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इन दस दिनों में गुंजा के दसों कर्म हो गए..

नदिया के पार फिल्म की पात्र गुंजा।
नदिया के पार फिल्म की पात्र गुंजा।

केशव प्रसाद मिश्र के उपन्यास कोहबर की शर्त के हिस्से क्रमशः आपको हम पढ़वा रहे हैं..आज दो खंड.. ये क्रम जारी है। कोहबर की शर्त उपन्यास पर प्रसिद्ध हिंदी फिल्म नदिया के पार का निर्माण हुआ था। 

 

चन्दन का पैर ठीक होने में लगभग दस दिन लग गए।
किन्तु इन दस दिनों में गुंजा के दसों कर्म हो गए।
वह छटपटाकर रह गई।
कब चन्दन घर आये कि वह देखे !
ओंकार के हाथ खाना भेजती तो तड़पकर रह जाती।

रामू कुछ-कुछ बोलने लगा था, चन्दन उससे बाते करता – खाने के बारे में, दूध के बारे में, सोने के बारे में।
रामू एक-एक बात गुंजा से कहता, जब न कहता तो गुंजा खोद खोद कर पूछती।

सवेरे ओंकार दाना-भूसी लेने गया तो उसने गुंजा को बता दिया कि आज चन्दन यहीं खाना खाने आएगा, तो गुंजा की ख़ुशी का ठिकाना न रहा।
बड़ी रूचि से, चन्दन को भानेवाली चीजें बनाई।
समय से एक घंटा पहले ही भोजन तैयार कर, लीप-पोत कर पीढ़े रख, पति और देवर के आने की प्रतीक्षा करने लगी।

चन्दन नहा-धोकर ओंकार की प्रतीक्षा में खण्ड के आगे, नीम के पेड़ तले बैठ गया।
ओंकार कहीं से लौटा, तो चन्दन को बैठा देख बोला,”तुम बैठे क्यों हो, रामू के साथ जाकर खा क्यों नहीं आते ? मुझे तो थोड़ी देर लगेगी।”

“अभी तो मुझे भूख भी नहीं लगी है, नहा-धो लो तो साथ ही चलेंगे।
रामू मुझसे तो चलेगा भी नहीं।
अंगूठे पर जोर पड़ता है तो दुखने लगता है।”

ओंकार चन्दन का मुँह देखने लगा।
“हाँ, मैं ठीक कह रहा हूँ, मुझे अभी भूख नहीं लगी है।
जाओ, नहा-धो लो।”
चंदन ने भाई से फिर कहा।
ओंकार नहाने -धोने में जुट गया।

किवाड़ बजे, गुंजा बिजली की स्फूर्ति से उठकर झाँकने लगी।
आँगन का आदमी रसोईघर के दालान से ही दिखने लगता था।
गुंजा ने देखा – आगे बाप के कंधे पर रामू , पीछे साध-साधकर पैर रखते हुए चन्दन आ रहा था।

क्षणभर को गुंजा देखती ही रह गई।
ओंकार और चन्दन रसोई घर के आगे वाले दालान में पहुँच गए।
पक्के चबूतरे पर पैर धोने के लिए दो लोटों में पानी रखकर गुंजा झुककर चन्दन का अँगूठा देखने लगी।
चन्दन को लगा उसकी आँखे मुँद जाएँगी।
वह दीवार का सहारा ले खड़ा हो गया।
गुंजा चन्दन का अँगूठा अच्छी तरह देखने लगी।

“अब भी दुखता है ?” गुंजा ने पुछा।
“ऐसे नहीं, दबाने से दुखता है।”
और पैर धोकर वह पास वाले पोधे पर बैठ गया।
“अरे, तुम उधर वाले चौड़े पीढ़े पर बैठो, यह तो पतला, इस पर मैं बैठूँगा।”
ओंकार ने कहा।

“एक ही बात है, अब तो बैठ गया|” चन्दन बोला।
“बैठ गए तो गया ,उठो, आराम से बैठकर खाओ।”
ओंकार ने चन्दन की बाँह पकड़कर उठा दिया।
विवशता में चन्दन वहीँ गुंजा के पास वाले पीढ़े पर बैठ गया।

आँखे गडाये चन्दन चुपचाप खाने लगा।
खाते समय, थाली में कोई चीज घटने पर चन्दन कभी मांगता नहीं था,गुंजा इसकी आदत जानती थी।
आज खाते -खाते एकाएक तरकारी की माँग कर बैठा।

” अरे चन्दन, आज क्या हुआ ? नयी बात।”
ओंकार ने मुस्कुराते हुए कहा।

“कुछ भी नहीं, हुआ क्या ?”
चन्दन चुपचाप खाने लगा।
गुंजा ओंकार की आँख बचाकर रह-रहकर चन्दन को ताक लेती थी।
किन्तु एक बार भी चन्दन ने सिर उठाकर गुंजा की ओर नहीं देखा।
खाया और हाथ धोकर भाई के पीछे-पीछे खण्ड की ओर निकल गया।

