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एमसी-बीसी महिलाओं में लोकप्रियः गालियों के अस्तित्व और विकास की गाथा

parched movie
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मैंने लीना यादव निर्देशित पार्च्ड फिल्म देखी जिसमें राजस्थान के एक गांव की महिलाएं की कहानी को दिखाया गया है जिसमें महिलाओं पर उनके पति और पुरुष वर्ग घोर अत्याचार करते हैं। गाली गलौज, मारपीट से लेकर जबरन सेक्स तक। फिल्म में एक दृश्य है जब फिल्म की मुख्य तीन महिला किरदार शोषित औऱ पीड़ित जीवन छोड़कर भाग आती है स्वतंत्र जीवन जीने की चाह में। अपने पतियों को छोड़कर आ जाती हैं। उसके बाद वो खुलकर मां बहन की गालियां देती हैं। जब आप फिल्म में ये दृश्य देखेंगे तो आपको लगेगा कि ये महिलाएं गालियां देकर स्वतंत्रता का जश्न मना रही हैं। गालियां देकर खुशी साझा कर रही हैं। ये गालियां इन्हे कुंठा से उबारने का माध्यम लगती हैं।

उसके बाद एक बार फिर महिला प्रधान फिल्म वीरे द वेंडिंग में महिला किरदारों के जबान से गालियां दिलवाई गई हैं। फिल्में समाज का नेतृत्व करती हैं और समाज को दिशा देती हैं। आप अक्सर अखबारों में पढ़ते हैं फिल्म देखकर की चोरी, फिल्म देखकर की डकैती, किडनैपिंग या प्रेमिका को भगा ले जाने का प्लान बनाया। ऐसे ही हम सब जब फिल्म देखते हैं उसके किसी एक पात्र में खुद को देखते हैं। हीरोईन में पुरुष और हीरो में महिलाएं अपने साथी की छवि पाती हैं। ये मनोवैज्ञानिक नजरियां है। पुरुष हमेशा से गाली देते रहे हैं। महिलाएं भी देती ही होंगी। पर पुरुषों की अपेक्षा कम। लेकिन अब जो गालियों  और महिलाओं के संबंध को लेकर सुनने में आ रहा है वो ये कि कॉलेज और स्कूल में पढ़ने वाली लड़कियां मां बहन की गालियां सार्वजनिक रूप से दे रही हैं। अंग्रेजी स्कूल की लड़कियां एमसी (मां की गाली को संक्षिप्त रूप) और बीसी बोलती हैं। ये खुलकर बोलती हैं। पढ़ी लिखी महिलाएं, उच्च शिक्षित मेट्रो सिटीज में भी गालियों का चलन महिलाओं के बीच बढ़ा है। सुना है फिल्मकार एकता कपूर मां बहन की गालियां देती हैं। कुछ लोग कह रहे हैं आत्मविश्वास और पुरुषों से समकक्षता के चलते महिलाओं में गाली विकसित हो रही हैं। जो भी हो महिलाओं में गालियों का बढ़ता प्रचलन किसी भी लिहाज से उचित नहीं कहा जा सकता।

चूंकि गाली शास्त्र सदियों से चलता आ रहा है और चलता जाएगा तो इस संदर्भ में बीबीसी समेत कुछ खोजी पत्रकारों की रिपोर्ट हम आपके लिए लाए हैं…

आप बेहतर समझ पाएंगे गालियों के अस्तित्व और विकास की गाथा…

आखिर क्यों सबसे ज्यादा गालियां औरतों को लेकर बनीं? क्या है वजह?

छोटी सी बात हो या कोई बड़ी लड़ाई सबसे पहले आदमी के मुख से अपशब्द ही निकलते है क्या आपने कभी सोचा है कि लोग गालियां क्यों देते हैं ? कोई आपको कहे कि सीधे साधे लोग गाली नहीं देते। पर ऐसा नहीं है। दुनिया में शायद कोई ऐसा नहीं है जो गाली न देता हो या जिसने कभी गाली न दी हो।

