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वहां टीआरपी के लिए निर्वस्त्र हो जाती है एंकरः जयशंकर गुप्ता

जयशंकर गुप्ता
मीडिया समग्र मंथन को संबोधित करते जयशंकर गुप्ता
  • आजमगढ़ में मीडिया समग्र मंथन
  • शार्प रिपोर्टर पत्रिका का आयोजन, देशभर के पत्रकार, साहित्यकार पहुंचे कार्यक्रम में
  • उल्लेखनीय कार्य़ के लिए पत्रकार-साहित्यकारों को किया गया सम्मानित

मीडिया मिरर न्यूज, दिल्लीः 

मैं एक बार भारत के तत्कालीन राष्ट्रपति एपीजे कलाम के साथ आईसलैंड की यात्रा पर गया था। आईसलैंड में 6 महीने रात होती है 6 महीने दिन। भौगोलिक परिस्थितियां हैं वहां की ऐसी। जिस समय मैं गया था वहां 24 घंटे दिन रहता था। मैंने एक स्थानीय व्यक्ति से पूछा कि बगैर रात के लोग यहां सोते कैसे हैं तो वो बोला पता लग जाएगा जब आपको सोना होगा।  मैं होटेल में था जब हम सोने के लिए जाने लगे तो हमारे कमरे को काले पर्दों से ढका जाने लगा। एकदम रात जैसा माहौल कर दिया गया। फिर मैंने होटेल में एक व्यक्ति से पूछा कि दिनभर मैं होटेल में टीवी देखता रहा पर न्यूज चैनल नहीं देखा। क्या यहां कोई न्यूज नहीं देखता। तो होटल वाला बोला सर यहां न्यूज देखते हैं लोग, रात 8 से 9 के बीच समाचारों का एक विशेष बुलेटिन जारी होता है जिसे नेक्ड न्यूज कहते हैं। मैंने पूछा नेक्ड न्यूज मतलब। तो होटल वाला बोला कि नेक्ड न्यूज मतलब कि एंकर हर ब्रेक के बाद एक एक कपड़े उतारती जाती है और समाचार के अंत तक एकदम नंगी हो जाती है। हमारे आइसलैंड में यही बुलेटिन समाचार के नाम पर होता है जिसे लोग देखते हैं। इसको टीआरपी मिलती है।

ये लम्बा वक्तव्य है प्रेस एसोसिएशन ऑफ इंडिया के अध्यक्ष वरिष्ठ पत्रकार जयशंकर गुप्ता का। श्री गुप्ता उत्तरप्रदेश के आजमगढ़ में मीडिया समग्र मंथन कार्यक्रम को संबोधित कर रहे थे। मीडिया समग्र मंथन 7-8 अप्रैल को सम्पन्न हुआ।

श्री गुप्ता ने आगे कहा कि टीआरपी की अजब होड़ है हमारे देश के चैनलों में। टीआरपी के लिए कुछ भी दिखाने को तैयार हैं। उन्होंने फेक न्यूज मामले पर भी चुटकी लेते हुए कहा कि प्रधानमंत्री जी अक्सर फेक न्यूज का कंटेंट उपलब्ध कराते हैं। लेकिन उस प्रकरण में फसेगा पत्रकार ही।

 

 

इस दो दिवसीय कार्यक्रम में प्रोफ़ेसर ऋषभ देव, प्रोफ़ेसर देव राज, प्रोफ़ेसर एम वेंकटेश्वर योगेन्द्रनाथ शर्मा ‘अरुण ‘समेत दर्जनों साहित्यकारों, समाज सेवियों और आंदोलनकारियों ने सम्बोधित किया। वरिष्ठ पत्रकार पुण्य प्रसून वाजपई, जय शंकर गुप्त, गिरीश पंकज, यशवंत सिंह, प्रशांत राजावत, गोपाल राय, राम किंकर सिंह ने सम्बोधित किया और लोकतंत्र में बढ़ते खतरे और मीडिया के सामने आती चुनौतियों को रेखांकित किया। जयशंकर गुप्त ने मीडिया में फैले भ्रष्टाचार पर प्रहार किया और कहा कि बदलते समय में पत्रकारों को सावधान होकर काम करने की जरूरत है। जिस तरह से फेंक न्यूज़ की कहानी सामने आ रही है वैसे में प्रतिबद्ध पत्रकारों की जिम्मेदारी और बढ़ जाती है।

