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एक पत्रकार की हत्या का मतलब है लोकतंत्र ख़तरे में है

पत्रकार संदीप शर्मा का फाइल फोटो
मध्यप्रदेश भिंड के पत्रकार संदीप शर्मा का फाइल फोटो, जिनको बेरहमी से खनन माफियाओं ने ट्रक से कुचलवा दिया

एडीटर अटैकः प्रशांत राजावत 

 

एक पत्रकार की हत्या का मतलब है कि लोकतंत्र ख़तरे में है। जनता की आवाज़ दबाई जा रही है। सत्ताधारी ताकतें उफान पर है। अपराध चरम पर है। जी हां यही मायने हैं एक पत्रकार की हत्या के। जब एक पत्रकार की हत्या होती है तो एक व्यक्ति नहीं मरता बल्कि मरती है जनता की आवाज, पत्रकारिता की साख और वजूद। उस दिन मरता नहीं व्यक्ति बल्कि मर जाती है मीडिया नाम की संस्था जिसे जनता की आवाज़ के रूप में देखा और समझा जाता है। 

 

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भारत में 24 घंटे के अंदर तीन पत्रकारों की (दो बिहार औऱ एक म.प्र.) बेरहमी से गाड़ी से कुचलकर हत्या कर दी जाती है। ये देश के विकास की प्रत्यक्ष हार है। पत्रकारों की इस घटना को विश्वभर के बड़े अखबारों ने प्रमुखता से प्रकाशित किया। क्यों। क्योंकि पत्रकारों की हत्या है। विश्व समूह इस बात का गवाह है जिस देश में पत्रकारों की हत्याएं सरेआम होने लगें मानो वो देश अस्थिरता की ओर अग्रसर है। मानो वो देश पूंजीपतियों और माफियाओं के चंगुल में है।

मानो वो देश सत्ता के हाथों की कठपुतली है।

 

ये बात सलीके से समझनी होगी लोगों को कि रोज न जाने कितनी हत्याएं भारत में होती हैं। भारत के अखबारों में भी शायद ही पूरी हत्याओं की खबरें आ पाती हों। विदेशी मीडिया की तो बात छोड़िए। पर 3 लोगों की हत्या की खबरें वैश्विक मीडिया में छायी हुई हैं। क्यों। क्योंकि ये लोग नहीं लोकतंत्र का आधार हैं। कहते हैं न पत्रकारिता लोकतंत्र का चौथा स्तम्भ है। बिल्कुल सही कहते हैं। चौथा खम्बा जब जब क्षतिग्रस्त होगा तब तब वैश्विक मीडिया में भारत की छवि को नकारात्मक ढंग से देखा-समझा जाएगा।

भारत का सत्ता पक्ष ये बात समझने को राजी नहीं है कि पत्रकारों की हत्या पर जल्द सख्त जांच हो। पत्रकारों की सुरक्षा को लेकर सख्त से सख्त कानून बनाए जाने की बेहद आवश्यक्ता है। न सिर्फ इसलिए कि पत्रकार सुरक्षित रहें बल्कि इसलिए भी कि विश्व में भारत को बढ़ते अपराध, हिंसा, गिरती कानून व्यवस्था और पत्रकारों के लिए असुरक्षित देश के रूप में न जाना जाए।

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कमेटी टू प्रोटेक्ट जर्नलिस्ट (सीपीजे) के एशिया कार्यक्रम संयोजक स्टीवन बटलर का कहना है कि प्रशासन को पत्रकारों की मौतों की गहराई से जांच करानी चाहिए ताकि ये पता चल सके कि क्या इनकी रिपोर्टिंग और इनके काम के चलते इन्हें निशाना बनाया गया है. सीपीजे की वैश्विक रैंकिंग में भारत का स्थान 13वां है, जो बताता है कि यहां पत्रकारों की हत्या में सजा शायद ही किसी को मिलती हो. सीपीजे का दावा है कि भारत में पत्रकारों की हत्या का एक भी मामला पिछले दस सालों में नहीं सुलझा है. 

बड़े शहरों से इतर छोटे शहरों और ग्रामीण इलाकों में पत्रकारों की जान पर अधिक जोखिम है. नेशनल क्राइम रिकॉर्ड ब्यूरों के आंकड़ों मुताबिक साल 2015 से लेकर अब तक करीब 142 पत्रकार हमलों का शिकार हो चुके हैं. वहीं साल 1992 से लेकर 2016 के बीच करीब 70 पत्रकार मारे गए थे. इनमें से अधिकतर स्वतंत्र पत्रकार थे जिनकी हत्या इनके घर या दफ्तर के पास की गई.

कई मामलों में पत्रकारों पर होने वाले हमलों की रिपोर्ट इसलिए भी नहीं होती क्योंकि उन्हें स्थानीय नेता, पुलिस या रसूखदार लोगों से धमकियां मिलती हैं. पिछले साल हाईप्रोफाइल पत्रकार गौरी लंकेश की बेंगलूरु में हुई हत्या ने देश में प्रेस की आजादी से जुड़े सवालों को फिर उठा दिया. लंकेश की हत्या पर तमाम बातें और बहसें हुईं लेकिन जमीनी स्तर पर अब तक कुछ नहीं बदला है.

 

पत्रकारों की लगातार हत्याएं और उनपर जानलेवा हमले बेहद दुखद हैं। इससे पता चलता है कि भारत पत्रकारिता के लिए कितना सुरक्षित है। या तो पत्रकार चुप रहें, या फिर आप की दी हुई रकम स्वीकारें या दलाल बने वरना मौत फ्री में मिलेगी। 

 

 

  • एडीटर अटैक मीडिया मिरर सम्पादक का नियमित कॉलम है। इस पर प्रतिक्रिया के लिए mediamirror.in@gmail.com  पर मेल करें। 
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