दोनों के बाहर होते ही, गुंजा ने चन्दन की जूठी थाली में खाना परसा और खाने लगी।
धीरे-धीरे, चबा-चबाकर स्वाद लेते हुए….मन की गंगा अनायास ही बहने लगी, बलिहार, चौबेछपरा, सोना का जल, करइल माटी का ताल सब पट गए।

जब तक अँगूठे का घाव था,चन्दन निश्चिन्त होकर खाट और खण्ड तक सीमित था।
अब चलने-फिरने लायक हुआ, तो उसके सामने एक समस्या आ खड़ी हुई।
पर जाने में वह और भी संकोच में पड़ गया, आखिर वह गुंजा को अब क्या कहकर पुकारे !
भाई ओंकार के साथ रहता तो रामू के माध्यम से वह गुंजा से कुछ मांग लेता।
लेकिन अकेले रहने पर…..!
वैसे अकेले आने में प्रायः वह कतराता रहता बहुत लाचारी में अकेले आना ही पड़ता, तो जल्दी से जल्दी वह बाहर भाग जाने की ताक में लगा रहता।
गुंजा देखती, समझती, किन्तु चुपचाप मुँह बंद किये दस पंद्रह दिन तक सहती रही, भीतर ही भीतर सुलगती रही, कलपती रही।

एक दिन ओंकार को कहीं जाना था, सो उसने कुछ जल्दी नहा-धोकर भोजन कर लिया।
बाद में रामू के साथ चन्दन पहुंचा।
निकसार का द्वार तो खुला था, किन्तु चौके में पहुँचने के लिए जिस घर से होकर जाना पड़ता था, उसका द्वार जान बूझकर गुंजा ने बंद कर दिया था।
आज पहली बार ऐसा हुआ था।
चन्दन ठिठक गया, रामू से बोला,” पुकार – मौसी !”
अपनी तोतली आवाज में रामू ने एक-दो बार मौसी-मौसी की आवाजें लगायीं, किंतु कोई उत्तर न मिला।
फिर चन्दन ने जंजीर खटखटाया, उसका भी कोई असर न हुआ।
हारकर उसने पुकारा,” भऊजी !”

चन्दन की बोली समाप्त हुई नहीं की खडाक से दरवाजा खुल गया, चौखट के बाहर चन्दन और भीतर कड़ी गुंजा एक-दुसरे को ताकने लगे।
गुंजा चन्दन को अपराधी की भांति देख रही थी।
चन्दन सर झुकाये आगे बढ़ने को राह पाने की प्रतीक्षा में खड़ा रहा।

गुंजा एकाएक हट गयी।
चन्दन आगे बढ़ गया।
बाल्टी में पानी लाया पैर धोने लगा, तो गुंजा लपककर उसका पैर पकड़ धोने को बैठ गयी।

चन्दन ने झटके से पैर खींचना चाहा, किन्तु गुंजा की पकड़ ऐसी थी कि पैर छुट न सका।
चन्दन ने झुककर गुंजा के दोनों हाथ पकडे और उससे पैर छुडाते हुए बोला,” नहीं-नहीं, अब पैर न छुओ, अब तुम बड़ी हो गई, भौजाई !”

“एकाएक इतना बदल जाओगे, चन्दन !
भगवान ने तो मारा ही, अब तुम भी चोट करोगे !”

“जब भगवान ही ने बदल दिया, तो उसके आगे हम कहाँ टिकेंगे, भऊजी !”

“सुनो, चन्दन !” गुंजा आहत होकर बोली.” मेरी एक विनय सुनो।”
“विनय-सिनय नहीं, जो कहना हो सीधे से कहो !”
” बिना भऊजी कहे भी तो काम चल सकता है ।”
चन्दन ने कोई उत्तर नहीं दिया।
गुंजा थाली परोसने के लिए रसोई घर में चली गई।

चन्दन खाने लगा।
गुंजा पास में बैठकर पंखा झलने लगी।
रामू खेलते-खेलते चन्दन की बगल में सो गया था,” इसे हटा के खटिया पर सुला दो ।”
वह बोला।
गुंजा रामू को खाट पर सुला कर लौटी, तो चन्दन ने तरकारी माँगी।
“पहले तो खाते समय अपने से कभी कुछ नहीं माँगते थे, अब क्या मुझ पर से इतना विश्वास उठ गया है चन्दन ?”