आदमी और औरत, बच्चे-बूढ़े, प्रोफ़ेसर डॉक्टर  और साधु-महात्मा, नेता-अभिनेता, अमीर-गरीब, विद्वान-मूर्ख, हिन्दू, मुसलमान, सिख-ईसाई सब गाली देते हैं। दुनिया में गाली देने का चलन कब शुरू हुआ? दुनिया की सबसे बुरी गाली क्या है? क्या सारी दुनिया में एक जैसी गालियां होती हैं? अगर दुनिया के समाजों का विकास अलग-अलग हुआ तो हमारी गालियों में इतनी समानता कैसे आ गई? इन बातो के बारे में आज हम आपसे बात करेंगे।

आखिर क्या है गाली का इतिहास

इतिहासकार सुसन ब्राउनमिलर ने बलात्कार के इतिहास पर एक किताब लिखी है, ‘Against Our Will: Men, Women And Rape’। उनका कहना है बलात्कार की शुरुआत प्रागैतिहासिक काल में हुई। जीवविज्ञानियों के अध्ययनों की चर्चा करते हुए वे बताती हैं कि अपने प्राकृतिक वातावरण में कोई पशु (animal) बलात्कार नहीं करता। पर इंसानों में मर्दों के रेप करने की क्षमता शरीर विज्ञान का मूलाधार है। क्योंकि यह पुरुषों और औरतों की लैंगिक बनावट से जुड़ी है, जहां औरतों की बनावट कमजोर है।

किसी भी कारण अगर उनकी मौजूदा शारीरिक, जीववैज्ञानिक बनावट कुछ और होती, तो कहानी कुछ और ही हो जाती। आग और पत्थर के हथियारों की खोज के साथ-साथ, प्रागैतिहासिक मनुष्य की यह जानकारी कि उसके अंग डर पैदा करने के लिए एक हथियार की तरह इस्तेमाल किए जा सकते हैं, उसकी सबसे बड़ी खोज थी। जब मर्दों को पता चला कि वे बलात्कार कर सकते हैं तो वे इसके साथ आगे बढे। बहुत-बहुत बाद में, खास हालात के चलते वे रेप को अपराध मानने के लिए तैयार हुए। संभवतः यहीं से गालियों और अपमानसूचक शब्दों की भी शुरुआत हुई हो।

आखिर क्यों देते है हम गाली ?

उनके मुताबिक गाली देकर हम किसी का अपमान करते हैं, अपना गुस्सा/खीझ उतारते हैं या मजाक उड़ाते हैं। आमतौर से ये सारे गुण, जैसे सम्मान, गुस्सा या मजाक मर्दों के ‘अधिकार’ माने जाते हैं। ऐसे में गाली अक्सर मर्दों की चीज बन जाती है। इसीलिए ज्यादातर गालियां मर्दों के अपमान/नुकसान को केन्द्रित कर बनी हैं। भले ही ऐसा करने में औरतों के शरीर या जानवरों की उपमाओं का इस्तेमाल किया जाता हो।

गाली और हम

एक आदर्श समाज में गाली के लिए कोई जगह नहीं होनी चाहिए, पर हम जानते हैं ऐसा सिर्फ कल्पनाओं में होता है। लोग एक-दूसरे को जलील करने के तरीके खोज ही लेते हैं और हमेशा करते रहेंगे। इसमें शायद किया ये जा सकता है कि आजकल की संवेदनशीलता और नीतियों, नैतिकताओं व संस्कृति से तालमेल बिठाते हुए अपना गालियों का सॉफ्टवेयर बदल लें। देखा जाय तो गालियों की अब तक की दास्तान असल में लैंगिक, जातीय और सामुदायिक उत्पीड़न का भी इतिहास है। मानव-शरीर के अंगों व उनसे जुड़ी प्रक्रियाओं की कूड़ा-कर्कट और गन्दगी से तुलना हो या मासूम जानवरों के नाम पर बनने वाली गालियां हों, अब बदलाव का वक़्त आ चुका है।

आज कल जिस तरह परिवार के सदस्यों से प्यार करने की बजाय लोग अपने बैंक खातों, कारों, महंगे मोबाइल फोनों, जूतों-कपड़ों से ज्यादा प्यार करने लगे हों तो यह कहना कैसा रहेगा, ‘तेरी iPhone की तो’, या ‘तेरी ऑडी की’ या ‘तेरी स्कोडा की’…’बजा दूंगा’।

गालियों की दिलचस्प दुनियां की सैर पर चलें

हम सब कभी न कभी गाली-गलौज करते हैं. कभी ग़ुस्से में, तो कभी दोस्तों के बीच हंसी-मज़ाक़ में. आम-तौर पर बात-बात पर गाली देने वालों को जाहिल, गंवार माना जाता है.

अगर कोई बोलचाल में गालियों का ज़्यादा इस्तेमाल करता है तो उसे भरोसे के क़ाबिल नहीं माना जाता. कुल मिलाकर, गाली-गलौज करना अच्छा नहीं माना जाता है.

जो भी ये करता है उसकी इमेज बाक़ी लोगों की नज़र में अच्छी नहीं होती.

मगर, दुनिया में शायद ही कोई ऐसा इंसान हो, जिसने कभी न कभी गालियां न निकाली हों. रिसर्च बताते हैं कि इंसान आम तौर पर छह बरस की उम्र से ही गालियां देना शुरू कर देते हैं.

यही नहीं, हर आदमी अपनी ज़िंदगी का औसतन आधा से पौन फ़ीसदी वक़्त गालियां देने में बर्बाद करता है.

चौंक गए न! गालियों की बात से चौंकने वाली सिर्फ़ यही बात नहीं. जिसे हम गंवारू भाषा कहकर नापसंद करते हैं, असल में वो गालियां देना कई बार फ़ायदे का सौदा भी हो सकता है. कई बार दूसरों से अपनी बात मनवाने के लिए तो कभी दिल के दर्द दूर करने के लिए.

तो चलिए आज आपको गालियों की दुनिया की दिलचस्प सैर कराते हैं.

पहली बात तो ये कि आम बोलचाल के लिए हम अपने दिमाग़ के जिस हिस्से की मदद लेते हैं, गाली देने में उस हिस्से का कोई रोल नहीं होता. यानी गालियों की हमारे दिमाग़ के अंदर ही अलग दुनिया है.

मनोवैज्ञानिक और लेखक रिचर्ड स्टीफ़ेंस का कहना है कि हमारी ज़ुबान को कंट्रोल करने वाले दिमाग़ का हिस्सा अलग है, जो इंसान के विकास की प्रक्रिया में बाद में विकसित हुआ.

वहीं, दिमाग़ के जिस हिस्से से गालियां निकलती हैं वो इंसान के दिमाग़ का शुरुआती, पुराना इलाक़ा है. स्टीफ़ेंस बताते हैं कि जिन लोगों को आम ज़ुबान बोलने में दिक़्क़त होती है, वो भी फ़र्राटे से गालियां दे लेते हैं, गाना गा लेते हैं.

कई लोगों को तो गालियां निकालने का ख़ब्त होता है. इसका सीधा ताल्लुक़ हमारे दिमाग़ की बनावट से है.

अलग-अलग ज़ुबानों में गालियों को लेकर अलग-अलग सोच भी है. जैसे अंग्रेज़ी में पहले, गाली-गलौज या कोसने का सीधा ताल्लुक़, धार्मिक भावनाओं से था.

मध्य युग में अंग्रेज़, धार्मिक बातों का मज़ाक़ उड़ाने या कोसने को बहुत बुरा मानते थे. उन्हें गालियां देने के बराबर ही माना जाता था.

आज, शरीर के हिस्सों का नाम लेकर मज़ाक़ बनाना ज़्यादा बुरा माना जाता है. मगर, उस वक़्त औरतों और मर्दों के अंगों को लेकर भद्दे मज़ाक़, गाली देने के दायरे में नहीं आते थे.

ब्रिटिश लेखिका मेलिसा मोर ने गालियों पर किताब लिखी है. वो कहती हैं कि पहले लोगों के बीच इतनी दूरियां नहीं थीं. अक्सर वो एक दूसरे को बिना कपड़ों के देखते थे. इसीलिए एक दूसरे के बदन को लेकर मज़ाक़ बनाने को गाली के तौर पर नहीं गिना जाता था.

हां, धार्मिक भावना पर चोट, ज़रूर गंवारू मानी जाती थी. हालांकि यूरोप में पुनर्जागरण या रेनेसां के दौर के बाद, गालियों का दर्जा बदल गया.

