Home > किताब चर्चा > ‘चंबल की बंदूकें गांधी के चरणों में’ किताब पुनः प्रकाशित

‘चंबल की बंदूकें गांधी के चरणों में’ किताब पुनः प्रकाशित

किताब विमोचन समारोह के दौरान मंचासीन अतिथि

 

किताब का मुखपृष्ठ
किताब का मुखपृष्ठ, हालांकि ऐसी जानकारी मिली है कि ये किताब निशुल्क मिलने की व्यवस्था है, न तो किताब में कोई कीमत अंकित है औऱ न ही इसे बेचा जाएगा।

ऐसा समाज बने जिसमें डाकू पैदा ही न हों..

 

० दस्यु समर्पण के सहयात्री रहे 
व्यक्तित्वों ने अनुभव साझा किए

भोपालः

समाज में डाकू पैदा नहीं होते, सामाजिक परिस्थतियां डाकू या बागी बनने को विवश करती हैं। शोषण, अत्याचार और प्रतिशोध की भावना इसके मूल में रहती आईं हैं। सातवें दशक में बागियों के शस्त्र समर्पण का दौर चला। लेकिन इससे यह समस्या समाप्त नहीं हुईं। आज भी समाज में यह प्रवृत्ति जिंदा है। बस स्वरूप बदल गए हैं। ऐसा समाज बनना चाहिए जिसमें डाकू पैदा ही न हों।

कुछ इस आशय के विचार गुरुवार को माधव राव सप्रे समाचार पत्र संग्रहालय के सभागार में सुनाई दिए। मौका था करीब 46 साल पहले जेपी के सान्निध्य में चंबल के 270 बागियों के शस्त्र समर्पण की ऐतिहासिक एवं अभूतपूर्व घटना की जीवंत रिपोर्टिंग करने वाली पुस्तक ‘चंबल की बंदूकें गांधी के चरणों में” के विमोचन समारोह का। संग्रहालय की ‘श्राद्ध अनुष्ठान” श्रंखला के तहत आयोजित इस समारोह की विशेषता यह थी कि कार्यक्रम में अतिथि के तौर पर वे ही लोग मौजूद थे जो किसी न किसी रूप में इस ऐतिहासिक घटना का हिस्सा रहे।

कार्यक्रम के मुख्य अतिथि उन क्षणों के साक्षी रहे कर्मयोगी डा.एस.एन. सुब्बाराव थे। अध्यक्षता उस घटना की रिपोर्टिंग करने वाली टीम के सदस्य वरिष्ठ पत्रकार श्रवण गर्ग कर रहे थे। विशेष अतिथि बागियों के आत्समर्पण के दौरान भिंड के पुलिस अधीक्षक डा. आर.एल.एस यादव तथा समाजशास्त्री प्रो. श्याम बिल्लौरे थे। इस अवसर पर रिपोर्टिंग करने वाली टीम के दो अन्य सदस्य प्रभाष जोशी के पुत्र सोपान जोशी,भाई गोपाल जोशी तथा अनुपम मिश्र की धर्मपत्नी मंजू मिश्र विशेष रूप से उपस्थित थे।
संग्रहालय की ओर से निदेशक डॉ. मंगला अनुजा तथा दीपक पगारे ने परिजनों को सम्मानित किया। इस अवसर पर उस समय के एक बागी बहादुर सिंह भी मौजूद थे। मंच पर इन्हें भी सम्मानित किया गया।

आरंभ में संग्रहालय के संस्थापक निदेशक विजयदत्त श्रीधर ने आयोजन के औचित्य पर प्रकाश डालते हुए कहा कि संग्रहालय लोगों में अध्ययनवृत्ति जाग्रत करने तथा सामाजिक सरोकारों से जुड़े अन्य कार्य करता है। कार्यक्रम का संचालन प्रो. आर रत्नेश ने किया।

 

! विमोचन प्रसंग !
” चंबल की बंदूकें गांधी के चरणों में ” 
किताब का विमोचन कल भोपाल में

०प्रभाष जोशी, अनुपम मिश्र और श्रवण गर्ग ने
जेपी के निर्देश पर लिखी थी

० ऐतिहासिक घटना की जीवंत 
रिपोर्ट से भरी किताब

० सप्रे संग्रहालय ने किया है पुनरप्रकाशन

माधव राव सप्रे समाचार पत्र संग्रहालय  में गुरुवार 22 मार्च को “चंबल की बंदूकें गांधी के चरणों में” पुस्तक का विमोचन हुआ। इस पुस्तक में श्री जयप्रकाश नारायण के सानिध्य में 1972 में हुए 270 बागियों के अभूतपूर्व समर्पण की जीवंत रिपोर्टिंग समाहित है। श्री प्रभाष जोशी, अनुपम मिश्र और श्रवण गर्ग द्वारा लिखी गयी इस किताब का पुनरप्रकाशन सप्रे संग्रहालय ने कराया है।

 

★ पुस्तक के बारे में

वर्ष 1972 में 14 अप्रैल से 1 मई के बीच चंबल के 270 बागियों ने लोकनायक जयप्रकाश नारायण के सान्निध्य में महात्मा गांधी के चित्र के समक्ष शस्त्र समर्पण किए थे।
इस आत्मसमर्पण के लिए जयप्रकाश जी ने फांसी नहीं होने परन्तु अपराध की पूरी सजा भुगतने की शर्त रखी थी। इस पूरी घटना की जीवंत रिपोर्टिंग का जिम्मा उस समय के तीन तरुण पत्रकारों सर्वश्री प्रभाष जोशी,अनुपम मिश्र तथा श्रवण गर्ग को सौंपा गया था। श्री जोशी तथा श्री मिश्र आज हमारे बीच में नहीं है। इन पत्रकारों ने अपनी रिपोर्टिंग में समाज,पुलिस-प्रशासन,बागियों के परिजन तथा अन्य पहलुओं का बड़ा सटीक और मनोवैज्ञानिक विश्लेषण किया है। इन्हें रिपोर्ट तैयार करने के लिए 96 घंटे का समय दिया गया था, जिसे इन्होंने 84 घंटे में ही पूरा कर दिया था।
इस घटना के मूल में करीब 12 वर्ष पूर्व 1960 में बिनोबा भावे द्वारा 20 बागियों के आत्मसमर्पण की घटना थी। इसे बाबा ने बागियों को समाज द्वारा प्राप्त करने का क्षण बताया था। पुस्तक में इन सभी बिन्दुओं का समावेश किया गया है।

  • डॉ राकेश पाठक जी ( प्रधान सम्पादक कर्मवीर) की रिपोर्ट साभार 
Share this: