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मीडिया बुरा है पर अच्छा भी करता है, देखो एक जिंदगी बचा ली

दैनिक जागरण में प्रकाशित खबर
दैनिक जागरण में प्रकाशित खबर

 

मीडिया और पत्रकारों को बहुत गाली मिलती है। बहुत आलोचनाएं झेलनी पड़ती हैं। पर कभी सोचा है मीडिया न हो, पत्रकार न हों तो क्या हो। जैसे सेना, पुलिस, न्यायपालिका और चिकित्सक न होने पर अस्थिरता आ सकती है ठीक वैसे ही मीडिया न होने पर भी देश में अस्थिरता आ जाएगी। खबरों का कोई स्रोत नहीं होगा आपके पास। आपकी सुबह की चाय के साथ अखबार नहीं होंगे तो सोचो कैसा लगेगा।

 

बहरहाल हम ये सब इसलिए कह रहे हैं कि मीडिया को लाख गाली दो, पत्रकारों को कोसो पर उनके योगदान को सराहो, उनकी हत्या पर शोक व्यक्त करो। क्योंकि मीडिया काम तो समाज के लिए ही करता है। कल रवीश कुमार भी यही कह रहे थे कि जब एक पत्रकार की हत्या हो जाती है तो पत्रकार ही विरोध क्यों करें, घर में बैठे आम लोग भी निकलें। पत्रकार खबरें अपने लिए थोड़ी लिखता है।

ये संदर्भ इसलिए कि देखिए कल मीडिया ने कितना बड़ा काम कर दिया। एक व्यक्ति का जीवन बचा लिया। जी हां नईदुनिया मुरैना के संवाददाता शिव प्रताप जादौन की एक खबर ने एक इंसान की जिंदगी बचा ली। दरअसल सीआरपीएफ में रहा एक व्यक्ति इलाज के लिए दर दर भटक रहा था। हाल उनका ये था कि पेट की आंते पन्नी में बांधकर बाहर लटकाए घूम रहे थे। रिपोर्टर ने मामले को गंभीरता से लिया और खबर प्रकाशित की।

खबर के बाद न सिर्फ मध्यप्रदेश शासन हरकत में आय़ा बल्कि सुप्रीम कोर्ट, राष्ट्रीय मानवाधिकार आय़ोग, केंद्रीय रिजर्व पुलिस बल भी चौकन्ना हो गया। शिवराज सरकार ने आनन फानन में जिला कलेक्टर के माध्यम से 10 लाख रुपए की मदद देने की पेशकश की। साथ मुख्यमंत्री ने कहा कि देश में नहीं तो विदेश में हम इलाज करवाएंगे। सीआरपीएफ के अधिकारियों ने पीड़ित का हाल जाना। एम्स में इलाज के लिए सिफारिश की। इसके साथ ही मानव अधिकार आय़ोग ने भी मामले पर संज्ञान लेते हुए सरकार को नोटिस जारी किया है कि आखिर पीडि़त की सुध क्यों नहीं ली गई औऱ आय़ोग ने स्पष्ट कहा कि हमने स्वतः संज्ञान मीडिया की खबरों के आधार पर लिया है।

कितनी बड़ी बात है ये, कितनी बड़ी उपलब्धि है ये मीडिया की, एक पत्रकार की। अब भी आप मीडिया की, पत्रकार शिवप्रताप की पीठ नहीं थप थपा सकते तो फिर मीडिया में शायद अच्छाई आप देख ही नहीं सकते। एक जिंदगी बचा ली उस व्यक्ति की जो चार वर्षों से पेट की आंते लेकर घूम रहा था। पीड़ित मनोज कुमार ने मीडिया और विशेषरूप से नईदुनिया का आभार व्यक्त किया है। मीडिया बहुत बुरा हो रहा है पर अच्छा भी करता है, उस थोड़े अच्छे को भी हमे सराहना चाहिए। 

 

शिव प्रताप जादौन की खबर नईदुनिया मे- 

पॉलीथिन में आंत रख जीवन बिता रहा जवान, खर्च उठाएगी सरकार

शिवप्रताप सिंह जादौन, मुरैना। मार्च 2014 में छत्तीसगढ़ की झीरम घाटी में नक्सली मुठभेड़ में गंभीर रूप से घायल हुए सीआरपीएफ के पूर्व जवान मनोज तोमर के लिए रविवार को अच्छी खबर आई। मप्र के मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान ने कहा है कि जवान का पूरा खर्च राज्य सरकार उठाएगी। यदि देश में इलाज संभव न हुआ तो विदेश भी ले जाएंगे। मनोज के पेट में सात गोलियां लगीं थीं। बेहतर इलाज के अभाव में मनोज पेट से बाहर निकली आंत को पॉलीथिन में लपेटकर जीवन बिता रहा था।

उनकी इस परेशानी को नईदुनिया ने प्रमुखता से प्रकाशित किया था। इसी के बाद शासन-प्रशासन हरकत में आया। खबर के प्रकाशन के बाद मुरैना जिला प्रशासन ने सीएम स्वेच्छानुदान कोष से 10 लाख स्र्पए की सहायता की अनुशंसा की थी। इसके बाद रविवार देर शाम मुख्यमंत्री ने मुरैना कलेक्टर भास्कर लाक्षाकार को फोन कर इलाज का पूरा खर्च उठाने की बात कही। दूसरी ओर सीआरपीएफ के अध्ािकारी भी मनोज का हाल जानने के लिए मनोज के ग्वालियर स्थित निवास पर पहुंचे। सीएम ने एम्स से टाईअप कर जवान का उपचार कराने की घोषणा की है।

दर्द का लंबा सफर

– मनोज के पेट में सात गोलियां लगीं थीं। गंभीर घायल होने की स्थिति में आंत को पेट में रखने का ऑपरेशन उस समय संभव नहीं था, इसलिए आंत का कुछ हिस्सा बाहर ही रह गया था। एक आंख की रोशनी भी जा चुकी थी।

– मनोज को केंद्रीय गृह मंत्री राजनाथ सिंह से पांच लाख रुपये की सहायता का आश्वासन भी मिला, लेकिन मदद नहीं मिल पाई।

इलाज के लिए पांच से सात लाख रुपए की दरकार थी, जिसका इंतजाम करना मनोज के लिए मुश्किल था।

उम्मीद : विशेषज्ञों का कहना है कि ऑपरेशन के बाद मनोज की आंत पेट में रखी जा सकती है और तब वे सामान्य जिंदगी जी सकते हैं। आंख की रोशनी भी लौट सकती है।

 

मैं टूट गया था, अब फिर से उम्मीद बंधी

नक्सलियों से मुठभेड़ में घायल होने के बाद जरूरी इलाज न मिलने और सरकार की अनदेखी के कारण मैं टूट गया था, लेकिन अब मुझे लगता है कि सही इलाज और सम्मान मिलेगा। मैं नईदुनिया का आभारी हूं, जिसने मेरी मजबूरी सरकार और समाज तक पहुंचाई – मनोज तोमर

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