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मिश्र जी के उपन्यास में गुंजा की शादी ओंकार से ही होती है…

नदिया के पार फिल्म का एक दृश्य
नदिया के पार फिल्म का एक दृश्य
उपन्यास
उपन्यास

छिबरामऊ के विशाल समर्पित की कलम सेः

प्रसिद्ध फिल्म नदिया के पार उपन्यास कोहबर की शर्त पर बनी है। पर जैसा कि फिल्म में दिखाया गया है उपन्यास उससे थोड़ा अलग है। पढ़िए 

 

 

भारतीय सिनेमा के हिंदी दीर्घा की सुप्रसिद्ध फिल्म ‘नदिया के पार’ केशव प्रसाद मिश्र के प्रसिद्ध उपन्यास “कोहबर की शर्त” पर फिल्माई गई है।
२ घंटे २४ मिनट की यह अत्यंत प्रसिद्ध फिल्म १ जनवरी १९८२ को रिलीज हुई थी।
और तब से लेकर आज तक यह फिल्म और इसके चरित्र {चन्दन,गुंजा,ओंकार,रूपा,वैधजी व् काका} हिंदी की सदाबहार फिल्मों की दीर्घा में अपना स्थान निरंतर अग्रिम पंक्ति में बनाये हुए है।
हालाँकि यहाँ पर यह सब बाते बताना मेरा उद्देश्य नहीं है इसलिए सीधे मुद्दे पर आते हैं……

केशवप्रसाद मिश्र जी का उपन्यास ‘कोहबर की शर्त’ एक ऐसा उपन्यास है, जिसमे पूर्वी उत्तर प्रदेश के दो गाँवो बलिहार और चौवेछपरा का जन-जीवन गहन संवेदना और आत्मीयता के साथ चित्रित हुआ है।
एक रेखांकन की तरह, यथार्थ की आडी-तिरछी रेखाओं के बीच झाँकती सी कोई छवि या आकृति।
यह आकृति एक स्वप्न के सदृश है।
इसे दो युवा ह्रदयों ने सिरजा था लेकिन एक पिछड़े हुए समाज और मूल्य विरोधी व्यवस्था में ऐसा स्वप्न कैसे साकार हो?
चन्दन के सामने ही कुँआरी गूंजा, सुहागिन गूंजा, विधवा गूंजा और कफ़न ओढ़े गूंजा
चार टुकड़े हो जाते हैं स्वप्न के !
इतना सब झेलकर भी चन्दन यथार्थ की कठोर धरती पर पूरी दृढ़ता और विश्वास से खड़ा रहता है।

कोहबर की शर्त एक तरह से निराश और बर्बाद जिंदगी में एक नयी प्रेरणा, नयी स्फूर्ति और नया उत्साह फूंकने की ही शर्त है जिसका विस्तार इस मर्म स्पर्शी उपन्यास में सहज ही देखा जा सकता है।

केशव प्रसाद मिश्र जी का यह उपन्यास चार खंड में राजकमल प्रकाशन से सन १९६५ में प्रकाशित (पुस्तकालय संस्करण) हुआ।
इस उपन्यास के केवल शुरुआत के दो खंड से ही सुप्रसिद्ध फिल्म नदिया के पार राजश्री प्रोडक्शन्स के बैनर तले बनी। इसको तेलुगु में प्रेमलयम नाम से डब भी किया गया। इसके बाद १९९४ में राजश्री प्रोडक्शन्स ने ही “हम आपके हैं कौन” शीर्षक के साथ पुनः निर्माण किया।

इस प्रसिद्ध फिल्म में अंत में रूपा की मृत्यु के पश्चात रामू की देख भाल के लिए ओंकार की शादी की बात गुंजा से चलाई जाती है और बात भी तय हो जाती है ओंकार अपनी बारात लेकर गुंजा के दरवाजे पर पहुँच जाता है परन्तु ठीक समय पर ओंकार चन्दन और गुंजा के नेह को भांप लेता है और अपनी जगह पवित्र अग्नि की भाँवर चन्दन और गुंजा के मध्य डलवाकर उनकी शादी करवा देता है।
लेकिन, उपन्यास में ऐसा नहीं है मिश्र जी के उपन्यास में गुंजा की शादी ओंकार से ही होती है….और क्या क्या होता है उपन्यास में जानने के लिए जुड़े रहिये मेरे साथ मैं दिनांक ०५-०५-२०१८ से उपन्यास का खंड ३ के बाद खंड ४ का एक एक करके रोज एक भाग प्रस्तुत करूँगा।

 

नोट:-

‘कोहबर’ शब्द का अर्थ = ‘विवाह का वह स्थान जहाँ कुलदेवता की स्थापना होती है’
लेखक स्वयं बलिहार गाँव से हैं
बलिहार गाँव उत्तर प्रदेश के जनपद बलिया में है
लेखक ने कई पात्र अपने गाँव से ही लिए हैं
उपन्यास की सुप्रसिद्ध नायिका गुंजा का गुंजा नाम लेखक ने अपनी बहन के नाम पर रखा है
उपन्यास में गुंजा का चरित्र पुर्णतः काल्पनिक है

मेरी राय:-

खंड ३ व् ४ को पढने से पहले आपको एक बार “नदिया के पार” फिल्म अवश्य देख लेनी चाहिए बेशक आपने वह कितनी ही बार क्यों न देखी हो..