धार्मिक बातों की बजाय, औरतों-मर्दों के शरीर के अंगों के हवाले से गंदी बात कहना ज़्यादा बुरा माना जाने लगा.

वहीं एशिया के तमाम देशों में गाली-गलौज का सीधा ताल्लुक़, सोसाइटी में आपकी हैसियत, आपके पुरखों के रसूख़ से जोड़कर देखा जाता है.

माना जाता है कि जापानी ज़ुबान में गालियां नहीं होतीं. ये धारणा एकदम ग़लत है. उनके यहां सेक्स को लेकर, इतनी गालियां हैं कि गिनना मुश्किल.

गालियों की दुनिया का दायरा इतना बड़ा है कि बोल और सुन न सकने वालों की सांकेतिक ज़ुबान में भी इसका दख़ल है. इशारों में थोड़े से हेर-फेर से ही सलीक़े की बात कहने वाला जुमला, गाली में तब्दील हो सकता है.

इंसान को गंवारू ठहराने वाली गालियां कई बार बड़े काम की हो सकती हैं. कुछ हालिया रिसर्च से ये बात सामने आई है.

जब हम गालियां देकर बात करते हैं तो इसके हवाले से हम अपना ग़ुस्सा, तकलीफ़ या चिढ़ ज़ाहिर करते हैं. गाली देकर, हम सामने वाले को ये बताते हैं कि उसकी बात, या तरीक़ा हमें पसंद नहीं आया. इस तरह हम हिंसक बर्ताव करने से बच जाते हैं.

गालियों के ज़रिए जो बात हम कहते हैं, वो कई बार आम बोलचाल से ज़्यादा असरदार साबित होती हैं. हम अच्छे से अपनी बात दूसरों को समझा पाते हैं.

नेताओं पर ये बात ख़ास-तौर से लागू होती है. 2014 में इस हवाले से बड़ी दिलचस्प रिसर्च हुई थी. एक ब्लॉग में नेताओं के बारे में कई क़िस्से लिखे गए थे.

जिस भी कहानी में नेता को गाली-गलौज करते हुए बताया गया था, उस पर लोगों ने ज़्यादा यक़ीन किया. हालांकि, इससे लोगों के वोटिंग के इरादे पर कोई फ़र्क़ नहीं पड़ा.

साफ़ है कि गाली देने वाले नेता पर लोगों ने इसलिए भरोसा किया कि वो बनावटी नहीं लगा. एक बात और है.

ऑनलाइन बात करने में लोग बेहूदा ज़ुबान का ज़्यादा इस्तेमाल करते हैं. इसलिए भी ब्लॉग में गाली-गलौज वाली कहानी पर लोगों ने ज़्यादा यक़ीन किया. एक रिसर्च के मुताबिक़, ट्विटर पर औसत से क़रीब 64 फ़ीसदी ज़्यादा गालियां देते हैं लोग.

मनोवैज्ञानिक रिचर्ड स्टीफ़ेंस ने इस बारे में एक और दावा किया है. वो कहते हैं कि बात-बात पर गालियां देने वालों की दर्द बर्दाश्त करने की क्षमता ज़्यादा होती है. उन्होंने कॉलेज के छात्रों के साथ एक प्रयोग किया. बेहद ठंडे पानी में उनका हाथ डलवाया और कहा जो दिल में आए वो बोलो.

प्रयोग में शामिल जिन छात्रों ने गाली-गलौज की वो ज़्यादा देर तक ठंडे पानी में हाथ रख पाए. साफ़ है कि गाली देने की वजह से ठंडे पानी से होने वाले दर्द को बर्दाश्त करने में उन्हें मदद मिली. इन लोगों के दिल की धड़कनें भी बढ़ गईं.

मतलब गाली देना एक तरह से पेनकिलर दवा खाने जैसा था, इन छात्रों के लिए.

वैसे, गालियां देकर आप कितनी राहत महसूस करते हैं, ये एक और बात पर निर्भर करता है. वो ये कि आप गालियों को कितना बुरा मानते हैं.

बचपन में आपको गाली देने के लिए कितनी बार मार पड़ी. अगर मां-बाप ने गाली देने के लिए बचपन में आपको ज़्यादा पीटा है, तो गालियों का आप पर ज़्यादा असर होगा. यानी ग़ुस्से में गालियां देने से आपको दर्द से ज़्यादा राहत महसूस होगी.

यूं तो गाली देना गंवारपन माना जाता है. मगर न्यूज़ीलैंड में हुई एक रिसर्च में इसे विनम्रता का प्रतीक माना गया. वेलिंगटन की विक्टोरिया यूनिवर्सिटी में इस बारे में एक रिसर्च हुई.

ये शोध, कुछ फ़ैक्ट्री मज़दूरों पर हुआ. ये लोग आपस में तो ख़ूब गालियां देकर बात करते थे. मगर दूसरी टीम के सदस्यों के साथ ऐसा नहीं करते थे.

आपस में गाली देकर बात करने को ये अच्छी और ईमानदार बातचीत मानते थे. इससे एक दूसरे के प्रति लगाव ज़ाहिर होता था. काम का तनाव दूर होता था.

ये तो हुई गाली-गलौज के फ़ायदे की बात. मगर, जो लोग गालियां निकालकर बात करते हैं, उनके बारे में लोगों की राय क्या होती है?

हम सब अपने बड़ों के सामने, बॉस के सामने गालियां देने से बचते हैं कि इससे हमारी इमेज ख़राब होगी. गाली देने पर हमें जाहिल, बेसलीक़ा माना जाएगा. कहा जाएगा कि तमीज़ नहीं, तहज़ीब नहीं.

मगर, हालिया रिसर्च इसके उलट कहानी कहते हैं. अब, गालियां देने को कम पढ़े लिखे होने, तमीज़ न होने से जोड़कर नहीं देखा जाता.

ब्रिटेन की लैंकेस्टर यूनिवर्सिटी में 2004 में हुई रिसर्च बताती है कि आज पढ़े-लिखे अमीर तबक़े के लोग ज़्यादा गालियां देते हैं, बनिस्बत, कम पढ़े-लिखे ग़रीब लोगों के. ऐसे लोगों को गाली-गलौज के इमेज पर असर की भी परवाह नहीं होती.

लेखिका मेलिसा मोर कहती हैं कि ज़रा कल्पना कीजिए. किसी जगह सब पढ़े-लिखे समझदार लोग बैठे हैं.

तमीज़दार दिखने की फ़िक्र में कोई खुलकर बोल नहीं पा रहा, दिल की भड़ास नहीं निकाल पा रहा. ऐसे में खुलकर, ईमानदारी से बात ही नहीं होगी. सब चुपचाप बैठे होंगे, बनावटी मुस्कान बिखेरते.

वो कहती हैं कि गालियां देना, हमारे इंसान होने की निशानी है. अपनी भड़ास निकालने के लिए ये हमारी बुनियादी ज़रूरत है.

तो अगली बार, अगर आपको ग़ुस्सा आए, तो ख़ुद को रोकिएगा नहीं. खुलकर अपनी भड़ास निकाल लीजिएगा. आप गंवार नहीं कहलाएंगे.

 

ब्रिटिश लेखिका मेलिसा मोर ने गालियों पर किताब लिखी है. वो कहती हैं कि पहले लोगों के बीच इतनी दूरियां नहीं थीं. अक्सर वो एक दूसरे को बिना कपड़ों के देखते थे. इसीलिए एक दूसरे के बदन को लेकर मज़ाक़ बनाने को गाली के तौर पर नहीं गिना जाता था.

हां, धार्मिक भावना पर चोट, ज़रूर गंवारू मानी जाती थी. हालांकि यूरोप में पुनर्जागरण या रेनेसां के दौर के बाद, गालियों का दर्जा बदल गया.
धार्मिक बातों की बजाय, औरतों-मर्दों के शरीर के अंगों के हवाले से गंदी बात कहना ज़्यादा बुरा माना जाने लगा.
वहीं एशिया के तमाम देशों में गाली-गलौज का सीधा ताल्लुक़, सोसाइटी में आपकी हैसियत, आपके पुरखों के रसूख़ से जोड़कर देखा जाता है.
माना जाता है कि जापानी ज़ुबान में गालियां नहीं होतीं. ये धारणा एकदम ग़लत है. उनके यहां सेक्स को लेकर, इतनी गालियां हैं कि गिनना मुश्किल.
वो कहती हैं कि गालियां देना, हमारे इंसान होने की निशानी है. अपनी भड़ास निकालने के लिए ये हमारी बुनियादी ज़रूरत है.