काशी विद्यापीठ
कार्यक्रम को संबोधित करते काशी विद्यापीठ में पत्रकारिता व जनसंचार विभाग के निदेशक प्रो.ओपी सिंह

वरिष्ठ पत्रकार यशवंत सिंह ने कहा लोकतंत्र में मीडिया की भूमिका बड़ी होती है लेकिन सरकार नहीं चाहती है कि सच सामने आये। लेकिन पत्रकारों को सच बोलने और कहने से पीछे नहीं हटना चाहिए। वरिष्ठ पत्रकार गिरीश पंकज ने मीडिया में बढ़ रहे फेक न्यूज़ पर काफी क्षोभ प्रकट किया और कहा कि लोकतंत्र की रक्षा मीडिया को धारदार बनाकर की संभव है। वहीँ युवा पत्रकार रामकिंकर सिंह ने मीडिया पर बढ़ते हमले और लोकतंत्र के स्तम्भों को कमजोर करने की साजिशों का खुलासा किया। वरिष्ठ पत्रकार प्रसून वाजपई ने दिल्ली से ही लाइव के जरिए अपनी बात रखी और पत्रकार एवं पत्रकारिता के साथ ही लोकतंत्र से जुड़े मुद्दों को बखूबी उकेरा। वाजपई ने कहा कि अभी का समय चिंतन करने का है और मीडिया को लोकतंत्र पर हो रहे हमले पर चुप्पी तोड़ने का समय है। साथ ही संविधान के साथ खड़े रहने की जरूरत है ताकि जनता की गरिमा को बचाया जा सके।

गोरखपुर रेडियो स्टेशन की अधिकारी डॉ अनामिका श्रीवास्तव ने कहा कि जब तक समाज में साहित्य और मीडिया है तबतक लोकतंत्र को कोई कमजोर नहीं कर सकता। यह हमारी पूंजी है और आत्मा भी। राजनीति चाहे जो भी हो मीडिया कर साहित्य के दम पर समाज को जोड़ने का काम चलता रहेगा।

 

‘मीडिया समग्र मंथन-2018’
(उत्सव का प्रथम दिवस)

पूर्व डीजीपी प्रकाश सिंह
संबोधित करते वरिष्ठ पत्रकार अखिलेश अखिल

मीडिया भटकाव की राह पर है -देवराज।
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महात्मा गांधी अंतररार्ट्रीय हिंदी विश्वविद्यालय वर्धा के भाषा विद्वान प्रो. देवराज ने उत्तर प्रदेश के आजमगढ़ में मीडिया समग्र मंथन-18 के दो दिवसीय राष्ट्रीय कार्यक्रम में प्रथम दिवस 7अप्रैल को ‘मीडिया, लोकतंत्र और हमारा समय’ विषय को प्रवर्तन करते हुए कहा कि मरना जिसको आता हो है जीने का अधिकार उसे ही है। आजमगढ़ के अतीत को याद करते हुए कहा कि कला, साहित्य और संस्कृति की धरती से गंभीर पत्रकारिता का हस्तक्षेप किया जाना सकारात्मक पहल है। लोकतंत्र के बारे में लोहिया, अंबेडकर और नरेंद्र देव का बड़ा योगदान है। वे ऐसा लोकतंत्र चाहते थे जिसमें व्यक्ति महज मत न होकर मूल्य होना चाहिए। पिछले सात दशक में आम आदमी को मत बना दिया गया है। दुनिया का अधिकांश सौंदर्य श्याम है, आचार्य नरेंद्र देव कहते थे कि विचार की आवश्यकता और उसकी स्वतंत्रता अनिवार्य है। पिछले सात दशकों में विचार की कितनी रक्षा और सुरक्षा हम कर पाएं हैं यह देखना होगा। पहले हमने व्यवस्था को मततंत्र में बदला बाद में यही स्वार्थतंत्र में बदल गया। लोकतंत्र के नाम पर हम एक ऐसी व्यवस्था की ओर बढ़ रहे हैं जो सिर्फ औपचारिकता रह जाएगी।

मीडिया आज लिखित से मशीन की ओर गया है। प्रोद्यौगिकी के आने से मीडिया के सरोकार कमजोर हुए हैं। हमारी प्रतिबद्धताएं और प्राथमिकताएं बदल गई हैं। लोकतंत्र में लोक की भागीदारी कम हुई है। पिछले सात दशक में सबसे अधिक उपेक्षा शिक्षा और संस्कृति की हुई है। संस्कृति, संस्कार, और परिष्कार का नाम है। संस्कृति जीवनशैली, विचार प्रधान, बौद्धिक बनाने का नाम है तो हमें मानना होगा कि जीवन का हर पहलू उसका अविभाज्य अंग है। संस्कृति हमारे लिए उत्सव हो गया है, जीवन नहीं। भाषा का लोकतंत्र और मीडिया से गहरा संबंध है। हिंदी पत्रकारिता या कहें भाषाई पत्रकारिता हाशिए पर है। अंग्रेजी पत्रकारिता की शुरुआत साम्राज्यवाद को स्थापित करने के लिए हुई थी। 1957 के स्वाधीनता संग्राम को अंग्रेजी मीडिया ने महज एक विद्रोह करार दिया। उस संग्राम में समाज का हर वर्ग शामिल था। उस संग्राम से प्रेरित होकर नोआखाली में अनुशीलन समिति बनी थीं। उस संग्राम में वो उत्तरपूर्व की बालिकाएं भी थीं जो कपड़ों में छिपाकर हथियार पहुंचाया करतीं थीं। इस संग्राम में तमाम वो साधु भी थे, जिन्होंने आंदोलनकारियों के शवों का अपमान न हो इसलिए अपनी झोपड़ी में रखकर उसको आग के हवाले कर दिया था। देशी भाषाओं की मिशनरी पत्रकारिता को नमन किए जाने की जरूरत है। पत्रकारिता के मूल चरित्र की बात क्यों नहीं होती। पत्रकारिता का काम आज सत्ता प्रतिष्ठानों को गाली देने का काम राह गया है। हिंदी की पत्रकारिता अनुदित बन चुकी है। यह हमारे विचार का विषय होना चाहिए कि भाषाई पत्रकारिता को मूल चरित्र पर लौटाए जाने की जरूरत है।
उन्होंने कहा कि लोकतंत्र, मीडिया और बौद्धिक जगत के बीच कई दीवारें हैं। लोकतंत्र के रक्षक एक तरफ हैं, बौद्धिक बिरादरी एक तरफ है। बुद्दिजीवियों और पत्रकारों को अलग खांचों में बांट दिया गया है। बुद्धिजीवियों और लेखकों में भी बंटवारा कर दिया गया है। बुद्धिजीविओं और शिक्षकों को अलग कर दिया गया है। पहले की पत्रकारिता ही बौद्धिकता थी। माखनलाल चतुर्वेदी में सभी तत्व एक ही इकाई में समाहित थे। इस देश में बौद्धिक जगत ने उत्तर आधुनिकता के नाम पर भूचाल खड़ा कर दिया है। विचार, मूल्य, कला, संस्कृति और लेखन का अंत कर दिया है। सिर्फ बचे हैं तो प्रश्न और विचार का अंत हो चुका है। उत्तर आधुनिकता निकारागुआ के विचारकों ने स्थापित की थी। पश्चिम के जिस बुद्धिजीवी वर्ग से हम बहुत अधिक प्रभावित रहते हैं उसने हमें खोखला बना दिया है। हमने अपने अभावों और कुंठाओं से मुक्त होने के नाम पर तथाकथित बौद्धिकता का आडंबर ओढ़ लिया। हमारे बुद्धिजीवियों ने तीसरी दुनिया के देश नामक शब्द गढ़ा। पूरी दुनिया को उत्तर आधुनिक, आधुनिक और पिछड़े राज्यों में बांट दिया गया। भारतीय उपमहाद्वीप को पिछड़े देशों में रखा गया है। जो मीडिया अंग्रेजी और पश्चिमी साजिशों को समझती है, उसके संवर्धन की जरूरत है।
उन्होंने कहा कि जब मीडिया ने अपनी रखवाली करने की कोशिश की तब उसे सकारात्मक बने रहने के नाम पर उद्देश्य से भटका दिया गया है। सकारात्मक मीडिया के नाम पर मीडिया भटकाव की राह पर है। सकारात्मक या नकारात्मक कुछ नहीं होता जो आप देते हैं वही जरूरत है। आज सकारात्मक वह है जो सत्ता को सुख पहुंचाए। फिल्मों का मूल्यांकन बॉक्स ऑफिस के कलेक्शन से किया जाना चिंताजनक है। फ़िल्म की कसौटी रचनात्मकता, कथानक, विचार और मूल्य होने चाहिए। मीडिया को अपने गिरेबां में झांकने की जरूरत है। लघु, माध्यम पत्रकारिता आज भी मूल्यपरक और वास्तविक पत्रकारिता से जुड़ी हुई है। इस धरती की गरमाई को संजोने के लिए कुछ बड़ा काम करने की जरूरत है। जिस जमीन ने हिंदी के भाषिक चरित्र को परिभाषित किया। उस धरती की धरोहर को संजोने के लिए राहुल सांकृत्यायन के नाम पर विश्वविद्यालय बनाने का प्रस्ताव यह सभा करती है।
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पूर्व डीजीपी प्रकाश सिंह
पूर्व डीजीपी प्रकाश सिंह कार्यक्रम को संबोधित करते

मीडिया के मुंह में खून लग चुका है -प्रकाश सिंह
कार्यक्रम के मुख्य वक्ता और उत्तर प्रदेश,आसाम के पूर्व पुलिस महानिदेशक प्रकाश सिंह ने कहा कि हिंदुस्तान के लोकतंत्र पर हम सभी को अभिमान है। इसके साथ ही हमें अपनी कमजोरियों का निदान नहीं किया तो लोकतंत्र मजबूत नहीं हो पाएगा। पिछली लोकसभा में 34 फीसदी सांसद आपराधिक पृष्ठभूमि के थे। यह संख्या लगातार बढ़ती जा रही है। देश में ऐसे लोगों से राष्ट्रीय सुरक्षा की उम्मीद कैसे की जा सकती है। संसदीय व्यवस्था का जिस तरह से चरित्र बदल रहा है। लोकतंत्र स्टेट की ओर से क्या हम क्रिमनल स्टेट की ओर तो नहीं बढ़ रहे हैं। जनप्रतिनिधि आज लोकतंत्र की कब्रें खोद रहे हैं। इस स्थिति में देश में कोई तानाशाह आएगा और इनकी छुट्टी कर देगा। ऐसे में क्या हम तानाशाही के लिए रास्ता तो नहीं तैयार कर रहे। इलेक्शन में विदेशी फंडिंग नहीं किया जा सकता है। यह फंडिंग सभी पार्टियां कर रही हैं। इसके ख़िलाफ़ दिल्ली उच्च न्यायालय में गैरकानूनी ठहराया। 1976 में दोनों पार्टियों ने कानून बनाकर विदेशी निवेश को वैध बना दिया। इस कानून के अस्तित्व में आने के बाद देश औपनिवेशिक व्यवस्था की ओर बढ़ रहे हैं। लोकतंत्र से दीमक का सफाया नहीं किया गया तो इसका चरित्र विकराल हो जाएगा।
उन्होंने मीडिया को लेकर टिप्पणी करते हुए कहा कि मीडिया के मुंह में आज खून लग गया है। पी साईनाथ कहते हैं कि मीडिया के नैतिकता का दायरा खत्म होता जा रहा है। संस्थान चलाने के लिए पैसे चाहिए पर कितना चाहिए यह सीमा तो तय करनी पड़ेगी। क्या पैसे कमाने के लिए हम कपड़े उतारकर नंगे हो जाएंगे। एक बड़े अख़बार का मालिक व्याभिचारी है उससे आप क्या उम्मीद करेंगे।
उन्होंने मौजूदा समय के संदर्भ में बताया कि विकास के साथ हो रहे मूल्यों के ह्रास को कोई देख नहीं रहा है। परिवार और समाज से परिवार और रिश्तों में आदर का भाव खत्म होता जा रहा है। धर्म की जय करके हम अपने आपको संतुष्ट कर रहे हैं। लगातार अधर्म का दायरा बढ़ता जा रहा है। प्राणियों में सद्भाव के स्थान पर मारकाट होती जा रही है। अंग्रेजों ने संप्रदायों में बैर कराया। हम तो उनको जाति, भाषा, क्षेत्र, लिंग और परंपराओं के नाम पर लड़वाने का काम कर रहे है। कुछ ऐसी खबरें होती हैं, जो जान बूझकर फैलायी जाती है, जिससे दुर्भावना बढ़ती है। देश को तोड़ने का षणयंत्र है, हिंदू धर्म को तोड़ने का षणयंत्र है बड़े कैनवस में देखें तो यह देश तोड़ने की षणयंत्र है। पैसे लेकर ब्रेकिंग इंडिया मुहिम चलाई जा रही है। कथित बुद्धिजीवी देश तोड़क अभियान चला रहे हैं।
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संघ पर किताब लिखने की योजना है-पुण्य प्रसून
वीडीओ कांफ्रेंसिंग के माध्यम से एबीपी न्यूज चैनल के कार्यकारी संपादक पुण्य प्रसून बाजपेयी ने कहा कि भारत में राजनीतिक सत्ता ही सब कुछ नियंत्रित करनी चाहती है। जो चीजें संविधान के दायरे में नहीं बंधती वो लोकतंत्र को मजबूत करती हैं। अधिकतर राजनीतिक दलों में,संविधान में,संविधान को कॉपी पेस्ट किया हुआ माल होता है। संवैधानिक संस्थाओं पर सत्ता का दबाव लोकतंत्र को कमजोर करता है। मीडिया उस राजनीतिक सत्ता से ही प्रभावित हो जाता है। पूरी की पूरी मीडिया सरकार केंद्रित हो जाती है। संसदीय बहसों में 62 प्रतिशत किसानों और मजदूरों पर बहस होती है, पर बजट में महज 5 फीसदी ही आ पाती है। मुस्लिम तुष्टिकरण, हिंदू ध्रुवीकरण, दलित राजनीति और पिछड़ों का खेल हमेशा खेला जाता रहा है। गांव के व्यक्ति को वोट बनाने के लिए शहर तैयार है, शहर के व्यक्ति को वोट बनाने के लिए मार्किट तैयार है। हिंदुस्तान की संस्कृति अगर सत्ता के इर्दगिर्द चलती रहेगी तो यही लोकतंत्र की परिपाटी बन जाएगी। आज़मगढ़ का जिक्र कैफ़ी आज़मी या राहुल सांकृत्यायन के नाम पर किया जाए या मुस्लिम चरमपंथ के नाम पर किया जाए। सत्ता, शक्ति यह कभी नहीं चाहेगा कि संवैधानिक संस्थाओं में उनके लोगों की भर्ती न हो। हिंदुस्तान में अब यह बताना पड़ेगा कि दलित, पिछड़ों, मुसलमानों की आबादी कितनी है। आप बताते इसलिए नहीं हैं कि आपको खुद कहने की हिम्मत नहीं है।
पत्रकार को पत्रकार रहने दीजिए, जज को जज रहने दीजिए। हमको नेता कहता है कि आप क्यों नहीं चुनाव लड़कर देख लीजिए। लोकतंत्र को वोटतंत्र में बदलने का षणयंत्र बना दिया गया। चुनाव और मतदाता ही लोकतंत्र नहीं है। अब मीडिया को यह भी बताना पड़ेगा कि लोकतंत्र है या नहीं है, है तो उसके सही मायने क्या हैं। हमें उस जज का बायकॉट करना पड़ेगा जो अपनी ताकत का बेजा इस्तेमाल करता है।
हमने किताबों का कल्चर विकसित नहीं किया। न्यूनतम समर्थन मूल्य डेढ़ गुना देने की घोषणा को हवा देते रहे, वास्तविकता यह है किसान की आय दोगुना होने के बावजूद हैंड टू माउथ है। क्या इसका मतलब यह मान लिया जाए कि क्या लोकतंत्र को खत्म कर लेने के लिए मीडिया टूल बन चुकी है।
हमने लोकमत समाचार से नौकरी शुरू की। यह सफर सहारा, एनडीटीवी, जी न्यूज, आजतक होकर एबीपी न्यूज में पहुंचे हैं। पिछली सरकार या उससे पिछली सरकार का दबाव बराबर ही रहता है। यह वक्त का हेरफेर है यह परफेक्शन पर डिपेंड करता है। हमें इस स्थिति को रोकने के लिए बात करनी चाहिए। डॉ मनमोहन को लेफ्ट समर्थन लेकर सरकार चलाते हैं। एनडीए प्रचंड बहुमत के बाद वही करते हैं। इलेक्शन में हिंदुस्तान सबसे अधिक रकम न्योछावर करता है। कारपोरेट को पता रहता है कि कौन सरकार आने वाली है। इसलिए 2014 के चुनाव में 80 फीसदी चंदा बीजेपी को मिला था।
किताब तो लिखनी चाहिए थी आरएसएस पर, पॉलिटिकल प्रॉसेस पर, उच्च शिक्षा पर, उसके बाजारीकरण पर,सामाजिक असमानता पर लेकिन हम अभी उस पर काम कर नहीं पाए हैं। काम करते हुए किताबें लिख पाना थोड़ा संभव नहीं है। हमने अब तक ‘आदिवासियों पर टाडा’, ‘संसद : लोकतंत्र या नजरों का धोखा’, ‘राजनीति मेरी जान’, ‘डिजास्टर : मीडिया एंड पॉलिटिक्स’ लिखीं हैं। यह सभी हमारे आलेखों के संग्रह हैं मूल तौर पर किताब नहीं कह सकते हैं। आरएसएस पर किताब लिखने की योजना है। आम आदमी को आज उपभोक्ता और यूजर बना दिया गया है।
मान लीजिए किसी पत्रकार को काम नहीं करने दिया जाएगा। ऐसे हालात में भी पत्रकार काम तो करें, क्योंकि मीडिया के लिए कई माध्यम हैं। हिंदुस्तान की राजनीति आज सबसे करप्ट है यह हम नहीं कह पा रहे हैं। हम यह भी नहीं बता पा रहे हैं कि मूल विषयों को किस तरफ धकेलने की साजिश चल रही है।
मीडिया की विश्वसनीयता काफी समय से दांव पर है। आप मेनोफेस्टो लागू करने की बात क्यों करते हैं। संविधान को लागू करने की बात तो कीजिए। हमारे देश के राजनीतिक दलों ने संविधान को ही मेनिफेस्टो बना लिया।
नेहरू ने 100 पिछड़े जिलों का जिक्र किया था, मोदी उन्हीं जिलों को संवेदनशील जनपद घोषित कर रहे हैं।
देश का संविधान और कानून नजरों का धोखा है, गैरलोकतांत्रिक है। इस सवाल के जवाब में उन्होंने बताया कि गांधी जी ने यह बात तो 1947 में में ही कह दिया था कि देश आजाद नहीं हुआ सत्ता का हस्तांतरण हुआ है।
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सूचना एवं प्रसारण मंत्रालय के श्री गोपाल जी राय ने कहा कि मीडिया पर आरोप लगाना आसान है। सर्वोच्च न्यायालय तक घुटने टेककर न्याय मांगने मीडिया के पास आते हैं। वर्तमान मीडिया भी विदेशी फंडिंग से चल रही हैं। पत्रकार को बिकाऊ कहने वाले उसकी हकीकत नहीं जानते। जनता ने मीडिया को टिकाऊ बनाने के लिए कभी कोई आंदोलन ही नहीं किया। देश के किसी भी सदन में पत्रकारों के कल्याण को लेकर कोई सवाल नहीं उठाया गया।
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सम्मानित अतिथिगण
सम्मानित अतिथिगण

श्री गोपाल नारसन ने कहा कि मीडिया हमारे लोकतंत्र का सच्चा कवच है। यह आत्ममंथन और विवेचन भी करती है।
डॉ योगेंद्र नाथ शर्मा ‘अरुण’ ने अध्यक्षीय भाषण में कहा कि हम संविधान के नाम पर जातियों को बांट रहे हैं। हम माइंड गिनने के बजाय सिर गिनने की नीतियों का पालन कर रहे हैं। हम आरक्षण के नाम पर बाबा साहब का मजाक उड़ा रहे हैं। दस वर्ष के लिए आपने अंग्रेजी को संपर्क भाषा बनाए रखने की वकालत की थी आज राष्ट्रभाषा बनती जा रही है। प्रजातंत्र के पहले 25 वर्ष लोकतंत्र, अगले 25 वर्ष भीड़तंत्र, फिर 25 वर्ष अराजकतंत्र और अंतिम 25 वर्ष अधिनायकतंत्र के होंगे। हमने विज्ञान बनाया और उसके दास बन गए। विज्ञान ने हमारी नैतिकता ले ली, मूल्य ले लिए, संवेदनाएं ले लीं। कथित सोशल मीडिया सर्वेंट की जगह मास्टर बन गया है। नकारात्मकता हमने अपने दिल से लगा रखा है, तो सकारात्मकता कैसे आएगी। हमें वो नहीं चाहिए जो हमें अनर्थ नहीं सिखाए हमें वो चाहिए जो हमें अर्थ सिखाए। अंग्रेजी के अख़बार रद्दी में बेंचे जाते हैं, हिंदी के अख़बार पढ़े जाते हैं। कर्तव्य निभाते हुए पत्रकार का निधन होता है तो उसके परिवार के भरण पोषण के लिए मुआवजे की व्यवस्था करें।
कार्यक्रम के अंतिम सत्र में शाम को बोकारो से पधारी लोकप्रिय भोजपुरी गायिका चंदन तिवारी का रंगारंग कार्यक्रम हुआ। भोजपुरी और हिंदी पट्टी के मानस को समझते हुए चंदन माटी के दर्द और विरह की वेदना को अपना स्वर दिया जिसे लोगो मंत्रमुग्ध हो सुना।

सभी तस्वीरेंः कबीर जी, आजमगढ़ 

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