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लेखक की भाषा ही उसकी “राष्‍ट्रीयता” है

sushobhit
योसेफ़ कॉनरॉड को अंग्रेज़ी का पहला आधुनिक उपन्‍यासकार माना जाता है।

_______________________________________________सुशोभित सक्तावत की कलम से, इंदौर रहते हैं। पत्रकार हैं, अभिनेत्री दीप्ति नवल की बॉयोग्राफी लिख रहे हैं।

लेखक की भाषा ही उसकी “राष्‍ट्रीयता” होती है। तो “भाषांतर” को क्‍या उसका “विस्‍थापन” समझा जाए? शायद नहीं, क्योंकि लेखक की राष्ट्रीयता “उसकी भाषा” होती है, कोई “एक” भाषा नहीं, और “मातृभाषा” तो क़तई नहीं।

चंद उदाहरणों से इसको समझें।

योसेफ़ कॉनरॉड को अंग्रेज़ी का पहला आधुनिक उपन्‍यासकार माना जाता है। उनके सुगठित वाक्‍य विन्‍यास “लैक्सिकन प्रिसिशन” की मिसाल कहलाते हैं। बाद के सालों में अंग्रेज़ी के जो भी उल्‍लेखनीय “प्रोज़ स्‍टाइलिस्‍ट” हुए, वे सभी कॉनरॉड को अपना उस्‍ताद मानते हैं, चाहे वे फ़ॉकनर हों, नायपॉल हों, रूश्‍दी हों या ग्राहम ग्रीन ही क्‍यों ना हों। वे “हार्ट ऑफ़ डार्कनेस” ना लिखते तो नायपॉल “अ बेंड इन द रिवर” नहीं लिख सकते थे। “नॉस्‍त्रोमो” ने हेमिंग्‍वे को प्रेरित किया। “निगर ऑफ़ नार्सिसस” ने फ़ॉकनर को।

तब इसका क्‍या करें कि बीस साल की उम्र तक योसेफ़ अंग्रेज़ी बोल भी नहीं पाते थे! वे तो पोलिश थे। अंग्रेज़ी उनकी “सेकंड लैंग्‍वेज” भी नहीं थी, वह तो फ़्रेंच थी। तब बाद के सालों में उनके भीतर भाषा का ऐसा मूर्तन कैसे संभव हुआ? अंग्रेज़ी में उन्‍होंने अपने भीतर की कौन-सी लय पा ली? जैसे लोग अपना शहर या मुल्क छोड़कर दूसरे शहर या मुल्क में चले जाते हैं और फिर वहीं रच-बस जाते हैं, ठीक उसी तरह योसेफ़ कॉनराड अंग्रेज़ी के नागरिक हो गए थे।

एक अन्य नाम है व्‍लादीमीर नबोकफ़ का। नबोकफ़ रूसी थे। रूसी में पूरे नौ उपन्‍यास लिखने के बाद उन्‍होंने तय किया कि अब अंग्रेज़ी में लिखना है। और तब, अपने सबसे अच्‍छे उपन्‍यास उन्‍होंने अंग्रेज़ी में लिखे : “पेल फ़ायर”, जिसने औपन्‍यासिक संरचना के नए प्रतिमान रचे। “अदा” जिसने “टेक्‍स्‍चर ऑफ़ टाइम” की नए सिरे से तफ़्तीश की। और हां, “लोलिता” जिसने अनेक नए शब्‍द अंग्रेज़ी को दिए, जैसे कि “निम्‍फ़ेट”।

मिलान कुन्‍देरा की कहानी इससे उलट है। कुन्देरा चेक हैं और प्रारंभ में चेक में ही लिखते थे। कम्‍युनिस्‍टों ने चेकोस्‍लोवाकिया में कुन्‍देरा की किताबों पर बैन लगा दिया तो वे फ्रांस चले आए और वहीं के नागरिक बन गए। 1993 के बाद से उन्‍होंने फ्रेंच में ही लिखना शुरू कर दिया है। मानो चेकोस्लोवाकिया को यह जताना चाह रहे हों कि तुमने मुझे ठुकराया, मैंने तुम्हारी भाषा को ही ठुकरा दिया। यहां पर विडंबना और काव्य-न्याय यह है कि फ्रेंच में लिखी कुन्देरा की तमाम किताबें नाकाम रहीं। जैसे सहसा कुन्देरा लिखना ही भूल गए। उन्होंने जो भी अच्छा लिखा, चेक में ही लिखा। चेकोस्लोवाकिया को वे आख़िरकार ख़ुद से अलग नहीं ही कर पाए।

