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राष्ट्रपति की चिट्ठी पर दर्ज हुआ था छत्तीसगढ़ के पत्रकार पर देशद्रोह का मुकदमा

राष्ट्रपति और पत्रकार कमल शुक्ला

रायपुर से तामेश्वर सिन्हा।

बस्तर के वरिष्ठ पत्रकार कमल शुक्ला पर दर्ज देशद्रोह के मामले के पीछे बड़ा कारण राष्ट्रपति रामनाथ कोविंद के कार्यालय की चिट्ठी मानी जा रही है जो राज्य सरकार को भेजी गई थी और जिसके बाद राज्य सरकार ने कमल शुक्ला के खिलाफ देशद्रोह का मामला दर्ज किया।

गौरतलब है कि कमल शुक्ला पर जस्टिस लोया के मामले में कथित रूप से एक अपमानजनक कार्टून फेसबुक पर शेयर करने का आरोप है। हालांकि फेसबुक ने वह कार्टून हटा लिया है। लेकिन इसके बाद राजस्थान के एक व्यक्ति की कथित शिकायत पर पुलिस ने कमल शुक्ला के खिलाफ देशद्रोह का मामला दर्ज कर लिया है। इस मामले का दिलचस्प पहलू ये है कि राजस्थान के जिस व्यक्ति पुनीत जांगिण के इस कार्टून से ‘भावना आहत’ हो गई थी, उसने राज्य सरकार को सीधे कोई शिकायत नहीं की थी, जैसा कि कांकेर पुलिस दावा करती रही है। असल में 20 अप्रैल 2018 को यह कार्टून फेसबुक पर साझा किया गया था, जिसे कमल शुक्ला ने 21 अप्रैल को अपनी वॉल पर शेयर किया। इस कार्टून को शेयर करने वालों की संख्या हज़ारों में थी लेकिन शिकायतों के बाद फेसबुक ने वह कार्टून खुद ही ‘ब्लॉक’ कर दिया।

इस मामले में पुनीत जांगिण ने राष्ट्रपति रामनाथ कोविंद को एक पत्र लिख कर इस मामले में कार्टून शेयर करने वाले के खिलाफ़ मामला दर्ज करने का अनुरोध किया। जिसके बाद राष्ट्रपति भवन ने छत्तीसगढ़ सरकार को चिट्ठी लिख कर इस मामले में आवश्यक कार्रवाई के लिये कहा। मामला राष्ट्रपति भवन की चिट्ठी का था, इसलिये पुलिस ने 28 अप्रैल को कांकेर थाने में 0156/18 क्रमांक में धारा 124 ए के तहत देशद्रोह का मामला दर्ज कर लिया और जांच की कार्रवाई भी शुरू कर दी।

छत्तीसगढ़ के पत्रकारिता जगत में इस कार्रवाई को लेकर काफी रोष व्याप्त है। एक दिन पहले ही छत्तीसगढ़ के रायगढ़ जिले में पत्रकारों ने धरना देकर प्रदर्शन किया था तो वहीं बस्तर के पत्रकार जल्द बड़े आंदोलन के मूड में हैं। 

हालांकि हाईकोर्ट में कमल शुक्ला के खिलाफ दर्ज एफआईआर को रद्द करने और कमल शुक्ला की गिरफ्तारी को रोकने के लिये याचिका दायर करने वाले कमल शुक्ला के वकील का कहना है कि पुलिस ने दुर्भावनावश कमल शुक्ला के खिलाफ मामला दर्ज किया है और इस मामले में कमल शुक्ला के पक्ष में ही फैसला आयेगा। उन्होंने कहा कि इस मामले में केदारनाथ सिंह बनाम बिहार सरकार के 1962 के सुप्रीम कोर्ट के फैसले को अभी हाल ही में कई मामलों में सुप्रीम कोर्ट ने उदाहरण मानते हुये फैसले दिये हैं। सुप्रीम कोर्ट के फैसले की व्याख्या में किसी भी स्थिति में कमल शुक्ला के खिलाफ यह मामला नहीं टिकेगा।

अब संकट ये है कि कमल शुक्ला के खिलाफ जिस धारा में मामला दर्ज किया गया है, उसे प्रमाणित कर पाना पुलिस के लिये संभव नहीं है। लेकिन राष्ट्रपति भवन की चिट्ठी के कारण पुलिस के लिये न तो निगलते बन रहा है और ना ही उगलते। ऐसे में एफआईआर के आधार पर इस मामले में गिरफ़्तारी अनिवार्य मानी जा रही है।

सूत्रों के अनुसार पुलिस यह कोशिश कर रही है कि भावनाओं को आहत करने वाला कार्टून फेसबुक से बरामद किया जाये या फिर इसी कार्टून से संबंधित हैदराबाद के मामले के दस्तावेज़ हासिल किये जायें। ऐसा होते ही पुलिस के पास गिरफ़्तार करने का प्राथमिक आधार बन जायेगा।

सरकार के लिये मुश्किल ये है कि उसने आनन-फानन में धारा 124 ए के तहत देशद्रोह का मामला तो दर्ज कर लिया लेकिन विधि विशेषज्ञों का कहना है कि सुप्रीम कोर्ट के फैसलों के अनुसार यह मामला देशद्रोह की श्रेणी में आता ही नहीं है।

(लेखक पेशे से पत्रकार हैं और अपनी जमीनी रिपोर्टों के लिए जाने जाते हैं।)

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