 

#कोहबर_की_शर्त
#खंड_३_१

 

फिल्म की पात्र गुंजा
फिल्म की पात्र गुंजा

(गुंजा की शादी ओंकार से हो चुकी है)
गुंजा विदा होकर बलिहार आ गयी।
बलिहार की पतोहू, घर की स्वामिनी बनकर।
सूना, उदास घर एक बार फिर से भर गया| सम्बन्धियों में ओंकार की एक बूढी विधवा बुआ तथा एक और स्त्री आयी थी।
अंसवारी जब दरवाजे लगी, तो ओंकार के साथ गठबंधन किये दूरी में डेग डालती हुई गुंजा को गाँव-भर की चिर-परिचित लड़कियों ने घेर लिया।
पहले की सखी गुंजा, अब किसी की भौजाई, किसी की चाची हो गयी।
दो तीन दिनों तक तो कंगन छूटा, कथा हुई, भोज पात हुआ, घर में रौनक बनी रही।

घर की इस चहल-पहल में रामू* सबसे अनचीन्हा रहा।
वह हर समय गुंजा के पास सटा रहता। औरतें कहतीं, “अच्छा हुआ जो इनका ब्याह इसी घर में हो गया, नहीं तो इस लड़के को बड़ा दुःख होता”।

लेकिन इस घर की चहल-पहल को चन्दन नहीं देख पाया।
मंडवे में चोट लगा अँगूठा पक गया था।
दवा करते रहने पर भी उसमे सूजन हो आई थी।
दर्द बढ़ गया था।
खण्ड से घर आने में पाँच मिनट लगते थे, इतनी देर तक लंगडाकर चलना चन्दन के वश की बात नहीं थी।
इसलिए वह खण्ड में ही पड़ा रहता।
वहीँ नहाता, घर से खाना आता, वहीँ खा भी लेता।

ब्याह में, न्यौते पर आये हुए दो तीन आदमी ही रह गए थे।
बारात लौटे आज पाँचवा दिन था।
खंड के आगे कुएँ के बीचवाली परती में रात को सबकी खाटें बिछती थीं।
पहले चन्दन की,फिर तीन रिश्तेदारों की, फिर ओंकार की।
पांव में आज अधिक पीड़ा होने से चन्दन बैचैन था।
थोड़ी देर को भी लगातार पाँव एक जगह रख नहीं पाता था।
ठीक से आज खाना नही न हो सका।
आधा पेट खाकर वह चारपाई पर लेट गया।
कभी बायीं करवट, कभी दायीं।
आँख लगी, किन्तु पीड़ा ने सोने नहीं दिया।
प्यास के मारे गला सूखा जा रहा था।
चारपाई के नीचे, अँगोछे से तोपकर रखा हुआ लोटे का जल पीने को उठाया, तो एकदम गरम।
पीने की हिम्मत न हुई।
सोचा भईया को जगायें कि एक लोटा जल कुएँ से खींचकर दे दें।
आखिर में लगी भाई की खाट को ताका तो वह सूनी थी।
अगल-बगल के खंडो की ओर ताका तो सारे लोग सो रहे थे।
धीरे-धीरे झुरनेवाली उस गरम पछुआ ने रात में और भी सूनापन भर दिया था।
भईया गए कहाँ !
प्यास तो सही न जा सकी, उठना संभव न था, कुछ देर प्रतीक्षा करने के बाद वह लोटे क गरम जल गट-गट पी गया।
गले में कुछ नमी आई, तो नींद की खुमारी उतरी।
तब सहसा उसे कुछ सूझ गया, जिसने पाँव के दर्द को देह-भर में पसार दिया।
देह-मन की उस व्यथा में चन्दन मुँह के बल लेट गया और दोनों हाथों से आँखों को कसकर दबाकर उसने सिर तकिये में गढा लिया।

गरम हवा में धीरे-धीरे ठंडक आने लगी।
चित हो चन्दन ने आँखे खोलकर देखा तो भोर हो रही थी, और घर की ओर से कोई खण्ड की ओर आ रहा था।
धुंधलके में पहचाना तो न जा सका, किन्तु आदमी पास आता गया।
चन्दन वैसे ही आँखे खोलकर पड़ा रहा।
आदमी और पास आया तो चन्दन ने चाल से पहचाना, ये तो भईया हैं।
और भईया अपनी खाली खाट पर चुपचाप आकर लेटने को बैठे कि खटिया का कोई बंद पट से टूट गया।

चन्दन को सबकुछ समझ में आ गया।
जी हुआ की पके अँगूठे को चारपाई की पाटी पर कसकर पटक दे।

– केशव प्रसाद मिश्र

* रामू ओंकार की पहली पत्नी रूपा का लड़का है, रूपा की एक हादसे में मृत्यु हो चुकी है।

क्रमशः….

#कोहबर_की_शर्त
#खंड_३_२

सात-आठ दिनों के भीतर-भीतर, न्यौते में आये हुए सभी स्त्री-पुरुष विदा हो गए।
गुंजा इस चिर-परिचित घर में अकेली हो गई।
घर की बहुत सी चीजें जहाँ जैसे रख गई थी, वैसे ही मिलीं।
इसलिए काम-धाम शुरू होने में कोई कठिनाई नहीं हुई।
सभी कुछ वैसे ही था, किन्तु वह स्वयं ही बदल गयी थी।
मन की सारी उमंगें, सारे उल्लासों को जैसे पाला मार गया था।
घर के काम-काज अपने आप ही शुरू हो गए।
बन्दिनी राजकुमारी की तरह गुंजा अपने ही घर में कैद कर दी गई।
बुझी-बुझी सी, एक अजीब सी विवशता में वह जिन्दगी की राह पर चल पड़ी।

सुहागरात को ओंकार ने पूछा ,”घर तो जाना चिन्हा है, लेकिन उदास क्यों हो ?”
पति के बगल में चारपाई पर बैठी हुई गुंजा-एकाएक भरभराकर रो पड़ी।
रोकने की बहुत कोशिश के बावजूद भी आंसू टपटपा ही गए|
“मेरा तो ब्याह करने का मन ही नहीं था गुंजा, लेकिन रामू का मुँह देख बस न चला…..सोचा, तुमसे अधिक रामू के लिए उसका अपना कौन होगा ?
घर तुम्हारा देखा सुना था, इसलिए और भी मैं झुक गया।
यह भी सोचा, “बाद में अगर ब्याह करना ही पड़ा, तो कौन जाने कैसी लड़की मिले!”

गुंजा को जैसे किसी विषैले नाग ने सूंघ लिया।
वह ऊपर से निचे तक काँप गई।
फूल-सी खिली कोमल देह एकदम स्याह, झाँवर हो गई।
देह पसीने से तर हो गई।
बैठी-बैठी गुंजा खाट पर ढह गई।
ओंकार घबरा गया।
मुँह पर पानी के छींटे दिए और खड़े होकर भरपूर शक्ति से उसकी देह पर हवा करने लगा।

पाँच-सात मिनट के बाद गुंजा ने आँखें खोलीं।
मुँह एकदम पीला हो गया था, हथेली एकदम सफ़ेद, जैसे किसी ने सुई लगाकर हाँथ का रक्त खींच लिया हो।

कुछ स्वस्थ हुई तो ओंकार ने पुछा,”क्या बात है?”
“पता नहीं, जैसे चक्कर आ गया।”
“पहले भी कभी ऐसे हुआ था ?”
“हाँ, एक बार चौबेछपरा में हुआ था, ब्याह के दिन, जिस समय सगुन उठा था।
घर में बैठी थी, तुम्हारे नाम का जैसे ही सगुन उठा कि लगा, मेरी देह में से जैसे कोई कुछ निकालकर भाग चला।
आँखों के आगे अँधेरा छा गया।
दूसरी बार आज हुआ है।

ओंकार किसी गहरी चिंता में डूब गया।
“चन्दन का अँगूठा कैसा है ?” गुंजा ने पूछा।
“अभी तो वैसा ही है।
पक जाने से पीड़ा हो गई है, मैंने कहा कि घर ही चलकर रहो, लेकिन वह तैयार नहीं हुआ।
बोला, बहुत असुविधा होगी।”

गुंजा चुप लगा गई।
भोर होने से पहले ही ओंकार घर से निकल आया और अपनी चारपाई पर लेट गया था।
बाहर स्वच्छ, ठण्डी बयार लगी थी, किन्तु उसे नींद नहीं आई।
एक अजीब-सी मानसिक बेचैनी होने लगी।
करवट घूमकर देखा, तो चन्दन अपनी खाट पर बैठकर, चुपचाप पूरब की ओर ताक रहा था।

– केशव प्रसाद मिश्र

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