” नहीं-नहीं ये बात नहीं है।”
” तो फिर क्या बात है, एकाएक इतना क्यों बदलते जा रहे हो ?”
मुँह में डालने के लिए हाथ का उठा हुआ कौर हाथ में ही रह गया।

“पहले की बात है, जब भौजी आयी थीं, ऐसे ही खाते समय कुछ घट गया, दो तीन बार माँगा; भऊजी किसी काम में बझी थीं, सुना ही नहीं, फिर वैसे ही उठ गया।
तब से प्रण किया की अब खाते समय घटने पर कभी किसी से माँगूँगा नहीं।
भऊजी ने बाद में जाना तो बहुत रोईं, लेकिन सोच लिया तो सोच लिया।
खाते समय तभी से, कभी वे मेरे सामने से हटी नहीं।
लड़कपन को क्या कहूँ, उनसे बहुत खिसिया जाता था।
लेकिन मेरी वह जिद बड़ी अशुभ निकली, भऊजी चली गईं।
तुम आयीं, तो अपने मन के भय से वह प्राण मैंने तुम्हारे सामने तोड़ दिया ।”

गुंजा चन्दन का मुँह ताकने लगी।
फिर गुंजा बोली,”तुम्हारा बहुत बड़ा भरोसा था चन्दन, मैं सोचती थी की मेरे नेह छोह में यदि बल होगा तो तुम्हे पाऊँगी ही।
बाबू ब्याह तय कर लौटे तो जी हुआ तुलसी के चबूतरे को अंकवारि में भर लूँ।
चन्दन, मैं आसमान में पहुँच गयी, लेकिन सगुन में पहुना का नाम सुना तो धरती पर आ गिरी।
आज सोचती हूँ की आदमीं का भाग्य ही बली होता है।
हाँ, कभी-कभी, बहुत चाह कर के भी, मन को बोध नहीं होता, कोई जवाब नहीं मिलता, चन्दन !
मैं तो परबस थी लेकिन तुम कैसे मान गये ?”

” जिन्दगी में नेह-छोह ही तो सब कुछ नहीं होता, गुंजा !
जिस भाई ने बेटे के सामान पाला-पोसा , उसके आगे मैं मुँह खोलकर कहता की भईया, तुम अपना ब्याह कहीं और करो ! गुंजा, तुम तो बाद में आई हो, आँख खोली तो पहले भईया को जाना।”
चुप लगाकर चन्दन गुंजा को देखने लगा।
घर में एकदम निस्तब्धता भर गयी थी।
चन्दन फिर कहने लगा, ” लेकिन कहीं तो तुम्हारा ब्याह होना ही था।
मान लो, बलिहार न आकर किसी और गाँव चली जातीं तो !”

गुंजा बोली, ” तब चन्दन, जल में खड़े होकर कपडा धोनेवाले धोबी सी , प्यास से मरनेवाली यह गति तो मेरी न होती !”
” अब तो दिन काटने ही हैं गुंजा, चाहे मैं चूका या तुम चूक गयीं।”
“यह तो सगुन में पहुना का नाम सुनते ही, कोई तमाचे मारके कह गया।
और मैंने भी सोचा की यदि दुःख ही भोगना है, तो दुःख देनेवाली आँखों के सामने सही…।”
गुंजा की सारी पीड़ा आँखों में उभर आयी, ” जीने के लिए हजार बहाने होते हैं चन्दन, लेकिन मरने के लिए….एक भाई धर्मराज थे, जिन्होंने दुसरे भाइयों का ख़याल न करके द्रौपदी को जुए के दाँव पर लगा दिया, और एक भाई तुम हो।
तुम्हे तो मैं धर्मराज से भी बड़ा मानती हूँ।”
फिर एक लम्बी साँस खींचकर गुंजा बोली, ” और यह बात तो भूलना ही पड़ेगा, कल को तुम्हारा ब्याह होगा, बहू आएगी, घर- गृहस्थी में समा जाओगे, फिर कौन किसको याद आएगा ?….”

– केशव प्रसाद मिश्र

#कोहबर_की_शर्त
#खण्ड_३_४

चंदन
नदिया के पार फिल्म का पात्र चंदन

क्वाँरी गुंजा के सपने देखनेवाला चन्दन कुछ और था, ब्याह तय हो जाने के बाद से गुंजा के बलिहार आ जाने तक वह कुछ और हो गया था।
गुंजा का ब्याह ओंकार के साथ तय होते ही, मन की सारी करुणा और आँसू एक साथ ही चन्दन पी गया।

भीतर से आग सुलगती थी, ऊपर से चन्दन पानी के छींटे मार-मारकर उसे दबाता जाता था, किन्तु उस आग को दबाने के प्रयास में उठनेवाला धुआँ देह की रग-रग में भरता गया; चन्दन भीतर-भीतर ही झुलसने लगा।