यहां कुछ प्रतिष्ठित लोगों के वर्जन भी हैं…


गाली देना नजदीकी की भी निशानी होती है। हम जिसके बेहद करीब होते हैं उस से ऐसी भाषा मे बात करते हैं। हम हिन्दू कॉलेज के समकालीन लोग जब आपस में मिलते हैं तो खुशी के मारे इतनी गालियां एक दूसरे को देते हैं कि आसपास के लोग सन्न रह जाते हैं। यह हमारे लिए आपसी प्रेम और कुर्बत की पहचान है।

  • प्रभात रंजन, प्रोफेसर जाकिर हुसैन कॉलेज दिल्ली विश्विविद्यालय

गाली के सामाजिक पहलू पर सीएसडीएस में कुछ साल पहले एक शोध हुआ था। वैसे गालियों का मनोविज्ञान समय और समाज सापेक्ष होता है। और बहुत कुछ व्यक्तित्व पर भी निर्भर करता है। मैं पहले बहुत गाली दिया करता था लेकिन अब नहीं दे सकता। क्योंकि खुद को इसी तरह ढाल लिया है।

  • प्रेमचंद गांधी

असम की लोकभाषा में कुछ गालियां प्यार जताने के लिए भी बोली जाती हैं।

मेरी नज़र में गालियां भी हमारी संस्कृति का हिस्सा है।
गोपियां भी कृष्ण के छेड़ने पर भर भर गालियां देती थीं।
“आज मीठी लगे है तोरी गारी रे..

 बचपन में गांव में देखा था बेटी की शादियों में जब बरात खाने बैठती थी तब महिलाएं ज्योनार के समय भयानक गन्दी गालियां गाती थीं और सारे बराती बड़े खुश होकर हंस- हंस कर सुनते खाते जाते..कोई कोई कहता मजा नहीं आया …और गालियों की बौछार और तेज हो जाती..लड़के वाले पूरी शादी लड़की वालों पर रौब रखते,तरह -तरह की फरमाइश रखते…पर औरतें पहले ही दिन सारा बदला ले लेतीं…समधी की मां,बहन,बूआ,समधन सबको इतनी गन्दी गालियां देकर…रामायण में राम की बरात में भी ज्योनार के समय गाली देने का वर्णन आया है…बचपन में कानों में पड़े उन ज्यौनार गीतों की स्मृति से घबराहट होती थी …लगता था सुन लिया …कुछ पाप हो गया मन करता साबुन लेकर स्मृतियों को धो दूं …बहुत ही गन्दी गालियां जो गांव की बुजुर्ग गा रही थीं…जिनकी बहुत इज्जत करते थे हम…जाने क्या परम्परा है ये…अच्छा है अब शहरों में तो समाप्त हो गई…गांव का पता नहीं

  • उषा किरण खान, मैथिली लेखिका

 विकृतियां हर काम मे समय के साथ आती हैं। ज्यौनार या शादी ब्याह के अन्य अवसरों या पारिवारिक जुटान के समय में गाई जानेवाली गालियों के स्वरूप बेहद आह्लादकारी हैं। हम इन्हें गाते हैं और जब गाते हैं तो मैथिलेतर दर्शक भी मुस्कुराते हंसते हैं।
स्नेहलता लिखते हैं-
“सुनु सखी एक अनुपम घटना
अजगुत लागत भारी हे
खीर खाए बालक जनामाओल
अवधपुर के नारी हे।”
ऐसे गाली गीत हमारे भीतर रस घोलते हैं।
अश्लील गालियों का चलन बाद में शुरू हुआ। यह भी स्त्री मन की सेंसुअलिटी और सेक्सुएलिटी की अभिव्यक्ति है। गाओ और गाकर अपने को रिलीज कर लो। जिनके पति बिदेस हों, देस में भी हो तो जिनकी सूरत देखने को ना मिले, ऐसे में गीत उनके मन की भड़ास निकालने का सर्वोत्तम माध्यम है।
ये गीत आप सामान्य दिन में गाएं। झगड़ा तय है।

  • विभा रानी, लेखिका

 रस्मों-गीतों में पगी गालियां सही हैं या नहीं, यह अलग मुद्दा है, लेकिन वे माहौल बनाने के लिए प्रयुक्त की जाती रही हैं।
वैवाहिक अवसरों पर आंगन में सजने वाली जनाना महफिल में गालियों का गहरा धुआं भर जाता है। इसमें शिक्षित और सम्मानित महिलाएं भी जमकर दांव आजमाती हैं।
सामान्य दिनों में गालियां बकने में न देहाती आगे हैं और न शहरी पीछे। दिल्ली पंजाब में तो हर वाक्य में उपसर्ग प्रत्यय होती हैं गालियां। घर की महिलाओं को भी उसी रौ गालियां देते हैं। और कोई राज्य या भाषा इससे अछूता या पीछे नहीं है। 
मध्यप्रदेश के सतना में एक सज्जन ने करीब 1000 गलियों को अपनी पुस्तक में समाहित किया, लेकिन शासन की ओर से पुस्तक को ही प्रतिबंधित कर दिया गया।

 

लड़की और गाली.

जिस समाज में एक काम महिला करे और वो उसके चरित्र से जोड़कर देखा जाये लेकिन वही काम लड़का करे और उसे नॉर्मल देखा जाए तो लड़कियों को हर उस तरह के एब्नार्मल काम करने की जरुरत है ताकि धीरे धीरे ये बात ख़त्म हो जाए कि हाय! लड़की ने ऐसा किया.
इसी तरह मैं बिलकुल ये उम्मीद नहीं करती की लड़की गालियां ना दे, बशर्ते वो अपनी ही जात(जेंडर) को गाली ना दे. किसी भी सभ्य समाज ही क्यों ना हो, के लोग गुस्से या दूसरे भाव दिखाने के लिए गाली का प्रयोग करते हैं. अब महिलाओं से ये उम्मीद करना कि वो गाली ही ना दे, मुझे नहीं पचती.
ये तो वही बात हुई की तुम लड़कियों हमेशा सभ्य, सुशील, सोफिस्टिकेटेड बनी रहो, चाहे उस समाज के पुरुष कैसे भी हो.

लेकिन, लड़कियों को गाली देने के लिए जेंडर न्यूट्रल गाली बनानी चाहिए. गालियों में पितृसत्ता की बू ना हो.

(गालियां पूरी तरह समाज से ख़त्म ना हो जाए, जब तक के लिए मेरा ये पॉइंट ऑफ़ व्यू है क्योंकि गाली देना बुरी बात तो है ही.)

  • गीता यथार्थ, स्त्री मुद्दों पर लिखती हैं

 

