनों की कुछ पुस्तकें तो प्रकाशित हुई थीं उनके जीवनकाल में. पर बची हुई सामग्री को व्यवस्थित करने का काम चल रहा है और इस वर्ष यह मरणोत्तर अवशेष सामने आ जाना चाहिए. फिर उनके समग्र निकालने का भी प्रयास रहेगा. कई बार सोचता हूं कि स्वर्ग में रमेश देवताओं को ईसुरी की फागें सुना रहे होंगे; जितेन्द्र उन्हें मुनासिब आत्मक्रूरता बरतने का पाठ पढ़ा रहे होंगे और कमलेश बता रहे होंगे कि कैसे उनका जीवन बिना पुस्तकों के व्यर्थ है.

कविता, राजनीति और पागलपन

कवियों को पागल या दीवाना मानने की लम्बी परम्परा है. राजनीति के पीछे पागल राजनेता पागल नहीं बहुत चतुर और समझदार होते हैं. पागलपन एक बीमारी है जो अवसर बेइलाज रही आती है. इधर एक पुस्तक आई है अमरीकी आलोचक डेनियल स्विफ्ट की: ‘दि बगहाउस: दि पोएट्री, पॉलिटिक्स एंड मैडनेस ऑफ एज़रा पाउंड’. उसमें कविता, राजनीति और पागलपन के जटिल संबंधों पर विस्तार से विचार और विश्लेषण है.

एज़रा पाउंड पश्चिमी आधुनिकता के एक बड़े असंदिग्ध स्‍थपति थे. उन्होंने 1941 से कुछ समय तक मुसोलिनी के पक्ष में लगातार रेडियो ब्रॉडकास्ट प्रसारित किए थे. 1943 में उन्हें अमरीकी सरकार ने देशद्रोही घोषित किया और 1945 में उन्हें अमरीकी सेना ने गिरफ्तार किया. सैनिक डॉक्टरों और नागरिक मनोचिकित्सकों ने पाउंड को पागल क़रार दिया और उन्हें सेंट एलिज़ाबेथ अस्पताल भेज दिया गया जहां वे साढ़े बारह वर्ष रहे. उस दौरान उनका कई बार डॉक्टरों और मनोविशेषज्ञों ने परीक्षण किया पर इस पर मतैक्य नहीं हुआ कि वे सचमुच पागल थे. लेकिन इसी दौरान अमरीका के सभी श्रेष्ठ कवि उनसे मिलने आते रहे. इस सूची में टीएस ईलियट, एलिज़ाबेथ, बिशप, जान बेरीमैन, चार्ल्‍स ओलसन, विलियम कार्लोस विलियम, राबर्ट लोवेल आदि शामिल थे. इन कवियों ने अपनी मुलाक़ातों के बारे में लिखा और कई मायनों में उनकी कविता पर भी इन मुलाक़ातों का असर पड़ा.

पाउंड का आधुनिक अमरीकी कविता में स्थान असंदिग्ध था: उन्होंने आधुनिक क्लासिक मानी जानेवाली कविता ‘द वेस्टलैंड’ को उसके मूल पाठ से लगभग दो तिहाई काट दिया था; उनकी अर्नेस्ट हेमिंग्वे को सलाह थी कि कम विशेषणों का इस्तेमाल करें. जेम्स ज्वायस के उपन्यास ‘यूलीसीज़’ के प्रथम प्रकाशन के लिए वे ही ज़िम्मेदार थे. इज़ायाह बर्लिन ने इस आधार पर कि उन्होंने खुलेआम लोकतंत्र के बरक्स एक सर्वसत्तावादी निज़ाम का समर्थन किया था, पाउंड के समर्थन में कुछ कहने से इनकार किया था. उपन्यासकार सॉल बैलो ने विलियम फ़ाटकनर की दलील पर कि उन्हें मुक्त किया जाना चाहिए यह कहा कि अगर वे पागल नहीं हैं तो उन पर देशद्रोह का मुक़दमा चलना चाहिए और अगर वे पागल हैं तो उन्हें सिर्फ़ इस बिना पर कि वे कवि हैं कैसे छोड़ा जा सकता है?

डेनियल स्विफ्ट ने विस्तार से कई उपन्यासों में इन कवियों और उनकी कृतियों का विश्लेषण किया है जो अमरीका से सबसे प्रतिष्ठित कवियों द्वारा पाउंड से मुलाक़ात के बाद लिखी गई थीं. अपने आप में यह प्रभाव अप्रत्याशित और अनहोना था. पर कहना व्यापक होगा इसकी कल्पना भी नहीं की जा सकती थी. पाउंड की राजनीति और कई करतूतों से असहमत होकर भी कवियों ने इस कविगुरु को तजा (छोड़ा) नहीं: उनका तथाकथित पागलपन कविता के लिए किए गए उनके अथक प्रयासों की स्मृति धूमिल नहीं कर पाया. स्वयं कविता के इतिहास में यह अभूतपूर्व था और आज तक है. एक देशद्रोही और पागल क़रार दिए गए महाकवि को कविबंधुओं ने पूरी तरह से ख़ारिज करने या स्मृति से मिटाने की अनैतिकता नहीं बरती. एक निष्कर्ष यह भी कि कवि की ग़लत राजनीति सही कविता को अतिक्रमित नहीं कर सकती, कर पाती.

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