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रंजिशें ना द्वेष है, ना छिपा कोई क्लेश हैं,

पंकज कसरादे
पंकज कसरादे
रचनाकर्म में माखनलाल चतुर्वेदी राष्ट्रीय पत्रकारिता एवं संचार विश्वविद्यालय भोपाल में अध्ययनरत छात्र पंकज कसरादे की कविता। 
रंजिशें ना द्वेष है,
ना छिपा कोई क्लेश है,
ना स्वार्थ कोई दिल में घुसकर,
पल रहा न चल रहा
ना भाग्य मेरी चौखटों पर,
नित्य आहें भर रहा,
ना घर में नीचता कोई,
बन सर्पनी बैठी हुई है,
ना ही धूमिल साधनाएँ
तमतमा ऐंठी हुई है,
वासना से ग्रस्त आँखों,
फिर भी सुनो प्रतिकार मेरे!
छीन सको तो छीन लो
तुम सारे अधिकार मेरे !
मेरी आँखों ने दिखाए
कुछ अँधेरे स्वप्न मुझको
और दुनिया से मिले हैं
कुछ तिरस्कृत प्रश्न मुझको
श्राप गौतम का लिए
उम्मीदें बन के पत्थर बैठी हैं
और सारी लालसाएँ
इंतजार में बैठी हैं
फिर भी कपटी इन्द्र कोई हो
तो सुन लो समर का आह्वान मेरे
छीन सको तो छीन लो
तुम सारे अधिकार मेरे !!!
रंक्तरंजित रातरानी राह में
यूँ रो रही हैं
शब्द संचित साधनाएँ व्यर्थ
में ही खो रही हैं
कर्म कल्पित कामनाएँ कौतुहल वश
क्रोध में हैं
हार सारी साथ होकर जीत के
आगोश में हैं
द्वार पर से रथ विजय का कब का
वापस जा चुका हैं
अहंकार के अहम से देखो मन
पराजय पा चुका है
इंकलाबी राख हूँ मैं
फूँक मुझको देख चिंगारी बाकी है
तो फिर से हुकूमत आ तू सुन ले
विचारों की टंकार मेरे
या छीन सके तो छीन ले तू सारे अधिकार मेरे
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