महिला विरोधी गाली देना महिला का ही अपमान है. मैं ये नहीं कह रही कि गाली मत दो. गाली बहुत सी हिंसा से बचाती है. गाली नेचुरल रिएक्शन है. गाली दिए बिना रिलैक्स नहीं हो सकते. मगर हमें बचना चाहिए…mc and bc से .
लड़कियों के मुँह से ऐसी गालियाँ बहुत भाती हैं पुरुषों को. वे तो चाहते ही हैं कि लडकियां स्त्री अंगों का नाम लेकर गाली बके.
हमें उनकी मंशा समझने की जरुरत है. जब दिल्ली आई थी, नयी नयी. होस्टल से निकल कर सीधा महानगर. कई तरह के कल्चरल शॉक लगे, उसमें लड़कियों के मुँह से धाराप्रवाह माँ बहन की गालियाँ भी शामिल थीं. एक सीनियर महिला पत्रकार के मुँह से पहली बार गालियाँ सुनीं और गश खाकर गिर गई. हम होस्टल में लड़कों को गाली – कुत्ता, कमीना , गुंडा, मवाली ..तक ही देते थे. इससे आगे बढ़ने की हिम्मत नहीं हुई.
दिल्ली आते ही एक के बाद एक लड़कियों के मुँह से गालियों के फूल झरते … माँ बहन वाली…
मैं तो अकबका जाती. मुझे उनके चेहरे से अजीब सी आज़ादी की फील आती या मर्दों से बराबरी का अहसास. या जाने क्या…
मुझे लगा- गालियाँ बकने से बराबरी आती है. छोटे शहर की लड़की ने मुँह में गाली भरी… पहले अकेले में अभ्यास किया, दस बार शरमाई , घबराई , फिर गालियाँ जुबान पर चढ गईं. समस्या ये कि मज़े मज़े में कैसे निकालूँ? और ग़ुस्सा किस पर करुं कि गालियाँ निकले. एक दिन बस स्टॉप पर किसी लड़के ने फ़िकरे कसे… गालियाँ और थप्पड़ दोनों तैयार थे. पहले जम के गालियाँ निकाली… फिर लगा, मारने दौड़ूँ.
गालियाँ सुन कर तो वह बेशर्मी से हँसता हुआ चला गया . मैं अवाक् कि इस पर कोई असर क्यों नहीं. मेरे भीतर स्त्री चेतना नहीं जागी थी. गालियाँ गंदी लगती थीं, तब भी और आज भी.
उस दिन के बाद से गालियाँ नहीं दी किसी को. पुरुषो के लिए अलग गालियाँ सोचने में वक़्त लगा. कुछ हम मित्रों ने मिल कर अविष्कार भी किए… मगर दे नहीं पाए.
जब स्त्री चेतना जागी तो समझ में आया कि ये गालियाँ दरअसल हम किसी पुरुष को नहीं, खुद को ही दे रहे होते हैं. पुरुष भी ये गालियाँ निकालते समय अपनी ही माँ बहन का उद्धार करते रहते हैं.
“वीरे दी वेडिंग” फिल्म के ट्रेलर में सोनम कपूर जो बहन की गाली दे रही हैं, मुझे पसंद नहीं आया. क्या इस लड़की को इतनी समझ नहीं कि माँ बहिन की गाली देना, खुद को गाली देने जैसा है. पुरुषवादी गालियाँ स्त्री के मुँह से नये नये आधुनिक बनी लड़कियों का प्रिय शग़ल है. उन्हें कब समझ में आएगी ये बात कि हमें पितृसत्ता की गढ़ी गई गालियों से ही लड़ना है… 

 – गीता श्री, वरिष्ठ लेखिका
आज़कल यह ट्रेंड चल गया है दीदी, नए जमाने की लड़कियां ख़ूब गाली देतीं, हर तरह की। शायद यह भी एक बराबरी का तरीका। और एकता कपूर ने बनाया, उसके बारे में तो सुनते हैं कि वह है गाली एक्सपर्ट वो भी मां बहन टाइप। बढ़िया आलेख आपका। – एक लेखिका
अंग्रेजी मीडियम लड़कियों को एम सी , बी सी कहते सुना मैंने , समझ नहीं पाई ।तो बेटी ने बताया अरे माँ ये वो वाली गालियाँ है, MC, BC, bossDK, chutiya तो जयपुर में भी आम है। शुक है मैं कस्बाई कॉलेज में पढ़ाती हूँ, वहां ये माहौल नहीं है
-लक्ष्मी शर्मा
बनारस सन बीम स्कूल मे बहन के बच्चे , उसके जेठ के बच्चे पढ़ते है ।बहन ने भी बताया , स्कूल मे भी लड़कियाँ ऐसे बोलती ।
– सपना सिंह
ठीक कहा दी..अच्छी रिपोर्ट..मनोवैज्ञानिक तौर पर कई मामलों में इस तरह की गाली स्त्रीयां या लड़कीयां अपने बचाव के लिए एक आवरण बनाने के लिए भी करती है ताकि लंपटों के जमात के बीच सर्वाइव कर सके। मैंने अपने ऑफिस में देखा है की छुईमुई स्त्रीयों को बहुत कुछ झेलना पड़ता है ..चरित्र और खुद को पुरुष की नजरों से बचाये रखना एक बड़ा काम होता है पर वहीं जो मुँहफट, कटु और गाली देने वाली होती हैं उनसे कोई नही लगता..गालियां देने के प्रवृति के पीछे की मंशा उन पुरुषों से निबटना ज्यादा लगता है मुझे।
– राकेश पाठक
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