इस कहानी को और आगे बढ़ाएं। सैम्‍युअल बैकेट को शायद हम लोग अब फ्रांसीसी ही मानते हैं, जबकि वे आइरिश थे। अंग्रेज़ी को वे “लद्धड़” भाषा मानते थे और फ्रेंच को ही साहित्यिक अभिव्‍यक्ति की अग्रणी भाषा स्‍वीकारते थे (जैसे क्‍लासिकी संगीतकार इतालवी को संगीत की भाषा मानते हैं)। ठीक इसी तरह, फ्रांत्‍स काफ़्का चेक थे, लेकिन जर्मन में लिखते थे। वे मानते थे कि जर्मन के बिना लिख ही नहीं पाएंगे और आज भी ऐसी अनेक काफ़्काई अभिव्‍यक्तियां हैं, जिनका अन्‍य भाषाओं में कोई स्‍थानापन्‍न नहीं है, जैसे कि “द जजमेंट” का चर्चित शब्‍द “Verkehr”, जिसकी भिन्‍न व्‍याख्‍याएं होती रहती हैं। यही कारण है कि मुइर्स एक भिन्‍न काफ़्का को अनूदित करते हैं और मॅक्स ब्रॉड एक दूसरे काफ़्का को और काफ़्का की गुत्‍थी अनसुलझी रह जाती है कि उसके यहां “हिब्रू थियोलॉजी” है या “ब्‍यूरोक्रेटिक क्रिटिक” है या “फ़ासिज्‍़म” की आहट है या “अस्तित्‍ववाद” है।

निर्मल वर्मा अंग्रेज़ी और चेक भाषाओं में सिद्धहस्‍त थे, लेकिन उन्‍होंने हमेशा हिंदी में ही लिखा। ख़ोर्खे लुई बोर्खेस अंग्रेज़ों से बड़े अंग्रेज़ थे, “एंग्‍लोफ़ाइल” थे, लेकिन स्पैनिश में ही लिखते थे। “एंग्‍लो सैक्‍सन” महाकाव्‍यों को मूल में पढ़ने के लिए उन्‍होंने जर्मन भी सीखी थी। इमरे कर्तेश बर्लिन में रहते थे, लेकिन हंगारियन में ही लिखते रहे। ओरहन पमुक नफ़ीस अंग्रेज़ी बोलते हैं और उनकी (पूर्व) गर्लफ्रेंड (किरन देसाई) अंग्रेज़ी में लिखकर बुकर पुरस्‍कार जीतती हैं, लेकिन लिखते वे टर्किश में ही हैं। डब्‍ल्‍यूजी सेबल्‍ड ने अपना पूरा जीवन इंग्‍लैंड में बिताया और मैनचेस्‍टर में वे पढ़ाते रहे, लेकिन जर्मन में ही लिखा। रबींद्रनाथ ने बहुत विवश होकर “गीतांजलि” को अंग्रेज़ी में स्‍वयं ही अनूदित किया था। वे मानते थे यीट्स इसका कबाड़ा कर देंगे। फिर भी, जो “गीतांजलि” बांग्‍ला में है, वह किसी अन्‍य भाषा में कैसे होगी? हिंदी तक में नहीं हो सकती तो यूरोपियन भाषाओं की बात ही रहने दें।

भाषा का देश और भाषा से देशांतर : इस सिलसिले को और आगे बढ़ाया जा सकता है। अनंतकथा है। अनेक दृष्‍टांत हैं। एक लेखक की भाषा ही उसकी राष्‍ट्रीयता होती है, यह सच है, लेकिन ज़रूरी नहीं कि वह अनिवार्यत: उसकी मातृभाषा ही हो। जिस भाषा में उसका सवेरा हो, उसका बसेरा वहीं होता है। और बक़ौल ग़ालिब, “रेख़्ते के एक तुम ही उस्ताद नहीं”, जो भी रेख़्ता में रचेगा-बसेगा, वह उसके संगीत को गा सकेगा, और यही लेखक की निष्ठा है। उसकी ज़बान, बोली-बानी, लहज़ा, लहज़े की सिफ़त, यही उसका वतन है, कोई अन्य राजनीतिक अवधारणा नहीं।

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[ तस्वीर : द ग्रेट व्लादीमीर नबोकफ़ ]
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