भरे हुए मुँह की हिरन सी, हरदम मुस्कुराती हुई आँखों के नीचे कालापन छाने लगा।
शेर की तरह तानी हुई छाती भीतर को दब गई।
चन्दन अपराधी की तरह नीची नजर किये हुए प्रायः झुककर चलने लगा।
आरम्भ में देह-मन दोनों पर प्रतिक्रिया हुई थी, उसने चन्दन के मन में एक नशा सा भर दिया था।

सबकुछ भूलकर, अपने को ऊपर से पत्थर बना वह भाई के ब्याह में जुट गया था।
और अब सारी पीड़ा, सारा दुःख, घोर मानसिक असंतुलन के बावजूद भी, गरल पिए हुए शंकर की तरह चन्दन अपने को नए सिरे, नए ढंग से तैयार करने लगा।

पैर का घाव अच्छा हो जाने पर, अगम-अथाह सागर-सा चन्दन पहली बार जब गुंजा के सामने पड़ा, तो बड़ी मजबूती से कसा हुआ धीरज का बंधन एकाएक ही तड से टूट गया।
गुंजा की आरत आँखों ने चन्दन को दागना आरम्भ कर दिया।
गुंजा ने चन्दन को अपराधी ठहरा दिया….जो कुछ हुआ था उसका सबका जिम्मेदार !
चन्दन ने बिना किसी विरोध के अपने को दोषी मान लिया और तब से वह भीतर-बाहर और भी छटपटाने लगा, लू के थपेड़ों से गाछ की तरह सूखने लगा।

आषाढ़ लग गया था, लोग भदई बोने की तैयारी करने लगे बैशाख-जेठ की तपन के बाद प्रतीक्षित आषाढ़ की बूँदे चन्दन के तप्त मन को तनिक भी ठंडक न पहुँचा सकी।
उसने जबरदस्ती अपने को खेती के कामों में लगाया।
बोवाई के दिनों, खाने-पीने में ऐसे ही देर सवेर होती है , चन्दन और भी लापरवाह हो गया।
उसकी लापरवाही पर ओंकार झुंझलाता ,डाँटता, किन्तु चन्दन भाई की हर बात, बिना किसी उत्तर या सफाई के सर-माथे पर ओढ़ लेता है।

भदई तो किसी तरह बो दी गई, किन्तु इन दो तीन महीनों में चन्दन के बदले हुए स्वाभाव से ओंकार चिंतित हो उठा।
चन्दन ने घर में आना-जाना कम कर दिया था।
पहले भाई के साथ ही दोनों जून ऐसी खाने की आदत थी कि समय पर चन्दन यदि खण्ड में न रहता, तो ओंकार प्रतीक्षा करता, ओंकार न होता तो चन्दन रूक जाता।
यह समझौता अजीब सी कड़ियों में गुथा हुआ था।
पर अब इसकी एक-एक कड़ी अनायास ही टूट जाती थी।

चन्दन प्रायः भोजन के समय खण्ड में न रहता, ओंकार अकेले ही खा आता।
दिन में दोपहर की बेला ढल जाती, गुंजा चन्दन की प्रतीक्षा में बिना खाए-पीये बैठी रहती।
ओंकार ने गुंजा को कई बार टोका था, किन्तु गुंजा पर इसका कोई असर नहीं हुआ।
देर-सवेर, जब चन्दन के मन में आता, घर चला आता।

गुंजा चुपचाप परस देती, चन्दन बिना कुछ बोले, खाकर पच्छिम की बारी निकल जाता।
गुंजा,ओंकार,चन्दन……तीनो-के-तीनो,एक ही मार से पस्त होकर जैसे भहरा गए थे।
घर की ख़ुशी एक अजीब सी ख़ामोशी धारण करती जा रही थी।

ब्याह के दो-तीन महीनों में ही ओंकार, घर की इस बदलती परिस्थित से गहरी चिंता में डूबने लगा था।
अपना दोष अच्छी तरह समझ लेने के बाद भी उसने सोचा था की समय के साथ, गुंजा और चन्दन का मन घर के काम-काज में लग जाएगा, पीछे का सब कुछ भूल बिसर जाएगा, गुंजा से उसे संतोष हो चला था, किन्तु चन्दन था, जो बुझती आग में जैसे रह-रह कर घी डाल देता था।
गुंजा बुझ-बुझकर सुलग जाती थी।

उड़ने बाले रंगों से बने चित्र की भाँति गुंजा का छीजता हुआ चेहरा और चन्दन के अबोध, उतरे, निर्दोष मुँह का भाव देख, ओंकार भीतर-ही-भीतर मथकर रह जाता।
परिवार के भविष्य की बात सोच-सोचकर वह मन-ही-मन काँप जाता।

जारी…

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