Home > किताब चर्चा > पत्रकारिता के विद्यार्थी के पास ये किताब ज़रूर होनी चाहिए

पत्रकारिता के विद्यार्थी के पास ये किताब ज़रूर होनी चाहिए

परफेक्ट फ्रेम
महिला फोटोग्राफरों की दुनिया पर आधारित किताब परफेक्ट फ्रेम
परफेक्ट फ्रेम
होमई व्यारावाला 

टीवी पत्रकार रवीश कुमार समय-समय पर अच्छी किताबों की वकालत करते हैं। इस बार महिला फोटोग्राफरों की दुनिया पर आधारित किताब परफेक्ट फ्रेम के बारे में बता रहे हैं और कह रहे हैं ये किताब पत्रकारिता के छात्र अनिवार्य रूप से पढ़ें। 

 

होमई व्यारावाला की बेटियां बड़ी हो गईं हैं

पिछले साल किसी वक्त मुंबई से मेरे दोस्त ने एक किताब भेजी। आज उसका जन्मदिन भी है। मुझे तो यही जानकर हैरानी हुई थी कि वो कैसे आधुनिक कला संग्नरहालय पहुंच गया। उसे लगा कि ये किताब मेरे लिए बहुत ज़रूरी है, मैं तो इसी बात से भाव-विभोर हो गया। सोचता रह गया कि कभी होमई पर लिखी गई इस किताब पर लिखूंगा। पर आज ही मौका मिला।

जब भी इस किताब को पलटता हूं, आंखें नम होनी शुरू हो जाती हैं और फिर भी बेपरवाह होकर झरझर बहने लगती हैं। किताब के कवर पर होमई व्यारावाला को देर तक देखते रह जाता हूं। भीतर के पन्नों में उनके कैमरे का कमाल भारत का इतिहास है। ग़ुलाम भारत से आज़ाद भारत की संध्या और सुबह के बीच वो अकेली लड़की अपने कैमरे के साथ हर जगह मौजूद रहती है। उसकी अपनी कहानी गुजरात के नवसारी से शुरु होती है। पिता उर्दू पारसी यात्रा थियेटर में काम करते थे। होमई मुंबई आती हैं और स्कूल में मैट्रिक पास करने वाली अकेली लड़की हो जाती हैं । यही लड़की भारत की पहली महिला फोटोग्राफर बनती है। 57 साल की उम्र में सोचती है कि उसके काम से किसी को क्या काम और वो फोटोग्राफी बंद कर देती है। शहर दर शहर मकान बदलते रहती है। अपने सारे निगेटिव को बक्से में बंद कर देती है और वो बक्सा खो जाता है। जो पास में बचा था, वो भी जला देती है। तभी दिल्ली का कोई फोटो जर्नलिस्ट प्रेस इंफोर्मेशन ब्यूरों की सूची में एक महिला का नाम देखता है। उसकी तलाश करता है, मगर अचानक दिल्ली के एक कैमरे की दुकान में होमई से मुलाकात हो जाती है। जहां वे अपना कैमरा ठीक कराने आईं थीं और फिर शुरू होती है होमई व्यारावाला की शानदार गाथा। सबीना गडिहोक ने उन पर जो किताब लिखी है, वो अदभुत है। इसे NATIONAL GALLERY OF MODERN ART, ALKAZI FOUNDATION FOR THE ARTS AND MAPIN PUBLISHING ने छापा है।
सर्वेश होमाई की ही बेटी होंगी। उन्होंने मुझे मेसेज किया कि किताब लिखने कहां आती है, फिर भी लिखा है तो देखिएगा। ज्ञानपीठ से छपी महिला फोटोग्राफरों पर सर्वेश की किताब हाथ में आते ही बहुत सारी होमई नज़र आने लगीं थीं। यह किताब भी होमई की कहानी से शुरू होती है। सरस्वती चक्रवर्ती, कृष्णा रॉय, उमा क़दम, रूहानी कौर, गीतिका ताल्लुक़दार, जयश्री पुरी, सुमन कंसारा, मीता अहलावत सहित 32 महिला फोटोग्राफर की कहानी आपको इस किताब में मिलेगी। होमई अकेली और पहली थीं, सर्वेश की किताब में आपको उनकी 32 बेटियां मिलेंगी। मुझे कितनी खुशी हुई है आज इस किताब को पढ़कर बता नहीं सकता। बता तो रहा हूं।

“कुछ लोग कलम से लिखते हैं, पर मेरी जैसी महिलाएं कैमरे से लिखना पसंद करती हैं। मेरा जन्म साधारण परिवार में हुआ। कम उम्र में शादी कर दी गयी। ज़्यादा पढ़ी लिखी न होने के कारण दस साल तक पति के अत्याचार सहती रही। फिर समय ने कुछ ऐसी करवट ली कि मुझे घर से बगावत करनी पड़ी। लोग क्या कहेंगे- इस डर से मायके वालों ने आश्रय नहीं दिया। सामाजिक संस्था सहेली ने जीने की राह दिखाई। कैमरा पकड़ते ही लगा कि मुझे पंख मिल गये हों। “

ये सर्वेश की अपनी कहानी हैं। हम लोगों के आस पास उन्हें जगह बनाते हुए, भीड़ से खुद को निकाल कर क्लिक करते कई बार देखा है। इन 33 महिलाओं के कमैरे तक पहुंचने की कहानी भी हमारे समाज और पेशे का महत्वपूर्ण दस्तावेज़ है। जयश्री, सुमन, पूजा को तो अच्छे से जानता हूं। अपने जीवन की नाइंसाफ़ी का घेरा तोड़ कर जब वे महिला फोटोग्राफर बनती हैं तो वहां भी नाइंसाफ़ी का एक नया घेरा बन जाता है। उनसे लड़ते हुए, घिसते हुए,अपने समय को जिस हुनर के साथ दर्ज करती हैं, वो तस्वीरें उनकी अपनी ज़िंदगी का पता नहीं बताती हैं। भले ही वे अपने समय और भूगोल का पता दर्ज करती होंगी।

सर्वेश ने इनकी पेशेवर ज़िंदगी को कलमबंद कर कितना अच्छा काम किया है, बता नहीं सकता। पत्रकारिता के विद्यार्थी के पास ये किताब अनिवार्य रूप से होनी चाहिए। 200 रुपये की तो है। सर्वेश के कैमरे में मेरी भी कई तस्वीरें हैं।

Share this: