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कर्मचारी सुविधा अब मीडिया संस्थानों के लिए चुनौती

पत्रकारिता व मीडिया
पत्रकारिता व मीडिया

कर्मचारियों को सप्ताह में 2 दिन के अवकाश व अन्य सुविधाओं के लिए दिल्ली के मीडिया संस्थानों पर बन रहा दबाव 

 

एडीटर अटैक-प्रशांत राजावत 

 

खासतौर पर भारत के मीडिया हब के रूप में प्रसिद्ध दिल्ली के मीडिया संस्थानों के लिए कर्मचारी सुविधा के नाम पर एक बड़ी चुनौती आने वाली है। और आने वाली क्या है आ ही गई है। इस प्रतिस्पर्धी दौर में मीडिया घरानों के लिए सबकुछ सामान्य होगा, सबकुछ उनके पक्ष में होगा ऐसा नहीं है।

मीडिया संस्थानों में सभी विभागों के कर्मचारियों को सुविधा देने की चुनौती सामने आ रही है। चाहे सम्पादकीय विभाग हो, विज्ञापन विभाग, प्रसार या अन्य। दरअसल हो ये रहा है कि जब यूसी न्यूज, बीबीसी और फिर एनडीटीवी, न्यूज 18 आदि दिग्गज मीडिया समूहों ने सप्ताह में 2 दिन का अवकाश पत्रकारों को देने की व्यवस्था की तबसे अन्य मीडिया संस्थान पशोपेश में हैं जो कि सप्ताह में एक अवकाश के लिए अनाकानी करते हैं। अब ऐसे संस्थानों के ऊपर भारी दबाव बन रहा है कि वो सप्ताह में 2 अवकाश अपने सम्पादकीय व अन्य विभागों के कर्मचारियों को दें जैसा कि अन्य मीडिया संस्थान कर रहे हैं।

हालांकि पश्चिमी देशों में सप्ताह में 2 दिन अवकाश का प्रावधान है और वर्किंग आवर पर भी काम होता है। भारत में भी श्रम मंत्रालय की निर्देश सूची देखें तो सभी श्रमिक पाएंगे कि उनका भरसक शोषण हो रहा है और कर्मचारी शोषण में पत्रकार भी शामिल हैं। लेकिन जहां 2 वक्त की रोटी के लिए जद्दोजहद हो सिर्फ नौकरी बचाने के हर रोज प्रयास होते हों वहां श्रम मंत्रालय के अनुसार बने नियमों को हवाला देते हुए सुविधाओं की मांग कौन पत्रकार करेगा अपने सम्पादक या मालिक से। जो पत्रकार अपने हकों के लिए मजीठिया वेज बोर्ड के लिए कुछ नहीं कर पाया वो व्दितीयक सुविधाओं के लिए क्या लड़ेगा।

पर हां प्रत्यक्ष तौर पर मीडिया समूह अब दबाव जरूर महसूस कर रहे हैं। दिल्ली के उन मीडिया संस्थानों से लगातार खबरें आ रही हैं जहां सप्ताह में एक अवकाश का प्रावधान है कि वो लगातार मंथन कर रहे हैं। अखबार व चैनलों के प्रबंधकों पर कर्मचारियों को रोकने का दबाव है। क्योंकि ये भी सच्चाई है कि दिल्ली के अखबार और चैनलों को अच्छे पत्रकार नहीं मिल रहे हैं और जो अच्छे पत्रकार आ भी जाते हैं वो रुकते नहीं हैं। चाहे मीडिया संस्थानों में मातृत्व अवकाश की बात हो या शैक्षणिक अवकाश की। हालात बेहद खराब हैं। कई बार तो अगर पत्रकार बीमारी के लिए छुट्टी लेते हैं और घर में हुई किसी विषम परिस्थिति के लिए तो प्रबंधन उस पर भी संदेह जताता है।

पत्रकार अक्सर कहते पाए जाते हैं कि पत्रकारिता में छुट्टी कहां, पैसा कहां, सुकून कहां। पर अब चीजें बदल रही हैं। मीडिया संस्थान अच्छा पैसा दे रहे हैं। दिल्ली में ही कई मीडिया संस्थान प्रशिक्षु पत्रकारों को 25 हजार तक प्रति माह दे रहे हैं। मीडिया संस्थानों में हेल्थ पॉलिसी है, पीएफ है, पेन्शन योजना है, सप्ताह में 2 अवकाश हैं। साल में 2 बार किसी डेस्टिनेशन में जाने का पूरा भुगतान संस्थान कर रहे हैं। परिवार समेत आप 5 स्टार सुविधा ले सकते हैं। एनबीटी जैसे अखबार ऐसा कर रहे हैं। दैनिक भास्कर ने एक समय कर्मचारियों को फ्री लैपटॉप और माह में  सिनेमा हॉल के 2 टिकट की व्यवस्था अपने हर कर्मचारी के लिए की थी, मैंने भी खूब फिल्में देखी दैनिक भास्कर के टिकट व्यवस्था पर।

मीडिया दफ्तर अब हर सुविधा को लेकर ध्यान दे रहे हैं। खासतौर पर महिला शौचालय अब भी अलग से कई संस्थानों में नहीं हैं, पुस्तकालय नहीं हैं। इनपर ध्यान दिया जा रहा है। आपको आश्चर्य होगा कि कई संस्थानों में जिम भी है। महीने में एक बार फिटनेस के लिए बॉडी का टेस्ट होता है, जिसमें तमाम जांच होती हैं। दैनिक भास्कर के कई दफ्तरों में ऐसा है। साथ ही समय समय कॉफी चाय मिलता रहे। एसी सही हो। कर्मचारियों के बैठने के लिए कुर्सियां आरामदायक व लक्जरी हों इस पर फोकस है संस्थानों का। कम्यूटर सेट्स पर लेजर गार्ड लगाए जा रहे हैं। समय समय पर कर्मचारियों को उपहार, बेहतर काम पर प्रशस्ति पत्र, उनके जन्मदिन आदि को संस्थान द्वारा सेलिब्रेट करना ऐसा होने लगा है।

माहौल में भी धीरे धीरे सुधार हो रहा है। सम्पादक अब अपना अड़ियल रवैय्या छोड़कर मित्रवत पेश आ रहे हैं। इसके पीछे कई कारण हैं। जब अंग्रेजी मीडिया के अखबारों के सम्पादकों की अच्छे व्यवहार की तारीफ होती है तो फर्क तो पड़ता हिंदी सम्पादकों पर कि वो फि़जूल के रुतबे से बाहर निकलें।

कुल-मिलाकर वो संस्थान जो अपने कर्मचारियों का शोषण कर रहे हैं उनके ऊपर निश्चित ही दबाव है, खबरें हैं कि सम्पादक भी अपनी बात मालिकान को रख रहे हैं कि  संस्थान की प्राथमिकता कर्मचारी सुविधा अगर नहीं रही तो हमें अच्छे पत्रकारों को रोकना मुश्किल हो जाएगा और हमारे प्रतिद्वंदी संस्थान हमारे पत्रकारों को या अन्य विभागों के कर्मचारियों को तोड़ लेंगे।

ये पत्रकारों के लिए सुकून भरी खबर है और बहुत संभव है कि दिल्ली के अधिकांश मीडिया संस्थानों को सप्ताह में 2 दिन के अवकाश की बहुत जल्द घोषणा करनी पड़े।

  • एडीटर अटैक मीडिया मिरर सम्पादक का नियमित कॉलम है। 
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